Wednesday, 16 July 2008

कामोद्दीपक भी हैं नारी के कान ...मनोरम यात्रा का नया पड़ाव ....

कामोद्दीपक हैं नारी के कान
साभार :istockphoto
नारी के कानों का भी अपना अनूठा सौन्दर्य है .व्यवहार विज्ञानी डा0 डिजमण्ड मोरिस की राय में मानव कर्णों , खासकर नारी के कानों का सबसे खास गुण हैं उनकी कामोद्दीपक भूमिका। प्रणय प्रसंगों के दौरान नारी के कानों के मुलायम मांसल हिस्से (लोब्स) रक्त वर्ण हो उठते हैं, इनमें खून की आपूर्ति यकायक बहुत बढ़ जाती है, वे फूल से उठते हैं और स्पर्श के प्रति अत्यन्त संवेदनशील हो जाते हैं। प्रणय बेला में कानों का विविध ढंगों से प्रेमस्पर्श नारी को काम विह्वल कर सकता है। प्रख्यात काम शास्त्री किन्से की राय में तो कुछ विरलें मामलों में मात्र कानों को उद्दीपित करने से ही नारी को मदन लहरियों (आर्गेज्म ) का सुख प्राप्त होना देखा गया है। इस तरह नारी के कान उसकी समूची देह रचना में एक महत्वपूर्ण ``कामोद्दीपक क्षेत्र´´ की भूमिका निभाते हैं।

कानों को नारी गुप्तांग का भी प्रतीक मिला हुआ है। उसकी आकार रचना ही कुछ ऐसी है। विश्व की कुछ संस्कृतियों-लोक रिवाजों में कानों का बचपन में छेदना दरअसलन एक तेरह से ``नारी खतने´´ (फीमेल सर्कमसिजन) का ही प्रतीक विकल्प हैं। किशोरियों के कान छिदवाने की प्रथा के पार्श्व में भी सम्भवत: यही अप्रत्यक्ष भावना रही होगी, भले ही प्रत्यक्ष रूप में इसका कारण श्रृंगारिक दिखता हो।

मिस्र में किसी व्यभिचारिणी की आम सजा है- कानों को तेजधार की छुरी से काट देना। नारी कानों को उसके गुप्तांग (योनि) का विकल्प मानने का ही एक उदाहरण है। महाभारत का एक रोचक मिथक सूर्य पुत्र कर्ण के जन्म को कुन्ती के कानो से मानता है। गौतमबुद्ध भी कुछ दन्तकथाओं के अनुसार कर्ण प्रसूता है। कानों में बालियों [कुण्डल]के पहनने का प्रचलन बहुत पुराना है। आरिम्भक कांस्ययुग (चार हजार वर्ष से भी पहले) से ही कानों में कुण्डल धारण करने का रिवाज विश्व की कई संस्कृतियों में रहा है। आरम्भ में तो कर्णफूल/बाली आदि आभूषणों को पहनने के पीछे किसी काल्पनिक खतरे से निवारण का प्रयोजन/(अन्ध) विश्वास हुआ करता था। किन्तु अब यह कानों के आभूषण `स्टेटस सिम्बल´ का भी द्योतक बन गया है। यह धनाढ्यता और सामाजिक स्तर को प्रतिबिम्बत करता है। कानों में आभूषणों का पहनाव नारी के सौन्दर्य को बढ़ाता है, क्योंकि यह नारी के कानो के कुदरती स्वरूप को और भी उभार देता है।

6 comments:

Udan Tashtari said...

कुछ नये तरह से जानकारी मिली.

Mumukshh Ki Rachanain said...

भाई मिश्रा जी,
रोचक, ज्ञानवर्धक, लेख अग्रसारित कर पढ़वाने के लिए धन्यवाद.

चन्द्र मोहन गुप्त

Gyandutt Pandey said...

कामोद्दीपन के नाम से कतरा कर निकलने का मन किया। पर फिर लगा कि टिप्पणी तो कर ही दें।
कामोद्दीपन अब हमें आउट आफ कोर्स लगता है।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Agar aap ko saundryashastree ki upaadhi di jaaye to galat na hoga.

arun prakash said...

kaan ki charchaa kar ke aapne kaion ke kaan kaat daalein hai puuri tarah se sahmat

veerubhai said...

नारी का अंग प्रत्यंग संवेदनशील है ,प्रोब करने अन्वेषित करने की ज़रुरत होती है .अकसर इस अन्वेषण को भूल पुरुष सुरक्षा कवच पहन कुरुक्षेत्र के मैदान में कूद जाता है .कर्ण लोलक वाकई संवेदी होतें हैं ,आमाइश कर देखें .