Tuesday, 29 December 2009

इस मछली के पुनर्वास की फौरी जरूरत है!


कल मैंने ऊपर दिया  चित्र लगाया था यहाँ और उसके बारे में पूंछा था! कुछ जवाब आये हैं -दो तरह के -एक वर्ग मानता है यह कोई मछली है और दूसरा गांगेय डालफिन! एक वर्ग के प्रबल दावेदार हैं हिमांशु तो दूसरे के गिरिजेश! उन्मुक्त जी की मनाही है कि इसे डालफिन न माना जाए ! उन्मुक्त जी ,नहीं मानते हैं इसे डालफिन और न हीं सील -अरे यह स्तनपोषी   थोड़े ही है ! यह तो अपनी मोय -चीतल मछली है ! अंगरेजी में फीदर बैक . गंगा नदी की एक प्रमुख मछली ! यह जिस परिवार की है भारत  में उसकी बस दो प्रजातियाँ हैं -एक नोटोंप्टेरस नोटोंप्टेरस और दूसरी नोटोंप्टेरस चिताला ! पहली छोटी होती है यही कोई आधा फुट की मगर दूसरी जिसकी फोटो मैंने यहाँ लगाई थी कई फुट की हो सकती है -३-४ फुट और वजन भी कई किलो ! मगर दुःख है यह प्रजाति अब दुर्लभ हो चली है! १९८० के दौरान जब मैं मछलियों पर इलाहाबाद में शोध कर रहा था तो यह आसान से हाथ से फेकने वाले जाल -फेकौआ जाल से पल भर में मिल जाती थी उस जगह से जहाँ आजकल ज्ञानदत्त जी सफाई अभियान चलाये हुए हैं ! मगर अब जल्दी नहीं मिलती !



नदियों और कुदरती जल क्षेत्रों  में   तेजी से दुर्लभ होती इस मछली के पुनरुस्थापन का प्रयास मैंने यहाँ बनारस के मत्स्य पालक  मक़सूद अली के सहयोग से राजकीय मत्स्य प्रक्षेत्र उन्दी पर किया  है और सफलता से ब्लॉग परिवार को  भी अवगत कराने की इच्छा  हो आई ! इस सफलता पर जी फूला नहीं समा रहा था जो .....अपने यहाँ तो यह एक महत्वपूर्ण और उम्दा भोज्य मछली है मगर विदेशों की एक मशहूर अलंकारिक ,शोभाकर अक्वेरियम मछली .हम केवल इसे उदरस्थ करते रहे हैं और विदेशी इसे अक्वेरियम की मछली बना कर लाखो करोडो कमा रहे हैं -यह है भारत की  दरिद्रता का करण ! कुछ चित्र और देखें और एक अक्वेरियम में इस मछली की अठखेलियाँ भी !एक्वेरियम व्यवसाय में इस मछली का नाम क्लोन नायिफ फिश कर दिया गया है ! इसके पुनर्वास की फौरी  जरूरत है अब !

पहले आप पहचानिए यह क्या है ,फिर मैं तफसील से बताउंगा!

जी जरा अपने दृश्य और ज्ञान चक्षुओं की परीक्षा लीजिये और बताईये यह क्या है ? फिर मैं तफसील से बताता  हूँ कि यह है  क्या और मैंने क्यों यहाँ साईब्लोग पर इसे जगह दी है!

मुझे लगता है कि उन्मुक्त जी को तो सहजता से बता देना चाहिए मगर फिर भी देखता हूँ ? और सीमा गुप्ता जी ,अल्पना वर्मा जी ,संजय बेंगाणी साहब और मेरे प्रिय मित्र भूत भंजक सहित आओं आओं सब पहेली विद्वान् ,विदुषियों और बूझो यह है क्या आखिर?

Monday, 21 December 2009

अवतार के बहाने विज्ञान गल्प पर एक छोटी सी चर्चा !



 विज्ञानं गल्प फिल्म अवतार इन दिनों पूरी दुनिया में धूम मचा रही है ! फ़िल्म भविष्य  में अमेरिकी सेना द्वारा सूदूर पैन्डोरा ग्रह से एक बेशकीमती खनिज लाने के प्रयासों के बारे में है ! पूरी समीक्षा यहाँ पर है ! अमेरिका में अब यह बहस छिड़ गयी है कि यह फ़िल्म विज्ञान गल्प (साईंस फिक्शन या फैंटेसी )है भी या नहीं.मेरी राय में यह एक खूबसूरत विज्ञान फंतासी ही है और अद्भुत तरीके से हिन्दू मिथकों के कुछ विचारों और कल्पित दृश्यों से साम्य बनाती है!

दरअसल विज्ञान गल्प /फंतासी का  हमारी समांनांतर दुनिया से कुछ ख़ास लेना देना नहीं होता ! हमारे परिचित चरित्र और चेहरे इन कथाओं में नहीं दिखते -क्योंकि अमूमन विज्ञान फंतासी भविष्य का चित्रण करती है -भविष्य  की दुनिया ,वहां के लोग और वहां की प्रौद्योगिकी -या फिर धरती से अलग किस्म की किसी सभ्यता की कहानी! दिक्कत यह है कि जिस दुनिया या लोगों या तकनीक से लोग परिचित नहीं है उसे कैसे और किस तरह दिखाया जाय ! लोग इसलिए ही विज्ञान कथाओं के पात्रों से खुद को जोड़ नहीं पाते और ऊब उठते हैं ! विज्ञान कथाकार /फिल्मकार एक अजनबी से माहौल /परिवेश के चित्रण के साथ यह भी भरपूर कोशिश करता है कि वह दर्शकों को किसी न किसी बहाने रिझाये रहे -यह काम एक  सशक्त कथा सूत्र पूरा करता है जिसमें प्रायः मानव  और मानवता के ही गहरे सरोकार व्यक्त होते हैं -और मारधाड़ के दृश्य भी इनमें बतौर फार्मूले के डाले जाते हैं ताकि विनाश या युद्ध प्रेमी दर्शक लुत्फ़ ले सकें ! साथ ही एक होशियार विज्ञान कथाकार मनुष्य के  जाने पहचाने विचार अवयवों को ख़ूबसूरती से मुख्य कथा की धारा में पिरोता चलता है ताकि दर्शक कथा से जुड़े रह सकें !

इसलिए अवतार में हिन्दू मिथक से अवतारों की अवधारणा ली गयी है -धरती पर अधर्म बढ़ने पर विष्णु अवतार लेते हैं -यह लोगों के मन  में रचा बसा है-इसकी व्याख्या की जरूरत भी नहीं है यहाँ -यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः ....तदात्मानं सृजाम्यहम ! रोचक  बात यह है कि अवतार स्वयं में एक स्वतंत्र  ईकाई होने के बावजूद भी मुख्य चेतना -विष्णु से सम्बद्ध  होता है ! अवतार में भी पैन्डोरा के मूल निवासियों के बीच पहुँचने  के लिए धरती के वैज्ञानिक एक अवतार का ही सृजन करते हैं! मगर तरीका खासा वैज्ञानिक  है -तकनीक को व्याख्यायित किया गया है -जो मिथक  और विज्ञान कथा के फर्क को दर्शाता है! 

पैन्डोरा ग्रह के वासियों के बीच   रहने और उनका विश्वास हासिल करने के लिए उनकी जोड़ के डी  एन ये से मानव   के डी एन ये का मिलान कर -और मूल मनुष्य के मष्तिष्क को पैन्डोरा वासी से ही दिखने वाले प्रतिकृति में "डाउनलोड़" कर अवतार रूपी नायक का सृजन करके नए ग्रह -वातावरण में उतार देते है -वहां  लोग इस "आसमानी सभ्यता " के प्रतिनिधि  को स्वीकार कर लेते हैं और आगे चलकर वही उनका मुखिया बनता है और आसन्न विपत्ति से उन्हें छुटकारा दिलाता है ! कृष्ण भी तो हूबहू यही करते हैं -वे कहीं कहीं तीसी के फूल की सी निलीमा लिए दिखते हैं -पैन्डोरा वासी भी  नीले लोग हैं ! वहां के लोगों की  पूंछे हैं -हिन्दू मिथकों में एक पूंछ से सारी लंका जला दी गयी है ! हिंदूओ मिथक कथाओं में गरुण तो विष्णु के वाहन हैं -पैन्डोरा वासी और उनका मुखिया अवतार भी एक भव्य गरुनाकार पक्षी पर सवारी करत्ता है -वहां विचित्र से घोड़े हैं ! विष्णु का आगामी अवतार भी घोड़े पर चढा हुआ दिखाया  गया है ! लगता है अवतार फ़िल्म की अनेक दृश्यावलियों को सीधे सीधे हिन्दू मिथकों से उड़ा लिया गया है ! अब एक अजनबी ग्रह के वासियों और प्राणियों को फिल्मकार दिखाए भी तो कैसे -हिन्दू मिथक आखिर कब काम आयेगें ?  

आधुनिक विज्ञान कथा  साहित्य का हिन्दू मिथकों से यह समन्वय काफी रोचक है -फ़िल्म देखकर आईये फिर और चर्चा होगी!

Wednesday, 16 December 2009

क्या महिलायें बहलाने फुसलाने में ज्यादा पारंगत होती हैं ?



क्या महिलायें बहलाने फुसलाने में ज्यादा पारंगत होती हैं ? जी हाँ पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में यह हुनर ज्यादा विकसित है -ऐसा कहना है व्यव्हारविदों का ! उनका मानना है कि ऐसा इसलिए होता है कि माताओं पर बच्चों के लालन पालन का दायित्व पुरुषों से अधिक होने के नाते उनका यह स्वभाव ही बनता जाता है -अब बालहठ को आखिर कैसे संभाला जाय ? मैया मैं तो चन्द्र खिलौना लैहों -लीजिये मासूम हठी बालक चान्द ही मांग बैठा ! और वह कविता तो आपको याद होगी न -"हठ कर बोला चाँद  एक दिन ...." यह भी बाल मन को ही इंगित करती कविता है ! अब माँ करे भी तो क्या ..बाप को अपने बाहर के कामों से फुरसत नहीं -और यह शिकारी मनुष्य के काल से ही चलता आया है -घर पर अकेली माँ बच्चे को अब कैसे बहलाए फुसलाये ? तो प्रक्रति ने उत्तरोत्तर माँ को ऐसी क्षमता देनी शुरू की जिससे वह कन्विंसिंग लगे -बच्चे को लगे कि उसकी माँ झूंठ नहीं बोल रही है !... और माँ ने ऐसे निरापद झूठ  बोलने की क्षमता विकास के दौर में हासिल कर ली कि  इस विधा में पारंगत ही बन बैठी !

मगर कहानी यहीं खत्म नहीं होती ..बच्चे तो बच्चे ...बच्चों के बाप भी अक्सर झांसे में आ  जाते हैं -प्रेमी तो अक्सर बनते ही  रहते हैं -क्या मजाल कि झूंठ का ज़रा भी भान हो जाय ! पुरुष इतने सफाई से झूंठ नहीं बोल पाता -याद कीजिये पिछली बार कैसे झूंठ बोलते हुए आप पकडे गए थे...चेहरा सफ़ेद पड़ गया था  और हकलाहट थोड़ी बढ गयी थी न ?और तिस पर झपकती आँखों ने सारे राज का पर्दाफाश कर दिया था ...मगर यह आपको पता नहीं हैं कि मोहतरमा उससे कई ज्यादा बार आपको उल्लू बना चुकी हैं और आपको उसका आभास तक नहीं हुआ ! मगर यह काम महिला एक सरवाईवल वैलू के ही लिहाज से करती है ताकि परिवार का विघटन बचा रहे -बड़े होते बच्चों पर कोई विपदा न आ  जाय !

कई रियल्टी शो नारी के इस  आदिम हुनर का बेजा फायदा उठा रहे हैं -झूंठ बोलने की मशीन का बेहूदा प्रदर्शन कर महिला से यह उगलवाने का निर्लज्ज प्रदर्शन करते भये हैं कि उसका गैर वैवाहिक सम्बन्ध भी   है -अब दर्शक दीर्घ में बैठे बिचारे पति को तो मानो काटो तो खून नहीं ..एक रियलटी शो में मशीन ने जो झूंठ पकड़ा कि लोगों की रूहें काँप गयीं -मोहतरमा अपने पति की ह्त्या ही नियोजित किये बैठी थीं ! यद्यपि झूंठ पकड़ने वाली मशीने खुद भी विवादित रही हैं और बहुत से वैज्ञानिक उनकी सत्यता पर आज भी सशंकित से हैं मगर यह इन्गिति तो हो ही जाती है कि महिलायें ज्यादा सहज हो झूंठ बोल  जाती हैं जो सौ फीसदी सच लगता है !

अंतर्जाल पर ऐसे अनेक दृष्टांत हैं जिन्हें रूचि हो वे यहाँ, यहाँ और यहाँ देख सकते हैं और खुद भी गूगलिंग कर इस रोचक मामले की पड़ताल कर सकते हैं ! कुछ ऐसे मामले हैं जहाँ वह केवल अपने जीवन साथी को खुश रखने के लिए ही झूंठ बोल जाती है जैसे कि उसने उसे सचमुच संतुष्ट कर दिया है !
संकलित कड़ियाँ यहाँ भी हैं  ! 
दावात्याग : अभी भी वैज्ञानिकों में यह मामला विवादित है -यहाँ केवल व्यवहारविदों (ईथोलोजिस्ट  )की राय व्यक्त हुई है!

Sunday, 6 December 2009

बिना वजूद के ही याद हो आये जो वो ड़ेजा वू है .....

हर शख्श के अपने जायज रंजो गम हैं ,गमे रोजगार और गमे मआश हैं ,हमारे आपके भी हैं और लवली कुमारी जी के भी हैं और इसके बाद और बावजूद भी जब वे समय निकाल कर ब्लॉग दुनिया के लिए  योगदान करती  हैं तो सहज ही साधुवाद की अधिकारिणी बन जाती हैं -अब चूंकि  अकादमिक सरोकारों से हम भी बंधे से हैं तो जरूरी हो जाता  है कि कुछ ऐसे ब्लागरों की उन रचनाओं पर एक सार्थक संवाद करें ,भले ही चाहे अनचाहे , जिनका अकादमीय महत्व हो और जहां  कुछ जरूर कहा जाना चाहिए ! लवली कुमारी जी इन दिनों मनोविश्लेषण  पर एक श्रृंखला कर रही हैं ! वे उस अकादमीय 'स्कूल' की हैं जहाँ बात पाठ्य पुस्तकीय शुचिता को हूबहू बनाए रखे हुए  प्रस्तुत की जाती है  ,किसी भी तरह के सरलीकरण से परहेज किया जाता है;भले ही कुछ शब्दों और वाक्यांशों को समझने में गुनी जनों के भी माथे पर पसीने ही क्यों न झलक आयें -उनकी ताजातरीन पोस्ट इसका उदाहरण है -मैं कुछ मदद करने आया हूँ यह विश्वास दिलाते हुए कि मेरा मन   साफ़ है और एक नैतिक तकाजे   के तहत ही मैं कुछ कहना चाहता हूँ -विज्ञान का लोकप्रियकरण मेरा शौक है -मेरी मंशा पर कोई शक न किया जाय ! यह पोस्ट लवली कुमारी जी की इंगित पोस्ट की कोई आलोचना नहीं है -बल्कि एक अंश ("जो कोई दृश्य आप अचानक देखते हैं और आपको लगता है की इस स्थान से मैं पहले गुजर चूका हूँ ..अथवा यह मैंने सपने में या कहीं और (कल्पना में ) देखा है.") की यथा शक्ति सरल प्रस्तुति है! और यह पोस्ट समय को समर्पित है क्योकि वे  गंभीर विषयों के प्रेमी हैं मगर उनकी पोस्ट भी प्रायः  उसी पाठ्य पुस्तकीय शुचिता की पैरोकारी करती हैं -बल्कि वे यथोक्त स्कूल के डीन हैं!



इंगित पोस्ट में मस्तिष्क के कुछ उन विचित्र अनुभवों की चर्चा हुई है जिन्हें फ्रेंच भाषा में डेजा वू (Déjà vu) कहते हैं -जब कभी किसी जगह जाने पर  आपको ऐसा लगे  कि वहां तो आप पहले ही आ चुके हैं जबकि हकीकत में आप वहां नहीं गए  हों या किसी अगले पल घटने वाली घटना का पूर्वाभास सा हो जाय जो ठीक वैसी ही घट जाए जैसा आपने अभी अभी सोचा हो तो ऐसे अनुभव डेजा वू कहलाते हैं .फ्रेंच भाषा में डेजा वू का अर्थ है 'पहले से देखा हुआ -आलरेडी सीन' ! ऐसा होता क्यूं है? लवली कुमारी जी की पोस्ट से इतर आईये समझते हैं इस दिमागी गुत्थी को ! दरअसल मनुष्य की याददाश्त भी कई घटकों में बटी होती है -जैसे लम्बे समय की याददाश्त ,थोड़े समय की याददाश्त या किसी घटना मात्र से जुडी 'इपिसोडिक' याददाश्त और महज तथ्यों से जुडी याददाश्त और इन सभी स्मृति -घटकों के लिए दिमाग के दीगर हिस्से जिम्मेवार होते हैं जहां मस्तिष्क की कोशायें इन तरह तरह की यादों को संजोये रखती हैं .हिप्पोकैम्पस एक ऐसा ही हिस्सा है जो नई स्मृतियों को सहेजता है . इन हिस्सों को प्रयोगशालाओं में रासायनिक और बहुत हलके विद्युत् स्फुलिंगों द्वारा उद्वेलित करने पर कुछ वैसी ही अनुभूतियाँ होती है जैसा कि प्रायोगिक प्राणी -मनुष्य को भी वैसा सचमुच का काम करने पर होतीं -उनके उद्वेलन से बिना सहचर की उपस्थिति के ही  नर मादा में चरमानंद की अनुभूति भी प्राप्त कर ली गयी ! बल्कि ऐसी अनुभूति के लालच में कुछ प्रायोगिक प्राणियों से श्रम साध्य कार्य भी करा लिए गए !

मनुष्य का मस्तिष्क समान सी यादों में फर्क भी कर सकता है और 'समान मगर ठीक वैसी ( आईडंनटीकल ) नहीं ' का भी फर्क जिसे वैज्ञानिक पैटर्न सेपरेशन कहते हैं ! जब यह स्मृति प्रणाली फेल कर जाती है तो मति भ्रम /दृष्टि भ्रम /दिशा भ्रम जैसी स्थितियों से दो चार होना पड़ता है ! डेजा वू भी एक ऐसी ही स्मृति विभ्रम की घटना है ! मिर्गी के मरीज ऐसे अनुभूतियों से प्रायः गुजरते रहते हैं .डेजा वू में मस्तिष्क के दो हिस्सों न्यूरो कार्टेक्स और हिप्पोकैम्पस की पारस्परिक अनुभूतियों में फ़र्क हो जाने से विचित्र  अनुभव होते हैं -न्यूरो कार्टेक्स जहाँ यह  इन्गिति देता है कि आप किसी ऐसी स्थिति में वास्तव में नहीं हैं जिनमे आप दरअसल होते हैं और हिप्पोकैम्पस ठीक उसी समय हकीकत की अनुभूति कर रहा होता है -लिहाजा इन परस्पर विरोधाभासी स्मृति अनुभूतियों के करण डेजा वू जैसी अनुभूति हो जाती है ! यूं कहिये यह याददाश्त प्रणाली का ही एक साईड इफेक्ट है ! इसी तरह जामिया ( jamiya )  वू आपको एक ऐसी स्थिति का आभास देता है जिसमें लगता है कि अमुक स्थिति में तो कभी आप रहे ही  नहीं जबकि हकीकत में वैसी स्थिति से आप पूर्व में गुजर चुके होते हैं!

क्या लवली जी या समय साहब मुझे आप अपनी पाठ्य पुस्तकीय शुचिता  का कुछ पाठ पढायेगें प्लीज और आप दोनों जन कुछ सरलीकरण /लोकप्रियकरण  के गुर सीख लेगें ? ये दोनों ही स्थितियां वैयक्तिक अतिवाद की परिचायक है -कुछ समझौते क्यूं न किये जायं  ?  
संदर्भ :नोबेल लारीयेट सुसुमु टोनेगावा और थामस मैकफ़ के शोध से सारांशित ,टाइम पत्रिका (अगस्त ,20,2007 ,
व्यक्तिगत संकलन)

Wednesday, 25 November 2009

क्या प्रलय सचमुच इतना करीब है ? कौन जाने यह दबे पांव आ ही न जाय !

आगामी २०१२ में प्रलय की अनेक संभावनाएं व्यक्त हो रही है ! एक ब्लाकबस्टर फ़िल्म भी अभी अभी रिलीज हुई है नाम है २०१२!
हिन्दी नाम रखा गया है प्रलय की शुरुआत! क्या फिलम है भाई!हौलनाक,दहशतनाक ,खौफनाक सब विशेषण पानी मांगते नजर आते हैं! कमजोर दिल वालों का हार्ट अटैक हो सकता है -बिलीव मी! मैं तो इंटरवल में ही पनाह मांग गया -बार बार दिल को यकीन दिलाया कि भैये ये हकीकत नहीं है तब जाकर उसने बल्लियों उछलना छोड़ा! आप भी मजबूत कलेजा करके ही इस फ़िल्म को देखें! सच  कह रहा हूँ -इसे कैजुअली लिए तो भुगतिएगा! इस फ़िल्म में धरती का महाविनाश दिखाया गया है!कारण तो बोगस विज्ञान(गलत ढंग और तौर तरीके से पेश हुआ विज्ञान ) है कि सौर ज्वालाओं की अधिकता के चलते न्यूट्रिनो (एक नाभिकीय अनावेषित कण ) की बौछार से धरती का गर्भथल  पिघल उठता है और ऊपरी परतें दरक जाती हैं ,और दरकती चली  जाती हैं -महाद्वीप के महाद्वीप नष्ट होते जाते हैं -भयंकर सुनामियाँ उन्हें लीलती चलती हैं! जैसे खुद महाकाल अपने जबड़ों को खोल सारी दुनिया को निगल लेने को उद्यत हो गया हो! मानवता का वजूद मिटने को है ! एक नई प्रलय आ धमकी है!

कहानी: धरती में पड़ती दरारें और भूकंप जैसी घटनाओं की जांच के संबंध में एक अमेरिकी भूवैज्ञानिक एड्रियन (श्वेतल एजिफर) को अपने एक दोस्त वैज्ञानिक सतनाम (जिम्मी मिस्त्री) से मिलने के लिए भारत आना पड़ता है। सतनाम एड्रियन को दिखाता है कि किस तरह से धरती का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। एड्रियन वापस जाकर इसकी रिपोर्ट अमेरिकी राष्ट्रपति थॉमस विल्सन (डैनी ग्लोवर) के सचिव कार्ल (ऑलिवर प्लैट) को सौंपता है। कुछ अन्य देशों के राष्ट्रपतियों की बैठक के बाद यह साफ हो जाता है कि तीन वर्षो बाद यानी 2012 में धरती का विनाश हो जाएगा।"
मगर क्या यह सब हकीकत में बदल सकता है? क्या २०१२ में प्रलय आने वाली है? क्या उसके पहले नहीं आ  सकती? आने वाली प्रलय अगर वह आई तो कैसी होगी? जल प्रलय? जिसमे सारी दुनिया जल समाधि  लेगी! या फिर अग्नि प्रलय जिसमे सूर्य नेजे पर (धरती के बहुत करीब ) आ जायेगा और धरती भक्क से जल उठेगी! सारीं मानवता  स्वाहा! आखिर ऐसी हे तो होगी प्रलय? मगर वैज्ञानिकों की राय में धरती पर आने वाली आपदाओं में किसी पथभ्रष्ट धूमकेतु या फिर उल्का पिंड या क्षुद्र ग्रह/ग्रहिका की ज्यादा भूमिका हो सकती है जो अचानक ही धरती के परिवेश/कक्षा  में आकर जल कर या सीधे टकरा कर प्रलय सी तबाही मचा सकते हैं! जैसे कि कहा जाता है कि कोई ६ करोड़ वर्ष पहले ऐसी ही एक घटना में डायनोसोर लुप्त हो गए थे!सौ वर्ष पहले रूस के तुंगुस्का में भी एक ऐसी ही घटना में लाखो जीव जंतुओं का सफाया हो चुका है!


प्रलय का कोई दिन मुक़र्रर नहीं है -यह दबे पांव आ  भी सकती है -संभावनाएं हैं मगर २०१२ में ही ऐसा हो कौन निश्चितता से  कह सकता है ? प्रलय आनी होगी तो कभी भी आ  सकती है -आसमान के रास्ते ! दबे पांव ! मगर हम भी तैयार है बल्कि हो रहे हैं ! मेरी माने तो मस्त रहे -धरती का बाल बांका भी नहीं होने वाला है ! मगर मेरी इस बात में क्या दम है -सही आपत्ति है आपकी मगर यह एक अंतर्बोध है जिसके वजूद को विज्ञान की पद्धति में भी इनकार नहीं किया जा सका है !

Sunday, 8 November 2009

प्रोफेसर यशपाल विज्ञान संचार के सर्वोच्च पुरस्कार "कलिंग/कलिंगा पुरस्कार " से सम्मानित!


प्रोफेसर यशपाल को विज्ञान संचार के सर्वोच्च पुरस्कार "कलिंग/कलिंगा  पुरस्कार " से सम्मानित  किया गया है! कभी उडीसा के मुख्य मंत्री रहे बीजू पटनायक  जी ने एक युग द्रष्टा की भूमिका अपनाते हुए इस पुरस्कार के लिए यूनेस्को को मुक्त हस्त से १९५२ मे ही एक बड़ी धनराशि दान कर दी थी -वे भारत के कलिंग फाउनडेशन ट्रस्ट के संस्थापक थे.विज्ञान संचार के क्षेत्र में किसी बड़े योगदान के लिए कलिंगा पुरस्कार प्रावधानित हुआ था -ऐसा काम जो आम लोगों की समझ में  विज्ञान को आसान कर सके ! अभी तक तो ज्यादा वैज्ञानिकों को ही इस पुरस्कार के लिए चुना गया है मगर मानविकी ,पत्रकारिता की भी दुनिया से  लोग आम आदमी  तक विज्ञान की सरल समझ विकसित करने के प्रयासों के लिए इस पुरस्कार के लिए क्वालीफाई  हो सकते हैं ! विजेता को दस हजार स्टर्लिंग पाउंड और यूनेस्को के अलबर्ट आईनस्टीन सिल्वर मैडल से नवाजा जाता है ! अब विजेता को रूचि राम साहनी चेयर भी प्रदान  की जाती है जिसे भारत सरकार ने कलिंग पुरस्कार की पचासवीं जयंती पर संकल्पित किया है !पुरस्कार द्विवार्षिक है और विश्व विज्ञानं दिवस पर १० नवम्बर को  प्रदान किया जाता है !

भारत से अभी तक इस समान से नवाजे गए लोगों की सूची निम्नवत है -
1963-जगजीत सिंह
1991 -नरेंद्र के सहगल 
1996 -जयंत नार्लीकर 
1997 -डी  बाला सुब्रमन्यियन
और अब यशपाल जी को यह पुरस्कार मिला है ! यशपाल  जी के  विज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए किये गए कामों को कौन नहीं जानता -पहली बार सही अर्थों में यह पुरस्कार यशपाल का संस्पर्श पाकर सम्मानित  हुआ है !

Monday, 19 October 2009

नारियां क्यों बनाती है यौन सम्बन्ध ? एक ताजातरीन जानकारी !

विश्वप्रसिद्ध साप्ताहिक पत्रिका टाईम(अक्टूबर ६ ,२००९) का यह ताजातरीन लेख  महिला सेक्सुअलिटी में रूचि रखने वालो /वालियों के लिए रोचक हो सकता है ! एलायिसा फेतिनी द्बारा लिखा  'व्हाई वीमेन हैव सेक्स " शीर्षक यह लेख हो सकता है यौन कुंठाओं वाले एक बड़े भू भाग के  भारतीय उपमहाद्वीप  का प्रतिनिधि  चित्रण न करता हो मगर एक प्रजाति के रूप में मनुष्य की सहचरी के गोपन व्यवहार का कुछ सीमा तक अनावरण करता ही है ! नैतिक मान्यताओं को लेकर आज बहुत कुछ अस्पष्ट और संभ्रमित  भारतीय मानस भले ही ऐसे अध्ययनों से प्रत्यक्षतः दूरी बनाए रखना चाहता हो मगर  ऐसे अध्ययनों के अकादमीय महत्व को सिरे से नकारा नहीं जा सकता !

टेक्सास विश्वविद्यालय के मनोविज्ञानी द्वय सिंडी मेस्टन और डेविड बस ने दुनिया भर से १००० के ऊपर महिलाओं को इस अध्ययन के लिए चुना और नतीजों को पुस्तकाकार रूप भी दे दिया है -उन्होंने २३७ कारण गिनाएं है की क्यों महिलायें यौन संसर्ग करती हैं /राजी होती हैं ! सबसे आश्चर्यजनक है की महज उदाद्त्त प्रेम ही यौन सम्बन्ध बनाने का अकेला सहज कारण  कम मामलों में पाया गया !  टाइम ने  यौन विषयक अध्येताओं का साक्षात्कार भी छापा है ! सार संक्षेप यहाँ प्रस्तुत है -विषय की समग्र समझ के लिए उक्त लेख और सम्बन्धित  कड़ियों के अनुशीलन की सिफारिश की जाती है !

नर - नारी यौन सम्बन्धों के पीछे शारीरिक आकर्षण ,सुखानुभूति (चरम  आनंद !) की चाह या प्रेमाकर्षण /अनुरक्त्तता जैसे अनेक कारण हो सकते हैं ,मगर नारी यौनोंन्मुखता के पीछे  भावात्मक लगाव की  भूमिका रेखांकित की गयी  है ! नारी, पुरुष से कहीं अधिक ऐसे मामलों में यौन सम्बन्ध की आकांक्षी हो उठती है जहाँ मानसिक /भावात्मक जुडाव महसूस करती है ! जबकि पुरुष प्रकृति वश   अवसर की ताक में भी  रहता है ! नारियां छोटे अवधि के सांयोगिक संबंधो को लेकर खास तौर पर सतर्क और "चूजी "  होती हैं ! पुरुष की यौन सम्बन्धों की चाह के पीछे सहकर्मियों में अपने स्टेटस को ऊंचा उठाने की भी मनोवृत्ति जहां आम तौर पर  देखी गयी है इस अध्ययन  में कुछ नारियों को भी इसी मानसिकता के वशीभूत पाया गया है !

नारियां यौन सम्ब्न्धोन्मुख  कब और क्यों होती हैं के जवाब में अध्येताओं का कहना है कि  उनमें भी यह चाह  लैंगिक आकर्षण ,भौतिक  सुख,प्रेम के प्रागट्य और किसी के प्रति लगाव की अभिव्यक्ति या उद्दीपित होने पर आवेग के शमन के लिए भी हो सकता है ! या फिर यह आत्म गौरव या यौन गौरव  (सेल्फ एस्टीम या सेक्स एस्टीम ) को ऊंचा  उठाने  ,लचीले सहचर को खुद तक आसक्त बनाए  रखने की युक्ति और कुछ मामलों में तो महज सर दर्द को दूर करने के उपाय (हाँ, यह कारगर है !) के रूप में यौन सम्बन्ध की अभिमुखता   देखी गयी है ! अध्येता द्वय ने कामक्रीड़ा की आर्थिकी पर भी एक भरा पूरा अध्याय  लिख मारा है जिसमें प्रतिदान (और प्रतिशोध की भी ! ) भावना लिए नारियों के यौन संसर्ग वर्णित हुए हैं ! कोई काम करने के लिए -भले ही वह घर के कूड़े की सफाई में सहयोग (याद आयी दीवाली ? ) ,रात्रिभोज का पक्का इंतजाम या फिर महंगे (स्वर्ण ) उपहार को यौन संसर्ग से हासिल करने की भी जुगत इस्तेमाल में है ! पुस्तक का एक अध्याय नारी यौन  सम्बन्धों  के काले अध्याय पर भी है जहां वे  धोखे का शिकार होती है ,छली जाती है और बलपूर्वक यौन कर्म में संयुक्त कर ली जाती है !


अध्ययन की एक चौकाने वाली जानकारी यह रही कि  महिलाओं ने कहीं कहीं सेक्स सम्बन्ध महज प्रतिशोध के लिए बनाए -धोखेबाज प्रेमी को यौन जनित रोगों का 'उपहार " अपनी सहेलियों  के जरिये या फिर ईर्ष्यावश सहेली के पहले से ही 'इंगेज्ड ' पार्टनर को कामपाश में बाँधने (मेट पोचिंग ) को भी बखूबी अंजाम दिया गया ! इस घटना को अंजाम देने वाली रोमान्चिताओं ने जहाँ यह स्व -कृत्य बखाना वहीं  इससे पीड़ित नारियों ने भी अपना दुखडा भी  रोया ! मैं इन दिनों खुद अंतर्जाल पर मेट हंटिंग (सावधान :नामकरण का कापीराईट मेरा है ) के एक रोचक यौन व्यवहार के अध्ययन में लगा हूँ ! नतीजा तो शायद गोपन ही रह जाय !

नारी यौनोंन्मुखता के पीछे बकौल डार्विन "फीमेल च्वायस " की बड़ी भूमिका है और यह आज भी सही है ! आज की आधुनिका भी  लाख डेढ़ लाख पहले की उसी आदि अफ्रीकी महिला की ही अविछिन्न वंशज है जिसने अपने निर्णय में कोई चूक नहीं की थी और सही पुरुष पुरातन के चयन से  हमारी वंश बेलि का मार्ग प्रशस्त कर दिया था  -एक लैंगिक निर्णय की सफल महिला की सफल जैवीय दास्ताँ है मानव विकास ! आज उसी महिला महान की वंशधर नारियां वैसी ही  यौन मानसिकता /मनोविज्ञान -पुरातन ज्ञान  का वरण किये हुए हैं जिसका जीवनीय मूल्य है ! उनका यौन चयन आज भी व्यापक मामलों में बेहतर उत्तरजीविता और प्रजनन सफलताओं की गारंटी है !


और यह हकीकत है कि  लैंगिक प्रतिस्पर्धा के जैवीय परिप्रेक्ष्य में "वरणीय नर " जल्दी ही प्रणय आबद्ध हो इंगेज्ड हो उठते  हैं -कोई न कोई उनकी अंकशायिनी बन ही जाती हैं -इस मानवता के परचम को भी तो बुलंद किये रहना है मेरे भाई !  सुयोग्य वर की तलाश इसलिए ही सदैव मुश्किल रहती है -योग्यतम जल्दी चुन जो लिए जाते हैं - कहीं  न कहीं प्रणय  पाश में बध ही जाते हैं. प्रेम या योजित किसी भी तरह के सम्बन्ध में   ! इसतरह योग्य पुरुष के लिए आज भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, नारियों में मनचाहे पुरुष चयन की प्रतिस्पर्धा जारी है !

पूरी किताब भले  न मिल सके इस पूरे आलेख का आस्वादन  यहाँ  मय समस्त कड़ियों और नयनाभिराम चित्रों के किया ही जा सकता है -मेरी सिफारिश है !

Monday, 12 October 2009

छठी का दूध याद है ? अरे वही पांचवा स्वाद ?

काफी समय  तक यही  माना जाता रहा की  मनुष्य की जीभ चार मूल स्वाद ग्रहण कर सकती है -मीठा ,खट्टा,कसैला/तीता    और नमकीन .स्वाद की अनुभूति में गंध की भी अहम् भूमिका होती है -जुकाम के समय व्यंजनों का स्वाद न मिलने का कारण यही है ! मगर ठीक   १०० साल पहले जापान एक प्रोफेसर  किकुने एकेडा ने एक समुद्री सेवार (सी वीड ) से निकले पदार्थ "अजीनोमोटो" से  पाँचवे स्वाद का जायका लोगों को दिलवाया.  "अजीनोमोटो" यानि ग्लूटामेट  (जो एक  नान -एसेंसियल अमीनो अम्ल है)  को चखने से एक नए स्वाद की अनुभूति लोगों को हुई !  और यही आगे चल कर पांचवा स्वाद कहलाया .बताते चलें कि नान एसेंसियल अमीनो अम्ल वे हैं  शरीर जिनका  उत्पादन  कर सकता है और एसेंसियल अमीनो एसिड वे होते हैं जिनका उत्पादन शरीर नहीं कर सकता और जिन्हें बाहर से लेना जरूरी हो जाता है  .  पाँचवे स्वाद का नामकरण हुआ युमामी (Umami ) जो जापानी शब्द है जिसका हिन्दी में कामचलाऊ अर्थ है "स्वादिष्ट"!अगर अब कोई पूंछे की स्वाद कितने प्रकार का होता है तो  मीठा ,खट्टा ,कसैला  /तीता और नमकीन के साथ  युमामी का जिक्र करना न भूलें .


ग्लूटामेट का इस्तेमाल हम अक्सर चायनीज व्यंजनों में करते हैं - अपने यहाँ मशहूर "चायनीज" व्यंजनों - चाओमिन ,चिली पनीर ,मंचूरियन आदि में मोनोसोडियम ग्लूटामेट (एम् एस जी ) ई -६१  डाला जाता है ! इसका व्यापारिक निर्माण जापान की अजीनोमोटो (Ajinomoto Kabushiki)  नाम से जानी   जाने वाली कम्पनी करती है जो दुनिया में इस पदार्थ के सम्पूर्ण खपत का अकेले ३३% आपूर्ति करती है ! इसलिए ही आम बोल चाल की भाषा में ग्लूटामेट अजीनोमोटो बन गया !


अजीनोमोटो (Aji no Moto = “Essence of Taste,”)  का शाब्दिक अर्थ है स्वाद का सत्व ! यही मोनो सोडीअम ग्लूटामेट है जिसकी खोज  केकुने   इकेदा ने किया और १९०९ में इसे जापान में ही पेटेंट करा लिया ! मुझे याद है मैंने पहली बार MSG(मोनोसोडियम ग्लूटामेट) का स्वाद तब चखा था जब मैगी उत्पादों(नेस्ले) का भारत में चलन शुरू हुआ था -यही कोई बीसेक वर्ष पहले !वैसे इसके पहले ही अजीनोमोटो नाम से यह पदार्थ पंसारी /किराना की दुकानों पर भी मिल जाता था ! मैंने बाद में जाना कि अरे यही अजीनोमोटो ही मोनोसोडियम ग्लूटामेट है !  लेकिन तब तक मैगी ने अच्छा खासा पैसा खलीते से निकाल लिया था ! तब मैगी इसका व्यापार स्वाद वर्धक के रूप  में छोटी पुड़ियों में कर रही थी ! मुझे तभी इसका स्वाद भाया  था  और अब तो आज के बच्चों की यह पहली पसंद बन गया है ! अनेक वैज्ञानिक परीक्षणों में पाया गया है कि यह मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए निरापद है बशर्ते मात्रा का नियंत्रण रखा जाय !




पके टमाटरों में और  चीज उत्पादों में  कुदरती तौर पर ग्लूटामेट मिलता है ! इसमें सोडियम आयन की मात्रा भी खाने वाले सामान्य नमक से काफी कम होती है -मतलब स्वास्थ्य की दृष्टि से ब्लड प्रेशर आदि के कुछ मामलों में साधारण नमक का  यह बेहतर विकल्प हो सकता है ! कई पके फलों और खमीर वाले फरमेंटएड   खाद्य पदार्थों में यह पर्याप्त मात्रा में मिलता है -पके टमाटर में  तो भरपूर ही - २५०-३०० मिली ग्राम /प्रति १०० ग्राम ! और माँ के दूध में भी इसकी मौजूदगी (०.०२%) होती है !फिर तो  इसका स्वाद बचपन से हमारे मुंह लगा हुआ है !  वैसे भी मानुष जाति  यानि हम ठहरे चटोरे जनम के ....

तो पांचवे स्वाद की कहानी कैसी लगी ? खट्टी या मीठी ?...या युमामी !

Wednesday, 7 October 2009

क्या आप बता सकते हैं कि.....

क्या आप बता सकते हैं कि हिरन और मृग में क्या अंतर है ? या फिर उत्तरप्रदेश का राज्य पशु और पक्षी क्या है ? घड़ियाल और मगरमच्छ में क्या अंतर है ? या कौन सा पक्षी है जो अपने पंखों से ही पतवारों का काम लेकर तैरता भी है ? सवाल दर सवाल मगर सब के सही जवाब ! और उत्तर बड़े बूढों ने नहीं दिए बल्कि बच्चों ने उमग उमग कर ये उत्तर दिए -मन  बाग बाग हो गया ! अवसर था चौवन्वे वन्य जीव सप्ताह (१-७ नवम्बर ) के समापन आयोजन का ! जो आज वन विभाग के सौजन्य सारनाथ के मृगदाव पार्क में सम्पन्न हुआ !





                          वाराणसी वृत्त के वन संरक्षक श्री आर एस हेमंत कुमारके साथ मैं
अपने देश में नई पीढी अब जीव जंतुओं की जानकारी के प्रति चैतन्य हो रही है -यह सचमुच बहुत ही सुखद है ! आज वन्य जीवों की जानकारी की ओर बच्चों की रुझान बढ़ने के लिए कई कार्यक्रम /प्रतियोगिताएं आयोजित हुईं जिनमे वन्य जीवन पर चित्रकारी .,निबंध प्रतियोगिता ,भाषण आदि प्रमुख रहे ! मैं इस अवसर पर उपस्थित होकर धय्न्य हुआ -आज का पूरा दिन वहीं बीता ! प्रभागीय वनाधिकारी (डिविजनल फारेस्ट ऑफीसर ) श्री लालाराम बैरवा (आई ऍफ़ एस ) ने कल ही मेरी वन्य जीवों की अभिरुचि को लक्ष्य कर आज के कार्यक्रम में निमंत्रित किया था ! वाराणसी वृत्त के वन संरक्षक श्री आर एस हेमंत कुमार जो मूलतः आंध्र  प्रदेश के हैं  और उत्तर प्रदेश कैडर के सीनियर आई ऍफ़ एस हैं मुख्य अतिथि रहे -विनम्र ऐसे कि मुझसे तब तक  मुख्य अतिथि बनने और उस विशिष्ट्तम  कुर्सी पर बैठने का आग्रह करते रहे जब तक कि मैंने किंचित बल  से ही उन्हें उस कुर्सी पर आसीन नहीं करा दिया ! वे ही उसके सर्वथा योग्य भी थ .कार्यक्रम का सञ्चालन श्री ओ पी गुप्ता उप संभागीय वनाधिकारी ने किया ! श्री आर एस यादव रेंज आफीसर ने कार्यक्रमों का संयोजन किया !


 कार्यक्रम में बच्चों ने ही नहीं बच्चियों ने भी बढ़ चढ़  कर हिस्सा लिया

हमने कार्यक्रमों के औपचारिक समापन के बाद वन्य वशुओं का पालतू बाद भी देखा और उन्हें कुछ खिलाया  भी ! नीचे  चित्र देखिये इसमें आगे की ओर तो कृष्ण मृग है (ब्लैक बग -antelope ) और पीछे चीतल, जो हिरन (deer )  है !  जान लें कि जो हर साल सींगे गिरा देता है वह हिरन है और जो जीवन एक ही सींग से गुजर देता है वह मृग -बच्चों को भी बता देगें यह प्लीज ! और हाँ उत्तर प्रदेश का राज्य पशु बारहसिंगा (हिरन ) है-

और पक्षी सारस यानि क्रौंच  (crane ) ! (पहले जानते रहे इसे ? खैर कोई बात नहीं इस बार के वन्य पश्य सप्ताह पर ही जान लें ! ) घडियाल की लम्बी थूथन होती है जिस के सिरे पर एक घरिया (एक तरह का छोटा मिट्टी का पात्र ) नुमा रचना होती है जबकि मगर का थूथन तिकोना लिए होता है ! और पेंग्विने अपने डैनों से तैरती हैं ! कोयल और पपीहा नीड़ परिजीवी हैं यानि घोसला नहीं बनाती बल्कि दूसरे के घोसले में अंडे पारती हैं -कोयल कौए के और पपीहा सतबहनी (बैबलर ) के ....इन क्विज का जवाब बच्चे बेलौस देते गए और मुख्य अतिथि से  इनाम झटकते गए .





आप भी भारतीय वन्य जीवन से बच्चों को अवगत करने का सिलसिला शुरू करे ! इस वन्य जीव सप्ताह पर यही आह्वान है !

Monday, 5 October 2009

गंगा की गोद की सिसकती सूंस को मिला राष्ट्रीय जल जंतु का दर्जा


वन्य जीव सप्ताह (१ अक्तूबर -७अक्तूबर ) में इससे अच्छी खबर कोई हो नहीं सकती ! पिछले तकरीबन पचास सालों से मनाये जा रहे इस सरकारी पर्व पर इससे अच्छी बात मैंने कभी नहीं देखी सुनी-यह वन्यजीव सप्ताह भी एक और औपचारिक सरकारी आयोजन के रूप में सिमट गया होता मगर अब यह यादगार बन गया है -सूंस (डालफिन)  को राष्ट्रीय जल जंतु का दर्जा दे दिया गया है ! सूंस गंगा की  गोद में न जाने कब से सिसक सिसक कर अपनी जान की दुहाई मांग रही थी -अब सरकार के कानो पर जू रेंग गयी है !

वात्सल्यमयी गंगा न केवल हमारी वरन अनेक जल जंतुओं की प्राण दायिनी रही हैं -मगर कृतघ्न ,लोभी और अदूरदर्शी मानव के पर्यावरण विरोधी कारनामों से गंगा की छाती विदीर्ण होती रही है -उसकी आँचल की छाव तले पल बढ़ रहे अनेक जीवो की जान पर बन आई है -जिसमें सबसे बुरी गति गंगा की डालफिन (Platanista gangetica ) यानि अपनी सूंस की हुई है -दरअसल गांगेय सूंस एक विलक्षण प्राणी है -यह अंधी है बेचारी मगर मनुष्य की मित्र है ! हिन्दी में तो सूंस मगर बंगाल में सुसक या सिसुक और संस्कृत में सिसुमार के नाम से विख्यात इस जलीय जीव का अस्तित्व संकट में पड़ गया है !






प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में अभी कल ही सम्पन्न राष्ट्रीय गंगा रीवर बेसिन अथारिटी की बैठक में जब बिहार के मुख्य मंत्री नितीश कुमार ने गंगा की डालफिन को राष्ट्रीय जलीय जंतु बनाए जाने की घोषणा की तो इसे सहज ही स्वीकार कर लिया गया .इस तरह नितीश कुमार अब जीव  जंतु प्रेमियों के भी हीरो बन गये हैं ! सूंसों की संख्या तेजी से गिरी है और ये अब २०० से भी कम रह गयीं है -मादा सूंस नर से बड़ी होती है और दूर से देखने में भैंस के छोटे से बच्चे की तरह लगती है काली सी मगर दिल वाली ऐसी कि कई डूबते लोगों की सहायता के भी इसके किस्स्से सुने गए हैं ! बाढ़ के दिनों में ऐसा लगता है कि भैसके बच्चे पानी के भीतर अठखेलियाँ खेल रहे हों ! गंगा की डाल्फिने समुद्र में प्रवेश नहीं करतीं और शायद इनकी मुसीबत का एक करण यह भी है -बाकी डालफिन प्रजातियाँ फिर भी समुद्र की अपार जलराशि में अपनी वंश रक्षा कर ले रही हैं .




बाघ के राष्ट्रीय पशु और मोर के राष्ट्रीय पक्षी घोषित होने के बाद गंगा की  डालफिन को राष्ट्रीय जल जंतु का दर्जा दे दिया गया है -इस तरह अब गंगा की डालफिन के जीवन मृत्य का प्रश्न अब हमारी राष्ट्रीय पहचान से जुड़ गया है ! यह वन्य जीव अधिनियम १९७२ के अधीन पहले से ही अबध्य प्राणी है -शिड्यूल एक में है ! अब यह राष्ट्रीय गौरव का भी प्रतीक बन गयी है ! मुख्यमंत्री नितीश कुमार की इस पहल के लिए वे वाहवाही के हकदार हैं .

Sunday, 4 October 2009

वैज्ञानिकों ने जाना चिर युवा होने का राज !

अखबारों में  यह खबर सुर्खियों में है ! कभी च्यवन ऋषि ने चिर युवा बने रहने का नुस्खा हासिल किया था च्यवनप्राश के रूप में ! मगर आज का च्यवनप्राश मानकों पर खरा नहीं उतरता ! उम्र की ढलान को रोकने के लिए दुनिया भर में वैज्ञानिक कब से लगे हुए हैं -नए नए नुस्खों और माजूमों के साथ ! नित नई नई पेशकशें ! और अब यह -

वैज्ञानिकों का नया दावा है कि है कि बढ़ती आयु और आयु संबंधी बीमारियों का उपचार संभव है। हाल ही में चूहों व बंदरों पर किए गए शोध में वैज्ञानिकों ने जीवनकाल बढ़ाने के तरीके को खोज निकाला है। इससे इंसान लंबे समय तक युवा रह सकेगा।


यूनिवर्सिटी कालेज लंदन के इंस्टीट्यूट आफ हेल्दी एजिंग के वैज्ञानिकों ने मानव जींस 'एस6 कायिनेज 1' [एस6के1] में हेरफेर कर उम्र बढ़ाने वाले प्रोटीन के उत्पादन को रोके रहने में सफलता पायी है । चूहों पर किये गए प्रयोगों में शोधकर्ताओं   ने यह भी पाया है कि  कैलोरी खपत की मात्रा को 30 प्रतिशत तक घटाकर जीवनकाल को 40 फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है। अमेरिकी पत्रिका 'साइंस' में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक एस6के उत्पादन को रोककर भी यही फायदे हासिल किए जा सकते हैं। इसके लिए आहार  में कमी करने की कोई जरूरत नहीं। एस6के1 भोजन में बदलाव के बारे में शरीर की प्रतिक्रिया निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाता है।



देखा गया की ऐसे चूहों जिन के जीन में वांछित बदलाव कर दिए गए थे अन्य चूहों से २० फीसदी अधिक काल तक जिए -वे कुल ९५० दिन जिए आम चूहों से १६० दिन अधिक ! इन चूहों में टाईप २ मधुमेह जैसी बीमारियां भी नहीं हुईं ! उनकी  टी कोशिकाएं जो रोगरोधी होती हैं भी तरोताजा देखी गयीं -मतलब उम्र के बढ़ने  के साथ मनुष्य की रोग रोधन क्षमता का ह्रास होना भी इस अध्ययन से प्रमाणित हुआ है !वेलकम ट्रस्ट द्वारा पोषित इस अध्ययन से जुड़े डेविड जेम्स का कहना है की "इस अध्यन से हम उम्र की बढ़त को रोकने का सहसा ही एक कारगर नुस्खा पा गए हैं ! चूहों पर इस शिद्ध के बाद मेटफोमिन नामक दवा का ट्रायल अब मनुष्य पर किया जाएगा ! रापामायासिन  भी सामान प्रभावों वाले औषधि के रूप में देखी जा रही है !



 

Monday, 21 September 2009

हरित क्रांति के प्रणेता तथा पद्मविभूषण से सम्मानित नारमैन बोरलाग नहीं रहे !





कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलाग
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और पद्म विभूषण से सम्मानित जाने माने  कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलाग नहीं रहे  .विकासशील दुनिया में भूख से लड़ने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए उन्हें १९७० में प्रसिद्ध नोबेल शान्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था .वे  95 साल के थे .विगत १२ सितम्बर को कैंसर से उनका निधन हुआ !

1960 और 1990 के बीच बोरलाग ने   गेहूं उत्पादन को भारत में चौगुना बढाकर 'हरित क्रांति' का स्वप्न साकार कर दिखाया .1950 के दशक में बोरलाग और उनकी टीम ने रोग प्रतिरोधी, उच्च गेहूं की किस्में पैदा की और विकसित  खेती के तरीके में सुधार किया. अपने काम से विकासशील देशों में भुखमरी से लाखों लोगों को बचाने में निर्णायक भूमिका निभायी .भारत के प्रमुख कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन ने  हिंदू को बताया, "वह असाधारण मानवता प्रेमी थे , एक भूख से मुक्त दुनिया को साकार करने को  प्रतिबद्ध उनका  योगदान बहुआयामी था - वे एक साथ ही वैज्ञानिक , राजनैतिक और मानवतावादी थे . "

बोरलाग ने 1986 में विश्व खाद्य पुरस्कार शुरू करने में  महत्वपूर्ण भूमिका अदा की जो  अब खाद्य और कृषि  के लिए नोबेल पुरस्कार माना जाता है .

 नोर्मन ने एक बार कहा था: 'मैं घोर गरीबी , भूख और मानव दुख के बीच में व्यक्तिगत तौर पर आराम से नहीं रह सकता , निंदा और गरीबी के जीवन में रह रहे   परिवारों से दुनिया में शांति नहीं हो सकती ..."

Monday, 14 September 2009

प्यार में ज़रा संभलना ......बड़े धोखे हैं इस राह में !

मानव प्यार की जटिलताओं को विवेचित करती लगातार यह  तीसरी पोस्ट इस श्रृखला की फिलहाल अंतिम कड़ी है ! इश्क से दीगर मसले और भी तो हैं ! प्रेम के जोडों में कई कुदरती अवरोधक (जिनकी चर्चा पिछले पोस्ट में हुयी है ) अनुपयुक्त साथी की पहचान कर उन्हें आगे बढ़ने से रोक देते हैं ताकि अनचाहे गर्भ धारण और बाद की झंझटों ,बच्चों के लालन पालन के साझे बोझ को उठाने की समस्याओं से बचा जा सके !

दिक्कत है कि हमारे कई सामाजिक रीति रिवाज जो दरअसल अनुपयुक्त  जोडों के मिलन  के निवारण के लिए ही आरम्भ हुए,जैसे स्वयंवर  ही ,कालांतर में मात्र (विवाह की  ) रस्मो अदायगी तक सीमित रह गए ! उपयुक्त वर के  तलाश की कवायद तो आज भी जारी दिखती है (वधू की कम ही ! ) ,कई उपक्रम किये जाते हैं ,पंडित -फलित ज्योतिषी गणना करते हैं ("गन्ना मिलाना ",=गुण मिलाना ) फिर एक आदर्श जोड़ा /जोड़ी को सामाजिक हरी झंडी मिल जाती है ! मगर पूर्वजों द्वारा सही जोड़े के मिलान की 'कुदरती जरूरत' की समझ जहां विस्मित करती है वहीं आजकल इसके नाम पर चल रहे समझौते इस व्यवस्था के मूल उद्येश्य पर  ही प्रश्नचिहन लगाते हैं !

विवाह के रूप में जितने  जोडों को सामाजिक स्वीकृति मिलती है उनमें  कुदरती तौर पर कितने फीसदी सही जोड़े होते हैं यह भी एक मुद्दा है ! इसी तरह बलात्कार और वैश्यावृत्ति में भी कुदरत के सही जोड़ा मिलान की व्यवस्था ध्वस्त हो रहती है ! ये  कुदरत की सच्चे प्यार से उपयुक्त जोड़ा बंधवाने की व्यवस्था को धता बताते मानव व्यवहार के बड़े उदाहरण रहे !

कुछ छोटे छोटे झांसे भी देकर गलत जोड़े बनने के मामले अध्ययन के दौरान प्रकाश में आये हैं - जहाँ कुदरत की अनपयुक्त को पहचाने की मशीनरी फेल हो जाती है ! मसलन कोई दुर्घटना हो गयी -प्लेन ,ट्रेन , मोटर क्रैश ,अग्निकांड ,बाढ़ -इस दौरान दूसरों की भलाई के लिए शरीर की एक और व्यवस्था सक्रिय हो उठती है -कुछ लोगों में बहुत तीव्रता के साथ प्राणोत्सर्ग (altruism )तक की भावना उछाल मारती है -इस दौरान किसी ने किसी को जान पर खेल कर बचा लिया तो अचानक  हादसे के चलते धमनियों में तुरत  बढ़ गए "हादसा हारमोन " ऐडरनलीन के प्रभाव में  शरीर की अनुपयुक्त जोड़े के पहचान के प्रक्रिया फेल कर जाती है और जोडों में एक आकर्षण/कृतज्ञता भाव उत्पन्न हो जाता  है . फिल्मों में छोटी मोटी दुर्घटनाओं के बाद नायक नायिका में पनपते प्रेम का दिखाया जाना अकारण नहीं  है !

  मगर सावधान यह संतानोत्पत्ति के लिए सही जोड़ा नहीं भी हो सकता है ! इसी तरह जो महिलायें  गर्भ निरोधक गोली नियमित तौर पर ले रही होती हैं उनमें भी सही गलत जोड़े के पहचान की कुदरती व्यवस्था जवाब दे जाती है -क्योंकि गर्भ  निरोधक जो स्वयं एक तीव्र प्रभाव वाले हारमोन हैं और नारी की अंडोत्सर्जन प्रक्रिया को बाधित करते हैं " साईड  इफेक्ट " में  सही जोड़े की पहचान को प्रभावित कर देते हैं ! पश्चिमी देशों में  एक अध्ययन में तो यह पाया गया कि गर्भ निरोधक गोलियों  के इस्तेमाल के दौरान बने प्रणय सम्बन्ध और  विवाहों में तलाक की दर बहुत ज्यादा है ! जाहिर है नकली प्रेमी इस दौरान "एम् एच सी " फैक्टर की पहचान को धता बता देता है !

वैसे भी इश्क का बुखार लम्बे समय तक नहीं  चलता यह या तो "सहचर प्रेम " ( companionate love !)  में तब्दील हो जाता है  या फिर शनैः शनैः मिट जाता है जब यह कुदरत की मूल प्रजनन /संतानोत्पत्ति की भावना को किन्ही कारणों से भी चरितार्थ नहीं कर पाता ! मानवीय संदर्भ में जो सबसे महत्वपूर्ण जैवीय मुद्दा है वह ऐसे जोड़ा  बंधन (पेयर बांडिंग ) को बढावा देने का है जो संतति की जिम्मेदारियों का कुशलतापूर्वक वहन कर सकें -महज मौज मस्ती ही नहीं ! इसलिए निरे रोमांस पर लगाम लग जाती  है और यह किसी की जिन्दगी को लम्बे वक्त तक तबाह नहीं करता -" सहचर प्रेम " में बदल जाता है या फिर मिट जाता है ! भले ही असफल प्रेम के अनगिनत किस्से कहानियाँ को जन्म देकर ! मनुष्य जैसा तार्किक (और अतार्किक !)प्राणी भी इक मुकाम पर इसलिए ऐसे इश्क से तोबा कर लेता है जो फलदायी न हो -उतरती जाए है रोमांस की खुमारी अहिस्ता आहिस्ता ! 

मगर इसका मतलब यह भी नहीं कि जोडों में रोमांस कुछ कमतर हो जाता है -यह सहचर प्रेम में तब्दील होकर अक्षुण हो उठता है -कई शादी शुदा जोडों में वर्षों उपरांत भी उनके ब्रेन का वह हिस्सा उद्दीप्त पाया जाता है जो कि इश्क के दीवानों में दमकता रहता है ! मगर ऐसे मामले अपवाद ही हैं !

Sunday, 13 September 2009

लवेरिया हुआ ,मगर हुआ क्यूं ?

कमीने इश्क के बाद जो कुछ और सामग्री इस बहुप्रिय विषय पर मेरे खलीते में थी उसे रिसायिकिल बिन में डाल दिया था ,मगर आज फिर उस बिन को खलिया कर निकाल लाया हूँ -अब चिट्ठे पर भी कभी कभार कुछ कचरा नहीं आयेगा तो फिर कैसे श्रेष्ठ रचनाओं की तुलनात्मक साख बनेगी ! लिहाजा इश्क ,प्रेम ,वासना ,यौनाकर्षण जो भी कह लें आप , पर कुछ और जानकारी लेकर बन्दा हाजिर है !

मगर पहले एक  पाठ दुहराई  हो जाय तो फिर मामला आगे बढे ! अब तक यह तय पाया गया कि कुदरत को इसकी तनिक भी परवाह नहीं कि हम लवेरिया या रोमांस के रस में कितना सरोबार और डूब उतरा रहे हैं ,उसका मकसद तो खास तौर पर यही रहता है कि उसकी जनन लीला बदस्तूर जारी रहे और प्रेम को समर्पित जोड़े (पेयर बांड ) संतानोत्पत्ति कर शिशुओं की देखभाल का भी जिम्मा  साथ उठायें ! बस इसी काम को अंजाम देने को कुदरत ने ये सारे चोचले गढे हैं !

पुरुष स्वभावतः सुन्दर चेहरों का चहेता है -"हर हंसी चेहरे का मैं तलबगार हूँ " .यही नहीं वह भावी सहचर में उन घटकों /अवयवों की भी चेतन -अवचेतन  तलाश करता है जो प्रजनन -उर्वरता की द्योतक हों . वह ऐसे स्पष्ट यौन संकेतकों  की तलाश करता है जैसे पतली कमर और चौडे कूल्हे जो प्रजनन की उर्वरता का पावरफुल संकेत देते  हैं ! इसी तरह नारियां भी चौडे और पुष्ट कंधे ,चौड़ी छाती , कसी मुश्कों  ,और भरी पूरी दाढी पर फिदा होती हैं -यह सारे लक्षण नर हारमोन के प्राबल्य को जताते हैं !

यौन गंध  सूघने में मनुष्य की नाक भी कोई नीची नहीं है .साबित हो चुका है कि  साथ साथ रहने वाली नारियों का मासिक चक्र मेल कर जाता है ! यह रासायनिक गंध संकेतो के जरिये ही संभव होता है ! पुरुषों का अवचेतन ही यह भाप लेता है कि अमुक नारी का अंडोत्सर्जन ( ओव्यूलेशन  )कब हो जाता है, जिस समय निषेचन की सम्भावना सबसे अधिक होती है ! इस काल में पुरुष सहचर उसके प्रति बहुत  केयरिंग ,याचनापूर्ण और चाँद  सितारे तोड़ने का  भी संकल्प लेने को उतारू दिखता है ! एक होता है मेजर हिस्टोकाम्पैटीबिलिटी फैक्टर ( एम् एच ऍफ़ ) जो यह क्ल्यू देता है कि प्रेमोन्मत जोड़े संतति वहन के योग्य हैं भी या नहीं ! इसका चूकिं गर्भ रक्षा से सीधा सम्बन्ध होता है और एक जैसे एम् एच ऍफ़ के रहते गर्भ रक्षा संभव नहीं है तो चुम्बन के समय लार के विनिमय से इसकी पहचान अवचेतन में ही जोड़े कर लेते हैं और समान होने पर प्रत्यक्षतः किसी न किसी बहाने से दूर होने लगते हैं !

हामरे कई सांस्कृतिक रीति रिवाजों में यौन वर्जनाओं के पीछे अनचाहे गर्भ और यौन जनित बीमारियों के रोक की ही कवायद होती है जो पुश्तैनी तौर पर चली आ रही हैं ! आज की आधुनिक जीवन शैली के "समागम पूर्व " व्यवहार -डेटिंग और पेटिंग भी जोडों की यौन उपयुक्तता की छान बीन के तरीके हैं जो उपयुक्त सहचर के चयन का मार्ग ही प्रशस्त करते हैं !  कुछ सच्चे जोडों के मस्तिष्क के अंदरूनी हिस्सों को फंक्शनल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजेस के जरिये देखा गया है जो अपनी सक्रियता के उच्च  बिंदु पर जा पहुँचते हैं जिसमें डोपामाईन रसायन के प्रमुख भूमिका होती है ! सक्रियता के ये पहचान बिंदु  वेंट्रल तैग्मेंटल एरिया में उभरते हैं -जिसकी आगे की प्रक्रिया को ऊपर का एक हिस्सा न्यूक्लियस अक्यूम्बेंस संभालता है जहाँ डोपामाइन के साथ अब सेरोटोनिन (यह केले में मिलता है -खूब खाईए केले मूड फ्रेश रहेगा ) भी आ मिलता है ! आगे स्नेह.वात्सल्य भावना का जिम्मा  आक्सीटोसिन नमक हारमोन निभाता है ! बच्चों के जन्म पर भी इसी आक्सीटोसिन का निकलना अधिक रहता है जो माँ में ममत्व उभारता है ! यहाँ  तक कि प्रसूति गृहों में सद्य प्रसूता के साथ की महिलाएं भी तीव्र ममत्व का अनुभव करती हैं -जाहिर हैं आक्सीटोसिन उनकी घ्राण इन्द्रिय को भी प्रभावित करता है !

ब्रेन का लव सिग्नल कौडेट  न्यूक्लियाई में होता है जो दोनों ओर यानि जोड़े में होता है -प्रेम के भावातीत भाव को यही प्रेरित करता है ! इस तरह कई जैव रसायन (opioids )  जब सक्रिय होते हैं तब  हम आप यह समझ लेते हैं किसी अमुक ने सुखद अनुभूतियों का पिटारा आपको सौंप दिया है जबकि यह खुद हमारा   ही मस्तिष्क होता है जो हमें  खुशियों की सौगात सौंपता
है !
अभी कुछ और है आगे ...

Thursday, 10 September 2009

मछली सुन्दर सलोनी ,मगर खतरनाक कितनी ?

मैं आज मानव प्रणय श्रृखला को आगे ले जाना चाहता था मगर न जाने किस अज्ञात प्रेरणा से इसी विषय से सम्बन्धित लगभग उन्ही तथ्यों के साथ एक पोस्ट फिर  यहाँ आ गयी -अब स्तब्ध मैं अपने लिखे को कूड़े में मतलब फिलहाल रिसायिक्लिन बिन में डाल कर अब आपके लिए कुछ नया लेकर आया हूँ -वो कहते हैं न कि दुनिया में और भी गम हैं इक मोहब्बत के सिवा !
मैंने पिछले   दिनों मैदानी कार्यों पर ज्यादा ध्यान लगाया और तभी यह कौंधा कि अपने काम के सिलसिलें से जुडी कुछ "वैज्ञानिक ,रचनात्मक .कलात्मक " बातों को  अपनी सरकारी सेवक आचरण नियमावली के प्रावधानों के बिना उल्लंघन के आपके साथ साझा कर सकता हूँ ! तो क्यों नहीं इस छूट का लाभ उठाऊँ !



मैंने पिछले दिनों एक अफ्रीकी मूल की मछली टिलैपिया  की चर्चा की थी जिसे चोरी छिपे घुसपैठियों ने भारत में ला दिया और आज इसने गंगा और सहायक नदियों में बाकी मछलियों को बाहर का रास्ता दिखाना  शुरू कर दिया है ! इन जीवों की स्थिति भी  म्यान में बस एक तलवार की होती है ,बस यहाँ म्यान को वैज्ञानिक लोग niche -नीशे बोलते हैं -मतलब यह शब्द किसी भी जीव के एड्रेस और आक्यूपेशन -पते और काम दोनों का एक साथ बोध कराता है ! मतलब अगर टिलैपिया ने किसी niche को कब्जिया लिया है तो सीधा यह मतलब है कि उस niche में पहले से वास करने वाली मछली के दुर्दिन आ गये ! वह कालांतर में विलुप्त  भी हो सकती है !


अभी टिलैपिया का आतंक बदस्तूर जारी है तभी एक और चोरी छिपे मछली प्रजाति भारत में बरास्ते बंगाल स्मगल हो आ गयी है और अभी जब मैंने इसे एक तालाब में अचानक देखा तो होश हवाश गुम -अरे यह तो पिरान्हा लग रही है जो अमेरिकन मूल की मछली है -अब बिचारा मछली पालक परेशान -"नहीं साहब यह रूप चंदा है -इसका जीरा (शिशु  मीन ) मुझे एक एक रूपये में मिला है ! मैंने दो हजार खरीदे हैं -बंगालियों का कहना है कि  यह बहुत  जल्दी बढेगी ..."  अब उसे कौन बताये कि यह मछली अमेरिका की कुख्यात पिरान्हा है जिसके बारे कहा जाता है और कुछ हद तक सच भी है कि यदि पिरान्हा से भरे टैंक में किसी बड़े जानवर को भी डाल दिया जाय तो बमुश्किल १५ मिनट में उसके शरीर पर मांस  का एक रेशा भी नहीं बचेगा !केवल कंकाल ही रहेगा ! अब ऐसी मछली यदि खुली कुदरती जल धाराओं में आ गयी तो क्या कहर गुजरेगा यह सहज ही कल्पनीय है !
                                          सुन्दर सलोनी मछली मगर खतरनाक कितनी ?

उत्तर प्रदेश से पिरान्हा परिवार की इस मछली की यह पहली रिपोर्ट मेरी जानकारी में है -जो प्रजाति -पहचान मैंने की है वह है -
Pygocentrus nattereri और जो चित्र मैंने लिया है वह भी देखिये -इसकी सुन्दरता पर मत जाईये -यह बहुत खतरनाक है !
अभी इन मछलियों को कानूनन बैन नहीं  किया गया है ! जबकि इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक कमेटी भी है जो बाहरी जनन द्रव्यों -जर्म प्लाज्म के आंतरिक निवेशन की समीक्षा और रोक के लिए ही है ! हमें तो फील्ड में वही करना है जो निर्देश मिलेगा! बस इसकी रिपोर्ट ऊपर भेज देते हैं !

Monday, 7 September 2009

......और गायब हो गए शनि के सभी छल्ले !


इन दिनों जबकि हिन्दी ब्लॉग जगत कन्या राशि ( जो सौभाग्य या दुर्भाग्य से मेरी भी है ) पर आगामी ९ सितम्बर से शनि की साढे साती के आरूढ़ हो जाने का विवेचन कर रहा है शनि देव से ही जुडी एक विलक्षण खगोली घटना अभी पिछले ४ सितम्बर को घटित हुयी है -और देखा गया की शनि के सभी वलय /छल्ले ही गायब हो चुके हैं !

नहीं नहीं घबराने की कोई बात नही है -प्रत्येक १५ -१६ साल पर सूर्य के चक्कर लगाने के चक्कर में शनि महराज धरती से कुछ ऐसे कोण में आ जाते हैं की उनके छल्ले ही नही दीखते ! ४ सितम्बर को यही हुआ और तभी से शनि के छल्ले ही नही दिख रहे हैं जो अगले माह से ही दिखना आरम्भ करेगें !

आप इस साईट पर जाकर रोंगटे खडी कर देने वाली और भी विस्तृत जानकारी और वीडियो देख सकते हैं !

राहत है कि मेरी राशि वालों पर शनि आरूढ़ होगें तो छल्ले अदृश्य होगें ,इसे हम शुभ मान रहे हैं ! यानि हम शनि के घेरों से मुक्त हो घनचक्कर नही बनेगें -हा हा हा !

Sunday, 6 September 2009

यह इश्क कमीना -क्या सचमुच ?

प्रेम पर इधर कुछ गंभीर चिंतन मनन शुरू हुआ है जिसे आप यहाँ  ,यहाँ और यहाँ देख सकते हैं ! मंशा है कि इसी को थोड़ा और विस्तार दिया जाय ! हो सकता है कुछ लोग रूचि लें ! कबीर तो कह गए कि ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय -मगर यह 'ढाई आखर' है क्या और कोई इसे चाहे तो कैसे आजमा पाये जबकि अगरचे जुमला यह भी है कि प्यार किया नही जाता बल्कि हो जाता है !प्रेम का हो जाना तो एक बात है अन्यथा प्रेम करने का आह्वान एक अशिष्ट आग्रह की ओर संकेत भी करता है !

पहले तो हम यह बात साफ़ कर देना चाहते हैं कि प्रेम एक छतनुमा / छतरी -शब्द है इसके अधीन कई कई भाव पनाह पाते हैं ! प्रेम का भाव बहुत व्यापक है -भक्त -ईश्वर का प्रेम ,पिता- पुत्री /पुत्र ,माँ -बेटे /बेटी ,पति -पत्नी /प्रेयसी ,प्रेमी -प्रेमिका आदि आदि और इन सभी के प्रतिलोम (रेसीप्रोकल ) सम्बन्ध और यहाँ तक कि आत्मरति भी हमें प्रेमाकर्षण के विविध आयामों का नजारा कराते हैं !

हम यहाँ प्रेम के बहु चर्चित ,गुह्यित रूप को ही ले रहे हैं जो दो विपरीत लिंगियों के बीच ही आ धमकता है और कई तरह का गुल खिलाता जाता है और अंततः रति सम्बन्धों की राह प्रशस्त कर देता है ! आईये यही से आज की चर्चा शुरू करते हैं ! जब आप किसी के प्रति आकृष्ट होते हैं तो उसके प्रति एक भावातीत कोमलता अनुभूत होती है -एक उदात्त सी प्रशांति और पुरस्कृत होने की अनुभूति सारे वजूद पर तारी हो जाती है और यह अनुभूति देश काल और ज्यादातर परिस्थितियों के परे होती है -मतलब पूरे मानव योनि में इकतार -कहीं कोई भेद भाव नहीं -न गोरे काले का और न अमीर गरीब का !


इस अनुभूति के चलते आप कई सीमा रेखाएं भी तोड़ने को उद्यत हो जाते हैं -बस प्रिय जन की एक झलक पाने को बेताब आप, बस चले तो धरती के एक सिरे से दूसरे तक का चक्कर भी लगा सकते हैं -आसमान से तारे तोड़ लेने की बात यूं ही नहीं कही जाती ! कैसी और क्यूं है यह कशिश ?रुटगर्स विश्विद्यालय के न्रिशाश्त्री हेलन फिशर कहते हैं - लोग प्रेम के लिए जीते हैं मरते हैं मारते हैं ..यां जीने की इच्छा से भी अधिक प्रगाढ़ इच्छा प्रेम करने की हो सकती है !


सच है प्यार की वैज्ञानिक समझ अभी भी सीमित ही है मगर कुछ वैज्ञनिक अध्ययन हुए हैं जो हमें इस विषय पर एक दृष्टि देते हैं जैसे मनुष्य के 'जोड़ा बनाने ' की प्रवृत्ति ! प्रेम को कई तरीकों से प्रेक्षित और परीक्षित किया जा रहा है -चाक्षुष ,श्रव्य ,घ्राण ,स्पार्शिक और तांत्रिक -रासायनिक विश्लेषणों में विज्ञानी दिन रात जुटे हैं प्रेम की इसी गुत्थी को सुलझाने ! क्या महज प्रजनन ही प्रेम के मूल में है ?


आभासी दुनिया की बात छोडे तो फेरोमोन भी कमाल का रसायन लगता है जो एक सुगंध है जो अवचेतन में ही विपरीत लिंगी को पास आकर्षित कर लेता है -पर सवाल यह की किसी ख़ास -खास में ही फेरोमोन असर क्यों करता है ? समूह को क्यों नहीं आकर्षित कर लेता ! मगर एक हालिया अध्ययन चौकाने वाला है -मंचीय प्रदर्शन करने वाली निर्वसनाएं (स्ट्रिपर्स ) जब अंडोत्सर्जन (ओव्यूल्युशन ) कर रही होती हैं तो प्रति घंटे औसतन ७० डालर कमाती हैं , माहवारी की स्थिति में महज ३५ डालर और जो इन दोनों स्थितियों में नहीं होती हैं औसतन ५० डालर कमाती है -निष्कर्ष यह की ओव्यूल्यूशन के दौर में फेरोमोन का स्रावित होना उच्चता की दशा में होता है और वह पुरुषों की मति फेर देता है -फेरोमोन एक प्रेम रसायन है यह बात पुष्टि की जा चुकी है !


एक और अध्ययन के मुताबिक जब औरते ओव्यूलेट कर रही होती हैं तो उनके सहचर उनके प्रति ज्यादा आकृष्ट रहते हैं और पास फटकते पुरुषों से अधिक सावधान ! वैज्ञानिकों की माने तो प्रेम सुगंध केवल यह भान ही नहीं कराता की कौन सी नारी गर्भ धारण को बिलकुल तैयार है बल्कि यह इतना स्पेसिफिक भी होता है की एक सफल (जैवीय दृष्टि से -गर्भाधान की योग्यता और शिशु लालन पालन के उत्तरदायित्व की क्षमता ) जोड़े को ही करीब लाता है !


वैज्ञानिकों ने एक मेजर हिस्टो काम्पैबिलटी फैक्टर (एम् एच सी ) की खोज की है जो दरअसल एक जीन समूह है जो अगर नर नारी में सामान हो जाय तो गर्भ पतन की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं -ऐसे जोड़े प्रेम सुगंधों से आकर्षित नहीं होते ! इस शोध की पुष्टि कई बार हो चुकी है -एक सरल से प्रयोग में पाया गया की कुछ वालंटियर महिलाओं को अज्ञात लोगों की बनियाने सूघने को दी गयीं और बार बार उन्हें वही बनियाने सूघने में पसंद आयीं जिनके स्वामी विपरीत एम् एच सी फैक्टर वाले थे !

अभी प्रेम सुगंध का स्रवन जारी है .....




Monday, 31 August 2009

लो जी, एक और सुअरा !

अभी एक सुअरा (स्वायिन फ्लू ) के प्रकोप से मानवता कराह ही रही है कि एक नए सुअरा का पता लगने से वैज्ञानिक समुदाय चिंतित हो उठा है .गनीमत यही है कि यह नया सुअरा स्वायिन फ्लू के विपरीत मनुष्य के लिए अभी तक तो निरापद पाया गया है .मगर बकरे की माँ जो इस मामले में एबोला वाईरस हैं आख़िर कब तक खैर मनायेगी ?

वैज्ञानिकों ने एबोला वाईरस के इस स्ट्रेन- reston ebola virus की पहचान फिलीपीन के घरेलू सूअरों में की है ! वैसे यह सतरें तो अभी तक निरापद पाया गया है मगर है यह उसी घातक एबोला समूह का ही सदस्य जिनसे अनियंत्रित रक्तस्राव के साथ तेज बुखार हो जाता है !

खतरनाक एबोला विषाणु मनुष्य में छुआछूत से फैलने वाली बीमारियों में कुख्यात हैं और इनसे मरने की दर ८० फीसदी तक जा पहुँचती है ! अभी खोजा गया तो यह सुअरा सौभाग्य से एबोला परिवार का एकलौता निरापद सदस्य है -मगर विषाणु म्यूटेशन करते रहते हैं यह कौन नही जानता ? पहले पहल यह निरापद एबोला वाईरस १९८९ में बंदरों में पाया गया था -आख़िर ये वाईरस पहले पहल बंदरो (ऐड्स की याद है ? ) में ही क्यों मिलते है ? कौन बातएगा ? और फिर सुअरा बन मानवता को ग्रसित करते हैं ! कुदरत का यह क्या खेल है ??


इस निरापद सुअरा की खोज का श्रेय मैकिन्टोश नामक वैज्ञानिक को है और पूरी रिपोर्ट मशहूर साईंस पत्रिका के १० जुलाई के अंक में प्रकाशित है .
आभारोक्ति : स्वायिन फ्लू के लिए सुअरा शब्द की सूझ भाई गिरिजेश राव की है !

Sunday, 30 August 2009

मानव प्रजाति में प्रणय याचन और यौन संसर्ग : क्या कहते हैं व्यवहारविद ?

चित्र साभार : Lori Finnegan
इन्ही ब्लॉग पन्नो पर हमने पशु पक्षियों के प्रणय याचन प्रदर्शनों को निरखा परखा और अब बारी है मनुष्य प्रजाति में प्रणय व्यवहार के अवलोकन की -मनुष्य प्रजाति यानि होमो सैपिएंस सैपिएंस जो एक 'सामाजिक प्राणी ' है ! जैवविद प्रायः प्रजाति को पारिभाषित करने में यह भी कहते हैं की जो प्राणी आपस में निर्बाध प्रजनन कर संतति जनन कर लेते हैं वे एक प्रजाति के होते हैं ! यह परिभाषा भी मनुष्य को एक भरी पूरी प्रजाति होने का गौरव देती है ! मतलब धरती पर का कहीं का गोरा या काला ,नाटा -मोटा कद काठी का इन्सान इस परिभाषा को पूर्णतः साक्षात ,चरितार्थ कर सकता है !

तो आईये अनावश्यक विस्तार को तूल न देकर हम सीधे मुद्दे की बात करें -मनुष्य के प्रणय प्रदर्शनों पर मेरे संग्रह में जो बेहतरीन कृति है वह डेज्मांड मोरिस की " इंटीमेट बिहैवियर " है ! आईये इस मसले पर इसी पुस्तक के हवाले से कुछ गौर फरमाएं !

मनुष्य का प्रणय काल दीगर पशुओं की तुलना में काफी अधिक -एक वर्ष तक लंबा खिचता देखा जाता है ! मगर सहज तौर पर यह औसतन एक वर्ष का आका गया है ! मनुष्य की पारस्थितिकीय जटिलताओं के चलते इस समय में प्रायः कमी बेसी भी देखी जाती है ! (मतलब प्यार में धैर्य का साथ न छोडें या धैर्य आपका साथ न छोडे तभी गनीमत है ! ) ! इसी एक वर्ष की अवधि में प्रथम दृष्टि के कथित अनुभव के साथ ही यौनिक संसर्ग तक प्रणय याचन (कोर्टशिप ) के कई चरण /स्टेप्स घटित होते हैं ! ऐसा लगता है कि व्यवहार शास्त्री ( इथोलोजिस्ट ) रूहानी प्रेम (प्लैटानिक लव ) को अपने अध्ययन क्षेत्र के बाहर का विषय मानते हैं -वे प्यार की दीवानगी में देह की भूमिका ही सर्वोपरि मानते हैं !

घनिष्ठ सम्बन्ध की व्याख्या करते हुए डेज्मांड मोरिस कहते हैं कि बिना शरीर के किसी भाग के हिस्से के संस्पर्श हुए किसी के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध नही हो सकता ! मतलब बात बात में घनिष्ठ सबंध का दावा करने वालों में यह देखा जाना चाहिए कि उनके अंग उपांग कभी संस्पर्श के दौर से गुजरे भी है या नहीं ! अब हैण्डशेक तक न हुआ हो और दावे किए जायं कि अमुक से हमारा घणा /घनिष्ठ संबंध है तो एक इथोलोजिस्ट को इस पर आपत्ति हो सकती है ! गरज यह कि घनिष्ठ सम्बन्ध संस्पर्शों की बिना पर ही परवान चढ़ते हैं ! तो जाहिर है मनुष्य के प्रणय याचन से यौन संसर्ग तक की कथा दरअसल कड़ी दर कड़ी घनिष्ठ से घनिष्ठतम संस्पर्शों का ही फलीभूत होना है ! मोरिस ने इस पूरी प्रक्रिया को कई चरणों /स्टेप्स में यूँ बयान किया है ! (मूल कृति से साभार ) ( इस अंतर्जाल संस्करण को पढने की सिफारिश है )
1. eye to body.
2. eye to eye.
3. voice to voice.
4. hand to hand.
5. arm to shoulder.
6. arm to waist.
7. mouth to mouth.
8. hand to head.
9. hand to body.
10. mouth to breast.
11. hand to genitals.
12. genitals to genitals.
मतलब आंख से शरीर ,आँख से आँख ,आवाज से आवाज ,हाथ से हाथ ,हाथ से कंधे ,
हाथ से कमर ,मुंह से मुंह ( चुम्बन ) ,हाथ से सिर ,हाथ से शरीर का कोई भी हिस्सा -यौनांग छोड़कर ,
मुंह से वक्ष ,हाथ से यौनांग ,यौनांग से यौनांग ! (इति रति-लीलाः)

मगर यहाँ एक काशन है !प्यार के एक पावदान से ऊपर के पावदान पर पैर रखना इतना सहज नही है !
यह पुरूष के प्रणय साथी के निरंतर प्रतिरोध ,हतोत्साहन ,और अनिच्छा को झेलते जाने का एक जज्बा है -यह प्रकृति के फूल प्रूफ़ सुरक्षात्मक उपायों की एक व्यवस्था है ताकि किसी नाकाबिल /अक्षमं को प्रजननं का मौका न मिल जाय जिसमे नारी को जहमत ही जहमत उठानी पड़ती है -गर्भ धारण से शिशु के लालन पालन तक ! तो एक स्टेप से आगे के स्टेप पर जाते हुए कड़ी जैवीय छान बीन भी अपरोक्ष रूप से चलती रहती है -इसमें किसी भी स्तर पर भी क्वालीफाई न कर पाने पर प्यार के मैदान से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है -भले ही आप उसके बाद बेमिसाल उर्दू पोएट्री लिखते पाये जाएँ ! हाँ आश्चर्य है कि इतनी चाक चौबंद व्यवस्था के बाद भी कुछ चक्मेबाज अपनी घुसपैठ बना ही लेते हैं और नारी अभिशप्त होती है ! ऐसा क्यों होता है -विमर्श जारी है !

ऊपर के चरणों के अपवाद वेश्यावृत्ति और सामाजिक अनुष्ठानों -परिणय जो निश्चय ही प्रणय नही है में मिलते है जिनमे बताये गए स्टेप्स गडमड हो जाते हैं -इन पर चर्चा फिर कभी !


Saturday, 15 August 2009

टिलैपिया का आतंक ...

ढेरों मृत टिलैपिया
अफ्रीकी मूल की टिलैपिया मछली दुनिया भर में इसलिए कुख्यात है कि यह किसी भी जलतंत्र में घुसपैठ कर ऐसा कब्जा जमाती है कि दूसरी प्रजाति की मछलियों की छुट्टी ही नही कर देती है बल्कि उन्हें पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर देती है -इसलिए यह घुसपैठिया जलीय प्रजातियों-एक्वेटिक इन्वैजिव स्पीशीज (IAS) में अव्वल नंबर पर है -इसने पिछले कुछ सालों से गंगा और सहयोगी जल प्रणालियों में भी प्रवेश पा लिया है और दिन दूनी और रात चौगुनी दर से बढ़ रही है बिल्कुल सुरसा की तरह ! यह जबरदस्त प्रजननं कारी है ,साल भर बच्चे देती रहती है ! गंगा में इसके प्रवेश से यहाँ की देशज मछलियों पर अभूतपूर्व संकट आ गया है !

कल छुट्टी के बावजूद भी मुझे डी एम का आदेश मिला कि मैं तत्काल लक्सा के के निकट लक्ष्मीकुण्ड पर पहुंचू और वहां मर रही मछलियों की समस्या दूर करुँ -मैं आश्चर्यचकित रह गया कि कुंड टिलैपिया मछलियों से भरा पडा है जबकि उसका सम्बन्ध गंगा से नही है और नही उससे कोई नाला नाली ही जुडी है जिससे कहीं और से यह मछली आ सके -पूंछताछ पर पता लगा कि प्रत्येक मंगल और शनि को यहाँ राहु से पीड़ित वैष्णव जन आ आ कर मछलियाँ डाल जाते हैं -किसी भक्तजन ने टिलैपिया भी लाकर डाल दी होगी और अपनी आदत के मुताबिक इसने बच्चे बच्चे दे देकर तालाब को भर दिया !

जब भी बदली कई दिनों से छाई रहती है और सूरज महाराज के दर्शन नही होते तो तालाबों में घुलित आक्सीजन कम पड़ जाती है -जलीय शैवाल ,प्लवक और वनस्पतियाँ प्रकाश संश्लेषण नही कर पाते -आक्सीजन की कमी पड़ती जाती है जबकि उनका श्वसन चालू रहता है और निकट परिवेश की आक्सीजन भी वे लेते रहते हैं -एक ऐसी स्थिति आ पहुँचती है कि पानी में आक्सीजन की मात्रा बहुत कम (१ -२ पी पी एम ) मात्र ही रह जाती है -तब मछलियाँ पानी की सतह पर आकर बेचैन होकर मुंह खोल खोल कर मुंह में हवा लेती देखाई पड़ती हैं ! और सदमें से मरने लगती है .यही घटना लक्ष्मी कुंड पर अल्लसुबह घटी -सैकडों मछलिया मर के उतरा गयीं ! चिल्ल पो मच गयी ! हम लोग इस स्थिति के आदी हो चुके हैं -वहाँ पहुँच कर लाल दवा आदि छिड़क कर पानी को हिला डुला कर ,टैकरों से पानी मंगा मंगा कर उसमे डाल कर उनका मरना नियंत्रित किया गया !



यह है सबसे घुसपैठिया टिलैपिया प्रजाति -ओरिओक्रोमस मोजाम्बिकस




यह तो समस्या का तात्कालिक हल हुआ है -वहां से टिलैपिया का निकलना ही स्थाई हल है -मगर स्थानीय भक्तजनों की भावनाएं इन मछलियों से जुडी हुयी हैं -वे उन्हें निकालने के लिए राजी नही हैं ! देखिये यह समस्या अपना हल कैसे ढूंढती है ?

कुछ छूटा है तो वह यहाँ पर है !

Tuesday, 11 August 2009

अन्तरिक्ष में आतिशबाजी !

पर्सिज तारामंडल को लोकेट करें -चित्र पर क्लिक्क करें
जी हाँ ,गूगल बाबा की पैनी निगाहें आगाह कर रही हैं कि अन्तरिक्ष में आज रात एक अद्भुत नजारा दिखेगा जिसे आधीरात के बाद उत्तरी पूर्वी क्षितिज में देखा जा सकेगा ! यह अद्भुत दृश्यावली पर्सिज उल्का वृष्टि (Perseid meteor shower) कहलाती है -आसमान में लुक्क -लुक्कारे छूटते हैं .आम आदमी को लगता है देवता लोग आतिशबाजी का लुत्फ़ उठा रहे हों ! वैसे भी बरसात का जिम्मा इन्द्रदेव ने इस बार संभाला ही नही है उन्हें फुरसत ही फुरसत है आतिशबाजी खेलने की ! मगर इस आकाशीय आतिशबाजी का कारण तो कुछ और ही है -होता यह है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते हुए प्रत्येक वर्ष उस नियत स्थान पर जा पहुँचती है जो एक धूमकेतु स्विफ्टटटल का परिभ्रमण पथ है और जहाँ उससे उत्सर्जित मलबा /कचरा जमा है ! जब धरती के परिवेश से इस कचरे के धूल धक्कड़ टकराते है तो जल उठते हैं और हमें आसमानी आतिशबाजी का नजारा दिखता है !

अन्तरिक्ष में वह जगह जहाँ हमारी धरती स्विफ्ट टटल के परिभ्रमण पथ से गुजरती है पर्सिज तारामंडल (perseid constellation ) का पृष्ठभूमि लिए हुए दिखती है -इसलिए इस घटना को पर्सिज उल्का वृष्टि भी कहते हैं !यह प्रत्येक वर्ष १०-१२ अगस्त को अपने चरम पर होती है -आज यह नजारा अपने उरूज पर होगा ! आप अगर इन दिनों आसमान के तारों को गिन रहे हो या बादलों की खोज में निगाहें रात में भी आसमान की ओर बार बार उठ जा रही हों तो पक्का दिखेगा यह नजारा आपको -हाँ निगाहें उत्तरी पूर्वी क्षितिज की ओर रखियेगा -पानी की बूंदों की बौछार की बजाय इस बार उल्कों की बौछार /बरसात से ही दिल बहला लीजिये ! एक बार यह अनुभव भी सही!
यह वीडियो भी देख लीजिये !

Sunday, 9 August 2009

स्वायिन फ्लू :समय गवाने का वक्त नही अब !

दुःख है कि इस विश्वव्यापी महामारी को लेकर की गयी आशंकाएं धीरे धीरे हकीकत में बदल रही है -और उन सभी लोगों के लिए जो ऐसी स्थितियों के प्रति एक बेपरवाह दृष्टि लिए रहते हैं अब सजग होने की जरूरत है - इन आकडों से ऐसे लोगों की आँख खुल जानी चहिये -

1. कुल पुष्टि हो चुके मामले-772

-मृत्यु -4

उम्र सीमा -

* 0-4 y.o. = 5%

* 5-14 y.o. = 33.97%

* 15-34 y.o. = 41.6%

* 35-59 y.o. = 18%

* 60+ y.o. = 1.5%


लिंग

* पुरूष : 49%

* औरत : 51%

ट्रेंड -बढाव पर

साफ़ है कि यह युवको को ज्यादा चपेट में ले रहा है -वे सावधान हो रहें . किसी संदेह के मामले में पूरी सावधानी बरते - मास्क का प्रयोग करें ! कई बार साबुन से मल मल कर हाथ धोएं !इस पृष्ठको देखें .


Thursday, 6 August 2009

इक प्रणय कुटीर बने न्यारा : पशु पक्षियों के प्रणय प्रसंग (10)-(डार्विन द्विशती विशेष)

बना यह प्रणय कुटीर आलीशान
सबसे अनोखा प्रणय मंच कर्मी (स्टेज परफार्मर ) तो आस्ट्रेलियाई बोवर बर्ड है जिसकी १८ प्रजातियाँ हैं और सभी अपने अपने अनूठे तरीके से प्रणय पर्ण कुटीर का निर्माण मादा को रिझाने के लिए करती हैं -टूथ बिल्ड बोवरबर्ड घने जंगल की फर्श के एक नन्हे से टुकड़े को बड़ी परिश्रम से साफ़ करता है और तृन - तिनकों को बीन बीन कर एक आठ फीट का घेरा लिए हुए प्रणय कुटीर तैयार करता है और उसे तरह तरह की रंग बिरंगी चीजों से सजाता है .पत्तियों का उल्टा पीला भाग यह सामने की ओर करके पर्ण कुटीर पर चस्पा करता रहता है -मानो इसके प्रणय बसंत का भी संकेत रंग पीला ही हो ! पत्तियों की सजावट के बाद नाचना गाना शुरू हो जाता है !

बोवर बर्ड की दूसरी प्रजाति है एवेन्यू बिल्डर्स की जो अपने कुटीर में एक प्रेम गली का निर्माण करने में निपुण हैं और वह भी कोई बहुत संकरी नहीं ,अच्छी खासी चौड़ी जिससे उसकी महबूबा खरामा खरामा आराम से भीतर आ सके ! स्पाटेद बोवर बर्ड अपने प्रणय कुटीर को सफ़ेद रंग के साजो सामान से सजाती है -सफ़ेद हड्डी के टुकड़े ,पत्थर के टुकड़े ,छोटे घोंघों के सफ़ेद कवच आदि यह ढूंढ ढूंढ कर लाकर कुटीर के इर्द गिर्द बिखेरती है और मानो अपनी शान्ति प्रियता की मिसाल देना चाहती हो प्रणय संगिनी को ! फान बोवर बर्ड को हरा और गहरा नीला रंग पसंद है -सब प्रजातियों ने मानो कामवश हो इन्द्रधनुष के सभी रंगों को थोड़ा थोड़ा सा चुरा लिया हो ! डेविड अटेंन्ब्रो का यह वीडियो जरूर देखिये !

सबसे भव्य प्रदर्शन तो satin bower bird का है और इसप्रजाति पर व्यवहार विदों ने व्यापक अनुसंधान किया है .गहरे नीले काले रंग और नीली आंखों वाला नर अपने प्रणय कुटीर के एक हिस्से में एक ५ इंच चौड़ी रास गली बनाता है जिसकी दीवारें १२ इंच ऊंची और चार इंच मोटी होती हैं -कुटीर के उत्तरी सिरे पर यह रगीन वस्तुओं का मानो भानुमती का पिटारा ही चुरा लाता हो -तोतों के नीले पर ,नीले फूल ,नीले चेरी के फल ,नीले कांच के टुकड़े ,नीले फीते -रस्सी के टुकड़े ,नीले कपड़े ,नीले बटन और यहाँ तक की शहरी बस्ती के निकट के जंगलों में यह बसों के नीले टिकट ,धोबी घाट से ले उडे नीले रूमाल और थैले सभी कुछ .प्रणय की इस नीलिमा को प्रणाम ! गोपियों को कृष्ण का नीला रंग ही तो कहीं भा नही गया था -नील सरोरुह श्याम !

अब प्रणय के इस नीले रंग /ब्लू फिल्म का एक त्रासद पक्ष भी देखिये कि जब इन पक्षियों को अध्ययन के लिए बने बड़े पिजरों में दूसरी चिडियों के साथ रखा गया तो प्रणय काल में इन्होने दी गयी टहनियों और फुन्गों से कुटीर तो बना लिया मगर नीले रंग के अभाव में नैराश्य जनित क्रोध के चलते इन्होने नीले रंग की चिडियों को ही मार मार कर प्रणय कुटीर के सामने प्रदर्शित कर दिया -प्रेम के नाम पर निरीहों के बलि ! हे राम !

Monday, 3 August 2009

प्रणय घरौदे और अभिसार मंच !-पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (9)-(डार्विन द्विशती विशेष)



तीतरों
और बटेरों की कुछ प्रजातियों में तीतरों की एक प्रजाति सेज ग्राउस में मादा से संसर्ग की इतनी होड़ होती है बस केवल कुछ हर दृष्टि से सक्षम नर ही अपनी मुहीम में कामयाब हो पाते हैं -एक प्रेक्षण में पाया गया कि ४०० नरों में से केवल चार ही स्वयम्बर की इच्छुक ७४ फीसदी मादाओं से घनिष्ठ हो गए -बाकी सब के सब महज २६ प्रतिशत पर कामयाब हो पाये ! मतलब प्रणय शूरमा निकले केवल चार !
प्रणय रत नर मादा सेज ग्राउस

आस्ट्रेलिया की लम्बी पूंछो वाली लायिर बर्ड का नर तीन फिट के लगभग दस गीली मिट्टी के प्रणय घरौदें (love mounds ) बनाता है और अपने प्रणय याचन की विभिन्न भाव भंगिमाओं से मादा को रिझा लेता है !

लायिर बर्ड का प्रणय प्रदर्शन



इसी
तरह बर्ड आफ पैराडाईज घने जंगलों में जहाँ सूरज का प्रकाश तक नही पहुँचता जमीन के छोटे छोटे स्थलों की साफ़ सफाई करके अभिसार /स्वयम्बर मंच बनाते हैं और फिर घने लता गुलमो की कटाई छटाई करके प्रकाश की एक रेख स्वयम्बर मंच तक ला पाने में सफल हो जाते हैं -सूर्य की यह प्रकाश रेखा स्वयम्बर मंच पर मनो स्पाट लाईट का काम करती है ! फिर नर की नाच कूद मादा को रिझाने के लिए शुरू हो जाती है !
यह वीडियो जरूर देख लें !

Thursday, 30 July 2009

कैसे कैसे स्वयम्बर ?-पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (8)-(डार्विन द्विशती विशेष)

अब एरेना डिसप्ले मतलब रंगभूमि प्रदर्शन की कुछ बानगी भी देखिये जो आपके सामने यह भी खुलासा करेगी कि चिडियों की कुछ प्रजातियों में स्वयम्बर की क्या रूप रेखा है -मादाएं नर का चुनाव कैसे करती हैं ?

एक पक्षी है यूरोपियन सैंड पाईपर -भारत में भी प्रवासी है -ruff नर को कहते हैं reeve मादा को ! हिन्दी नाम है गेह वाला या कहीं कहीं बागवाद ! नर की उन्नत कलंगी होती है जो अपने रंगीले परो व कालर से सहज ही पहचाना जा सकता है .ये बसंत ऋतु के आगमन के साथ ही कुछ पारम्परिक रंग भूमियों पर अपना अनंग आसन जमा लेते हैं -नरों में उच्च अनंग आसन यानी पर्वत की चोटी को हथियाने की होड़ और घमासान मचता है. मतलब रंगभूमि का यह हिस्सा सबसे महत्वपूर्ण होता है जहां ज्यादा से ज्यादा नर पहुचने की कवायद करतेहैं- यह नरों की जमावट के कारण फूलों की सेज सा दीखता है -पहाड़ की चोटी , और सेज पिया की,वाह! क्या कहने! सबसे दबंग नर यहाँ कब्जा जमा लेते हैं और ढेर सारे दब्बू नर इर्द गिर्द जमा होते हैं !

मादाएं परिधि के दब्बू नरों की उपेक्षा कर चोटी के गहरे रंगों की कलगी वालों नरों की और आकर्षित होती हैं -उनके आगमन के साथ ही नर प्रणय याचन का जबरदस्त प्रदर्शन करते हैं -मादाएं मनचाहे नर का वरण करती हैं और घनिष्ठ संसर्ग के बाद स्वयंबर सम्पन्न हो जाता है ! प्रणय संसर्ग संपन्न होते ही मादाएं नरों को अलविदा कह देती हैं और अपने वात्सल्य बसेरे की और लौट चलती हैं जहां नीड का निर्माण और अंडे देने ,सेने ,शिशुओं का लालन पालन खुद करती हैं ।रंगभूमि में मादाओं का आगमन और प्रणय प्रसंग कुछ मिनटों में ही निपट जाता है .

यहाँ कुछ हैरतअंगेज भी घटता है. दरअसल इस महा -स्वयम्बर में दो तरह के नर होते है ,एक तो 'सेज पिया की ' पर कब्जा किये अखाडिया नर (रेसिडेंट मेल्स ) और दूसरे अखाडे के किनारे पर जमे लग्गू भग्गू या भडुआ नर (सैटेलाईट मेल्स )। अखाडिया नरों की कलगी गहरे रंग की होती है जबकि भडुआ नर फीकी कलगी वाले होते हैं ! मादा के साथ मुख्य यौन संसर्ग तो अखाडिया नर ही करते हैं मगर भडुआ नर भी किनारे से मादा पर कामुक गिद्ध दृष्टि जमाये रहते हैं ! और मजे की बात तो ये कि अखाडिया नरो से भडुआ नर बिलकुल भी नहीं झगड़ते बल्कि उनकी मिजाज पुरसी /ठकुर सुहाती में लगे रहते हैं! तो फिर इनकी जैवीय जरूरत ही क्या है ? रंगभूमि में फिर इनका क्या काम ?


जोहन फ्रेडरिच नौमान (1780-1857) का "लेक " का चित्रण


दरअसल भडुए नर अपनी उपस्थिति से चोटी /सेज पिया पर काबिज नरों की भीड़ का हिस्सा बनते हैं और मादाओं को दूर से यह अहसास दिला देते हैं कि वहां नरों की भीड़ अधिक है ! इस तरह वे अखाडिया नरो की मदद ही कर रहे होते हैं ! मादाओं का अवचेतन "अधिक नर ,उपयुक्त के चयन के अधिक अवसर " का अनुसरण करता है और वे पिया की सेज पर आ धमकती हैं ! फिर भी इससे भडुआ नरों का क्या सीधा लाभ ? क्या वे निरपेक्ष भाव से केवल अखाडिया नरों के यौन लाभ के लिए आत्मोत्सर्ग कर रहे होते हैं ? नहीं ! ये भी मौके की तलाश में होते हैं और अखाडिया नरो की आपसी प्रतिस्पर्धा जनित द्वंद्व युद्धों में यौनोन्मत्त मादा से क्षण भर के लिए भी विरत नर के स्थान पर ये सहसा ही आ धमकते हैं और ख़ुद द्वारा चयनित नर के युद्ध कौशल को निहार रही और उसके वापस लौटने की प्रतीक्षा कर रही मादा पर आरूढ़ हो जाते हैं -मानो कुदरत भी एक विचित्र असमंजस की स्थिति को बनाये रहती है और मादा के प्रतिकार के पूर्व ही भडुआ नर अपना शुक्र दान कर चुके रहते हैं -विजयी नर के आते आते ये फिर फुर्र से अखाडे के किनारे उड़ चलते हैं -परिस्थितियों का पूरा लाभ उठाने वाले घोर अवसरवादी भडुआ नर बस इन्ही चुराएं हुए काम केलि के तोहफों पर जीवन गुजार देते हैं।

कुछ और पक्षी प्रजातियों में स्वयम्बर की दास्तान जारी रहेगी .......