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Sunday, 17 July 2011

तोते अपने बच्चों को उनके नाम से पुकारते हैं

तोते आवाजों की नक़ल में उस्ताद तो हैं ही ,अब यह भी पता चला है कि वे अपने बच्चों का बाकायदा नामकरण करते हैं और उन्हें उन्ही नामों से पुकारते भी हैं .कार्नेल विश्वविद्यालय में वेनेजुएला के जंगलों में पाए जाने वाले हरी कूबड़ के तोतों पर हुए इस अध्ययन से पक्षी -प्रतिभा और व्यवहार की यह हैरतन्गेज जानकारी हुयी है .
प्रोसीडिंग्स आफ द  रायल सोसायटी बी के अभी हाल के अंक (१३ जुलाई ,२०११) में इस अध्ययन की रिपोर्ट आयी है .

यह पाया गया है कि हरे कूबड़ वाले तोतों की इस प्रजाति जो अपेक्षाकृत छोटे तोतों की एक प्रजाति है -६ से ७ अंडे अपने घोसलों में देती है और करीब एक पखवारे में इनसे बच्चे निकल आते हैं जो बहुत असहाय से होते हैं ...आपको पता होगा कि पक्षी जगत में दो तरह के बच्चे /चूजे जन्मते हैं -एक तो अंडे से बाहर निकलते ही दौड़ने भागने वाले 'प्रीकासिअल' और दूसरे असहाय से एक मांस लोथड़े के सदृश पड़े रहने वाले 'ऐलट्रिसीयल '....तोते इस दूसरे तरह के बच्चे देते हैं ....अध्येता कार्ल बर्ग कहते हैं कि ये तोते मनुष्य की भांति एक ख़ास अलग अलग "वोकल सिग्नेचर टोन "  से अपने बच्चों को बुलाते हैं और वे बच्चे भी उन्ही ध्वनि पैटर्न को अपने नाम के रूप में याद रखते हैं ! 
Green-rumped parrotlets from Venezuela. Image credit: Nicholas Sly

वैज्ञानिक बर्ग मनुष्य और तोतों के इस शिशु नामकरण व्यवहार के कई साम्यों की जिक्र करते हैं -मनुष्य -शिशु भी लम्बे समय तक असहाय से होते हैं और ये तोते के बच्चे भी -नाम से इनके संबोधन से दैनंदिन के इनके लालन पालन में इनके ध्यान के आकर्षण में सुभीता हो जाती है -तोते भी मनुष्य के बच्चों की तरह अपना नाम ताउम्र याद रखते हैं .उनके मां बाप  भी अपने बच्चों के नाम याद रखते हैं -और मां बाप ही नहीं  कुनबे के दूसरे लोग भी बच्चों को और उनके बड़े होने पर भी उनके नाम से संबोधित करते हैं -यह बात मनुष्य और तोते में कामन है ! है न मजेदार बात ? 


कोई आश्चर्य नहीं, मानव आबादी के निकट  रहने वाले तोते अपने मित्र और शत्रु मानवों का भी नामकरण न कर देते हों -कनवां,मर्कहवा ,कलूटवा,कलमुहिया टाईप नाम -क्या आप इस विषय पर शोध करना चाहेगें ? 


Friday, 22 April 2011

शहर में मोर नाचा सबने देखा!

यह कहावत तो सभी ने सुनी होगी कि जंगल में मोर नाचा किसने देखा? मतलब जो समृद्धता ,ख्याति ,प्रदर्शन प्रत्यक्ष न हो उसके होने न होने से फर्क ही क्या  पड़ता है ....मगर जमाना अब बदल गया है अब जंगल में नहीं मोर शहर में नाच रहे हैं ....हाथ कंगन को आरसी क्या ? आप खुद इस वीडियो में देख लीजिये! मगर यह अनहोनी हुयी तो क्यों ? क्या मोर यह ताने सुनते सुनते थक गया कि उसका जंगल में नाचना मनुष्यों को रास नहीं आ रहा और उसने शहर की राह पकड़ ली ...मगर गीदड़ की मौत वाले रास्ते पर नहीं बल्कि लोगों को अपने मनभावन नृत्य से लुभाने के अभियान पर ..यह मोर इन दिनों बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के समीप  शहर में ही लोगों को अपने नृत्य से लुभा रहा है ...अब तो नर नारियां ही उसकी संगिनियाँ हैं जिन्हें देखते ही इस पक्षी का भी  मन मयूर मानो नाच हो उठता है और वह झूम उठता  है.

 पशु पक्षियों के प्राकृतिक रहवास -पर्यावास को मनुष्य ने तहस नहस कर डाला है ...यहाँ तक कि उनका पलायन शहरों की ओर  हो चला है ..कितने पक्षी अब शहरों को ही अपना प्राकृतिक वास बनाने में लग गए हैं -मोर भी ऐसा ही एक बेसहारा बिचारा पक्षी है जो मनाव आबादी के निकट  रहने की चाह में शहर की सड़कों पर चहलकदमी करने आ  पहुंचा है ....कहते हैं इनके नवजातों के दिमाग में मनुष्यों की छवियों की ऐसी    इमप्रिन्टिंग हो रही है कि वे इन्हे अपने जोड़े के रूप में भी देख रहे हैं -लिहाजा उनका सामीप्य पाने को अपना मशहूर कोर्टशिप प्रदर्शन भी करने से नहीं चूक रहे -क्या जाने किसी 'मनुष्य मोरिनी' का दिल आ ही जाय इन अदाओं पर :) 
अपने राष्ट्रीय पक्षी की इस अदा पर  मेरा दिल तो आ गया अब आपकी बारी है- (वीडिओ सौजन्य:प्रशांत शुक्ला )

Wednesday, 13 April 2011

चार सौ वर्ष पुराने कच्छप महराज घर से बेघर

वियेतनाम के सेंट्रल होएन कियेम  झील से जब २०० किलो के कच्छप महराज  सेना की काफी जद्दोजहद के बाद निकाले गए तो तमाशायी भीड़ नतमस्तक हो गयी -उनका पालनकर्ता, विघ्नहर्ता सामने था!वियेतनामी इस कछुए को अपनी समस्याओं का तारणहार मानते हैं -कु रुआ नाम्नी  पितामह का दर्जा प्राप्त यह कच्छप महराज कुछ अस्वस्थ हो गए थे ..किसी ने इनके शरीर पर घावों की पुष्टि की थी ..फिर तो इलाज लाजिमी था ....मामला सेना को सुपुर्द किया गया ....और अब काफी मशक्कत के बाद इलाज के लिए इन्हें झील से बाहर निकाल लिया गया है !


भारत में जैसे कच्छप को देवत्व प्राप्त है और विष्णु के एक अवतार  होने का भी गौरव इन्हें मिला हुआ है वैसे ही वियेतनाम में ख़ास कु रुआ को ही दैवीय दर्जा दिया गया है .किंवदंती हैं कि यह इसी कछुए का पुण्य प्रताप था कि होंन  कियेम की अतल गहराईयों से दंतकथाओं की स्वर्ण मंडित तलवार निकल आयी और पंद्रहवीं शती के वियेतनामी योद्धा ली लोई ने चीन के मिंग शासकों के अधिपत्य से वियेतनाम  को मुक्त करा लिया ..

दावा है कि यह कछुआ करीब ६०० वर्ष का है और जादुई क्षमताएं रखता है -ऐसे विचार इन दुर्लभ हो रहे जंतुओं के संरक्षण के लिए अभयदान बन जाते हैं! रफेटस  स्विनहोई वैज्ञानिक नाम(Rafetus swinhoei ) वाला यह कछुआ विश्व के दुर्लभतम कछुआ प्रजाति की नुमाईन्दगी  करता है -कहते हैं यह प्रजाति केवल अब चार की संख्या में ही रह गयी है -एक यह ,दो चीन में और एक हनोई में ...यद्यपि वियेतनाम और चीन में कछुआ थाली का एक सुस्वादु व्यंजन 'बा  बा ' है मगर कु रुआ के दैवीय स्टेटस के कारण इसे अभयदान मिला हुआ है! विश्व के  दुर्लभतम २५ कच्छपों में से १७ यहीं एशिया के ही हैं .

कु रुआ के चाहने  वाले उसके स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं ....पर्यावरण विद कहते हैं कि उसकी दवा दारू वहीं उसके झील के पर्यावास में ही होनी चाहिए थी- मेरा भी यही मानना है और मैंने अपना मत भी टाईम पत्रिका की इस रिपोर्ट पर डाल दिया है ..आपका क्या विचार है?

Monday, 12 October 2009

छठी का दूध याद है ? अरे वही पांचवा स्वाद ?

काफी समय  तक यही  माना जाता रहा की  मनुष्य की जीभ चार मूल स्वाद ग्रहण कर सकती है -मीठा ,खट्टा,कसैला/तीता    और नमकीन .स्वाद की अनुभूति में गंध की भी अहम् भूमिका होती है -जुकाम के समय व्यंजनों का स्वाद न मिलने का कारण यही है ! मगर ठीक   १०० साल पहले जापान एक प्रोफेसर  किकुने एकेडा ने एक समुद्री सेवार (सी वीड ) से निकले पदार्थ "अजीनोमोटो" से  पाँचवे स्वाद का जायका लोगों को दिलवाया.  "अजीनोमोटो" यानि ग्लूटामेट  (जो एक  नान -एसेंसियल अमीनो अम्ल है)  को चखने से एक नए स्वाद की अनुभूति लोगों को हुई !  और यही आगे चल कर पांचवा स्वाद कहलाया .बताते चलें कि नान एसेंसियल अमीनो अम्ल वे हैं  शरीर जिनका  उत्पादन  कर सकता है और एसेंसियल अमीनो एसिड वे होते हैं जिनका उत्पादन शरीर नहीं कर सकता और जिन्हें बाहर से लेना जरूरी हो जाता है  .  पाँचवे स्वाद का नामकरण हुआ युमामी (Umami ) जो जापानी शब्द है जिसका हिन्दी में कामचलाऊ अर्थ है "स्वादिष्ट"!अगर अब कोई पूंछे की स्वाद कितने प्रकार का होता है तो  मीठा ,खट्टा ,कसैला  /तीता और नमकीन के साथ  युमामी का जिक्र करना न भूलें .


ग्लूटामेट का इस्तेमाल हम अक्सर चायनीज व्यंजनों में करते हैं - अपने यहाँ मशहूर "चायनीज" व्यंजनों - चाओमिन ,चिली पनीर ,मंचूरियन आदि में मोनोसोडियम ग्लूटामेट (एम् एस जी ) ई -६१  डाला जाता है ! इसका व्यापारिक निर्माण जापान की अजीनोमोटो (Ajinomoto Kabushiki)  नाम से जानी   जाने वाली कम्पनी करती है जो दुनिया में इस पदार्थ के सम्पूर्ण खपत का अकेले ३३% आपूर्ति करती है ! इसलिए ही आम बोल चाल की भाषा में ग्लूटामेट अजीनोमोटो बन गया !


अजीनोमोटो (Aji no Moto = “Essence of Taste,”)  का शाब्दिक अर्थ है स्वाद का सत्व ! यही मोनो सोडीअम ग्लूटामेट है जिसकी खोज  केकुने   इकेदा ने किया और १९०९ में इसे जापान में ही पेटेंट करा लिया ! मुझे याद है मैंने पहली बार MSG(मोनोसोडियम ग्लूटामेट) का स्वाद तब चखा था जब मैगी उत्पादों(नेस्ले) का भारत में चलन शुरू हुआ था -यही कोई बीसेक वर्ष पहले !वैसे इसके पहले ही अजीनोमोटो नाम से यह पदार्थ पंसारी /किराना की दुकानों पर भी मिल जाता था ! मैंने बाद में जाना कि अरे यही अजीनोमोटो ही मोनोसोडियम ग्लूटामेट है !  लेकिन तब तक मैगी ने अच्छा खासा पैसा खलीते से निकाल लिया था ! तब मैगी इसका व्यापार स्वाद वर्धक के रूप  में छोटी पुड़ियों में कर रही थी ! मुझे तभी इसका स्वाद भाया  था  और अब तो आज के बच्चों की यह पहली पसंद बन गया है ! अनेक वैज्ञानिक परीक्षणों में पाया गया है कि यह मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए निरापद है बशर्ते मात्रा का नियंत्रण रखा जाय !




पके टमाटरों में और  चीज उत्पादों में  कुदरती तौर पर ग्लूटामेट मिलता है ! इसमें सोडियम आयन की मात्रा भी खाने वाले सामान्य नमक से काफी कम होती है -मतलब स्वास्थ्य की दृष्टि से ब्लड प्रेशर आदि के कुछ मामलों में साधारण नमक का  यह बेहतर विकल्प हो सकता है ! कई पके फलों और खमीर वाले फरमेंटएड   खाद्य पदार्थों में यह पर्याप्त मात्रा में मिलता है -पके टमाटर में  तो भरपूर ही - २५०-३०० मिली ग्राम /प्रति १०० ग्राम ! और माँ के दूध में भी इसकी मौजूदगी (०.०२%) होती है !फिर तो  इसका स्वाद बचपन से हमारे मुंह लगा हुआ है !  वैसे भी मानुष जाति  यानि हम ठहरे चटोरे जनम के ....

तो पांचवे स्वाद की कहानी कैसी लगी ? खट्टी या मीठी ?...या युमामी !

Wednesday, 7 October 2009

क्या आप बता सकते हैं कि.....

क्या आप बता सकते हैं कि हिरन और मृग में क्या अंतर है ? या फिर उत्तरप्रदेश का राज्य पशु और पक्षी क्या है ? घड़ियाल और मगरमच्छ में क्या अंतर है ? या कौन सा पक्षी है जो अपने पंखों से ही पतवारों का काम लेकर तैरता भी है ? सवाल दर सवाल मगर सब के सही जवाब ! और उत्तर बड़े बूढों ने नहीं दिए बल्कि बच्चों ने उमग उमग कर ये उत्तर दिए -मन  बाग बाग हो गया ! अवसर था चौवन्वे वन्य जीव सप्ताह (१-७ नवम्बर ) के समापन आयोजन का ! जो आज वन विभाग के सौजन्य सारनाथ के मृगदाव पार्क में सम्पन्न हुआ !





                          वाराणसी वृत्त के वन संरक्षक श्री आर एस हेमंत कुमारके साथ मैं
अपने देश में नई पीढी अब जीव जंतुओं की जानकारी के प्रति चैतन्य हो रही है -यह सचमुच बहुत ही सुखद है ! आज वन्य जीवों की जानकारी की ओर बच्चों की रुझान बढ़ने के लिए कई कार्यक्रम /प्रतियोगिताएं आयोजित हुईं जिनमे वन्य जीवन पर चित्रकारी .,निबंध प्रतियोगिता ,भाषण आदि प्रमुख रहे ! मैं इस अवसर पर उपस्थित होकर धय्न्य हुआ -आज का पूरा दिन वहीं बीता ! प्रभागीय वनाधिकारी (डिविजनल फारेस्ट ऑफीसर ) श्री लालाराम बैरवा (आई ऍफ़ एस ) ने कल ही मेरी वन्य जीवों की अभिरुचि को लक्ष्य कर आज के कार्यक्रम में निमंत्रित किया था ! वाराणसी वृत्त के वन संरक्षक श्री आर एस हेमंत कुमार जो मूलतः आंध्र  प्रदेश के हैं  और उत्तर प्रदेश कैडर के सीनियर आई ऍफ़ एस हैं मुख्य अतिथि रहे -विनम्र ऐसे कि मुझसे तब तक  मुख्य अतिथि बनने और उस विशिष्ट्तम  कुर्सी पर बैठने का आग्रह करते रहे जब तक कि मैंने किंचित बल  से ही उन्हें उस कुर्सी पर आसीन नहीं करा दिया ! वे ही उसके सर्वथा योग्य भी थ .कार्यक्रम का सञ्चालन श्री ओ पी गुप्ता उप संभागीय वनाधिकारी ने किया ! श्री आर एस यादव रेंज आफीसर ने कार्यक्रमों का संयोजन किया !


 कार्यक्रम में बच्चों ने ही नहीं बच्चियों ने भी बढ़ चढ़  कर हिस्सा लिया

हमने कार्यक्रमों के औपचारिक समापन के बाद वन्य वशुओं का पालतू बाद भी देखा और उन्हें कुछ खिलाया  भी ! नीचे  चित्र देखिये इसमें आगे की ओर तो कृष्ण मृग है (ब्लैक बग -antelope ) और पीछे चीतल, जो हिरन (deer )  है !  जान लें कि जो हर साल सींगे गिरा देता है वह हिरन है और जो जीवन एक ही सींग से गुजर देता है वह मृग -बच्चों को भी बता देगें यह प्लीज ! और हाँ उत्तर प्रदेश का राज्य पशु बारहसिंगा (हिरन ) है-

और पक्षी सारस यानि क्रौंच  (crane ) ! (पहले जानते रहे इसे ? खैर कोई बात नहीं इस बार के वन्य पश्य सप्ताह पर ही जान लें ! ) घडियाल की लम्बी थूथन होती है जिस के सिरे पर एक घरिया (एक तरह का छोटा मिट्टी का पात्र ) नुमा रचना होती है जबकि मगर का थूथन तिकोना लिए होता है ! और पेंग्विने अपने डैनों से तैरती हैं ! कोयल और पपीहा नीड़ परिजीवी हैं यानि घोसला नहीं बनाती बल्कि दूसरे के घोसले में अंडे पारती हैं -कोयल कौए के और पपीहा सतबहनी (बैबलर ) के ....इन क्विज का जवाब बच्चे बेलौस देते गए और मुख्य अतिथि से  इनाम झटकते गए .





आप भी भारतीय वन्य जीवन से बच्चों को अवगत करने का सिलसिला शुरू करे ! इस वन्य जीव सप्ताह पर यही आह्वान है !