Wednesday, 15 July 2009

पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (4)-कैसे कैसे लैंगिक संकेत ? (डार्विन द्विशती विशेष )

शु पक्षियों के प्रणय याचन में प्रजाति पहचान का मामला भी बड़ा जटिल है -जहाँ एक सरीखे ही असंख्य प्राणी प्रजातियाँ हों ,यह कैसे सुनिश्चित हो कि प्रेम की अभिव्यक्ति अपनी ही प्रजाति के जोड़े से हो पायेगी ? इसलिए कुदरत ने प्रजातियों को विशेष पहचान चिह्न और प्रणय याचन के तौर तरीकों की अलग सौगात सौंपी है -जिससे कोई भूल चूक हो और सही जोड़े ही प्रणय संसर्ग कर सकें अन्यथा विपरीत प्रजाति सयोगों से वंश बेलि बढ़ नही पायेगी ! इस कुदरती व्यवस्था के चलते क्या मजाल कि कोई एक प्रजाति किसी दूसरी प्रजाति से जोड़ा गान्ठने लगे !

जैव विदों ने उन तौर तरीकों जिनसे किन्ही अलग थलग प्रजातियों में यौनिक संसर्ग होने पाये -प्रजनिक पृथक्करण प्रलाणी ( reproductive isolation mechanism ) कहा है और इनमें प्रणय याचन के अलग अलग तरीके ,अलग अलग प्रणय काल (ब्राडिंग पीरियड ) , शारीरिक बनावट आदि शामिल है विकास की सीढी पर कई निचली श्रेणी के प्राणियों में यद्यपि प्रजनिक पृथक्करण प्रणाली थोड़ी ढीली ढाली सी है -मतलब उनमें विभिन्न गैर प्रजातियों में भी कभी कभार आकस्मिक संकरण हो जाता है ! ऐसा इसलिए भी है की कई निचले स्तर के प्राणियों में बाह्य निषेचन होता है आंतरिक गर्भाधान नहीं.जैसे जब मछलियों की कुछ प्रजातियाँ एक साथ प्रजनन करती हैं तो उनके अंडे और शुक्राणुओं की विशाल फौज जल धाराओं में गुत्थम गुत्था होती रहती हैं और गैर प्रजातियों के शुक्राणु और अंडे आपस में टकरा जाते हैं -सारी बोलने के बजाय वे निषेचन को तरजीह दे देते हैं ,इसलिए प्रकृति में रोहू ,कतला ,नैन मछली प्रजातियों के विभिन्न संकर रूप भी देखने को मिल जाते हैं -ऐसे उदाहरण दूसरे प्राणियों - जानवरों में भी हैं .मगर ऊँची प्रजातियों में गैर प्रजातीय यौन संसर्ग अपवाद हैं -गोरिल्ला और चिम्पांजी के वर्ण संकर नहीं मिलते !

इसी तरह नर मादा के बीच परस्पर पहचान के लैंगिक संकेत भी मुखर होते हैं -मगर यहाँ भी कई प्रजातियों में जैसे कई पक्षी प्रजातियों में लैंगिक पहचान बहुत गौण होती है जहां नर मादा की पहचान मुश्किल है -अब जैसे बुजेरिगर पक्षी (जिसे लव बर्ड कहने का प्रचलन है ) में नर के चोंच के ऊपर का हिस्सा -सेरे ,गहरा नीला होता है जबकि मादा में यही भाग भूरा होता है ! मगर यदि किसी नर की चोंच के इस ऊपरी हिसे को पेंट से भूरा कर दिया जाता है तो दूसरे नर उसी को मादा समझ कर यौन याचन और संसर्ग के प्रयास शुरू कर देते हैं और मादा के भूरे हिस्से को गहरा नीला पेंट कर देने पर नर उसकी ओर से बेरुखी अख्तियार कर लेते हैं !

बुजेरिगर -बाएँ मादा ,दायें नर (चोंच के ऊपर के सेरे से पहचाने ,जो मादा में भूरा और नर में नीला है !)

कई दूसरे लैंगिक संकेत गैर वयस्कों और वयस्कों के बीच फर्क करते हैं जैसे जेब्रा फिंच पक्षी के अवयस्क सदस्यों की चोंच काली होती है और मादा तथा वयस्कों की गहरी लाल -जब इन अवयस्कों की काली चोच लाल नेल पालिश से लाल कर दी गयी तो नर पक्षी यहाँ तक की खुद उनके पिता उनसे यौन संसर्ग पर उतारू हो गए ! उनकी जान फिर से नेल पालिश रिमूवर से लाल रंग हटाने के बाद ही छूटी !



विकास वाद के अनुसार सभी प्राणी एक दूसरे से गहरे सम्बन्धित हैं और उनमें व्यवहार का विकास भी पृथक तौर पर नहीं बल्कि एक क्रमिक रूप में हुआ हैं -ऊपर के अध्ययनों के मानवीय संदर्भ में क्या फलितार्थ /निहितार्थ हैं , अनेक व्यवहार शास्त्री ,समाज जैविकी विद इसे जानने समझने में जुटे हुए हैं !
जारी ......

Tuesday, 14 July 2009

पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (३)-बड़े खतरे हैं इस राह में (डार्विन द्विशती विशेष )

पशु पक्षियों में प्रणय याचन के अनेक भड़कीले प्रदर्शन केवल जीवन साथी को ही आकर्षित नही करते वरन वे कुदरती दुश्मनों ,परभक्षियों को भी सहज ही आकर्षित कर लेते हैं जो की किसी आफत से कम नही है .मादा को रिझाने के विज्ञापन अनुष्ठान (advertisement ritual )खतरनाक शिकारी प्रजातियों को भी आकर्षित करते हैं -टर्र टर्र करते मेढको के झुंड पर सहसा ही कोई चमगादड़ झपट पड़ता है और प्रणय सगीत का आरोह अचानक ही टूट जाता है .दादुर धुन सुन साँप सहज ही प्रणय रती बेसुध /बेखुद मेढक के पास पहुँच उसे दबोच लेता है और प्रणय गीत की जगह सहसा जीवन रक्षा की प्राणेर गुहार सुनाई देने लगती है .बरसात के मौसम में ऐसे आर्तनादों से आपका भे पाला पडा हो शायद -ये आर्तनाद प्रेम की वेदी पर बलि चढ़ जाने वाले बिचारे निरीह प्राणियों की हैं जो अपने समूह /प्रजाति संतति संवहन के लिए यह अनचाहा प्राणोत्सर्ग कर जाते हैं ! मगर यह तो कुदरत की बड़ी बेइंसाफी है .अब प्रणय निवेदन भी गुनाह है ?मतलब प्रणय पुकार का मतलब है जीवन को ही दांव पर लगा देना ?


बचो प्रणयी -कोई झपटने वाला है !

हाँ ,यहाँ एक नाजुक संतुलन की दरकार है -अगर प्रणयी प्राणी ज्यादा तड़क भड़क प्रर्दशित करता है तो वह अपनी मौत को भी आमंत्रित करता है और यह प्रदर्शन तनिक फीका रहा तो जीवन संगिनी का मिलना सम्भव नही और ख़ुद उसके वंश बेली का बढ़ना मुश्किल ! और इन दोनों ही स्थितियों में सम्बन्धित प्राजाति का विलोपन निश्चित है ।कुदरत ने इसलिए प्रजातियों को उनके नाजुक स्थिति /स्तर को देखकर प्रणय प्रदर्शन के अंग वस्त्रम /तौर तरीके सौंपे हैं .जो परभक्षियों के चपेट में नाहे हैं ऐसे पशु पक्षी काफी तड़क भड़क प्रणय प्रदर्शन कर लेते हैं जैसे जहरीले मेढक की प्रणय पुकार बहुत कर्कश होती है ,लंबे समय की होती है क्योंकि कोई परभक्षी उन्हें खाने की जुर्रत नही कर सकता .धोखे मेंपकड़ लिया तो सांप छछूदर की गति मिल जाती है .व्हेलें ज्यादा समय के लिए इसलिए ही गाती हैं की समुद्र में उनका कोई परभक्षी ही नही है -हाँ डालफिन कम देरी तक ही गा पाती है !

मगर जो प्राणी परभक्षियों से घिरे रहते हैं उनमें प्रणय प्रदर्शन ज्यादा तड़क भड़क लिए नही होता .और उनके जीवन संगी भी जल्दी ही रीझ जाते हैं.प्राणि जगत में कई नर बहुत ही तड़क भड़क तरीके से प्रणय संवाद करते हैं ! अब मोर को ही देखिये -यह कितना भव्य लगता है -औरअपने हरम की मादाओं को ही नही हमें भी रिझाता नहीं ? और क्या यही कारण नही है की मोरपंख की खातिर ही कितने मोरों को अपनी जान तक गवानी पड़ती है ! सच है प्रणय के राह में बड़े खतरे हैं -बच के भाई !

जारी.......

Tuesday, 7 July 2009

पशु पक्षियों के प्रणय प्रसंग -2 (डार्विन द्विशती विशेष )

कोर्टशिप यानि प्रणययाचन पर कुछ थियरी पहले हो जाय फिर प्रैकटिकल की भीबारी आयेगी -वो क्या है जब थियरी अच्छी समझी नहीं होती तो फिर प्रयोग भी सध नही पाता ! तो सुधी जन पहले थियरी पर लो मन लगाय फिर प्रयोग की बारी आय !
पहले विद्वानों द्बारा दी गयी प्रणय याचन की परिभाषा को हृदयंगम कर लें -
प्रणय याचन वह विशिष्ट व्यवहार प्रदर्शन है जो रति क्रिया की पूर्व पीठिका तैयार करता है
मगर इसमें बहुत झाम भी हैं -यह मामला बहुत सीधा सादा नही है -प्रेम गली अति साकरी ! प्रणय याचन जिसमें तरह तरह के शरीर सौष्ठव प्रदर्शन ,अठखेलियाँ ,स्वर संधान ,गीत संगीत होते हैं नर और मादा को यौन संसर्ग हेतु उकसाते हैं -अभिमुख करते हैं और उन्हें रति लीला हेतु समंजित करते है .मगर त्रासदी यह है कि संभावनाशील लैंगिक जोड़े केवल मिलन की ही भावना के वशीभूत नही होते उन्हें साथ ही भय और दुविधा की भी भावना आ घेरती है .नर तो बहुधा बहुत आक्रामक हो जाता है ,क्योंकि इसी वक्त उसमें अपनी टेरिटरी -चौहद्दी की रक्षा अपने प्रतिद्वंद्वी नरों से करनी होती है .

कुछ जीवों में तो मादा भी बड़ी आक्रामक हो उठती है - मकडो /मकडियों की कुछ प्रजातियों में नर ज़रा भी असावधान हुआ तो बड़े आकर की मादा उसे चट कर उदरस्थ ही कर लेती है -इसी आदत के कारण एक मकडी प्रजाति चिर वैधव्य से अभिशप्त होती है नाम है ब्लैक विडो स्पाईडर ! इसलिए आत्मरक्षा में नर मकड़े की कई प्रजातियों में यौन प्रदर्शन के सिग्नल मादा को निश्चल कर देने का काम भी करते हैं .

ब्लैक विडो स्पाईडर जो यौन संसर्ग के समय नर को उदरस्थ कर सकती है .



रीढ़ धारी प्राणियों में भी नर के क्षेत्र रक्षण (टेरीटोरियलिज्म ) प्रवृत्ति के कारण यौनोंमत्त नर मादा के प्रति भी आक्रामक हो सकता है -बस यही मुश्किल आन खडी होती है ! मादाएं नर की प्रेम पीगों को डर और भय से भी देखती हैं- समर्पित हों या फिर नयी मुसीबत /जहमत से भाग चलें -यह दुविधा उन्हें आ घेरती है . नर का आक्रामक हाव भाव सेक्स हारमोन टेस्टोस्तेरान के कारण होता है जो आक्रामकता का भी जिम्मेदार होता है .कई प्रजातियों यहाँ तक मनुष्यों में भी प्रणय याचन आक्रामकता लिए होता है और मनुष्य प्रजाति में यौन भावना और आक्रामकता का ऐसा कुछ घालमेल है कि यह कुछ यौन विकृतियों का भी जिम्मेवार हो गया है -कुछa असामान्य लोग बिना आक्रामक आचरण किए यौन तृप्ति नही पाते ,पर यह अलग विषय है !


प्रक्रति ने मादा को प्रणय दौरान नर की आक्रामकता से बचने के लिए कई प्रशान्तिदायक -अपीजमेंट व्यवहारों की सौगात दी है जिसमें अचानक अतिशय विनम्रता ,और समर्पण के हाव भाव और भंगिमाएं शामिल हैं ,एक मछली है यूंटरोप्लस मैक्यूलेटसka जिसमे नर प्रणय लीलाओं के दौरान इतना आक्रामक हो उठता है कि मादा की मानो शामत आ जाती है -ऐसे में एक्वेरिय्म मछलियों के ब्रीडर ऐसे जोड़े के साथ एक दो अतिरिक्त छोटे नरों को रखता है जिन पर यौनोंमत्त नर अपनी आक्रामकता का शमन करता है और मादा के साथ तब जाकर सफल यौन संसर्ग हो
पाता है


यूंटरोप्लस मैक्यूलेटस मछली का प्रणय
जिसमें नर मादा के जोड़े के साथ
और भी एक दो नर रखे जाते हैं ताकि
मादा उसकी आक्रामकता से बची रहे .


जारी .....

Sunday, 5 July 2009

साईब्लाग [sciblog]: पशु पक्षियों के प्रणय प्रसंग -१ (डार्विन द्विशती विशेष )

साईब्लाग [sciblog]: पशु पक्षियों के प्रणय प्रसंग -१ (डार्विन द्विशती विशेष )

पशु पक्षियों के प्रणय प्रसंग -१ (डार्विन द्विशती विशेष )

सारस का प्रणय प्रदर्शन
जीव जंतुओं में योग्यतम के संतति संवहन का जिम्मा कुदरत के एजेंडे में शामिल है -और इसे अंजाम देने के लिए उसका आजमूदा नुस्खा है कामाश्त्र का संधान -कामाश्त्र के संधान का मतलब है समस्त जीवों में काम भावना के संचार की जुगत ! कामवश हो जीव जंतु ही नहीं स्वयम मनुष्य भी विचित्र से हाव भाव -व्यवहार का प्रदर्शन करता है जो उनके आम व्यवहार से सर्वथा भिन्न होता है .आईये प्राणि जगत में काम व्यवहार के इस एक मुख्य पहलू की एक व्यवहार शास्त्रीय (ETHOLOGICAL ) पड़ताल करें जो ख़ुद मनुष्य में अपने उत्स पर जा पहुँचा है !


प्रजातियों की वंश रक्षा के लिए जरूरी है कि -
१-प्रत्येक जीव जंतु अपने नर मादा जोड़े की सहज तलाश कर सकें
२- वे अपने जोड़े की प्रजाति के वांछित लिंग की पहचान कर सकें
३-वे एक दूसरे को आकर्षित कर लेने में समर्थ हो सकें जिससे करीबी निकटता हासिल हो सके
४-आपस में रति प्रसंग के लिए उत्प्रेरित कर सकने में समर्थ हो सकें
५-यह भी सुनिश्चित हो सके कि जोडों के बीच सटीक तालमेल और प्रणय साहचर्य से सफल संसर्ग फलीभूत हो सके
इन जैवीय उद्येश्यों की पूर्ति के लिए जीव जंतुओं में एक सुनिश्चित प्रणय काल-कोर्टशिप पीरियेड तय होता है जिसकी गतिविधियाँ अज़ब गजब व्यवहार प्रदर्शनों से शुरू होकर अंततः अपने मुकाम -रति प्रसंग तक जा पहुँचती हैं ।
यह कोर्टशिप अवधि निचले जीवों में बहुत अल्पकालिक होकर पशु पक्षियों में कुछेक मिनटों से मनुष्य तक आते आते एक वर्ष तक जा पहुँची है ।
अब जैसे छिपकलियों की कोर्टशिप बस यही कोई १५ -२० मिनट में अप्रैल माह में होती है -उच्चतर जीवों ,पशु पक्षियोंकी भिन्न भिन्न प्रजातियों में घंटे भर से कई दिनों की कोर्टशिप देखी जाती है ।

झींगुरों का संगीत ,मेढकों की टर्र टर्र ,पशुओं का एक तरीके से रम्भाना कोर्टशिप की शुरुआत का शंखनाद ही तो है -उनकी इन प्रणय पुकारों से मादा को आकर्षित करने का बिगुल बज उठता है !व्हेलें प्राणी जगत में सबसे जटिल और लम्बी अवधि का प्रणय गीत गाती हैं जो ६ मिनट से ३० मिनट तक जारी रह सकता है -यह सैकडों मील तक प्रणयातुर जोडों को सुनाई दे जाता है !

जारी ....

Thursday, 25 June 2009

नर नारी के जैवीय कार्यक्षेत्र और लक्ष्मण रेखायें (मानव एक नंगा कपि है ! -डार्विन द्विशती ,विशेष चिट्ठामाला -समापन किश्त ))

आज भी नारियों की `गृह स्वामिनी´ की भूमिका सर्वोपरि और प्रकृति सम्मत है कदाचित वह इससे सर्वथा विमुख रहकर न तो स्वयं की और ना ही अपने परिवार को सुख-शांति प्रदान कर सकती है। नर आज भी घर के बाहर अपने उसी आदिम कपि का जज्बा लिए उन्मुक्त विचरण कर रहा है !

तो क्या नर के आधुनिक कार्यक्षेत्रों (जो प्राचीन शिकार क्षेत्रों के समतुल्य है) में नारियों का आना वर्जित होना चाहिए? क्योंकि इन कार्य क्षेत्रों में पुरुषों की टोलियों (प्राचीन नर शिकारी झुण्ड) का भ्रमण लाखों वर्षों से प्रकृति सम्मत रहा है। परन्तु पिछली एक दो सदियों और ख़ास कर विगत कुछ दशकों से स्थिति तेजी से ठीक इसके विपरीत होती जा रही है। पुरुषों के आधुनिक `शिकार क्षेत्रों´ में नारियों की भी घुसपैठहो चली है।यही नहीं उनकी आदिम भूमिकाएँ भी आमूल चूल रूप से बदलती दिख रही हैं -तेजी से रोल रिवर्जल हो रहा है ! क्या यह स्वंय नारियों, उनके परिवार और अन्तत: मानव समुदाय के लिए मुफीद साबित होगा ?

इन्हीं परिस्थितियों में हमारे जैवीय और सांस्कृतिक `मनों´ और मूल्यों में जोरदार संघर्ष होता है। मानव मन `व्यथित´ हो उठता है। वह सुख और शांति के बारे में नये सिरे से विचार करने लगता है। मगर उससे कहाँ भूल हो गयी है? इस प्रश्न पर उसका ध्यान नहीं जाता। सचमुच यदि हमें सुख और शांति से रहना है तो अपने जैवीय एवं सांस्कृतिक संस्कारों में तालमेल बिठाना होगा, सामंजस्य लाना होगा नहीं तो आधुनिक प्रगति का रास्ता हमें विनाश के गर्त में ढकेल सकता है।


आज की दिन ब दिन बढ़ती सामाजिक असंगतियों, बुराइयों के पाश्र्व में कहीं मानव का अपने `पशु मन´ को ठीक से समझ कर उसके अनुरूप कार्य न कर पाने की असमर्थता ही तो नहीं है। बाºय आवरणों, कपड़ों से शरीर भर ढँक लेने तथा सुख-ऐश्वर्य की चमक-दमक में हम अपनी मौलिक अभिव्यक्ति नहीं भूल सकते। आज के मानवीय समाज में बलात्कारों (पशु बलात्कार नहीं करते?), तलाकों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। ऐसा नारियों का, पुरुषों के आदिम अधिकार क्षेत्र में घुसपैठ का नतीजा तो नहीं है? आज की अत्याधुनिकाओं व तथाकथित आदर्शवादियों का यह नारा कि नारी हर क्षेत्र में पुरुष से `कन्धा से कन्धा´ मिलाकर चले सर्वथा अजैविकीय, अप्राकृतिक है। प्रकृति ने तो दोनों के कार्यक्षेत्रों का बँटवारा स्वयं कर रखा है।

एक `घर´ की `स्वामिनी´ दूसरा घर के बाहर का `स्वामी´- यही व्यवस्था प्रकृति सम्मत रहीं है, वर्तमान में है और कम से कम से कम एकाध लाख वर्ष के पहले तो नहीं जा सकती। यदि इस `व्यवस्था´ को छिन्न-भिन्न करने के प्रयास यूं ही चलते रहे तो, जनसंख्या वृद्धि, प्रदूषण आदि मानव जनित समस्याओं के अपने घातक रूप दिखाने के पहले ही हमारे भविष्य का कोई न कोई निर्णायक फैसला हो जायेगा।

यदि हमें सुख-चैन से इस धरा पर रहना है, अपना सफल वंशानुक्रम चलाना है तो अपने `जैवीय´ मन के अनुरूप ही कार्य करना होगा। आज का वैज्ञानिक चिन्तन हमें यही मार्ग सुझाता है। विश्व के दार्शनिकों, आम बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों तथा समाज सुधारकों को इन बातों को गम्भीरता से देखना-समझाना होगा क्योंकि सामाजिक व्यवस्था के संचालन का भार मुख्यत: उन्हीं के कन्धों पर रहता है। वैज्ञानिक अपने जीवनकाल में प्राय: लोकप्रिय नहीं हुआ करते। वे केवल सुझाव दे सकते हैं। उसे व्यवहार में लाना दुर्भाग्य से उनके स्वयं के वश में नहीं हो पाता।

टिप्पणी :इस विषय को लेकर अभी कोई अन्तिम मत नही उभरा है -वैज्ञानिकों -जैव विदों ,समाज जैविकी विदों और व्यव्हारशास्त्रियों के बीच विचार मंथन जारी है ! यहाँ प्रस्तुत मत को अनिवार्यतः मेरा दृष्टिकोण समझा जाय !

Tuesday, 23 June 2009

हम नहीं बदले हैं, केवल दृश्य बदल गये हैं -मानव एक नंगा कपि है ! (डार्विन द्विशती ,विशेष चिट्ठामाला -5))

हम नहीं बदले हैं, केवल दृश्य बदल गये हैं। आज भी विश्व में सर्वत्र नारियों के जीवन का अधिकांश समय एवं हिस्सा कुशल पारम्परिक, सर्वकालिक `गृहणी´ की ही भूमिका निभा रहा है। बच्चों के लालन-पालन का मुख्य भार आज भी नारियों के जिम्मे ही है । पुरुष वर्ग भी ज्यादातरअपनी पारम्परिक भूमिका में ही कार्यरत है। प्राचीन युग के जंगलों का स्थान आज शहरों, उद्योग क्षेत्रों, व कृषि भूमि ने ले लिया है।

अपने दिन भर के घोर परिश्रम और सफलतापूर्व कार्य सम्पन्न करने के पश्चात् सायंकाल वह घर `कुछ न कुछ´ लेकर लौटता है। कोई बड़ा शिकार हाथ में लेकर लौटना चाहता है, वह प्रतिदिन नये उत्साह से अपने कार्य संचालन के लिए घर से निकल पड़ता है-ठीक वही उत्साह जैसा कि उसे अपने शिकारी जीवन के दौरान अनुभूत होता था। वह आज भी हर शाम `कोई न कोई´ `बड़ा तीर´ मारने की फिराक में रहता है। यहाँ तक तो ठीक है, परन्तु मानवीय विकास ने पिछले दशकों में आत्मघाती रूख अपना लिया है।

ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि मानव का सांस्कृतिक विकास केवल दस पन्द्रह हजार वर्ष पूर्व होना ही शुरू हुआ है। हमारी पुराकथाओं में राजा पृथु को श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने सबसे पहले पृथ्वी पर आवास बनाया और उसका दोहन शुरू किया। जब मानव आबादी बढ़ी तो भोजन को संचित करने की आवश्यकता पर लोगों का ध्यान गया। परन्तु `मांस´ संचित नहीं रखा जा सकता था। मानव का ध्यान, फसलों को उगाने की ओर गया। इस तरह उसने कृषि जीवन भी अपना लिया। एक बार वह पुन: 2-3 करोड़ वर्ष पूर्व के आदि पूर्वज कपियों की भाँति वह शाकाहारी बन गया था। इस तरह मानव के सांस्कृतिक जीवन में पहला अध्याय कृषि क्रान्ति के रूप में जुड़ा। तदनन्तर जनसंख्या के बढ़ने व मानव आबादियों के कई जगह अपने आदिम `कबीलाई´ स्वरूपों में बँट जाने की प्रवृत्ति से `नागरी सभ्यता´ भी लगभग ८-१० हजार वर्ष पूर्व अस्तित्व में आई, जिसे `नागरी क्रान्ति ' का भी नाम देते हैं।

अभी पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मानवीय संस्कृति के इतिहास में एक नया सन्दर्भ जुड़ा, औद्योगिक क्रान्ति के रूप में . इससे मानव का भौतिक जीवन सुखमय हुआ-सामान्य जीवन स्तर सुधरा। पिछले दशकों में, `हरित क्रान्ति´ के नाम से एक बार पुन: `कृषि क्रान्ति´ का श्रीगणेश हुआ। यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि मानव के सांस्कृतिक विकास का क्या अभिप्राय है? `संस्कृति´ वास्तव में है क्या? `संस्कृति और सभ्यता´ का वैज्ञानिक नजरिया क्या है?

`संस्कृति´ और `सभ्यता´ क्या है? :
मानवीय संस्कृति के दो स्वरुप है- 1। भौतिक संस्कृति (material culture ) 2. अभौतिक संस्कृति (Non material culture )। मानव का पत्थर के औजार बनाने से लेकर अन्तरिक्ष यानों के बनाने तक के बीच की सभी तकनीकी प्रगति उसके भौतिक संस्कृति के विकास का द्योतक है। साथ ही मानवीय चिन्तन के आरिम्भक स्वरूपों, अध्यात्मिक व कलात्मक अभिरूचियों की अभिव्यक्ति के प्राथमिक प्रयासों, गुफाओं-कन्दराओं में आदिम चित्रकारी, लिपियों के आविष्कार से लेकर कविताओं, कहानियों के सृजन व महान पौराणिक ग्रन्थों व महाकाव्यों तथा आधुनिक काव्य ग्रन्थों- `इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका´´ और विकीपीडिया के सृजन तक का मानवीय इतिहास उसके अभौतिक संस्कृति यानि चिन्तन के क्रमानुक्रमिक प्रगति की कहानी कहता है।

हमारी आध्याित्मक, काव्यात्मक तथा कलात्मक सभी अभिवृित्तयाँ सांस्कृतिक विकास के इसी पक्ष को दर्शाती है। किसी देश के इन दो संस्कृतियों के विकास की सम्मिलित स्थिति उसके सभ्यता के स्तर का निर्धारण करती है । इस दृष्टि से कभी भारतीय सभ्यता विश्व की अन्य प्राचीनतम सभ्याताओं से परिष्कृति थी।

हमारी प्राचीन मोहन जोदड़ों और हड़प्पा की सैन्धव सभ्यता कभी अन्य सभ्यताओं की अपेक्षा अधिक उन्नत थी। अब स्थिति दूसरी है। आज अमरीका विश्व का सबसे विकसित व सभ्य देश माना जाता है- मेरे इस कथन पर विवाद हो सकता है परन्तु उपर्युक्त आधारों पर इस बात की सार्थकता परखी जा सकती है। आज का मानव प्रस्तर युग, तथा कांस्य युग से होता हुआ लौह युग `स्टील युग´ और अब अनतरिक्ष युग में प्रवेश कर गया है। परन्तु क्या वह अपने आदिम संस्कारों, पशु-प्रवृित्तयों में पूर्णतया मुक्त हो सका है?

सम्पूर्ण प्राणी जगत में जहाँ अन्य पशु-पक्षियों का केवल जैवीय विकास (biological evolution ) हुआ है, मानव का जैवीय और सांस्कृतिक दो तरह का विकास हुआ है और यह प्रक्रिया चलती जा रही है। परन्तु, जैवीय विकास की तुलना में सांस्कृतिक विकास अभी बिल्कुल नया है। हमारा जैवीय मन अभी भी हम पर दबंग है- हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक विकास का ढाँचा, जैवीय आधारों पर ही टिका है। कहीं-कहीं, मानव की संस्कृति और सभ्यता ने, अपने जैवीय संस्कारों को ही उभारने का यत्न किया है।

हमारी आदि जैवीय `एक पति-पत्नी निष्ठता´ का सन्दर्भ अब आधुनिक, सामाजिक परिवेश में वैवाहिक संस्कारों से दृढ़ बना दिया जाता है। आज की कुशल `गृहणी´ की अवधारणा की जड़ें हमारे जैवीय अतीत में टिकी हुई हैं। परन्तु साथ ही कई सन्दर्भों में सांस्कृतिक प्रगति ने, जैवीय प्रवृित्तयों के विपरीत भी पेंगे बढ़ायी है। यह आत्मघाती है। हम अपने जैवीय मन को इतने शीघ्र तो बदल नहीं सकते, क्योंकि इनके पाश्र्व में `जीनों´ (Genes ) की अभिव्यक्ति हैं। लाखों वर्षों के विकास के उपरान्त कहीं जा कर जीनों में कोई परिवर्तन आता है। हमारी संस्कृति और सभ्यता के तो बस केवल दस हजार वर्ष ही बीते हैं। आज भी हम पर हमारी जैवीय विरासत हावी है।

मनुष्य ही वह कपि है जिसके शरीर पर दूसरे कपियों की तरह घने बाल नही हैं -वह निर्लोम है ,नंगा कपि है !

अभी जारी .....अगले अंक में नर नारी की लक्ष्मण रेखाएं !