Tuesday, 11 November 2008

राष्ट्रीय परिचर्चा -विज्ञान कथा ,सत्र चालू आहे !

मित्रों ,जल्दी जल्दी कुछ बातें -कल उदघाटन सत्र और तीन तकनीकी सत्र पूरे हुए -यह मामला छाया रहा की विज्ञान कथा को मुख्य धारा के साहित्य में लानी के लिए क्या उपाय किया जाना चाहिए -या फिर इसे मुख्य धारा से बचा कर इसकी विधागत शुचिता को बचाए /बनाएं रहना चाहिए .क्योंकि मुख्यधारा की कई बुराईयों के समावेश से यह विधा अपनी विशिष्ट पहचान ही खो देगी .दूसरा मुद्दा यह रहा कि क्या विज्ञान कथा केवल पश्चिमी साहित्यिक सोच की उपज है या फिर इसके उदगम सूत्र भारत में भी तलाशे जा सकते हैं .आम मत से यह तय पाया गया कि भारत में मिथकों के प्रणयन और विज्ञान में फंतासी के प्रगटन में गहरा साम्य है -इन दोनों मुद्दों पर गहन विचार विमर्श से उद्भूत नवनीत -विचार को बनारस दस्तावेज -विज्ञान कथा -०८ में समाहित किया जायेगा .
कल के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जे आर एच विस्वविद्यालय के कुलपति महान गणितग्य प्रोफेस्सर एस एन दूबे थे जिन्होंने विज्ञान कथा की जड़ों को भारतीय पुराणों में स्थित पाया .अध्यक्षता प्रसिद्ध विज्ञान संचारक और राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार परिषद् नयी दिल्ली के निदेशक डॉ पटेरिया ने किया जिन्होंने विज्ञान कथा को विज्ञान के सहज संचार के माध्यम के रूप में विकसित करने पर बल दिया .
भारत की विभिन्न आंचलिक भाषाओं में भी विज्ञान कथा को प्रोत्साहन को बल दिया गया ,मराठी में तो यह पहले से ही समादृत है -
सत्र चालू आहे ......

8 comments:

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अच्छी लगी रीपोर्ट - विज्ञान कथाएँ भारत की हर भाषा मेँ लिखीँ जानी चाहीये -
- लावण्या

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर लिखा आपने ! आपकी रिपोर्टिंग की प्रतीक्षा रहती है ! धन्यवाद !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आधुनिक विज्ञान का विकास पश्चिम में हुआ तो विज्ञान फंतासी भी वहीं से आनी थी।

seema gupta said...

" good presentation on the subject, waiting to read more.."

Regards

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बढ़िया रिपोर्ट ..विज्ञान कथाये हमेशा आकर्षित करती हैं

अभिषेक ओझा said...

बहुत बढ़िया काम है ये ! सराहनीय.

Gyan Dutt Pandey said...

जमाये रहिये विज्ञान कथा।

योगेन्द्र मौदगिल said...

WAH...
wah....