Friday, 24 July 2009

......और हो आग दोनों तरफ़ बराबर लगी हुयी .... पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (6)-(डार्विन द्विशती विशेष ब्लागमाला )

जी हाँ ,इश्क में हो दोनों ओर आग बराबर लगी हुई की सोच का उदगम लगता है इन पशु पक्षियों के प्रणय याचन के व्यवहार से ही है -नर और मादा में काम विह्वलता की बराबरी और उनकी समकालिकता का होना जरूरी है तभी उनमें रति मिलन सम्भव है ! प्रणय याचन के व्यवहार इसी ओर उकसाते हैं ! यदि नर मादा में से कोई एक भी काम विह्वलता के समान स्तर पर नहीं पहुँच पाता तो रति प्रसंग सफलता पूर्वक संयोजित नही हो सकता .अनिश्चय की स्थिति प्रायः मादा की ओर से ही होती है अतः नर बार बार अपने चित्र विचित्र प्रणय व्यवहारोंकी पुनरावृत्ति करता रहताK है और यह एक भरे पूरे अनुष्ठान का रूप तक ले लेता है-बहुत कुछ किसी सेरीमनी जैसा ! जिससे मादा का असमंजस दूर हो जाय !

स्वार्ड टेल मछली का नर अपनी तलवार जैसी पूंछ से बार बार मादा के मुंह के सामने पंख झलने सा उपक्रम करता है -वह दूर भागना चाहती है तो भी नर उसका रास्ता रोक रोक कर अपनी पूंछ दिखाना चाहता है -यह तब तक चलता रहता है जब मादा भी पूर्ण समर्पण के लिए तैयार नही जाती


नर स्वार्ड टेल मादा को बार बार अपनी तलवारनुमा पूँछ दिखा कर रिझाता है


मछलियाँ प्रणय याचन के दौरान तीन तरह का व्यवहार प्रर्दशित करती है -भय (फियर ),आक्रामकता (एग्रेसन ) और यौन संसर्ग (mating) की उन्मुखता -यानि 'FAM '-जब तक पहले की दोनों प्रवृत्तियों का शमन नहीं होता -अंतिम यानि यौन संसर्ग हो पाना मुश्किल है !

नर स्टीकल बैक मछली का नर इतना आक्रामक हो उठता है की वह मादा के करीब आने पर उस पर भी आक्रमण कर सकता है -प्रणयातुर मादा अण्डों से भरा पेट तो दिखाती है मगर नर के पास आने पर भाग भी खडी होती है -मगर अण्डों से भरे पेट को देखते ही नर की आक्रामकता का शमन होने लगता है -वह मादा को खुद अपने बनाए गए नेस्ट -घोसले तक ले जाता है ,इसके दौरान वह एक विशेष तरह का टेढा मेढा नृत्य भी करता है ! यह नृत्य नर के उहा पोह को दर्शाता है की कही मादा के रूप में यह कोई आक्रान्ता हो जो उसके इतने परिश्रम से बनाए गए घोसले को उजाड़ दे !नर की इस दुविधा का लाभ उठाते ही मादा घोसले में घुस लेती है और मादा के घोसले में जाते ही नर की आक्रामकता नाटकीय तरीके से छू मंतर हो जाती है -वह मादा की पूँछ को बार बार आलोडित करता है -मादा अंडे दे देती है और नर उनपर अपने शुकाणुओं को छोड़ देता है -मगर तभी एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो जाती है -जैसे ही मादा अंडे दे देती है उसका पेट पिचक जाता है और नर उसे घोसले में आया कोई घुसपैठिया समझ लेता है और खदेड़ बाहर करता है ! अब नर ही अण्डों के सेने और बच्चे निकलने तक की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेता है !

स्टिकल बैक नर मादा को घोसले में घुसने को गाइड करता है और उसकी पूँछ को आलोडित करता है


पक्षियों में भी मादा की अनिच्छा को दूर करने के तरह तरह के प्रणय प्रदर्शन किये जाते हैं -जेब्रा फिंच नर मादा के सामने एक मजेदार नृत्य करता है -"कभी पास कभी दूर ' होने का और जैसे जैसे मादा उत्प्रेरित होती जाती है वह पास खिसकता आता है ! गौरया के नर को कभी प्रणय याचन /प्रदर्शन करते हुए देखिये -वह शिशुओं की तरह पंखों को सिकोड़ और सर नीचे कर मानो मादा से स्नेह -दुलार की याचना करता हो -मादा इस प्रदर्शन के वशीभूत हो प्यार करने की रजामंदी दे देती है.



जेब्रा फिंच का प्रणय नृत्य -वह धीरे धीरे मादा के निकट आता जाता है -एक रेखाचित्र


जो इन बारीक बातों को नहीं समझते उन्हें पशु पक्षियों के प्रणय व्यवहार अजीब से और हास्यास्पद लग सकते हैं -अब आप भी जब किसी पशु पक्षी को कोई अजीब सा व्यवहार करते देखें तो पहली इसी सम्भावना पर धयान दें की कहीं यह उसका प्रणय याचन तो नहीं है ?आपके प्राणी व्यवहार विद बनने के एक सुनहरे अवसर की शुरुआत हो सकती है यह ! आजमा के देखिये !


10 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर सूचनाएँ दे रहे हैं आप! मुझे तो इस से बहुत कुछ जानने को मिल रहा है जीवजगत के व्यवहार के मामले में।

डॉ. मनोज मिश्र said...

अच्छी जानकारी.

‘नज़र’ said...

बहुत बढ़िया लेख-माला!

शरद कोकास said...

भय निद्रा मैथुन आहार यह प्राणि जीवन की जैविक विशेषतायें हैं मनुष्य सदा प्राणियों से सीखता आया है मछ्लियों से हमने साँस लेना सीखा है काश प्रनय लीला भी सीख लेते तो शायद संसार मे इतना अनाचार ना होता

P.N. Subramanian said...

ज्ञानवर्धक. हम होते तो इस वीडियो को भी चिपका देते
http://www.youtube.com/watch?v=nS1tEnfkk6M

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

@शरद जी वैसे तो मनुष्यता हर दृष्टी से प्रकृति के विरुद्ध हैं ..आप क्या सिखने की बात कर रहे हैं ?

वहां सिर्फ जरूरतें हैं ..यहाँ समकालीन समाज की नीतियाँ (भले ही सापेक्ष) भी है अपवादों को छोड़ दिया जाय तब ..दुबारा कहती हूँ, मनुष्यता प्रकृति के विरुद्ध ही है.

Udan Tashtari said...

बेहतरीन जानकारी.

उन्मुक्त said...

आप । या , या ( ) या ! चिन्ह जगह देकर क्यों लगाते हैं। मेरे विचार से यह शब्द के समाप्त होते लगने चाहिये। इस तरह से लगाने पर यह अक्सर पंक्ति के शुरू में आ जाते हैं। जैसे इस चिट्ठी के तीसरे पैराग्राफ की दूसरी पंक्ति में हो रहा है। यहां ) चिन्ह पंक्ति के शुरू में लगा है। यह कुछ अजीब लगता है।

Science Bloggers Association said...

Gajab.

Arvind Mishra said...

@उन्मुक्त जी ,धयान रखूंगा!