Thursday, 9 October 2008

पुरूष पर्यवेक्षण -होठों पर इक नजर !

पुरूष पर्यवेक्षण के दौरान कुछ सूक्ष्म बातों पर भी ध्यान जा रहा है जैसे कि ये दो शब्द -मुख और मुंह ! क्या ये दोनों समानार्थी हैं ? मुझे तो नहीं लगता .मुख बोले तो पूरा मुखमंडल और मुंह बोले तो मुंह मंडल जिसमें होठ ,दांत और जीभ भी समाहित हैं .यदि किसी को इस वर्गीकरण पर ऐतराज हो कृपया बताये ।
जब हम मुंह की बात करते हैं तो होठों पर अनायास ही नजरें उठती हैं .चहरे पर होठ भावाभिव्यक्ति में बहुत महत्वपूर्ण रोल निभाते हैं -इनके आकार प्रकार में कई ऐच्छिक परिवर्तन लाये जा सकते हैं .होठों के ऊपर नीचे दायें बाएं करने से चेहरा अजब गजब भाव ग्रहण कर लेता है .होठों से सीटी बजाने से लेकर चुम्बन का चुम्बकीय हवाई सिग्नल भी ये होठ दे देते हैं .पर यह सब होठ करते कैसे हैं ? यह जानना रुचिकर हो सकता है ।
दरअसल होठ एक बहुत ही शक्तिशाली पेशी से संयुक्त होते है जिसे आर्बिक्यूलेरिस ओरिस कहते हैं इसकी ही गति या संकुचन से चुम्बन के आमंत्रण से लेकर होठ सिल लेने जैसी चुप्पी साधी जा सकती है .जब कोई मुक्केबाज रिंग में प्रतिद्वंदी से भिड़ता है तो ज़रा गौर से देखिये कि कैसे वह किसी मुक्के की प्रत्याशा में सहसा ही मुंह को भीच लेता है ,उसके होठ भिंच उठते हैं .यह सब कमाल उस पेशी का ही है . बदलते मूड को भांप कर होठ भी वैसा ही भाव बनते हैं या फिर इनकी गति से चेहरे का भाव बदल उठता है ।
प्रायः चार प्रकार के होठीय सिग्नल पहचाने गए हैं -खुले होठ ,बंद होठ ,होठों की अग्र गति और पच्छ गति.ये प्रफुल्लता से लेकर अवसाद तक की इन्गिति करते हैं । आर्बिक्यूलेरिस ओरिस नाम मुख्य होठ की पेशी चेहरे की दूसरी पेशियों से मिलकर चेहरे की कई भाव भंगिमाओं का प्रगटीकरण करती है .एक संक्षिप्त परिचय यूँ है -
१.levatar -इसकी मदद से ऊपरी होंठ दुःख ,घृणा और क्षोभ को प्रगत करते हैं ।
२.Zygomaticus - ऊपर उठ मुस्कराहट और हंसी
३.Triangularis-उदासी
.Depressor -निचले होठ को और भी नीचे करके तिरस्कार की अभिव्यक्ति
५.Levator menti -ठुड्डी को ऊपर करके निचले होठ को आगे बढाकर निष्ठुरता-अवज्ञा का प्रगटीकरण
६.Buccinataor -यह गालों को दातों तक खींच कर लाती है -फूँक मारने और खाना खाते समय की मुखमुद्रा !
७.Platysma - भय ,पीडा ,और खामोश गुस्से की अभिव्यक्ति !
इन सभी पेशियों के आपसी तारतम्य से होठ गुस्से के इजहार ,अट्ठहास आदि भावों को भी प्रगट करते हैं .खुश मिजाजी और दुखी चेहरे को अभिव्यक्त करने होठों को महारत हासिल है .खुले मन की हंसी में ऊपरी होठ ऊपर उठ कर ऊपरी दांतों तक को दिखा देते हैं .यदि हंसी में कोई नीचे के दांत भी दिखा देता है तो समझिये उसकी नेकनीयत नही है .वह बनावटी हंसी हस रहा है .होठों के फैलाव से खींसे भी निपोरी जाती हैं ।
दूसरे प्राणियों की तुलना में मात्र मनुष्य में ही होठों की श्लेष्मा सतह बाहर की ओर से दिखती है -यह एक यौन संकेतक भी है .घनिष्ठ क्षणों में ये थोडा फुले हुए ,ज्यादा रक्ताभ और थोडा बाहर की ओर निकलते हुए दीखते हैं .ये बहुत संवेदनशील हो उठते हैं -होठों के मामले में नारियां पुरुषों से बाजी मार ले गयी है क्योंकि उनके होठ अमूमन पुरूष से ज़रा से बड़े से होते हैं ! नर होठ -साभार

Wednesday, 8 October 2008

गाँव से यह स्कूप लेकर लौटा हूँ !

भरपेट भोजन के बाद चल पड़े डगमग


गाँव गया था,जौनपुर -मेरे तीन दिन के प्रवास में दो साँप दिखे -दोनों शुभ संयोग से विषहीन ! एक तो वोल्फ स्नेक था जिसके बारे में इस ब्लॉग पर पहले ही चर्चा हो चुकी है .दूसरा साँप पानी का साँप था जिसे चैकेर्ड कीलबैक वाटर स्नेक कहते हैं .इसका प्राणी शास्त्रीय नाम xenochropis piscator है .जब यह देखा गया तो यह एक बड़े से मेढक को निगल चुका था-इसके शरीर के फूले हिस्से को देखकर आप ख़ुद अंदाजा लगा सकते हैं .बहरहाल जैसा कि आम तौर पर गावों में होता है लोगबाग की भीड़ इसका काम तमाम करने को जुटने लगी और मेरे बच्चे इसकी तस्वीर उतारने में मशगूल हो गए -वीडियो भी लिया गया है ,देखिये लोड हो पता है या नहीं .नहीं तो फिलहाल फोटो से ही और कुछ अपनी कल्पना से वहाँ मचे हो हल्ले का अंदाजा लगाईये -बड़ी मुश्किल से मैं लोगों को इसे मार देने से रोक पाया -भीड़ भाड़ और हो हल्ला सुन कर इसने निगल चुके मेढक राम को उगल दिया -वे अधमरे से चित्र में देखे जा सकते हैं .बाद में Rana tigrina प्रजाति के ये महाशय जिन्हें गाँव में गोपाल मेढक भी कहते है चैतन्य हो गए और फूट निकले .बेटे कौस्तुभ और बेटी प्रियेषा साँप को पहले ही एक सुरक्षित स्थान पर ले जाने में सफल हो चुके थे ।
जाऊं तो जाऊं किधर जाऊँ ?

पानी के साँप को जौनपुर में पंडोल या देडहा भी कहते हैं अन्य अंचलों में इसका स्थानीय नाम दूसरा होगा .यह मछली और मेढक ख़ास तौर से पसंद करताहै -प्रायः तालाबों के निकट और धान के खेतों में दिखता है .ये दिन रात सक्रिय रहते हैं .ये वैसे तो गुस्सैल स्वभाव के होते हैं और छेड़े जाने पर किचकिचा के काट सकते है मगर 'सलीके '
से पेश आने पर पालतू भी हो सकते हैं .ये बिल्कुल ही विषहीन होते हैं -सौंप के खाल के व्यापारियों के साफ्ट टार्गेट हैं -तेजी से इनकी संख्या कम हो रही है -इनका पर्यावास भी खतरे में है -तालाब भी तेजीसे पट रहे हैं ।
इसके मुंह की पेशियाँ इतनी लचीली होती हैं कि ये काफी बड़े आकार के मेढक ,मछली और परिंदों को समूचा जिंदा निगल सकते हैं । जान बची तो लाखो पाये




इस पूरे प्रकरण का वीडियो मैं किसी न्यूज़ चैनेल को बेचने की फिराक में हूँ ताकि एक बाबा के झूठ मूठ संजीवनी के प्रलाप कीबजाय किसी सौ फीसदी सच्ची ख़बर को मीडिया में उछाला जा सके .है कोई बोली लगाने वाला ?
पुनश्च -आपको साँप को करीब से देखने के लिए फोटो को एनलार्ज कर देखना होगा !
और ये रहा वीडियो ! बड़ा मजेदार है जरूर देखिये !!

Friday, 3 October 2008

पुरूष पर्यवेक्षण : दाढी का सफाचट होना !

बस यही एक ही दाढी मुझे पसंद आयी
आईये तनिक विचार कर ही लें कि दुनिया के असंख्य लोग क्यों सुबह सुबह हजामत करने करवाने को अमादा हो जाते हैं ? उत्तर बड़ा सीधा सा है ( शायद आप सोच भी लिए हों ) .दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ती भीड़ भाड़ वाली इस दुनिया में दबंग और आक्रामक दीखते रहना अब बड़ा रिस्की हो गया है .कब कहाँ बात का बतडंग हो जाए कौन जानता है -दाढी दबंगता,दबंगई की द्योतक है -कम से कम यह हमारे अवचेतन में पुरूष पुरातन की छवि ला देती है .अब की दुनिया में यह छवि खतरे से खाली नहीं !तो दाढी से पिंड छुडाने का मतलब हुआ ऐसी ईमेज को प्रेजेंट करना जो प्रेम की वांछना रखती है न कि संघर्ष की ! जो सहयोग चाहती है न कि प्रतिस्पर्धा !!
दाढी विहीन चेहरा अपने सहकर्मियों को आश्वस्त करता है कि ," भाई ! मैं तो दोस्ती का तलबगार हूँ और तुमसे भी दोस्ती का वायदा चाहता हूँ .चलो हम पारंपरिक प्रतिस्पर्धा को दरकिनार कर मिल जुल कर रहें और जीवन को धन्य करें " इसी लिहाज से शेविंग दुनिया भर में एक गैर दबंगता का व्यवहार प्रदर्शन (अपीज्मेंट बिहैवियर ) बन गया .इसके कई और फायदे भी हैं .चूंकि बच्चों की दाढी नहीं होती इसलिए बिना दाढी वाला चेहरा बच्चों की सी मासूनियत की ही प्रतीति कराता है .बिना दाढी कासाफ़ सुथरा चेहरा भावों का खुला प्रदर्शन करता है -दूसरों से पूरा संवाद करता है .यहाँ चोर की दाढी में तिनका की खोज किसी दूसरे अंग के हाव भाव से नही की जाती -चहरे का हर हाव भाव प्रगट होता चलता है -इसलिए बिना दाढी का चेहरा आमंत्रित करता है .दाढी से ढंका छुपा चेहरा दोस्ताना नहीं लगता.
शेविंग किसी भी पुरूष के चहरे को बाल सुलभ सरलता और साफ़सुथरा , स्वच्छ परिक्षेत्र प्रदान कर देती है -रोजमर्रा के दुनियावी कामों के लिए फिट बना देती है .मगर दाढी विहीन चेहरा लोगों को थोडा स्त्रीवत भी तो बना देता है -और बिना दाढी वाले अक्सर इसीलिये दाढीवालों से कटूक्तियां /फब्तियां सुनते रहते हैं बिचारे !तो एक विश्वप्रसिद्ध समझौता हो गया -मूंछ का अवतरण ! दाढी तो सफाचट हुयी पर मर्दानगी की निशानी अभी भी बरकरार है -मूंछों पर ताव बरकरार है -हिटलर से लेकर चार्ली चैपलिन की मूंछों और उसके आगे तक भी मूंछों कीकहानी पुरूष की एक बेबसी भरी मर्दानगी की ही चुगली करती रही है .चहरे की दबंगता तो दाढी के सफाचट होते ही गयी पर पौरुष की एक क्षीण रेखा अभी भी तमाम चेहरों पर विराजमान है -मिलट्री ( मैन )की मूंछों की साज सवार और उनके घड़ी की सुईओं के मानिंद हमेशा ११ बजाते रहना एक आक्रामक अतीत का ही ध्वंसावशेष है ! वे यह ताकीद भी करती हैं कि भई मिलो तो मगर लेकिन इज्ज़त से पेश आओ !
ढाढी प्रकरण सामाप्त हुआ !

Thursday, 2 October 2008

पुरूष पर्यवेक्षण -दाढी महात्म्य जारी .........

पुराने जमाने में दाढी शक्ति ,सामर्थ्य और मर्दानगी की निशानी समझी जाती थी .जिसकी दाढी मूछ किसी भी कारण से मुड़वा उठती थी उसे काफी शर्मिन्दगी उठानी पड़ती थी .उस समय गुलामों ,दुश्मनों और बंदियों की दाढी मूछ मुड़वाने का चलन था .यह उनके लिए किसी अपमान से कम नही था .दाढी पर लोग सौगंध तक खा जाते थे और पब्लिक इस सौगंध पर भरोसा भी रखती थी .यहाँ तक की कई देवताओं तक को दाढी वाला माना जाता था .अपने आदि देव शंकर महराज ही लंबे जटा जूट वाले दिखाए जाते थे .प्राचीन मिस्र के धार्मिक अनुष्ठानों पर धर्मदूतों की लम्बी दाढी लोगों को आकर्षित करती थी .यह उनकी कुलीनता और बुद्धि के स्तर का प्रतीक थी ।
दाढी महात्म्य के चलते ही कई पुरानी सभ्यताओं -पर्सियन ,सुमेरियन ,असीरिया तथा बेबीलोन के शासक अपने दाढियों के साज सवार में काफी समय जाया करते थे .दाढी पर तरह तरह के रंग रोशन ,इत्र ,तेल फुलेल लगाए जाते थे .कहीं कहीं तो दाढी पर स्वर्ण कणों की फुहार भी होती थी
स्वैच्छिक तौर पर दाढी मूछ मुड़वाने की शुरुआत ईश्वरीय सत्ता के सामने दास्य भाव के प्रदर्शन से हुई लगती है .फिर प्राचीन ग्रीस और रोम की सेनाओं में दाढी को सफाचट रखने का फरमान जारी हुआ जिससे दुश्मनों से आमने सामने के टक्कर में कहीं सैनिक अपनी दाढी को नुचने से बचाने के ऊहापोह में मात न खा जायं .कहते हैं कि सिकन्दर महान ने अपनी सेना के लिए यह स्थायी आदेश दे दिया था कि कोई भी सैनिक दाढी मूंछ नहीं रखेगा .जिससे उसके सैनिक बेखौफ लड़ सकें .सेनापति को युद्ध के मैदान में इसतरह अपने युद्ध रत सैनिकों के पहचान में सुभीता हो गया .
इसतरह दो तरह के रिवाज शुरू गए -एक दाढीवाला दूसरा बिना दाढीवाला ! अब अपने अपने रोल माडल या मुखिया की तरह दाढी रखने या दाढी सफाचट रखने का फैशन शुरू हो गया .एक फ़्रांसीसी राजा ने अपने ठुड्डी के घाव को छुपाने के लिए दाढी उगा ली -फिर क्या था उसके अनेक अनुयायी भी ठीक उसी तरह दाढी रखने लगे -शायद फ्रेंच कट दाढी इसी के चलते फैशन में आयी .मगर इन ख़ास वर्गों के अलग लोग बाग़ दाढी रखने से परहेज करने लगे .मगर एलिजाबेथ के काल का एक समय ऐसा भी था कि दाढी रखने वालों पर टैक्स लगाया जाने लगा -जिसके चलते दाढी जहाँ आम आदमी के चेहरे से विलोपित होती गयी वही धनाढ्य वर्ग की पहचान भी बनती गयी जो टैक्स चुका कर भी दाढी रख रहे थे .भारत में भी ढोंगी संन्यासी भगवान् के नाम पर अपनी दाढी मूछ मुड़वाने लगे -मूछ मुडाई भये संन्यासी !
अभी कुछ और भी है .......

Tuesday, 30 September 2008

पुरूष पर्यवेक्षण :दास्ताने दाढी है जारी ......

दाढी छुपा सकती है मुहांसों से भरे चहरे को !चित्र सौजन्य -howstuffworks
ज्यादातर व्यवहार विद मानते हैं कि दाढी दरअसल पौरुष भरे यौवन की पहचान है -एक लैंगिक विभेदक है बस ! पौरुष का यह प्रतीक मात्र दिखने में ही भव्य नहीं बल्कि यह अपने रोम उदगमों में अनेक गंध -ग्रंथियों को भी पनाह दिए हुए है .मतलब यह चहरे के कई पौरुष स्रावों के लिए माकूल परिवेश बनाए रखती है .किशोरावस्था के आरम्भ से ही चहरे की गंध (सेंट ) ग्रंथिया भी सक्रिय हो उठती हैं -नतीजतन चहरे पर खील-मुहांसों की बाढ़ आ जाती है !जिस किशोर का भी चेहरा अतिशय मुहांसों से भरा हो तो वह बला का की काम सक्रियता( सेक्सिएस्ट ) वाला हो सकता है -कुदरत का यह कैसा क्रूर परिहास है!
दाढी से भरा पूरा चेहरा वास्तव में एक दबंग /आक्रामक पुरूष की छवि को ही उभारता है .वैज्ञानिकों ने सूक्ष्म निरीक्षणों में पाया है कि कोई भी पुरूष जब आक्रामक भाव भंगिमा अपनाता है है तो वह अपनी ठुड्डी को थोडा ऊपर उठा देता है और दब्बूपने में ठुड्डी स्वतः गले की ओर खिंच सी आती है .अब चूँकि पुरूषकी ठुड्डी और जबडा किसी भी नारी की तुलना में अमूमन भारी भरकम होता है -दाढी इसी दबंगता को उभारने की भूमिका निभाती है .हमारा अवचेतन दाढी को इसी आदिकालीन जैवीय लैंगिक सिग्नल के रूप में ही देखता है ।
तो तय हुआ कि दाढी पुरूष को पौरुष प्रदान करती है -पर तब एक प्रश्न सहज ही उठता है कि फिर रोज रोज यह दाढी सफाचट करने की 'दैनिक त्रासदी' का रहस्य क्या है आख़िर ?यह प्रथा कब क्यों और कैसे शुरू हो गयी और वैश्विक रूप ले बैठी ! यह कुछ अटपटा सा नहीं लगता कि पुरूष अपने ही हाथों अपने पौरुष को तिलांजलि दे देता है और वह भी प्रायः हर रोज !
आख़िर क्या हुआ कि दुनिया की अनेक संस्कृतियों के युवाओं ने इस लैंगिक निशाँ से दरकिनार होने को ठान ली ?किसी भी से पूँछिये दाढी बनाना सचमुच एक रोज रोज के झंझट भरे काम से कम नहीं नही है -हाँ नए नए शौकिया मूछ दाढी मुंडों की बात दीगर है वहां तो कुछ गोलमाल ही रहता है -रेज़र कंपनियां ,आफ्टर शेव और क्रीम लोशन उद्योग तो बस उनके इसी टशन की बदौलत ही अरबों का वारा न्यारा कर रही हैं ! डॉ दिनेशराय द्विवेदी और मेरे जैसे वयस्कों के लिए तो रोज रोज की समय की यह बर्बादी अखरने वाली ही होती है .
एक साठ साला आदमी जिसने १८ वर्ष की उम्र से ही यह दैनिक क्षौर कर्म शुरू कर दिया हो और कम से कम १० मिनट रोज अपना समय इसके लिए जाया करता रहा हो तो समझिये वह कम से कम २५५५ घंटे यानी पूरे १०६ दिन सटासट -सफाचट में ही जाया कर चुका है .तो आख़िर इतनी मशक्कत किस लिए ?? जानेंगे अगले अंक में !

Sunday, 28 September 2008

पुरूष पर्यवेक्षण : बात गालों की ,बात दाढी की !


पुरूष पर्यवेक्षण : डाढी और बिना दाढी का फ़र्क
नारी की ही भांति पुरूष के भी नरम ,मुलायम चिकने चुपड़े गाल उसकी सुन्दरता ,मासूमियत और सुशीलता के द्योतक रहे हैं .खासकर ये बच्चों के ही उभरे और क्यूट से गालों की ही प्रतीति कराते चलते हैं जिनसे मन में एक तरह का वात्सल्य भाव उमड़ता है .गाल भी मनुष्य की देह का एक कोमल हिस्सा है. मार्क ट्वैन ने एक बार फरमाया था की मनुष्य ही एकमात्र अकेला प्राणी है जिसके गालों पर लज्जा की लाली आती है .व्यवहार विदों की माने तो गालो पर लज्जा की लाली ही नहीं बल्कि क्रोध की तमतमाहट भी साफ़ देखी जा सकती है .मनुष्य के गाल उसकी बदलती भाव भंगिमा की कलई खोलते हैं .जैसे चेहरा सफ़ेद पड़ना किसी के सहसा भयग्रस्त होने की पुष्टि करता है -आदि आदि ।
पर एक पौरुष आवरण ऐसा है जो नर के गालों को नारी से बिल्कुल एक अलग पहचान देता है .
जी हाँ ,गालों और दाढी का आपसी गहरा रिश्ता है -गालों के विस्तीर्ण उपजाऊ मैदान पर ही दाढी की फसल लहलहाती है .यह दाढी ही पुरूष को नारी से अलग एक जबरदस्त प्रत्यक्ष लैंगिक पहचान देती है .किसी औसत आदमी की दाढी दो वर्षों में करीब १ फुट लम्बी हो जाती है .५-६ वर्षों में तो यह काफी भरी पूरी और नीचे तक लटकने वाली हो जाती है .किसी भी दीगर नर वानर कुल के सदस्य की दाढी इतनी भव्यता लिए नही होती .किशोरावस्था का आगमन हुआ नहीं कि पहली मूंछ रेख दिखाई दे जाती है .यह नर हारमोनों की सक्रियता के चलते होता है .वैसे तो एक क्षीड़ सी रोएँ वाली रेखा(peach -fuzz) तो नवयौवना नारियों में भी दूर से तो नही ,काफी करीब जाने पर दिखती है पर , औसत नारी चहरे पर बालों का प्रदर्शन बस इसके आगे रूक जाता है .मगर इसके ठीक उलट किशोरों में यह रोयेंदार मूछ बालों की एक बड़ी फसल का आहट दे देती है .धीरे धीरे यह बाल ,किशोरों के गाल ,ठुड्डी ,पूरे जबड़ों और गले के ऊपरी हिस्सों को भी अपने घेरे में ले लेते हैं .बालों की इस फसल की रोजमर्रा की वृद्धि करीब एक इंच के ६० वें हिस्से के बराबर होती है .मतलब यह कि यदि इनसे कोई छेड़ छाड़ न करे तो ये बाल इसके गर्वीले स्वामी को १ फ़ुट लम्बी लाबी दाढे का तोहफा दो वर्षों में दे डालेंगे .
दाढी का जैवीय महात्म्य क्या है ? पहले तो कुछ जानकारों ने कहा कि यह एक कुदरती स्कार्फ है जो नाजुक गले को शीत गरम से बचाता है .जब हमारे आदि पूरवज गुफाओं से बाहर निकल प्रकृति की शीत और ऊष्मा को झेलते थे यह दाढी ही उनकी रक्षा करती थी -इसलिए ही पुरूषों की दाढी है और इसके विपरीत बाह्य वातावरण के आतप से सुरक्षित गुफा जीवन में रहने वाली नारियों में इसकी कोई जरूरत ही नहीं रही इसलिए कुदरत ने इन्हे इस सौगात से मुक्त रखा !मगर इस दावे को दूसरे जैवविदों और व्यवहार शास्त्रियों का समर्थन नही मिला -उनका प्रतिवाद था यदि कुदरत को गले को शीत गर्मीं से बचाने की इतनी ही फिक्र थी तो वह कोई और कारगर तथा स्थायी तरीका अपनाती -कोई स्थायी चर्म आवरण जैसा कुछ ! साथ ही उन्होंने एस्किमों जातियों का उदाहरण भी दिया जिनमें दाढी के बाल बहुत छोटे होते है जबकि उनका पाला एक अति आक्रामक वातावरण पड़ता है -तो फिर प्रकृति ने मनु पुत्रों को दाढी की सौगात क्यों बख्शी ?
जानेंगे अगले अंक में !

Saturday, 27 September 2008

प्रलय की एक नई सुगबुगाहट .......!

कही ऐसा ही तो कोई क्षुद्र ग्रह नहीं टपकेगा धरती पर ?
मीडिया की बलिहारी ,प्रलय (जो नही आई ) के एक खौफनाक सदमें से हम अभी अभी गुजरे हैं.पर अब प्रलय की जो नई सुगबुगाहट सुनाई दे रही है उसमें तो दम ख़म है .अब जो चेतावनी है वह किसी आसमानी जलजले की संभावनाओं की आहट दे रही है -बकौल खगोल विदों के धरती पर प्रलय अन्तरिक्ष से यहाँ आ टपकने वाले किसी क्षुद्र ग्रहिका या अचानक नमूदार हो जाने वाले धूमकेतु से हो सकती है .तो क्या दबे पाँव सकती है प्रलय ?
अन्तरिक्ष अन्वेषियों के एक संगठन ने संयुक्त राष्ट्र में इस मामले को उठाने की सोची है .वैसे संयुक्त राष्ट्र ने अन्तरिक्ष में धरती के करीब के घुमंतू पिंडों पर कड़ी नजर रखने के लिए बाकायदा एक कमेटी बना रखी है जिसकी बैठक अगले वर्ष विएना में होनी तय है .खगोलविद इसी कमेटी में ही आसमानी जलजले की ओर पुरजोर तरीके से सम्बन्धित लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहते है ।
अगर अचानक कोई पथभ्रष्ट घुमंतू पिंड धरती की ओर लपक पड़े तो क्या होगा ?हम कैसे उसकी टकराहट को रोक पायेंगे ?हमें इसकी काफी तैयारियां समय से कर लेनी होगी .मगर कैसी तैयारियां ? हमें सारी धरती पर कई जगहों पर बहुत शक्तिशाली दूरदर्शियों को स्थापित करना होगा और धरती के सन्निकट के अन्तरिक्ष में हर वक्त नजर गडाए रखनी होगी .ऐसे दूरदर्शी अगले १५ वर्षों में करीब १० लाख घुमंतू पिंडों पर नजर रखेंगे जिन में ८ से १० हजार खतरनाक हो सकते हैं .कुछ खगोल विदों का मनाना है कि एक छोटे से स्टोर नुमा कमरे के बराबर का भी भटका हुआ पिंड धरती पर भारी तबाही मचा सकता है जो तकरीबन ४० हजार हिरोशिमा बमों की बराबरी कर सकता है .और एकाध किलोमीटर का पिंड तो लाखों हिरोशिमा बमों के विध्वंस को मात दे सकता है .जिनसे सारी धरती ही तबाह हो जायेगी .यदि ऐसा कुछ ज़रा भी संभावित हुआ तो यह वैश्विक आपातकाल का मंजर बनेगा .क्या उन्हें समय रहते हम अन्तरिक्ष में ही किसी तकनीक से विनष्ट कर सकेंगे ? या उनके पथ में ज़रा सा भी बदलाव कर आसन्न बला को धरती से टाल सकेंगे ?ऐसे खतरे से कोई पूजा पाठ तो हमें बचा नहीं सकेगा ,केवल वैज्ञानिक -तकनीक ही हमारा तारणहार बनेगी !इसलिए आज ही से ऐसी तैयारियों के लिए प्रबल जनमत को तैयार करना और राजनीतिक पहल की जरूरत है ।
यह पूरी ख़बर मशहूरअमरीकन वैज्ञानिक पत्रिका में सुर्खियों में है -यहाँ देखें .