Sunday, 29 March 2009

पुरूष पर्यवेक्षण -अब टांगों पर टंगी नजरें !

जी हाँ पुरूष पर्यवेक्षण अब अपने अन्तिम पड़ाव तक बस पहुँचने वाला ही है -इसी क्रम में लम्बी टांगों पर नजर है कि बस टंग गयी ! मनुष्य की टांगें उसकी लम्बाई का आधा हिस्सा जो हैं ! जब एक चित्रकार मनुष्य के शरीर का चित्रांकन करता है तो वह अपने सुभीते के लिए उसके चार हिस्से करता है ! तलवे से घुटने तक ,घुटने से कमर तक .कमर से वक्ष तक और अंततः वक्ष से सिर तक ! हाँ बच्चों में टाँगें छोटी रहती हैं ! समूचे नर वानर कुल में मनुष्य की टांगें ही शरीर की तुलना में सबसे बड़ी हैं ! टांगों के ऊपर भागों में मनुष्य के शरीर की सबसे बड़ी और मजबूत हड्डी फीमर होती है !

अपनी टांगों की ही बदौलत आदमी दो ढाई मीटर तक की ऊंची कूद सहज ही लगा लेता है और ८ से ९ मीटर की लम्बी छलांग भी ! तभी तो अपनी इसी क्षमता के आरोपण को अपने इष्ट देव हनुमान में कर देने से भक्तजनों को उनके 'जलधि लांघि गए अचरज नाही ' के रूप का दर्शन हुआ ! यह मजबूत टांगों का ही जलवा है कि २१५ दिनों से भी अधिक अनवरत नाचते रहने के रिकार्ड भी बन गए हैं ! दरअसल यह मजबूत विरासत हमें अपने शिकारी अतीत से ही मिली है जब शिकार को घेर कर पकड़ने की आपाधापी में हमारे पूरवज दिन भर में सैकडों मील का चक्कर लगा लेते थे ! हमारी ऊंची कूद की क्षमता का एक मिथकीय रूप विष्णु के वामन रूप में भी दीखता है जो समूचे ब्रह्माण्ड को ही महज ढाई पगों में नाप लेने को उद्यत और सफल हुए ! और वर्तमान दुनिया के उन पगों को भला कौन भूल सकता है जिसके बारे में कहा गया -चल पड़े जिधर डग मग में चल पड़े कोटि पग उसी ओर ! आज कितने ही राष्ट्र नायकों की पदयात्रा प्रिय राजनीतिक शगल है ! सो ,यदि टाँगें स्थायित्व ,शक्ति .और गरिमा की प्रतीक हैं तो इसमे आश्चर्य नही !
टांगों के जरिये कुछ तीव्र भाव मुद्राए भी प्रगट होती हैं खड़े लेटे और बैठे टांगों के बीच का बढ़ा फासला दृढ़ता , आत्म विश्वास और यौनाकर्षण के भावों का संचार करता है ! रोबदाब वाले लोग अक्सर खडे होने के समय पैरों का फैसला बढ़ा कर रखते हैं ,मगर पैरों को फासले के साथ करके बैठने से एक कम शालीन भाव बल्कि कभी कभी उत्तेजक अंदाज बन जाता है क्योंकि यह निजी अंगों को भले ही वे ढंके छुपे है को प्रगट करता है इसलिए ही आचार विचार की कई किताबे पैरों को फैला कर बैठने लेटने की मनाही करते हैं ! टांगों को क्रास कर बैठना एक अनौपचारिक बेखौफ मुद्रा है !
जारी .....

10 comments:

Science Bloggers Association said...

बहुत बढिया। खैर अल्‍लाह अल्‍लाह करके श्रृंखला अंत के करीब पहुंची। इसके सफल संचालन हेतु हार्दिक बधाई।

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तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

योगेन्द्र मौदगिल said...

Sukhad Shreenkhla taango tak to aani hi thi. Inke bagair bhi kya..?

ताऊ रामपुरिया said...

इस श्रंखला मे आपने टांगों पर एक और रोचक जानकारी दी. बहुत धन्यवाद आपको.

रामराम.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

टांगों की चर्चा बिना ‘टाँग खिंचाई’ के पूरी मत करिएगा। आज-कल ब्लॉगजगत इसी वृत्ति में सर्वाधिक लिप्त है। हाँ, अपनी ही टांग में कुल्हाड़ी मारने जैसे मुहावरों पर भी गौर करना होगा क्योंकि अच्छे भले लोग भी यह गलती कर डालते हैं।

मा पलायनम ! said...

इस तरह की वैज्ञानिक जानकारियों के लिए आपकी लेखनी सदैव सक्रिय रहे .ऐसी जानकारियां एक जगह पढने को नहीं मिल पाती .पर्यवेक्षण के सभीपोस्ट ज्ञानवर्धक रहे .

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर जानकारी दी आप ने.
धन्यवाद

Reema said...

बढिया लेख ! ख़ैर, ढाई मीटर लम्बी छलान्ग मारना "सहज ही" तो नहीं होता - नियमित व्यायाम की ज़रूरत होती है जो लाख बताने के बाद भी सब करते ही नहीं। पर हाँ, फ़ेमुर हड्डी की महत्ता के बारे में जितना कहा जाये, कम है।
मुझे लगता है कि हमारे समाज में जो उठने-बैठने के नियम हैं, उन्हें मनुष्य की शारीरिक बनावट से नहीं जोड़्ना चाहिए - पर ये केवल मेरी व्यक्तिगत सोच है।

बवाल said...

वाह वाह अरविंद जी, आपकी पोस्टें पढ़कर बहुत सी जानकारियाँ वैज्ञानिक अंदाज़ में मिल जाती हैं। आपका बतलाने का ढंग इतना निराला है कि पोस्ट के कंटैण्ट से आधिक आनंद प्रस्तुतिकरण में आता है। बहुत आभार आपका।

G M Rajesh said...

wah ji kya khub tanga tango par ham tange rahe tangon me aur tang khichaai bhi na thi. ab se tange uthaaye ghoomenge aur kisi ne kaha kuchh to usko bhi tange samjha denge ji

योगेन्द्र मौदगिल said...

भाई जी, आप तो टांगो में ही उलझ कर रह गये.. हम प्रतीक्षारत हैं... और हां ये 'ठकुर सुहाती' समझ में नहीं आया.. जरा क्लियर करें.. मेरा ग्यानवर्धन हो जायेगा..