Saturday, 25 February 2012

फेसबुक दोस्ती पर शोधकर्ताओं की नज़र

दोस्त बनने ,दोस्ती होने जैसी मनुष्य की सामाजिक वृत्ति पर एक रोचक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने सोशल साईट फेसबुक की मदद ली है .क्या निजी रुचियाँ भी नए नए दोस्त बनने बनाने में मददगार होती हैं? बेशक . मगर यह इस पर निर्भर करता है कि आपकी अभिरुचि /हाबी क्या है? अगर आपकी संगीत में रूचि है तो संगीत  पसंद करने वाले दोस्त सहजता और जल्दी से आपकी ओर खिंचेगे जबकि अगर आप किताब पढ़ने के शौक़ीन हैं तो पुस्तक पढ़ाकू लोगों पर इसका असर नहीं होता -मतलब अपनी इस हाबी से आप फेसबुक पर भी लोगों को आकर्षित नहीं कर सकते....मतलब किताब पढ़ने का शगल आपको अंतर्जाल पर अकेला रखता  है ....

इन अध्ययनों को हाल ही में प्रोसीडिंग्स आफ नेशनल अकैडमी आफ सायिन्सेज में जगह मिली है .हार्वर्ड विश्वविद्यालय के तीन शोधार्थी -केविन लेविस,मार्को गोंजालेज और जेसन कौफमन ने  अपना अध्ययन फेसबुक पर मित्रों के आपसी अंतर्सबंधों पर केन्द्रित किया .यह अध्ययन इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि हम कैसे अपने मित्रों का चयन करते हैं और मित्रता कैसे अभिरुचियों और विचारों के के व्यापक संचार में भूमिका निभाती है ...कई वर्षों तक चलने वाला यह अध्ययन अंतर्जाल पर हमारे सामाजिक चयन के व्यवहार और समवयी सम्बन्धों को भी विश्लेषित करता है .

मानव जीवन में आपसी सम्बन्ध सामाजिक संरचना के  मूलभूत  आधार हैं .अतएव कौन किसे पसंद करता है यह अध्ययन  हमें मानवीय व्यवहार के कई पहलुओं जैसे सामजिक विलगाव ,असमानताओं ,सहमतियाँ -असहमतियां ,आपसी सहयोग ,अवसरों/.कैरियर  की उपलब्धता आदि पर एक स्पष्ट दिशानिर्देश  दे सकता है .मगर क्या अंतर्जाल पर विभिन्न संस्कृतियों ,देश काल परिस्थितियों,अभिरुचियों या पुस्तकों, सिनेमा  आदि की अलग अलग पसंद वाले लोगों पर ऐसा अध्ययन सचमुच कोई निर्णायक परिणाम दे सकेगा? विद्वानों में मतभेद भी है . फेसबुक पर प्रायः  लोग अपनी अभिरुचियों ,पसंदगी को हायिलायिट करते रहते हैं -ऐसे में क्या नए लोग उनकी पसंद के मुरीद हो जाते हैं या फिर समय के साथ उनके साथ ढल जाते हैं -इस अध्ययन में इन बिन्दुओं को भी लिया गया था . 

यह अध्ययन मुख्यतः  कालेज छात्रों पर किया गया और यह पाया गया कि समान संगीत और फिल्म  की अभिरुचि वास्तव में ज्यादा लोगों को आपस में जोड़ती है बनिस्बत पुस्तक प्रेमियों के ....यह नहीं होता कि मित्र बनने के बाद आप या आपके मित्र की आपस की रुचियाँ भी समान हो जायं -यह भले ही हो कि पहले की समान अभिरुचियाँ मित्रता की सोपान बनें .इस नए अध्ययन ने मानव व्यवहार के अब तक कई अस्पर्शित पहलुओं को उजागर किया है .

6 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

सही दिशा में ,अच्छी जानकारी.

संतोष त्रिवेदी said...

समान रूचि और वह भी साहित्यिक,हम तो फेसबुक,ट्विटर और ब्लॉगिंग तीनों विधाओं में लाभान्वित हुये हैं.
पुस्तकों में रूचि होना और उन्हें पढ़ पाना अब दोनों अलग तरह की रूचियाँ हो गई हैं.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

यह तो होना ही था.

प्रवीण पाण्डेय said...

पुस्तक पढ़ने वालों को तो विदा लेना पड़ जायेगा वहाँ से

दर्शन लाल बवेजा said...

अच्छी जानकारी जी

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

रोचक है। कितनी बातों का अनुमान या व्यक्तिगत अनुभव रहा होता है परंतु ऐसे अनुभव उससे कहीं आगे बढकर एक प्रवृत्ति दर्शाते हैं और इस अध्ययन में तो कई अनछुए पहलू भी सामने आये हैं, धन्यवाद!