Showing posts with label Beauty and aesthetics. Show all posts
Showing posts with label Beauty and aesthetics. Show all posts

Saturday, 29 January 2011

चुम्बन विज्ञान यानि फिलेमैटोलाजी के बारे में क्या जानते हैं आप ?

कहाँ चुम्बन जैसा सरस मन हरष विषय और कहाँ विज्ञान की नीरसता ..आईये मानवीय सर्जना के इन दोनों पहलुओं में तनिक सामंजस्य बिठाने का प्रयास करे .. चुम्बन के विज्ञान(philematology )  पर एक  नजर डालते हैं! 
विज्ञान की भाषा में चुम्बन -आस्कुलेशन(osculation)   किन्ही भी दो व्यक्तियों के बीच की  सबसे घनिष्ठ अभिव्यक्ति है जिसके चलते कितनी ही साहित्यिक ,सांगीतिक और चित्रकलाओं की गतिविधियाँ उत्प्रेरित - अनुप्राणित हुयी हैं ...कहते हैं कुछ चुम्बनों या उनकी दरकार ने इतिहास के रुख को भी पलट दिया है ..मगर यह सब यहाँ विषयांतर हो जाएगा -यहाँ साईंस ब्लॉग की भी मर्यादा तो बनाए रखनी है न ..बाकी सब के लिए तो क्वचिदन्यतोपि है ही ....निश्चय ही  चुम्बन एक नैसर्गिक सी लगने वाली अनुभूति है मगर क्या यह सहज बोध प्रेरित गतिविधि है ? आकंडे कहते हैं कि दुनिया में तकरीबन दस फीसदी लोग आपस में अधरों का स्पर्श  तक नहीं होने देते ..तब  भी इसे आखिर क्या सार्वभौमिक सांस्कृतिक गतिविधि मान ली जाय ? बहुत से वैज्ञानिक इसे महज सांस्कृतिक गतिविधि नहीं मानते .....चुम्बनों का पारस्परिक विनिमय साथी के कितनी ही जानकारियों का अनजाने ही साझा करा देती है ...हम प्रेम रसायनों -फेरोमोंस का साझा करते हैं ....  प्रेम रसायनों(डोपा माईन,सेरोटोनिन आदि )    का एक पूरा काकटेल ही साझा हो जाता है और हमारे सामजिक बंध को और मजबूती दे देता है ,तनाव घटाता है ,उत्साह उत्प्रेरण और हाँ सुगम यौनिकता की राह भी प्रशस्त करता है यानि जैसा भी  संदर्भ /अवसर हो .....हम पर एक जनून तो तारी हो ही जाता है -यह सचमुच प्रभावकारी और सशक्त है -आजमाया हुआ नुस्खा है अगर किसी ने न आजमाया हो तो फिर हाथ कंगन को आरसी क्या ? 

सहज चुम्बन दिव्य सुखाभास की अनुभूति देता है ...और मस्तिष्क के 'प्रेमिल क्षेत्रों' को प्रेरित कर प्रेम रसायनों का एक पूरा डोज रक्त धमनियों में उड़ेल देता है ...यह सब महज सामाजिक औपचारिकताओं से भी निश्चय ही अलग एक कार्य व्यापार का संसार सृजित करता है ....हम जानते हैं हमारे नर वानर कुल के कुछ सदस्य अपने बच्चों को मुंह से मुंह खाना खिलाने के दौरान अधरों के संपर्क में आते हैं और शायद चुम्बन-व्यवहार का उदगम   इसी गतिविधि से ही  हुआ हो मगर ज्यादातर वैज्ञानिक मानते हैं कि इसका उदगम और विकास साथी के लैंगिक चयन में भी  भूमिका निभाते हैं -इसी दौरान साथी की शारीरिक जांच भी इस लिहाज से हो जाती है कि उनका जोड़ा संतति वहन के लिए  पूर्णतया निरापद है भी या नहीं ...मतलब संतानोत्पत्ति और उनके लालन  पालन में तो कहीं कोई लफड़ा नहीं रहेगा -यह सब रासायनिक परीक्षण चुम्बन के  दौरान ही अनजाने हो जाता है ....कितने ही प्रेम सम्बन्ध इन्ही कारणों से आगे नहीं बढ़ पाते -रासायनिक लाल झंडी है चुम्बन ....फिर शुरू होता है तुम अलग मैं अलग की कहानी और असली माजरा समझ में नहीं आता ...कई बार तो पहला चुम्बन ही निर्णायक हो जाता है ..अवचेतन तुरत फुरत भांप जाता है की अरे यह नामुराद तो बच्चे की जिम्मेदारी नहीं उठा पायेगा ...वैज्ञानिकों की माने तो चुम्बन भावी घनिष्टतम संपर्कों की देहरी है ..लाघ गए तो चक्रव्यूह का  अंतिम फाटक भी फतह नहीं तो देहरी पर ही काम तमाम .....
तो यह चुम्बन -आलेख शेरिल किरशेंनबौम की 'द साईंस आफ किसिंग' पुस्तक से परिचय कराने के लिए और किसी को नजराने के लिये लिखा गया है ...और अगर आपमें और अधिक जिज्ञासा जगा सका तो अंतर्जाल अवगाहन का विकल्प तो आपके पास है ही -हम विज्ञान संचारको का काम बस प्यासे को कुंए तक पंहुचा देना भर है ....पानी आप खुद निकालिए और पीजिये .....
एक मिनट का यह वीडियो भी देख सकते हैं ....



http://www.youtube.com/watch?v=7ykfQANwS_w&feature=player_embedded

Monday, 8 March 2010

नर नारी समानता का आख़िरी पाठ

हमने अभी तक देखा कि गुफाकाल से ही नर नारी के कार्य विभाजनों में फर्क के बावजूद भी उनके बीच सामाजिक स्तर का कोई  फर्क नहीं था बल्कि पुरुषों की तुलना में नारियां एक समय में एक  साथ ही कई कामों का कुशलता से संचालन करती थीं और उनकी यह क्षमता आज भी विद्यमान है. जबकि अमूमन पुरुष एक समय में किसी एक मुख्य कार्य में ही ध्यानस्थ हो जाता है जो उसके प्राचीन काल की आखेटक प्रक्रति /प्रवृत्ति की ही जीनिक अभिव्यक्ति -शेष है. प्राचीन प्रागैतिहासिक काल में में नर और नारी को तब के कबीलाई समाजों में बराबर का स्थान था बल्कि कहीं कहीं नारी ज्यादा प्रभावी रोल में थी -ईश्वरीय शक्ति से युक्त भी क्योकि वह सृष्टि -सर्जक थी -प्रजनन और संतति संवहन की मुख्य अधिष्ठात्री -यही कारण था कि पहले के कितने समाज मातृसत्तात्मक भी थे-नारियों की तूती बोलती थी और यहाँ तक कि  ईश्वर का  आदि स्वरुप भी खुद ममत्व का ,नारी का ही था -आदि शक्ति रूपी देवियाँ पहले प्रादुर्भाव में आयीं -अगर हम खुद अपने सैन्धव सभ्यता की बात करें तो भी यही इंगित होता है कि तत्कालीन समाज में नारी का स्थान ऊंचा था और आर्यों से पराजित और पुरुषों का समूह संसार होने के बाद  आर्यों द्वारा पोषित वैदिक संस्कृति में भी नारी पूर्व की ही भांति प्रतिष्ठित  बनी रही -वैदिक काल की अनेक ऋषि पत्नियों का सम्मान जनक उल्लेख हमें इसकी याद दिलाता है -यहाँ विस्तार विषय से विचलन हो जायेगा .. अस्तु ...मगर कालांतर में स्थितियां बदलीं और तेजी से बदलती रहीं.

नर नारी की समानता का संतुलन तब डगमगाता गया जब मानव जनसंख्या तेजी से बढी ,नगर और कस्बे  बढ़ते  चले गए और कबीलाई मानव नागरिक बनने लग गया -मानवीय संदर्भ में एक नए सांस्कृतिक विकास की देंन -धर्म (रेलिजन ) के बढ़ते प्रभावों ने अब कई विकृतियों को जन्म देना शुरू किया -नागरीकरण और धर्म के मिलेजुले अजीब सम्बन्धों ने आदि शक्ति स्वरूपा देवियाँ को विस्थापित कर देव -देवताओं को केंद्र में लाना शुरू किया -ममत्व की जीवंत मूर्तियाँ अब अधिकारवादी पुरुष देवों में बदलती गयीं -स्त्रीलिंग ईश्वर अब पुल्लिंग बन गया था! आदर्श हिन्दू जीवन शैली जो आज भी सैन्धव और आर्य संस्कृति का समन्वय किये  हुए  है आदि शक्ति रूपी देवियों और आदि देवों के बीच समान  साहचर्य ,समान श्रद्धा की ही पोषक बनी हुई है,किन्तु धर्म के सैद्धांतिक -कर्मकांडी स्वरुप में ही, व्यवहार में स्थिति बदल चुकी है .

लगता है  प्रतिशोधी पुरुष देवो ने पूरी दुनिया में ही अपने पवित्र प्रतिनिधियों के जरिये  कालांतर में और निरंतर भी खुद की धनाढ्य सत्ता और सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए अपनी पद- प्रतिष्ठा और अनुयायी पुरुष जमात को उच्च  सामाजिक स्तर देने का सिलसिला जारी रखा रखा है -नारी की अस्मिता को भी दांव पर लगाते हुए जो उत्तरोत्तर निम्न से निम्नतर सामाजिक स्तर पर पहुँचती रही -उससे उसके  सामाजिक उच्चता का वैकासिक जन्मसिद्ध अधिकार भी पुरुष देवताओं के बढ़ते वर्चस्व से छिनता चला गया - दरअसल उसी वैकासिक जन्मसिद्ध अधिकार की पुनर्प्राप्ति के प्रयास के तौर पर नारीवादी आंदोलनों को पहले तो पश्चिम से और अब उचित ही पूर्व से समर्थन मिला है .वे आज अपनी "आदि शक्ति" रूपी  सामाजिक सम्मान  की वापसी के लिए संघर्षरत हैं -अधिकारों की मांग कर रही हैं .और यह जायज भी है कम से कम भारतीय मनीषा के लिए तो अवश्य ही! देर सवेर उन्हें यह प्राप्त होकर ही रहेगा .मगर इन आंदोलनों को सही परिप्रेक्ष्य और स्पष्ट लक्ष्य की ओर संचालित होना होगा .वे कुछ भी नया नहीं मांग रही हैं बल्कि वास्तविकता तो यही है कि वे अपनी उसी खोयी हुई प्रतिष्ठा और ताकत की पुनर्वापसी चाहती हैं जो उन्हें अपने आदिकाल की भूमिका में प्राप्त था -स्वप्न साकार होने लग गए हैं!

Saturday, 6 March 2010

नर नारी समानता का अगला पाठ

हमने नर नारी समानता के कतिपय मूलभूत समाज जैविकीय पहलुओं को पिछले दिनों जांचा परखा .अब आगे . पश्चिम से शुरू हुए नारीवादी आंदोलनों के बाद /बावजूद आज भी सारी दुनिया के कई हिस्सों में नारी पुरुष की " प्रापर्टी " और उससे निम्न दर्जे की मानी जाती है -और यह निश्चित ही दुखद है - आज भी नारी समानता के लिए किये गए जेनुईन प्रयासों का का प्रभाव नही दिखता -एक व्यवहारविद के लिए भी यह  ट्रेंड उलझन में डालने वाला है कि लाखो वर्षों तक चलने वाले मानव विकास के दौरान ऐसा तो कभी नहीं था कि नारी पुरुष से कभी हीनता की स्थिति में रही हो -हाँ कार्य /श्रम विभाजन की दृष्टि से उनमें बटवारा तो था मगर अपने क्षेत्रों में तो ये दोनों ही श्रेष्ठ और निष्णात थे-इसलिए ही कालांतर के चिंतकों द्वारा भी बार बार यह कहा गया कि मानव जीवन रूपी रथ में नर नारी की भूमिका पहिये के समान ही है -और इनमें कोई छोटा या बड़ा नहीं हो सकता ,दोनों  समान हैं .

हमारे आदिम कार्य विभाजन में पुरुष एक दैनिक और दिन भर का  माने दिहाड़ी गृह त्यागी आखेटक था मगर सामाजिक जीवन की धुरी के रूप में स्त्रियाँ ही थीं जो अपने घर परिवार की देखभाल -दोनों पहर के भोजन की व्यवस्था ,बच्चों का पालन पोषण और कबीलाई बसाहट की साफ़ सफाई में लगी रहती थीं -जहाँ आखेट प्रबंध के चलते  पुरुष की एक समय में केवल एक काम  पर ध्यान में बेहतरी होती गयी वहीं नारियां उत्तरोत्तर  एक समय में एक साथ ही कई कामों को समान गुणवता के साथ सँभालने में दक्ष होती चली आई हैं -वे मल्टी टास्कर हैं -और इसका अनुभव मुझे भी गाहे बगाहे शिद्दत के साथ होता रहा है -एक रोचक और अंतर्जाल जगत से ही उदाहरण दूं -जहाँ बहुत से पुरुष जिसमें मैं भी सम्मिलित हूँ ही अंतर्जाल पर मानो टांग तोड़ कर बैठे रह जाते हैं -ब्लागिंग में मुब्तिला हो जाने पर उन्हें कुछ और नहीं सूझता (हाऊ पूअर न ? ) ठीक उसी समय अंतर्जाल प्रेमी नारियां एक साथ ही कई काम निपटाती रहती हैं -घर परिवार की देखभाल -खाना पीना ,चाय पानी ,आदि आदि -हमें उनसे चैटिंग करते समय भी यह अंदाजा नही रहता के उधर क्या क्या पापड बेले जा रहे हैं या कौन सी खिचडी पक रही है-मेरी तो एक महिला मित्र से इसे लेकर तक झक भी  होती रहती है मगर मैं मंद मंद मुस्कराता भी रहता हूँ उनके इस नैसर्गिक और प्रणम्य क्षमता को जनता जो हूँ -प्रगटतः कहने या प्रशंसा करने की आदत नहीं है इसलिए कहता नहीं .जाहिर हैं नारी इस मामले में तो निश्चित ही बेजोड़ है कि वह एक समय में एक साथ कई समस्याओं को संभाल सकती है -टैकल कर सकती है पुरुष ऐसी क्षमता अब सीखने लग गया है पर नारी की तुलना में बहुत कमजोर है .अ पूअर सोल ! हा हा !

नर नारी पारस्परिक व्यक्तिव का यह अंतर आज भी बहुत स्पष्ट और प्रामिनेंट है .सांस्कृतिक विकास के पहले एक लिंग दूसरे  पर हावी रहा  हो ऐसा तो कतई नहीं था  . वे अस्तित्व की रक्षा के लिए एक दूसरे पर हमेशा निर्भर रहे .मानव उभय  लिंगों में एक यह आदिम संतुलन तो रहा ही है कि वे समान रहे मगर अलग अलग से ...

मगर फिर ऐसा क्या होता गया कि नारी पर पुरुषों का अनुचित अधिपत्य शुरू हुआ ? कब से और क्यूं ??यह चर्चा हम आगे के लिए मुल्तवी करते हैं .....

Thursday, 4 March 2010

नर नारी समानता का दूसरा पाठ!

कल हमने बात की थी कि वयस्क पुरुष व्यवहार  जहाँ आज भी बचपन की मासूमियत और जोखिम उठाने की विशेषताये लिए हुए है वहीं वयस्क नारी आकृति  बाल्य साम्य अपनाए हुए है! नारी आकृति और पुरुष की आकृति में एक बड़ा फर्क प्राचीन वैकासिक काल से ही रहा है -प्राचीन काल के श्रम विभाजन ,जहां पुरुष एक कुशल आखेटक बन चुका था ,के चलते पुरुष को शरीर से ज्यादा मजबूत बनना था ,एथलीट माफिक जिससे उसे शिकार करने की दक्षता हासिल हो सके . नारी और पुरुष की आकृतियों का यह अंतर आज भी विद्यमान है .औसत  पुरुष के शरीर में जहां पेशियों का वजन २८ किलो होता है वहीं औसत नारी में पेशियाँ कुल १५ किग्रा ही होती हैं .टिपिकल पुरुष शरीर टिपिकल नारी शरीर से तीस फीसदी ज्यादा सशक्त,१० फीसदी ज्यादा भारी ,सात फीसदी ज्यादा उंचा होताहै .मगर नारी शरीर पर चूंकि गर्भ धारण का जिम्मा होता है अतः उसे भुखमरी की स्थितियों से बचाने के कुदरती उपाय के बतौर २५ फीसदी चर्बी  उसे अधिक मिली होती है जो पुरुष में मात्र १२.५ फीसदी ही होती है .
बस इसी चर्बी (puppy - fat ) की अधिकता के चलते नारी आकृति का बाल -साम्य लम्बे समय तक बना रहता है .चर्बीयुक्त  अपने गोलमटोल शरीर से बच्चे बड़े ही क्यूट लगते हैं -ऐसे बच्चों को देखते ही सहज ही उनकी ओर देखरेख और सुरक्षा के  लिए मन आकृष्ट  हो जाता है -व्यवहार शास्त्री इसे "केयर सालिसिटिंग व्यवहार" कहते हैं .कुदरत ने यही फीचर नारी आकृति में लम्बे समय तक रोके रखने की जुगत इसलिए लगाई ताकि वह नर साथी का सहज ही "केयर सालिसिटिंग रेस्पांस " प्राप्त करती रहे -आखिर संतति निर्वहन का बड़ा रोल तो उसी का था /है न ? अब देखिये कुदरत ने किस तरह गिन गिन कर नारी में दूसरे बाल्य फीचर भी लम्बे समय तक बनाए रखने की जुगत लगाई है -


नारी की आवाज की पिच पुरुष की तुलना में कहीं ज्यादा और  बच्चे जैसी है -गायिकाएं सहज ही बच्चे की आवाज  में पार्श्व ध्वनि दे देती हैं .भारी पुरुष-आवाजें जहां १३०-१४५ आवृत्ति प्रति सेकेण्ड हैं बहीं नारी का यह रेंज २३०-२५५ आवृत्ति प्रति सेकण्ड है .साफ़ है ,नारी आवाज विकास क्रम में अभी भी बाल सुलभता लिए हुए हैं .उनके चेहरे में भी आज भी वही बाल सुलभता दिखती है -जाहिर है पुरुष प्रथमतः सहज ही नारी की ओर किसी विपरीत सेक्स अपील की वजह से नहीं बल्कि अनजाने ही केयर सालिसिटिंग रेस्पांस के चलते आकृष्ट हो जाता है . जैसे किसी बाल मुखड़े को देख वह उसकी देखभाल और रक्षा की नैसर्गिक भावना और तद्जनित लाड- दुलार की भावना  के वशीभूत करता हो .नारी  की भौंहे ,ठुड्डी ,गाल और नाक सभी में बाल साम्यता आज भी दृष्टव्य है .

 इस चित्र को देखकर आपके मन में जो कुछ कुछ हो रहा है  वही है केयर सालिसिटिंग रिस्पांस
दरअसल मनुष्य आज भी एक नियोटेनस प्राणी है जो एक वह स्थति है जिसमें विकास के क्रम में जीव अपने लार्वल अवस्था में में ही प्रजननं करने लगते हैं -और यह लार्वावस्था एक स्थाई स्वरुप बन जाता है  -मनुष्य आज भी अपनी वयस्क अवस्था में भी लार्वल -बाल्य फीचर्स को अपनाए हुए है जिसके वैकासिक निहितार्थ हैं - ज्यादा बाल्य फीचर्स ज्यादा दुलार! .ज्यादा दुलार तो ज्यादा प्रजाति रक्षा और यह नारियों में पुरुष की तुलना में बहुत अधिक है -भले ही अभिभावक का ज्यादा दुलार बच्चों को कभी कभी बिगाड़ भी देता है मगर वह रक्षित तो रहता ही है -मगर अतिशय  दुलार प्रायः बच्चों की  शैतानियों को अनदेखा करता रहता है -मगर ऐसा नारियों के परिप्रेक्ष्य में तो नहीं लगता?क्यों ??

Wednesday, 3 March 2010

नर -नारी समान तो हैं ,मगर अलग से हैं!

पहले ही बोल देता हूँ -यह पोस्ट एक जैवविद के नजरिये से है. आपका मंतव्य अलग भी हो सकता है. इन दिनों मैंने खुद अपने आलोच्य विषयगत अल्प ज्ञान को अद्यतन करने के (नेक ) इरादे से वर्तमान वैश्विक साहित्य संदर्भों को टटोला और कई रोचक बाते सामने आई हैं जिन्हें आपसे साझा करना चाहता हूँ -जो साईब्लाग के पहले से पाठक रहे हैं उनका किंचित पुनश्चरण भी हो जायेगा -यह भी मंशा है (कठिन शब्दों का अर्थ कोई सुधी जन जानना चाहेगें तो दिया जा सकता है! ) .सबसे रोचक बात तो यह है कि आज भी वयस्क पुरुष जहां अपने व्यवहार में बाल्य सुलभता लिए हुए हैं वहीं युवा नारी आकृति की बाल्य साम्यता बरकरार है -आईये जानें कैसे -

पंद्रह वर्ष की अवस्था का किशोर - पुरुष नारी के मुकाबले १५ गुना ज्यादा दुर्घटना सहिष्णु होता है .ऐसा इसलिए है कि वह नारी की तुलना में इस उम्र तक भी बच्चों के खेल खेल में /के जोखिम उठाने की  ज्यादा प्रवृत्ति रखता है .यद्यपि उसकी यह वृत्ति उसे खतरों के ज्यादा निकट ले आती है मगर यह उन प्राचीन दिनों की अनुस्मृति शेष है जब नर झुंडों को शिकार की सफलता के लिए  अनेक जोखिम उठाने पड़ते थे. शिकारी झुंडों में अमूमन ६-७ पुरुष होते थे-नारियां शिकार झुण्ड में न सम्मिलित होकर घर की जिम्मेदारी उठाती थीं .पुरुषों का काम जोखिम उठाना ही था -और इसमें जन हानि की संभावना भी रहती थी -और इस उत्सर्ग के लिए पुरुष परिहार्य थे-उनके प्रजनक ह्रास के योगदान की उस शिकारी कुनबे के अन्य सदस्यों से प्रतिपूर्ति तो उतनी मुश्किल नहीं थी जितना किसी संतति वाहक  नारी का प्राणोत्सर्ग! इसलिए भी नारी  का  आखेट  में जाना अमूमन प्रतिबंधित था .रोचक बातयह है कि कुछ बड़े अपवादों को छोड़ दिया जाय तो कालांतर के युद्धों में भी नारियां नहीं जाती थीं -एक पौराणिक  संदर्भ राजा दशरथ का है जिहोने कैकेयी को युद्ध में साथ लिया था और कैकेयी ने अंततः उनकी प्राण रक्षा भी की थी. शिकार या युद्ध में नारियों का ह्रास सीधे आबादी के  प्रजननं दर के ह्रास का कारण  बन सकता था .हमें ध्यान में रखना होगा कि  प्राचीन काल (लाख वर्ष पहले ) में जहाँ आबादी बहुत  कम थी -प्रजनन दर का  ह्रास सचमुच जीवन मृत्यु का ही प्रश्न था .


अपने कबीलाई काल के केन्द्रीय रोल में नारियां आखेट का काम छोड़कर अन्य किसी काम में  खूब प्रवीण थीं -वे घर की देखभाल के साथ कई कामों को एक साथ करने में निपुण होती गयीं और उनकी यह क्षमता आज भी उनके  साथ है .वे उत्तरोत्तर एक मल्टी  टास्कर के रूप में दक्ष होती गयीं .एक साथ ही कई काम कर लेने की उनकी क्षमता आज भी स्पृहनीय है .उनकी वाचिक क्षमता (गांवों में कभी महिलाओं को झगड़ते देखा है ?) ,घ्राण क्षमता (पति के विवाहेतर सम्बन्धों को सूंघ लेने की क्षमता -हा हा ) ,स्पर्श ,और रंगों की संवेदनशीलता पुरुषों से अधिक विकसित है .वे एक कुशल सेवा सुश्रुषा करने वाली ,ज्यादा वात्सल्यमयी ,और  निरोगी(रोग प्रतिरोधी )   बनती गयी हैं .निरोगी होकर वे ज्यादा समर्थ माँ जो होती हैं -संतति वहन का भार उनके कन्धों पर ज्यादा ही है .इस तरह विकास के क्रम में पुरुषों के मस्तिष्क  ने बाल्यकाल के जोखिम उठाने के उनकी बाल सुलभ गतिविधियों को नारी के बालिका सुलभ गतिविधियों की तुलना में ज्यादा स्थायित्व दे दिया .
शिकार का जोखिम 

पुरुष जहाँ आज भी ज्यादा कल्पनाशील ,जोखिम उठाऊ और अड़ियल /दुराग्रही/जिद्दी /उद्दंड बना हुआ है नारियां ज्यादा समझदार और ध्यान देने वाली हैं .इन व्यवहारों का  साहचर्य एक दूसरे का परिपूरक बनता गया  और मनुष्य के विकास का झंडा लहराता आया है .
                                                             बहुधन्धी गृह कारज
नर नारी समान तो हैं मगर अलग से हैं -१(जारी... )

Monday, 19 October 2009

नारियां क्यों बनाती है यौन सम्बन्ध ? एक ताजातरीन जानकारी !

विश्वप्रसिद्ध साप्ताहिक पत्रिका टाईम(अक्टूबर ६ ,२००९) का यह ताजातरीन लेख  महिला सेक्सुअलिटी में रूचि रखने वालो /वालियों के लिए रोचक हो सकता है ! एलायिसा फेतिनी द्बारा लिखा  'व्हाई वीमेन हैव सेक्स " शीर्षक यह लेख हो सकता है यौन कुंठाओं वाले एक बड़े भू भाग के  भारतीय उपमहाद्वीप  का प्रतिनिधि  चित्रण न करता हो मगर एक प्रजाति के रूप में मनुष्य की सहचरी के गोपन व्यवहार का कुछ सीमा तक अनावरण करता ही है ! नैतिक मान्यताओं को लेकर आज बहुत कुछ अस्पष्ट और संभ्रमित  भारतीय मानस भले ही ऐसे अध्ययनों से प्रत्यक्षतः दूरी बनाए रखना चाहता हो मगर  ऐसे अध्ययनों के अकादमीय महत्व को सिरे से नकारा नहीं जा सकता !

टेक्सास विश्वविद्यालय के मनोविज्ञानी द्वय सिंडी मेस्टन और डेविड बस ने दुनिया भर से १००० के ऊपर महिलाओं को इस अध्ययन के लिए चुना और नतीजों को पुस्तकाकार रूप भी दे दिया है -उन्होंने २३७ कारण गिनाएं है की क्यों महिलायें यौन संसर्ग करती हैं /राजी होती हैं ! सबसे आश्चर्यजनक है की महज उदाद्त्त प्रेम ही यौन सम्बन्ध बनाने का अकेला सहज कारण  कम मामलों में पाया गया !  टाइम ने  यौन विषयक अध्येताओं का साक्षात्कार भी छापा है ! सार संक्षेप यहाँ प्रस्तुत है -विषय की समग्र समझ के लिए उक्त लेख और सम्बन्धित  कड़ियों के अनुशीलन की सिफारिश की जाती है !

नर - नारी यौन सम्बन्धों के पीछे शारीरिक आकर्षण ,सुखानुभूति (चरम  आनंद !) की चाह या प्रेमाकर्षण /अनुरक्त्तता जैसे अनेक कारण हो सकते हैं ,मगर नारी यौनोंन्मुखता के पीछे  भावात्मक लगाव की  भूमिका रेखांकित की गयी  है ! नारी, पुरुष से कहीं अधिक ऐसे मामलों में यौन सम्बन्ध की आकांक्षी हो उठती है जहाँ मानसिक /भावात्मक जुडाव महसूस करती है ! जबकि पुरुष प्रकृति वश   अवसर की ताक में भी  रहता है ! नारियां छोटे अवधि के सांयोगिक संबंधो को लेकर खास तौर पर सतर्क और "चूजी "  होती हैं ! पुरुष की यौन सम्बन्धों की चाह के पीछे सहकर्मियों में अपने स्टेटस को ऊंचा उठाने की भी मनोवृत्ति जहां आम तौर पर  देखी गयी है इस अध्ययन  में कुछ नारियों को भी इसी मानसिकता के वशीभूत पाया गया है !

नारियां यौन सम्ब्न्धोन्मुख  कब और क्यों होती हैं के जवाब में अध्येताओं का कहना है कि  उनमें भी यह चाह  लैंगिक आकर्षण ,भौतिक  सुख,प्रेम के प्रागट्य और किसी के प्रति लगाव की अभिव्यक्ति या उद्दीपित होने पर आवेग के शमन के लिए भी हो सकता है ! या फिर यह आत्म गौरव या यौन गौरव  (सेल्फ एस्टीम या सेक्स एस्टीम ) को ऊंचा  उठाने  ,लचीले सहचर को खुद तक आसक्त बनाए  रखने की युक्ति और कुछ मामलों में तो महज सर दर्द को दूर करने के उपाय (हाँ, यह कारगर है !) के रूप में यौन सम्बन्ध की अभिमुखता   देखी गयी है ! अध्येता द्वय ने कामक्रीड़ा की आर्थिकी पर भी एक भरा पूरा अध्याय  लिख मारा है जिसमें प्रतिदान (और प्रतिशोध की भी ! ) भावना लिए नारियों के यौन संसर्ग वर्णित हुए हैं ! कोई काम करने के लिए -भले ही वह घर के कूड़े की सफाई में सहयोग (याद आयी दीवाली ? ) ,रात्रिभोज का पक्का इंतजाम या फिर महंगे (स्वर्ण ) उपहार को यौन संसर्ग से हासिल करने की भी जुगत इस्तेमाल में है ! पुस्तक का एक अध्याय नारी यौन  सम्बन्धों  के काले अध्याय पर भी है जहां वे  धोखे का शिकार होती है ,छली जाती है और बलपूर्वक यौन कर्म में संयुक्त कर ली जाती है !


अध्ययन की एक चौकाने वाली जानकारी यह रही कि  महिलाओं ने कहीं कहीं सेक्स सम्बन्ध महज प्रतिशोध के लिए बनाए -धोखेबाज प्रेमी को यौन जनित रोगों का 'उपहार " अपनी सहेलियों  के जरिये या फिर ईर्ष्यावश सहेली के पहले से ही 'इंगेज्ड ' पार्टनर को कामपाश में बाँधने (मेट पोचिंग ) को भी बखूबी अंजाम दिया गया ! इस घटना को अंजाम देने वाली रोमान्चिताओं ने जहाँ यह स्व -कृत्य बखाना वहीं  इससे पीड़ित नारियों ने भी अपना दुखडा भी  रोया ! मैं इन दिनों खुद अंतर्जाल पर मेट हंटिंग (सावधान :नामकरण का कापीराईट मेरा है ) के एक रोचक यौन व्यवहार के अध्ययन में लगा हूँ ! नतीजा तो शायद गोपन ही रह जाय !

नारी यौनोंन्मुखता के पीछे बकौल डार्विन "फीमेल च्वायस " की बड़ी भूमिका है और यह आज भी सही है ! आज की आधुनिका भी  लाख डेढ़ लाख पहले की उसी आदि अफ्रीकी महिला की ही अविछिन्न वंशज है जिसने अपने निर्णय में कोई चूक नहीं की थी और सही पुरुष पुरातन के चयन से  हमारी वंश बेलि का मार्ग प्रशस्त कर दिया था  -एक लैंगिक निर्णय की सफल महिला की सफल जैवीय दास्ताँ है मानव विकास ! आज उसी महिला महान की वंशधर नारियां वैसी ही  यौन मानसिकता /मनोविज्ञान -पुरातन ज्ञान  का वरण किये हुए हैं जिसका जीवनीय मूल्य है ! उनका यौन चयन आज भी व्यापक मामलों में बेहतर उत्तरजीविता और प्रजनन सफलताओं की गारंटी है !


और यह हकीकत है कि  लैंगिक प्रतिस्पर्धा के जैवीय परिप्रेक्ष्य में "वरणीय नर " जल्दी ही प्रणय आबद्ध हो इंगेज्ड हो उठते  हैं -कोई न कोई उनकी अंकशायिनी बन ही जाती हैं -इस मानवता के परचम को भी तो बुलंद किये रहना है मेरे भाई !  सुयोग्य वर की तलाश इसलिए ही सदैव मुश्किल रहती है -योग्यतम जल्दी चुन जो लिए जाते हैं - कहीं  न कहीं प्रणय  पाश में बध ही जाते हैं. प्रेम या योजित किसी भी तरह के सम्बन्ध में   ! इसतरह योग्य पुरुष के लिए आज भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, नारियों में मनचाहे पुरुष चयन की प्रतिस्पर्धा जारी है !

पूरी किताब भले  न मिल सके इस पूरे आलेख का आस्वादन  यहाँ  मय समस्त कड़ियों और नयनाभिराम चित्रों के किया ही जा सकता है -मेरी सिफारिश है !

Sunday, 30 August 2009

मानव प्रजाति में प्रणय याचन और यौन संसर्ग : क्या कहते हैं व्यवहारविद ?

चित्र साभार : Lori Finnegan
इन्ही ब्लॉग पन्नो पर हमने पशु पक्षियों के प्रणय याचन प्रदर्शनों को निरखा परखा और अब बारी है मनुष्य प्रजाति में प्रणय व्यवहार के अवलोकन की -मनुष्य प्रजाति यानि होमो सैपिएंस सैपिएंस जो एक 'सामाजिक प्राणी ' है ! जैवविद प्रायः प्रजाति को पारिभाषित करने में यह भी कहते हैं की जो प्राणी आपस में निर्बाध प्रजनन कर संतति जनन कर लेते हैं वे एक प्रजाति के होते हैं ! यह परिभाषा भी मनुष्य को एक भरी पूरी प्रजाति होने का गौरव देती है ! मतलब धरती पर का कहीं का गोरा या काला ,नाटा -मोटा कद काठी का इन्सान इस परिभाषा को पूर्णतः साक्षात ,चरितार्थ कर सकता है !

तो आईये अनावश्यक विस्तार को तूल न देकर हम सीधे मुद्दे की बात करें -मनुष्य के प्रणय प्रदर्शनों पर मेरे संग्रह में जो बेहतरीन कृति है वह डेज्मांड मोरिस की " इंटीमेट बिहैवियर " है ! आईये इस मसले पर इसी पुस्तक के हवाले से कुछ गौर फरमाएं !

मनुष्य का प्रणय काल दीगर पशुओं की तुलना में काफी अधिक -एक वर्ष तक लंबा खिचता देखा जाता है ! मगर सहज तौर पर यह औसतन एक वर्ष का आका गया है ! मनुष्य की पारस्थितिकीय जटिलताओं के चलते इस समय में प्रायः कमी बेसी भी देखी जाती है ! (मतलब प्यार में धैर्य का साथ न छोडें या धैर्य आपका साथ न छोडे तभी गनीमत है ! ) ! इसी एक वर्ष की अवधि में प्रथम दृष्टि के कथित अनुभव के साथ ही यौनिक संसर्ग तक प्रणय याचन (कोर्टशिप ) के कई चरण /स्टेप्स घटित होते हैं ! ऐसा लगता है कि व्यवहार शास्त्री ( इथोलोजिस्ट ) रूहानी प्रेम (प्लैटानिक लव ) को अपने अध्ययन क्षेत्र के बाहर का विषय मानते हैं -वे प्यार की दीवानगी में देह की भूमिका ही सर्वोपरि मानते हैं !

घनिष्ठ सम्बन्ध की व्याख्या करते हुए डेज्मांड मोरिस कहते हैं कि बिना शरीर के किसी भाग के हिस्से के संस्पर्श हुए किसी के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध नही हो सकता ! मतलब बात बात में घनिष्ठ सबंध का दावा करने वालों में यह देखा जाना चाहिए कि उनके अंग उपांग कभी संस्पर्श के दौर से गुजरे भी है या नहीं ! अब हैण्डशेक तक न हुआ हो और दावे किए जायं कि अमुक से हमारा घणा /घनिष्ठ संबंध है तो एक इथोलोजिस्ट को इस पर आपत्ति हो सकती है ! गरज यह कि घनिष्ठ सम्बन्ध संस्पर्शों की बिना पर ही परवान चढ़ते हैं ! तो जाहिर है मनुष्य के प्रणय याचन से यौन संसर्ग तक की कथा दरअसल कड़ी दर कड़ी घनिष्ठ से घनिष्ठतम संस्पर्शों का ही फलीभूत होना है ! मोरिस ने इस पूरी प्रक्रिया को कई चरणों /स्टेप्स में यूँ बयान किया है ! (मूल कृति से साभार ) ( इस अंतर्जाल संस्करण को पढने की सिफारिश है )
1. eye to body.
2. eye to eye.
3. voice to voice.
4. hand to hand.
5. arm to shoulder.
6. arm to waist.
7. mouth to mouth.
8. hand to head.
9. hand to body.
10. mouth to breast.
11. hand to genitals.
12. genitals to genitals.
मतलब आंख से शरीर ,आँख से आँख ,आवाज से आवाज ,हाथ से हाथ ,हाथ से कंधे ,
हाथ से कमर ,मुंह से मुंह ( चुम्बन ) ,हाथ से सिर ,हाथ से शरीर का कोई भी हिस्सा -यौनांग छोड़कर ,
मुंह से वक्ष ,हाथ से यौनांग ,यौनांग से यौनांग ! (इति रति-लीलाः)

मगर यहाँ एक काशन है !प्यार के एक पावदान से ऊपर के पावदान पर पैर रखना इतना सहज नही है !
यह पुरूष के प्रणय साथी के निरंतर प्रतिरोध ,हतोत्साहन ,और अनिच्छा को झेलते जाने का एक जज्बा है -यह प्रकृति के फूल प्रूफ़ सुरक्षात्मक उपायों की एक व्यवस्था है ताकि किसी नाकाबिल /अक्षमं को प्रजननं का मौका न मिल जाय जिसमे नारी को जहमत ही जहमत उठानी पड़ती है -गर्भ धारण से शिशु के लालन पालन तक ! तो एक स्टेप से आगे के स्टेप पर जाते हुए कड़ी जैवीय छान बीन भी अपरोक्ष रूप से चलती रहती है -इसमें किसी भी स्तर पर भी क्वालीफाई न कर पाने पर प्यार के मैदान से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है -भले ही आप उसके बाद बेमिसाल उर्दू पोएट्री लिखते पाये जाएँ ! हाँ आश्चर्य है कि इतनी चाक चौबंद व्यवस्था के बाद भी कुछ चक्मेबाज अपनी घुसपैठ बना ही लेते हैं और नारी अभिशप्त होती है ! ऐसा क्यों होता है -विमर्श जारी है !

ऊपर के चरणों के अपवाद वेश्यावृत्ति और सामाजिक अनुष्ठानों -परिणय जो निश्चय ही प्रणय नही है में मिलते है जिनमे बताये गए स्टेप्स गडमड हो जाते हैं -इन पर चर्चा फिर कभी !


Saturday, 2 August 2008

पांवों के पड़ाव पर विराम पाती सौन्दर्य यात्रा !

सौन्दर्य की अधिष्ठात्री प्रेम की देवी वीनस
"आप के पाँव बहुत खूबसूरत हैं ,इन्हे जमीन पर मत रखियेगा नहीं तो ये गंदे हो जायेंगे ", मशहूर फिल्म पाकीजा की शुरूआत ही नायक द्वारा नायिका के खूबसूरत पावों की प्रशंसा से होती हैं। सिन्ड्रेला या लालपरी की कहानियों का जन्म स्थान चीन माना जाता है,जहाँ नारी के छोटे पावों को सदियों से खूबसूरत माना जाता रहा है। अभी कुछ समय पहले तक चीन में लड़कियों के पावों को बर्बरता पूर्वक छोटा बनाये रखने का रिवाज था। उन्हें बहुत छोटे आकार के ``जूते´´ पहनाये जाते थे। पावों की ऐड़ी और अग्रभाग को मिलाकर बांध दिया जाता था ताकि उनका सामान्य विकास रूक जाय।
चीन में ही नन्हें पावों को ``सुनहले कमल´´ की संज्ञा मिली हुई है। व्यवहारविदों की राय में इन सुनहले कमलों की भी भूमिका रही है। प्रेम संसर्ग के आत्मीय क्षणों में प्रेमीजन इन कमलवत पावों को चूमने से नहीं अघाते। अपने पैरों की विकृति के कारण सहजता से चलने फिरने में लाचार चीनी रूपसियाँ अपने को पूरी तरह से पुरुष सहचरों की दया पर निर्भर पाती है। यौनासक्त चीनी पुरुषों के ``अहम´´ को इससे तुष्टि मिलती है।
सुन्दरता की ओट में क्रूरता का यह घिनौना खेल क्या परपीड़ा से सुख प्राप्ति की विकृत मानसिकता का परिचायक नहीं है। आश्चर्य की बात है कि अभी भी चीन में नारी के ``कमलवत पांवों´´ के उपासकों की कमी नहीं है। कहाँ हैं नारी स्वतन्त्रता के पक्षधर?
सेक्स प्रतीकों की दुनिया में नारी पावों को ढकने वाले जूतों को ``योनि´´ के रूप में भी देखा गया है। कई विदेशी संस्कृतियों में जूतों के विभिन्न आकार प्रकार योनि प्रतीक को उभारते हुए नजर आते हैं। पावों के अलंकरण में भारतीय नारी की अग्रणी भूमिका रही है। किसी भरतीय नृत्यांगना के पावों को देखिए। मेंहदी और घुंघरूओं से उसके पावों की खुबसूरती में चार चा¡द लग जाते हैं। भारतीय नारी के श्रृंगार विधान में पावों का अलंकरण प्रमुखता से मुखरित होता है। नाना प्रकार के आभूषण और मेंहदी की डिजाइनें नारी पावों को सौन्दर्य के शिखर पर ला देती हैं।
नारी देह के मनोरम स्थलों की सुखद यात्रा के इस पड़ाव पर पहुँच मन एक अलौकिक प्रशान्ति भाव से भर उठता है। नारी के नख-शिख सौन्दर्य की यह शोध यात्रा यही उसके चरणों में विराम लेती है। किन्तु यहाँ नख शिख का कोई भेद नहीं है। यह रूप संसार की वह खोज यात्रा है जहाँ अन्त में आप प्रस्थान बिन्दु पर फिर वापस हो लेते हैं ।
नारी के रूप बन्ध से मुक्ति कहां ? मगर शायद इसीलिये महाकवि इस रूप्जाल में उलझ कर जीवन के उत्तर्दाय्त्वों के प्रति विमुखता से आगाह भी करता है -
दीप शिखा सम युवति तन ,मन जन होऊ पतंग
यह श्रंखला यहीं संपन्न होती है -मुझे इस पर विपरीत विचारों के अनेक जन्झावात भी झेलने पड़े ,शायद परिप्रेक्ष्य को सही नजरिये से देख पाने के कारण कई ब्लॉगर बंधुओं से संवादहीनता की स्थिति बनी रही ...कुछ स्नेही औरपरिप्रेक्ष्य को समझ रहे ब्लॉगर बंधुओं ने मुझे लगातार प्रोत्साहित किया -मैं उन सभी सहयोगी साथियों और असहयोगी साथियों का भी आभार प्रगट करता हूँ जिन्होंने सम्मिलित रूप से इस सौन्दर्य यात्रा के जीवन्तता बनाए रखी -विज्ञान में विरोध की बड़ी अहमियत है -वादे वादे जायते तत्व्बोधःएक विचार यह भी आया कि विज्ञान के नजरिये से नर नारी को लेकर पक्षपात क्यों ? पुरूष सौन्दर्य वर्णन क्यों नही ? यह प्रश्न साहित्यकारों से पूछा जाना चाहिए -तथापि मैं पुरूष सौसठव् पर भी एक श्रृखला अवश्य करना चाहता हूँ ........

Thursday, 31 July 2008

अब आ पहुंचे हैं नारी की खूबसूरत टांगो तक ......

सौजन्य -शटरस्टाक
नारी की `लम्बी´ टांगे खूबसूरती का प्रतीक मानी गयी है। यौन परिपक्वता की उम्र आते - आते टांगे अपनी अधिकतम लम्बाई ले लेती हैं। इसलिए इनकी अतिरिक्त लम्बाई ``अति लैंगिकता ´´ का प्रतीक बन जाती है ।तरह-तरह के उत्पादों के विज्ञापन/प्रदर्शन में नारी की टांगों को प्रमुखता से दिखाया जाता है। भले ही उत्पाद विशेष और नारी की टांगों का दूर दराज का भी कोई सम्बन्ध न हो। यह उपभोक्ताओं को आकिर्षत करने की एक चालाकी भरी युक्ति है ।
यह भी गौरतलब है कि विश्वसुन्दरियों की प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेने वाली रूपसियों की टाँगे अपेक्षाकृत लम्बी होती हैं। इन लम्बी टांगों को ऊंची ऐड़ी के जूतों पर साध कर उन्हें और भी लम्बा (खूबसूरत) बना दिया जाता है। फैशन की दुनिया में स्कर्ट की घटती बढ़ती लम्बाई भी टांगों के सौन्दर्य प्रदर्शन से नियमित होती रही है। नारी की जांघों का प्रदर्शन काफी कामोद्दीपक माना गया है ऐसा इसलिए है कि जांघे नारी योनि की निकटता का बोध कराती हैं।

Monday, 28 July 2008

प्रेम के इस प्रतीक चिह्न से कौन अपरिचित है ?


पहले एक निवेदन :

इस सौन्दर्य यात्रा पर कुछ सुधी पाठकों की जेनुईन आपात्तियां मिली हैं -मेरा आग्रह है कि यह आवश्यक नहीं कि जो कुछ यहाँ व्यक्त हो रहा है उससे मेरी अनिवार्यतः सहमति ही हो .व्यवहार शास्त्री कैसे मनुष्य को अन्य पशुओं के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं यह लेखमाला उसी के एक पहलू पर पर केंद्रित है .आगे अन्य विषय भी आते ही रहेंगे ।अस्तु ,

[नितम्बों की अगली कड़ी ......जारी .]

सभ्य समाज में भी कई नृत्य प्रारूप नारी नितम्बों के आकार को बढ़ा-चढ़ा कर ही प्रस्तुत करते है। यह सब यही सिद्ध करता है कि नारी नितम्बो की विकास यात्रा में उनके यौनाकर्षण की प्रबल भूमिका रही है। यह सही है कि हमारे पूर्वजों ने लाखों वर्ष पहले ही चार पैरों पर चलना छोड़ दिया था किन्तु आज भी हमारे अवचेतन मन से नारी नितम्बो के प्रति प्रबल मोह का भाव मिटा नहीं है। कहते हैं कि प्रेम का वैिश्वक प्रतीक चिन्ह (हृदयाकृति) दरअसल नितम्ब की ही सरलाकृति है।

इस चिन्ह के ऊपर के मध्यवर्ती गड्ढे (दरार) को देखिए और फिर खुद फैसला कीजिए कि यह दिल सरीखा लगता है या फिर नितम्ब जैसा? अपने प्रबल यौनाकर्षण की क्षमता के चलते नारी नितम्बों को ``चिकोटीबाजों´´ की अप्रिय हरकतों को भी ``सहना´´ पड़ता है।

इटली में चिकोटी बाजों का इतना आतंक है कि शायद ही कोई खूबसूरत (नितम्बों वाली) लड़की अपने अजनबी प्रशंसको को ``चिकोटी´´ से अनछुई बच जाय। भारत में भी भीड़-भाड़ भरे नगरी क्षेत्रों पिकनिक स्थलों पर चिकोटी बाजों की बन आती है। खुशवन्त सिंह की मशहूर कहानी `चिकोटी बाज´ ऐसे दृष्टान्तों की मनोरंजक झलक देती है। व्यंग पर मशहूर इतालवी पुस्तक ``हाऊ टू बी एन इटालियान´´ में नितम्ब चिकोटीबाजी की श्रेणियों तक का मजेदार वर्णन है। वहा¡ तीन तरह की चिकोटिया¡ बतायी गयी हैं। नौसिखियों के लिए ``द पिजिकैटो´´ है जिसमें अंगूठे और मध्यमा के सहयोग से अतिशीघ्रता से चिकोटी काटने का कला का वर्णन है। ``द विवैसी´´ में कई अगुलियों के समवेत प्रयास से एक ही चरण में शीघ्रता से कई बार चिकोटिया¡ काटने की विधि का व्योरा है। ``दु सोस्टेन्यूटों´´ श्रेणी के अन्तर्गत काफी देर तक चिकोटी का जमाव/दबाव नितम्बों पर बनाये रखने की सिफारिश है।

यह महज विवरण है इसकी कोई सिफारिश यहाँ अभिप्रेत नहीं है [सरल हृदयी पाठकों के लिए नोट ]

Saturday, 26 July 2008

नारी-नितम्बों तक आ पहुँची सौन्दर्य यात्रा !

आज जीवित प्राइमेट (नरवानर) समुदाय) प्रजाति के लगभग २०० सदस्यों में से केवल मानव प्रजाति को ही अभारयुक्त गोलाकार नितम्बो की सौगात मिली है। नितम्बों का विकास तभी से आरम्भ हुआ जब मानव दो पाया बना और सीधे खड़े होकर चलने लगा। नितम्बों के साथ सबसे दिलचस्प बात यह है कि वे मानव शरीर के ``जोक रीजन´´ का प्रतिनिधित्व करते हैं। यानि हंसी ठट्ठे का केन्द्र हैं वे !

फिर भी नारी नितम्बों का सौन्दर्य पक्ष अनदेखा नहीं किया जा सकता। नितम्बों का आकार एक सशक्त कामोद्दीपक नारी अंग की भूमिका निभाता है और हमारे उस पशु अतीत की ध्यान दिलाता रहता है, जब कामोन्मत्त नर कपि रति क्रीड़ाओ हेतु मादा के पृष्ठ भाग पर आरोही हो रहे थे। पुरुष की तुलना में नारी के नितम्ब भारी और अधिक उभार वाले होते हैं। इतना ही नही नारी कूल्हों के ``मटकाने´´ के गुणधर्म के चलते नारी-नितम्बों का यौनाकर्षण बढ़ जाता है। इस तरह नारी नितम्ब की तीन प्रमुख विशेषताए¡-अधिक चर्बी , उभार और मटकाने (अनडुलेशन) की स्टाइल उसे पुरुष के लिए एक अत्यन्त प्रभावशाली यौनाकर्षण का केन्द्र बिन्दु बना देती हैं।

प्रख्यात व्यवहार शास्त्री डिज्माण्ड मोरिस तो यहाँ तक कहते हैं कि अतीत की नारी के नितम्ब यौनाकर्षण की अपनी भूमिका में इतने बड़े और भारी होते गये कि रति क्रीडा का मूल उद्देश्य ही बाधित होने लगा । लिहाजा मानव को सामने से यौन संसर्ग (फ्रान्टल कापुलेशन) का विकल्प चुनना पड़ा। कालान्तर में नारी स्तनों ने नितम्बो के `सेक्स सिग्नल´ की वैकल्पिक भूमिका अपना ली और तब कहीं जाकर नारी नितम्बो के बढ़ते आकार पर अंकुश लग सका।

किन्तु आज भी एक जैवीय स्मृति शेष के रूप में विश्व की कई आदिवासी संस्कृतियों में नारी नितम्बों को बहुत उभार कर दिखाने की प्रथा है। अफ्रीका की ``वुशमेन´´ आदिवासी´´ औरतें अपने नितम्बों को एक विशेष पहनावे के जरिये बहुत उभार कर ``डिस्प्ले´´ करती हैं।

Thursday, 24 July 2008

छत्तीस के नहीं हैं कूल्हे और कमर के रिश्ते-सौन्दर्य के अगले पड़ाव पर !

कूल्हे और कमर के रिश्ते की पड़ताल :चित्र सौजन्य -ट्रेंड हंटर मैगजीन
कूल्हे मटकाना एक चर्चित मुहावरा है। इसका अर्थ चाहे जो कुछ भी हो इतना तो स्पष्ट है कि यह अपनी ओर ध्यान आकिर्षत करने की नारी की अनेक अदाओं में एक है। किसी रूप गर्विता का कूल्हे मटकाकर कहीं से निकलना कई रसिक जनों की दिल की धड़कनो को बढ़ा सकता है। पर जैवीय दृष्टि से नारी के `बड़े´ कूल्हें का फायदा शिशु के आसान प्रसव से जुड़ा है।

भारी भरकम कूल्हा नारी की उर्वर जनन क्षमता का प्रतीक है। नारी के कूल्हे जोरदार यौनाकर्षण के केन्द्र भी हैं अत: इन्हें साभिप्राय ``उभारकर´´ प्रदर्शित करने का प्रचलन भी रहा है। सौन्दर्य शिल्पकार अपनी नारी मूर्तियों के कूल्हों को खासों कोणों से उभार कर गढ़ते हैं। एक समय ब्रिटेन में कूल्हों की चौड़ाई सौन्दर्य का पैमाना मानी जाती थी। सबसे खूब सूरत लड़की वह होती थी जिसकी कमर की माप (इंचों में) ठीक उसके पिछले जन्म दिन की उम्र के बराबर होती थी। यानी जितनी पतली कमर होगी कूल्हे उतने ही चौड़े दिखेंगे।

कमर पतली रखने का कुछ ऐसा फैशन चला कि ब्रितानी महिलायें कुछ निचली पसलियों की शल्य क्रिया कराकर कमर की गोलाई कम करने में सफल हुईं .इस तरह कमर की सूक्ष्मतम माप 13 इंच तक जा पहुँची .अंग्रेज मेमों की पतली कमर देखकर ही शायद किसी शायर ने यह फिकरा कसा कि ``सुना है सनम को कमर ही नहीं है, खुदा जाने नाड़ा कहाँ बांधती हैं।´´

कमर की गोलाई को कम रखने की अनेक जुगतों ने कई समस्याओं को भी जन्म दिया। गर्भपातों की संख्या बढ़ने लगी श्वास रोगों में बढ़ोत्तरी हुई और यहाँ तक की आयु सीमा घटने लगी। चिकित्सकों ने कमर को पतला बनाने के अभियान का पुरजोर विरोध किया लेकिन विगत शती के पाँचवे दशक तक ऐसे पहनावों का बोलवाला रहा है, जो `पतली कमर´ को उभार कर प्रदर्शित करते हैं।
नारी की पतली कमर उसकी मासूमियत, कमसिन होने और अक्षत यौवना होने का भी प्रतीक रही हैं यदि किसी षोडशी के कमर की माप 22 इंच है, तो उसके मां बनने पर यह 28 से 30 इंच तक ``मोटी´´ हो सकती है। इसलिए धारणा यहा बनी कि कमर की माप जितनी कम होगी नारी की ``सेक्सुअल अपील´´ उतनी ही अधिक होगी। लेकिन अब सौन्दर्य बोध के प्रतिमान काफी बदल गये हैं।

विगत् वर्षों की भुवन सुन्दरियों की प्रति स्पर्धाओं में वक्ष कमर और कूल्हों का आदर्श अनुपात 36-24-36 का रहा है। इस जैव आंकडे में कमर और कूल्हों की माप के बड़े अन्तर को देखिए। कूल्हों को एक खास लय ताल में गति लेकर चहलकहदमी की आदत हालीवुड/बालीवुड की अफसराओं से लेकर आम नवयौवनाओं की भी रही है। कई नृत्य शैलियों में भी कूल्हों की विभिन्न गतियों को प्रमुखता मिली हुई है।
पुरुष नृत्यों में कूल्हों की गतियों पर वैसे तो काफी अंकुश रहा है किन्तु इधर हाल में इस प्रतिबन्ध के प्रति विद्रोह मुखरित हो रहा है, फिर भी कूल्हों को मटकाने का प्रकृति प्रदत्त अधिकार केवल महिलाओं को ही मिला हुआ है। इस मामले में तो वे निश्चित रूप से पुरुषों से बाजी मार ले गयीं हैं .

Wednesday, 23 July 2008

नाभि अलंकरण :नख शिख सौन्दर्य यात्रा का अगला विराम

नाभि अलंकरण :फोटो सौजन्य -iStockphoto
नारियां तोंद मुक्त होती हैं .उनके पेट की बनावट ही कुछ ऐसी होती है कि मोटी से मोटी महिला भी तोंद रहित लगती है। यहाँ तक कि गर्भ धारण में भी उनके पेट का आकार तोंदनुमा नहीं दिखता। वसा के अधिक जमाव के बावजूद भी उनका पेट आगे निकले के बजाय चौड़ाई में फैलता है और कूल्हों को घेर लेता है। पुरुष की तुलना में नारी का पेट अधिक लम्बा व गोलायमान होता है, नाभि और गुप्तांग के बीच की दूरी भी अधिक होती है।

महिलाओं के पेट की इसी सुघड़ता ने कला चित्रकारों का मन हमेशा आलोडित किया है, जो इस नारी अंग को पुरुषों के लिए लैंगिक आकर्षण का एक पसंदीदा विषय मानकर अपनी तूलिका को गति देते रहें हैं। यहाँ (पापी) पेट का सवाल एक दूसरे नजरिये से उभरता है और कितने ही नारी ``माडल´´ अपने सुघड़ पेटों की बदौलत ऐश्वर्य सुख भोगती हैं। उनकी इस पेट की कमाई में उनकी नाभि का योगदान कुछ कम नहीं है।

दरअसल नारी पेट की कामोद्दीपकता में उसकी नाभि चार चाँद लगाती है। नारी की नाभि की आकृति गोलाकार अथवा लम्ब रूप (वर्टिकल) हो सकती है। मोटी महिलाओं की नाभि ज्यादातर मामलों में गोलाकार तथा पतली महिलाओं की नाभि लम्बरूप लिए होती हैं। लम्बरूप नाभि सौन्दर्यबोध के पैमाने पर ज्यादा आकर्षक लगती है, अत: नारी मॉडलों में प्राय: नाभि का आकार लम्बरूप ही होता है। व्यवहार विज्ञानी नाभि के इस लम्बरूप आकार की लोकप्रियता में उसका योनि -साम्य होना पाते हैं। चूंकि नारी की नाभि योनि प्रतीक बन गयी है अत: वह पुरातन ,वादियों परम्परावादियों की आंखों में खटकती रही है।

``द अरेबियन नाइट्स´´ फिल्म के निर्माताओं पर सेन्सर का वज्रपात `नाभि प्रसंग´´ को लेकर हुआ था। सेन्सर ने फिल्म की नृत्यांगनाओं के नाभि प्रदर्शन पर कड़ी आपत्ति की थी और कई नाभि प्रदर्शक नृत्यों को फिल्म से निकलवा दिया था। हालीवुड फिल्मों में भी नाभि प्रदर्शन पर एक बार प्रतिबन्ध लग चुका है। काम क्रीड़ा की कई पुस्तकों में नारी की नाभि को लघु योनि के रूप में भी चित्रित किया गया है।

एलेक्स कम्र्फट द्वारा लिखित और मेरी आल टाइम पसंदीदा रही मशहूर सेक्स विषयक विज्ञान सम्मत सचित्र पुस्तक ``द ज्वॉय आफ सेक्स´´ में नाभि की कामोद्दीपक भूमिका पर रोशनी डाली गयी है।[हाईली रेकमेंडेड ]``बेली नर्तकिया¡´ अपनी विभिन्न नृत्य मुद्राओं में नाभि को उत्तेजक ढंग से प्रदर्शित करती दिखायी देती हैं .और अब तो नाभि के अलंकरण का दौर भी शुरु हो चुका है- नाभि-नथुनियाँ भी कितनों के दिल पर सीधे वार कर रही हैं .

Tuesday, 22 July 2008

दोहरी भूमिका में हैं नारी के वक्ष -भाग 2

मानव की `आदर्श भौतिक उम्र´ 25 वर्ष की मानी गयी है। इस अवस्था तक पहुंचते -पहुंचते समस्त शरीरिक विकास पूर्णता तक पहुँच चुका होता है। अत: इस उम्र तक नारी स्तन का विकास अपने उत्कर्ष पर जा पहुंचता है और भरपूर यौनाकर्षण की क्षमता मिल जाती है। ठीक इसके पश्चात् ही मातृत्व का बोझ नारी स्तन की ढ़लान यात्रा को आरम्भ करा देता है और वे अधोवक्षगामी होने लगती है।


जैवविदों के अध्ययन के मुताबिक पतली तन्वंगी नायिका के स्तन विकास की यात्रा धीमी होती है। जबकि हृष्ट-पुष्ट (बक्जम ब्यूटी) नायिका के स्तनों का विकास तीव्र गति से होता है। अब तो सौन्दर्य शल्य चिकित्सा (कास्मेटिक सर्जरी) के जरिये प्रौढ़ा के भी स्तनों में नवयौवना के स्तनों सा उभार ला पाना सम्भव हो गया है। विभिन्न तरह के वस्त्राभूषणों पहनावों के जरिये किसी भी उम्र की नारी अपने उसी ``नवयौवना´´ काल के स्तनों की ही प्रतीति कराती है।

परम्परावादियों की कोप दृष्टि हमेशा नारी स्तनों पर रही है। विश्व की कई संस्कृतियों में सामाजिक नियमों के जरिये नारी स्तनों को ढ़कने छिपाने के कड़े प्रतिबन्ध जारी किये जाते रहे हैं। ऐसी कंचुकियों/चोलियों के पहनाने पर विशेष बल दिया गया जिनसे नारी स्तनों का उभार प्रदर्शित न होता हो .सत्रहवी शताब्दी की स्पेनी नवयौवनाओं के स्तनों को सीसे की प्लेटों से दबाकर रखने का क्रूरता भरा रिवाज था, जिससे वे अपना कुदरती स्वरूप न पा सकें यानी बहुत पहले ही नारी स्तनों की यौन भूमिका जग जाहिर हो चुकी थी।

नारी स्तन की कुदरती अर्द्धगोलाकार स्वरूप की नकल कितने ही चित्रकार, छायाकार अपनी ``रचनाओ´´ में करके उनको सौन्दर्यबोध की नित नूतन परिभाषाए¡ प्रदान करते हैं। न्यूड मैगजीन के मध्यवर्ती पृष्ठों पर नारी स्तनों की कामोद्दीपकता वाली छवि के पाश्र्व में एक छायाकार को बड़ी मेहनत मुशककत करनी पड़ती है। उसे अपने सही मॉडल के तलाश में कम पापड़ नहीं बेलने पड़ते .

नारी स्तनों को उनके सर्वोत्कृष्ट कामोद्दीपक स्वरूप में दर्शाने के लिए एक छायाकार को एक उस षोडशी की खोज होती है, जिसके स्तन पूरी तरह विकसित हो चुके हों-अपने अर्द्धगोलाकार रूप की चरमावस्था में पहु¡च चुके हों किन्तु अभी भी उनकी `स्थिरता´ बनी हुई हो- यह विरला संयोग सहज सुलभ नहीं होता।

हम यही जानते हैं कि मानव मादा के बस दो ही स्तन होते हैं, पर यह सच नहीं है, हकीकत यह है कि प्रत्येक दो तीन हज़ार महिलाओं में से एक को दो से अधिक स्तन होते हैं। इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है- ऐसी घटना हमें अपने उस जैवीय अतीत की याद दिलाती है, जब हमारे आदि पशु पूर्वजों की मादायें एक वार में एक से अधिक बच्चे जनती थीं-एक साथ कई बच्चों का गुजर बसर बस जोड़ी भर स्तनों से कहा¡ होने वाला था। किन्तु कालान्तर में मानव मादा के आम तौर पर एक शिशु के प्रसव या अपवाद स्वरूप जुड़वे शिशुओं के जन्म के साथ ही स्तनों की संख्या दो पर ही आकर स्थिर हुई होगी। किन्तु अभी भी कुछ नारिया¡ दो से अधिक स्तनों की स्वामिनी होकर हमें अपने जैवीय इतिहास पुराण की याद दिला देते हैं।

रोमन सम्राट एलेक्जेण्डर की मा¡ को कई स्तन थे, जिसके चलते उनका नाम जूलिया मेमिया पड़ गया था। हेनरी अष्टम की अभागी पत्नी एन्नजोलिन के तीन स्तन थे। इस ``अपशकुन´´ के चलते बेचारी को अपनी जान गवानी पड़ी थी अतिरिक्त स्तनों वाली नारी को आज भी कई यूरोपीय देशों में अभिशप्त माना जाता है एवं उन्हें चुड़ैलों का सा दरजा प्राप्त है।

Sunday, 20 July 2008

दोहरी भूमिका में हैं नारी के वक्ष ...1

नारी वक्ष की दो रोल हैं- एक तो शिशु का पोषण (दुग्धपान) तथा यौनाकर्षण। किन्तु व्यवहारविदों की राय में नारी स्तनों की यौनाकर्षण वाली भूमिका ही ज्यादा अहम है। समूचे नर वानर समुदाय (प्राइमेट्स) में मानव मादा ही इतने उभरे अर्द्धगोलाकार मांसल स्तनों की स्वामिनी है। इससे यह स्पष्ट है कि मानव प्रजाति में मादा के स्तनों की मात्र शिशु पोषण वाली भूमिका ही नहीं है, जैसा कि वह नर-वानर वर्ग के कितने ही अन्य सदस्यों-चिम्पान्जी गोरिल्ला, ओरंगऊटान आदि वनमानुषों में हैं।
यह गौर तलब है कि वनमानुषों की मादाओं का स्तर अपेक्षाकृत बहुत पिचका और बिना उभार लिए होता है। नारी स्तनों की सबसे अहम भूमिका दरअसल यौनाकर्षण (सेक्सुअल सिगनलिंग) ही है। व्यवहार विज्ञानियों ने नारी वक्ष की यौनाकर्षण वाली भूमिका की एक रोचक व्याख्या प्रस्तुत की है। उनका कहना है कि नर वानर कुल के तमाम दूसरे सदस्यों में मादाओं के नितम्ब प्रणय काल के दौरान तीव्र यौनाकर्षण की भूमिका निभाते हैं - उनके रंग आकार में सहसा ही तीव्र परिवर्तन हो उठता है। उनके नर साथी इन नितम्बों के प्रति सहज ही आकर्षित हो उठते हैं। यह तो रही चौपायों की बात किन्तु मानव तो चौपाया रहा नहीं।

विकास क्रम में कोई करोड़ वर्ष पहले ही वह दोपाया बन बैठा-दो पैरों पर वह सीधा खड़ा होकर तनकर चलने लगा। वैसे तो और उसके पृष्ठभाग में नितम्ब अपने कुल के अन्य सदस्यों की ही भा¡ति अपनी यौनकर्षण वाली भूमिका का परित्याग नहीं कर पाये हैं- किन्तु मानव के ज्यादातर कार्य व्यापार आमने सामने से ही होने लगे, और नितम्ब पीछे की ओर चले गये। अब जरूरत आगे, सामने की ओर ही वैकल्पिक यौनाकर्षक `नितम्बों´ की थी और यह भूमिका ग्रहण की नारी स्तनों ने। नारी के वक्ष दरअसल उसी आदि यौन संकेत का ही बखूबी सम्प्रेषण करते हैं - सेक्सुअल नितम्बों का भ्रम बनाये रखते हैं, मगर सामने से मानव मादा के स्तनों की यह नयी यौन भूमिका कुछ ऐसी परवान चढ़ी कि उसके मूल जैवीय कार्य यानी शिशु को स्तनपान कराने में मुश्किलें आने लगीं।

अपने उभरे हुए गुम्बदकार स्वरूप में नारी के स्तन शिशुओं का मुंह ढ़क लेते हैं, स्तनाग्र अपेक्षाकृत इतने छोटे होते हैं कि शिशु उन्हें ठीक से पकड़ नहीं पाता। उसकी नाक स्तन से ढक जाती है और वह सांस भी ठीक से नहीं ले पाता। प्राइमेट कुल के अन्य सदस्यों के शिशुओं को यह सब जहमत नहीं झेलनी पड़ती। क्योंकि उनकी मा¡ओ के स्तन छोटे पतले और पिचके से होते हैं और चूचक लम्बे, जिन्हें शिशु आराम से मु¡ह में लेकर दुग्ध पान करते हैं।

नारी के पूरे जीवन में स्तनों की विकास यात्रा सात चरणों में पूरी होती है। जिनमें बाल्यावस्था के `चूचुक स्तन´, सुकुमारी षोडशी के उन्नत शंकुरूपी स्तन, नवयौवना के स्थिर उभरे स्तन तथा मातृत्व और प्रौढ़ा के पूर्ण विकसित, अर्द्धगोलाकार - गुम्बद रूपी स्तन और वृद्धावस्था के सिकुड़े स्तन की अवस्थाए¡ प्रमुख हैं।

क्रमशः

Saturday, 19 July 2008

अब बारी है सुराहीदार गरदन की ....

साभार :थाईलैंड लाइफ
नायक की तुलना में नायिका की सुराहीदार गरदन अधिक लम्बी और लचीली होती है। यहाँ तक कि लम्बे अभ्यास के बावजूद भी बैले नर्तक अपनी गरदनें सहनर्तकियों के समान लम्बी नहीं कर पाते। दरअसल नारी के ग्रीवा के नीचे का अंग `थोरैक्स´ पुरुष की तुलना में छोटा होता है। एक चित्रकार/कार्टूनिस्ट की नजर में नारी की ग्रीवा का भी अपना विशेष स्थान है। जहाँ उसे नारी अंगों को उभारने की आवश्यकता होती है वह गरदन को भी बड़ी करने से नहीं चूकता। नारीत्व की एक पहचान के रूप में गरदन लम्बी करने की ऐसी होड़ विश्व की कुछ संस्कृतियों में देखने को मिलती है जो वस्तुत: क्रूरता की सीमा लांघती हैं।

बर्मा की जिराफ ग्रीवा नारियों, की व्यथा कथा कुछ इसी तरह की है। यहाँ करने जनजाति के पडांग शाखा की लड़कियों को बचपन से ही पाँच पीतल के छल्ले गरदन में डाल देते है। उम्र के बढ़ने के साथ ही छल्लों की संख्या भी बढ़ने लगती हैं ,यहाँ तक कि यौवन की दहलीज लाघते-लाघते 22 से 24 छल्ले उनकी गरदन की लम्बाई के 15 इंच से भी उपर तक जा पहुँचती हैं ।यदि इस दशा में इनकी गरदन से पीतल के छल्ले निकाल दिये जाय तो सिर एक ओर लुढ़क जायेगा। नारी की लम्बी ग्रीवा सिर की कई तरह की भाव-भंगिमाओं को प्रदर्शित करने में भी मददगार है।

सिर के कुछ प्रमुख अभिप्राय पूर्ण संकेतों में जैसे सिर का आगे पीछे हिलाना (हामी भरना) सिर झुकाना (समर्पण), सिर का आगे पीछे हिलाना (इन्कार) आदि गरदन की मदद से सम्भव होता है। शायद यही कारण है कि रसिक जनों को नारी ग्रीवा सहज ही आकर्षित करती रहती है।

Thursday, 17 July 2008

ये होंठ है या पंखुडिया गुलाब की -नख शिख सौन्दर्य ,अगला पड़ाव !

क्या कहते हैं ये होठ ?फोटो साभार : Cult Moxie
ये होठ हैं या पंखुडिया गुलाब की ....जी हाँ सौन्दर्य प्रेमियों ने नारी के होठों के लिए गुलाब की पंखुिड़यों, रसीले सन्तरे कीफांक जैसी कितनी ही उपमायें साहित्य जगत को सौपी हैं। मानव होंठो की रचना अन्य नर वानर कुल के सदस्यों से ठीक विपरीत है। यह बाहर की ओर लुढ़का हुआ है, यानि मानव होठ की म्यूकस िझल्ली बाहर भी दिखती है जबकि अन्य नर वानर कुल के सदस्यों में यह भीतर की ओर है। यही म्यूकस िझल्ली नारी होंठों को भी एक विशेष यौनाकर्षण प्रदान करती है। काम विह्वलता के दौरान यही होठ अतिरिक्त रक्त परिवहन के चलते फूल से जाते हैं, रक्ताभ उठते हैं। व्यवहार विज्ञानियों की राय में नारी होठ यौनेच्छा का `सिग्नल´ देते हैं।
यहा¡ डिज्माण्ड मोरिस की एक दलील तो बड़ी दिलचस्प है। वे कहते हैं कि चूंकि नारी के योनि ओष्ठों (वैजाइनल लैबिया) और उसके होठों के भ्रूणीय विकास का मूल एक ही है, अत: यौन उत्तेजना के क्षणों में ये दोनो ही अंग समान जैव प्रक्रियाओं से गुजरते हैं। उनकी प्रत्यक्ष लालिमा `योनि ओष्ठों´ की अप्रत्यक्ष लालिमा की भी प्रतीति कराती है। इन दोनों नारी अंगों के इस अद्भुत साम्य का कारण भी व्यवहार विज्ञानीय (इथोलाजिकल) है।
नर वानर कुल के प्राय: सभी सदस्यों में जिनमें सहवास पीछे से (मादा के पाश्र्व से) सम्पन्न होता है- मादा के यौनांग एवं पृष्ठ भाग (रम्प) प्रणय काल के दौरान रक्ताभ और अधिक उभरे हुए से लगते हैं जो नर साथियों को आकिर्षत करते हैं। किन्तु मानव जिसमें न तो कोई खास प्रणय काल (बारहों महीने प्रणय) होता है और सहवास की क्रिया भी आमने सामने से होती है, नर को आकिर्षत करते रहने का कोई विशेष अंग सामने की ओर दृष्टव्य नहीं होता। योनि ओष्ठ, वस्त्रावरणों के हटने के बावजूद भी प्रमुखता से नहीं दिखते। इन स्थितियों में प्रकृति ने नारियों के होठो को उनके वैकल्पिक रोल में अपने पुरुष सखाओं को रिझाने को जैवीय भूमिका प्रदान कर दी। यह प्राकृतिक व्यवस्था नारियों के हजारो वर्षों से अपने होठों को रंगते आने की आदत को भी बखूबी व्याख्यायित करती है।
यह भी गौरतलब है कि परम्परावादियों को नारियों के होठो की लाली फूटी आ¡ख भी नहीं सुहाती।

Wednesday, 16 July 2008

कामोद्दीपक भी हैं नारी के कान ...मनोरम यात्रा का नया पड़ाव ....

कामोद्दीपक हैं नारी के कान
साभार :istockphoto
नारी के कानों का भी अपना अनूठा सौन्दर्य है .व्यवहार विज्ञानी डा0 डिजमण्ड मोरिस की राय में मानव कर्णों , खासकर नारी के कानों का सबसे खास गुण हैं उनकी कामोद्दीपक भूमिका। प्रणय प्रसंगों के दौरान नारी के कानों के मुलायम मांसल हिस्से (लोब्स) रक्त वर्ण हो उठते हैं, इनमें खून की आपूर्ति यकायक बहुत बढ़ जाती है, वे फूल से उठते हैं और स्पर्श के प्रति अत्यन्त संवेदनशील हो जाते हैं। प्रणय बेला में कानों का विविध ढंगों से प्रेमस्पर्श नारी को काम विह्वल कर सकता है। प्रख्यात काम शास्त्री किन्से की राय में तो कुछ विरलें मामलों में मात्र कानों को उद्दीपित करने से ही नारी को मदन लहरियों (आर्गेज्म ) का सुख प्राप्त होना देखा गया है। इस तरह नारी के कान उसकी समूची देह रचना में एक महत्वपूर्ण ``कामोद्दीपक क्षेत्र´´ की भूमिका निभाते हैं।

कानों को नारी गुप्तांग का भी प्रतीक मिला हुआ है। उसकी आकार रचना ही कुछ ऐसी है। विश्व की कुछ संस्कृतियों-लोक रिवाजों में कानों का बचपन में छेदना दरअसलन एक तेरह से ``नारी खतने´´ (फीमेल सर्कमसिजन) का ही प्रतीक विकल्प हैं। किशोरियों के कान छिदवाने की प्रथा के पार्श्व में भी सम्भवत: यही अप्रत्यक्ष भावना रही होगी, भले ही प्रत्यक्ष रूप में इसका कारण श्रृंगारिक दिखता हो।

मिस्र में किसी व्यभिचारिणी की आम सजा है- कानों को तेजधार की छुरी से काट देना। नारी कानों को उसके गुप्तांग (योनि) का विकल्प मानने का ही एक उदाहरण है। महाभारत का एक रोचक मिथक सूर्य पुत्र कर्ण के जन्म को कुन्ती के कानो से मानता है। गौतमबुद्ध भी कुछ दन्तकथाओं के अनुसार कर्ण प्रसूता है। कानों में बालियों [कुण्डल]के पहनने का प्रचलन बहुत पुराना है। आरिम्भक कांस्ययुग (चार हजार वर्ष से भी पहले) से ही कानों में कुण्डल धारण करने का रिवाज विश्व की कई संस्कृतियों में रहा है। आरम्भ में तो कर्णफूल/बाली आदि आभूषणों को पहनने के पीछे किसी काल्पनिक खतरे से निवारण का प्रयोजन/(अन्ध) विश्वास हुआ करता था। किन्तु अब यह कानों के आभूषण `स्टेटस सिम्बल´ का भी द्योतक बन गया है। यह धनाढ्यता और सामाजिक स्तर को प्रतिबिम्बत करता है। कानों में आभूषणों का पहनाव नारी के सौन्दर्य को बढ़ाता है, क्योंकि यह नारी के कानो के कुदरती स्वरूप को और भी उभार देता है।

Monday, 14 July 2008

"मैं शर्म से हुई लाल ...."बात है गालों की लाली की ...

चित्र सौजन्य :द इन्डियन मेक अप दिवा
नारी के नरम चिकने गाल मासूमियत और सुन्दरता की सहज अभिव्यक्ति हैं। ऐसा इसलिए कि बच्चों के से उभरे नरम गालों के गुण नारी में यौवन तक बने रहते हैं और सहज ही आकिर्षत करते हैं। प्रेम विह्वलता के सुकोमल क्षणों में गालों का रक्त वर्णी हो उठना, उनका प्रणय सखा द्वारा तरह-तरह से स्पर्श आलोड़न उनके एक प्रमुख सौन्दर्य अंग होने का प्रमाण है

´´ मैं शर्म से हुई लाल´´ में दरअसल यह गालों की ही लाली है जो एक विशेष मनोभाव को गहरी और सशक्त अभिव्यक्ति देती है। गालों के रक्त वर्ण हो उठने को एक तरह का यौन प्रदर्शन (सेक्सुअल डिस्प्ले) माना गया है। यह कुंवारी सुलभ अबोधता (विरिजिनल इन्नोसेन्स) का खास लक्षण है। ``ब्लशिंग ब्राइड´ के नामकरण के पीछे भी यही दलील दी जाती है।

व्यवहार विज्ञानियों का तो यहाँ तक कहना है गालों की लाली कुछ हद तक नारी के अक्षत यौवना होने का भी संकेत देता है। सम्भवत: यही कारण था कि प्राचीन गुलाम बाजारों में उन लड़कियों की कीमतें ज्यादा लगती थी जिनकी गालों पर (शर्म की) लाली अधिक देखी जाती थी। चेहरे के मेकअप में गालों को `रूज´ से सुर्ख करने की पीछे `विरिजिनल इन्नोसेन्स´ को ही प्रदर्शित करने की चाह होती है।

बहुत सी आधुनिकाओं के वैनिटी बैग में नित नये कास्मेटिक उत्पादों की श्रेणी में कई तरह के `ब्लशर्स´ भी शामिल हैं जो बनावटी तौर पर ही सही गालों को रक्तवर्ण बना देते हैं। सामाजिक मेल मिलापों और पार्टियों में इन `ब्लशर्स´ के जरिये अधिक वय वाली नारियां भी सुकुमारियों (टीनएजर्स) सरीखी दिखने का स्वांग करती है, अपना `सेक्स अपील´ बढ़ा लेती हैं।

गालों पर तिल होने की भी अपनी एक सौन्दर्य कथा है। मिथकों के अनुसार सौन्दर्य की देवी वीनस के मुंह पर भी एक जन्मजात दाग (सौन्दर्य बिन्दु) है। हिन्दी साहित्य की नायिका चन्द्रमुखी (दाग सहित) है ही। यदि ऐसा है तो फिर भला कौन नारी वीनस या चन्द्रमुखी दिखने से परहेज करेगी। लिहाजा गालों की सुन्दरता में एक धब्बे का स्थान भी ध्रुव हो गया है। नारी मुख का आधुनिक मेक अप शास्त्र `गाल पर तिल´ होने की महत्ता को बखूबी स्वीकारता है- यह काम मेकअप पेिन्सल बड़ी ही खूबसूरती से अन्जाम देती है ,

गाल पर धब्बों के बढ़ते फैशन ने अट्ठारहवीं सदी के आरम्भ में ही एक तरह से राजनीतिक रूख अिख्तयार कर लिया था जब यूरोप की दक्षिणपन्थी महिलाओं ने दायें गाल तथा वामपंथी महिलाओं ने बाये गाल को कृत्रिम तिल से अलंकृत करना आरम्भ किया था। रंगों के अलावा गालों के आकार की भी बड़ी महिमा है। यूरोप में गालों में गड्ढे़ (डिम्पल) को सौन्दर्य की निशानी माना जाता है- यहाँ तक कि इसे ईश्वर की अंगुलियो की छाप के रूप में देखा जाता है। ``ए डिम्पल इन योर चीक/मेनी हर्टस यू बिल सीक´´ गीत-पंक्ति गाल में गड्ढे की महिमा को बखाना गया है .गालों के जरिये मन के कुछ सूक्ष्म भाव भी प्रगट होते हैं
` मुंह फुलाने´´ की नायिका (मानिनी ) की अदा से भला कौन रसिक (प्रेमी) अपरिचित होगा? रूठने और मनुहार के बीच गालों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली है।

Sunday, 13 July 2008

नाक ऊंची या नीची -फ़र्क पङता है !

फोटो सौजन्य :आर्टिस्टिक रियलिस्म आर्ट स्टूडियो
सामान्यत: नारी की नाक पुरुष की अपेक्षा छोटी होती है-पर यह सौन्दर्य का प्रतीक है, किसी तरह की हीनता का नहीं।

सौन्दर्य प्रेमियों की दृष्टि में ही नहीं वरन व्यवहारविदों की भी राय यही है कि नारी की नाक बहुत कुछ बचपन सरीखी नाक-संरचना को बनाये रखती है। बच्चों की छोटी नाक सहज ही बड़ों को आकिर्षत करती है। चूंकि नारी में अपने सहकर्मी की ओर से सुरक्षा की चाहत रहती है, अत: प्रकृति भी उसकी नाक को बच्चों सरीखा बनाये रखती है। ताकि उसके पुरुष सखा अनजाने ही उसकी देखभाल और सुरक्षा के प्रति सचेष्ट रहें ।

नारी की बड़ी नाक विश्व की बहुतेरी सम्यताओं में कुरूपता की निशानी मानी गयी है। बड़ी नाक वाली महिलाओं के प्रति पुरुषों के मन में सुरक्षा प्रदान करने का ``सहज बोध´´ (इंस्टिंक्ट ) जागृत नहीं होता। मॉडल सुन्दरियों या फिर अभिनेत्रियों में छोटी नाक का होना बहुतों के लिए उन्हें और भी आकर्षक बना देता है। इसलिए पाश्चात्य सम्यता में अधिक सुन्दर दिखने की चाह के चलते नारियों में अपनी नाकों को प्लािस्टक सर्जरी के जरिये छोटा बनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही हैं। विश्व के बहुत से देशों में नाक में आभूषण पहनने का चलन है। भारत में भी महिलायें अलंकरण के लिए तरह-तरह के आभूषण -नथनी, नथ, बुलाक, बेसर आदि पहनती है।

नगर बधुओं में `नथ´ से जुड़ी एक रस्म का सम्बन्ध तो कौमार्यता से भी है। इन आभूषणों और उनके पहनावों से महिलाओं की एक विशिष्ट जाति पहचान भी जुड़ी हुई हैं।