Monday, 23 March 2009

पुरूष पर्यवेक्षण विशेषांक -4

बात पुरूष विशेषांग की चल रही थी .....यह कैसी बिडम्बना है कि मनुष्य को अप्रतिम सुखानुभूति कराने वाले इस अंग विशेष को कौन कहे प्यार पुचकार और लाड प्यार से सहेज सवांर के रखने की इस पर तो जोर जुल्म का जो दौर दौरा है वह हैरतअंगेज है ! बड़ी दर्द भरी दास्ताँ है इसकी ! सुनिए मन लगाय !

एक प्रथा है खतने या सुन्नत करने की जिसमें शिश्नाग्रच्छद ( फोरस्किन ) को बचपन में ही बेरहमी से काट कर अलग कर दिया जाता है ! और खतने की यह नृशंसता पुरूष ही नही नारी के खाते में भी प्रचलन में है ! यह विचित्र प्रथा सभ्यता के शायद उदगम से ही मनुष्य का अभिशाप बनी हुयी है ! जो बस महज अंधविश्वासों के चलते परवान चढ़ती गयी है -चाहे धर्म की आड़ लेकर या सांस्कृतिक रीति रिवाजों की दुहाई देकर ! हमारे कुछ आदि कल्पनाशील पुरुषों को लगा रहा होगा की जैसे सांप केचुली बदल कर मानों एक नया अवतार ही ले लेता है तो अगर मनुष्य के इस सर्पांग (शिश्न ) की केंचुली (फोरस्किन !) भी काट डाली जाय तो उसका अगला जन्म शर्तियाँ बेहतर हो जायेगा ! चमचमाते सांप सा ही ! तो फिर ट्राई करने में क्या जाता है ? और तभी से शुरू हो गयी यह बर्बर व्यवस्था !

और पीढियां दर पीढियां इसे अपनाती गयीं और कालांतर में यह एक सामुदायिक पहचान का प्रतीक बन बैठा !अब इस का निवारण और मुश्किल बन उठा ! प्राचीन मिस्र में ४००० ईशा वर्ष पूर्व से ही इस रिवाज के प्रमाण हैं ! ओल्ड टेस्टामेंट में अब्राहम ने इस प्रथा के पक्ष में आज्ञा जारी की !यहूदी और अरबी लोगों में यह परम्परा बदस्तूर चल निकली ! मोहम्मद के बारे में यह कहा जाता है की वे पैदा ही बिना फोरस्किन के हुए थे (एक ऐसी स्थिति जो मेडिकल दुनिया में अनजानी नही है ) ! फिर तो उनके पुरूष अनुयायियों में यह एक रिवाज ही बन गया !

हैरानी की बात तो यह है कि आगे चलकर यह "सामुदायिक बोध" इस बर्बर कृत्य के औचित्य को सिद्ध करने पर तुल गया -वैज्ञानिक और मेडिकल आधारों पर इसके एक लाभप्रद और स्वास्थ्य हितकारी पद्धति होने के तर्क गढे जाने लगे ! नीम हकीमों ने यह कहा की इस चमड़ी के रहते मनुष्य रति केंद्रित हो जाता है और कुछ ने तो ऐसी बीमारियों की लम्बी फेहरिस्त पेश की जिसमें इस चमड़ी के बने रहने से हिस्टीरिया ,मिर्गी ,रात्रि स्खलन और नर्वस बने रहने आदि के भयावह रोग शामिल कर दिए गए थे ! अब इस बैंड पार्टी में आधुनिक चिकित्सक भी निहित स्वार्थों के चलते शामिल हो गये ! और मिथ और मेडिकल की एक नयी जुगलबंदी शुरू हो गयी ! हद तो तब हुयी जब दुनिया की जानी मानी चिकित्सा पत्रिका -लैंसेट ने १९३२ में यह रिपोर्ट छापी की फोरस्किन के बने रहने से कैंसर तक हो सकता है (आप ने कभी शिश्न कैंसर के बारे में सुना भी है ?) कहा कि इस चमड़ी के अन्दर दबी रहने रहने वाली गन्दगी से पुरूष ही नही जिस नारी से वह संसर्ग करता है उसे भी कैंसर ही सकता है ! इस रिपोर्ट की छीछालेदरशुरू हुयी तो यह कहा गया कि इससे प्रोस्ट्रेट कैंसर होता है ! मतलब शिश्न से जुडी एक अंदरूनी ग्रन्थि में ! इस रिपोर्ट का नतीजा भयावह रहा -१९३० के दशक में ७५% अमेरिकियों ने खतना करा लिया ! और यह प्रतिशत बढ़ता ही गया ! १९७३ में ८४ % ,१९७६ में ८७ % और यह ट्रेंड भी भी बना हुआ है ।

कई शोधों में यह साबित हो गया है कि यह एक मिथ ही है और फोरस्किन से कोई भी समस्या नही होती .बल्कि यह अतिसंवेदनशीलता से बचाते हुए रति रति सुख की अवधि को लंबा करता है ! बच्चों में कुछ साल तक यह अवश्य ठीक से नही खुलता -कुछ बच्चों में इसका मुंह ज्यादा ही सकरा होता है और माँ बाप परेशान हो उठते हैं मगर बड़ा होने के साथ ही यह समस्या अपवादों को छोड़कर समाप्त हो जाती है !लैंसेट के लेख में आंकडों की कमियाँ पाई गयी थी -दरअसल लोग अपने एक पूर्वाग्रह और जातीय पहचान बनाये रखने की खातिर इस पूरी प्रथा को आज भी वैज्ञानिकता का जामा पहनाने में लगे हैं !जबकि इसका बच्चों के कोमल मन पर क्या प्रभाव पड़ता है और उनकी सायकोलोजी किस तरह प्रभावित होती है इस पर जो अध्ययन हो भी रहे हैं उन्हें दर किनार कर दिया जा रहा है !

अमेरिका में तो मेडिकल ( ग्राउंड ) खतना बदस्तूर जारी रहा है जबकि हाल में इसमें गिरावट भी दर्ज हुयी है ! मगर ब्रिटेन में यह अब काफी कम हो गया है १९७२ में जब इसका प्रतिशत अमेरिका में ८० था ब्रिटेन में महज ०.४१ रहा -वहां नेशनल हेल्थ स्कीम ने खतने की मनाही कर दीथी ! अमेरिका में खतने को लेकर करोडो डालर का इंश्योरेंस व्यवसाय फल फूल रहा है और वहां इस प्रथा का एक व्यावसायिक पहलू भी स्थापित हो चला है !

(पुरूष पर्यवेक्षण विशेषांक समाप्त ! )

9 comments:

P.N. Subramanian said...

अरे भैय्या हमें यह नहीं मालूम था कि बेवकूफ बनाया जा रहा है. साइंटिफिक रीसोनिंग देकर. आभार आपका. पुरूष पर्यवेक्षण विशेषांक कि समाप्ति के लिए बधाई भी आभार भी.

Science Bloggers Association said...

मैंने तो यहाँ तक सुना है कि कुछ जगहों पर लडकियों का भी खतना किया जाता है।

ताऊ रामपुरिया said...

अब इस बैंड पार्टी में आधुनिक चिकित्सक भी निहित स्वार्थों के चलते शामिल हो गये !

आपने बहुत ही ऐतिहासिक और एक मेडिकल विषय की जानकारी दी. वाकई अद्भुत जानकारी है. वैसे डाक्टर्स और दवा कंपनियां कोई भी मौका छोडती नही हैं. फ़िर उनको धार्मिक आश्रय मिल जाये तो सोने पर सुहागा.

पर श्रंखला इतनी जल्दी समाप्त कैसे कर दी जी.

रामराम..

ज्ञानदत्त पाण्डेय | G.D.Pandey said...

अगर ईश्वर/या खुदा को यह फोरस्किन मान्य न था तो मानव शरीर में वे इसे बाइ-डिजाइन क्यूं न खत्म कर दिये!

अभिषेक ओझा said...

शायद आपको पता हो की कुछ जगहों पर ये महिला विशेषांग के साथ भी किया जाता है. एक डॉक्युमेंट्री में इसका जिक्र आया था.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आलेख के लिए धन्यवाद। लेकिन इसे पढ़ते हुए लगा जैसे मैं इसे दुबारा पढ़ रहा हूँ। हो सकता है कि यह इस आलेख के तथ्यों की पहले से जानकारी के कारण हो।

राज भाटिय़ा said...

इस बारे हमारे यहां कई बार दिखाया जाता है महिलओ का खतना भी किया जाता है कई अफ़्रिकी देशॊ मै, जो कि बहुत ही खतरनाक होता है, ओर जिन महिलाओ का खतना होता है वो बेचारी कई कई दिनो तक ही नही महीनो तक परेशान रहती है, ओर कई बीमार भी हो जाती है, यह सब बाते यहां टीवी पर दिखाई जाती है.
आप ने बहुत ही सुंदर लेख लिखा.
धन्यवाद

Ek ziddi dhun said...

हिंदुस्तान में तो यह दंगों के वक्त `शिकार की पहचान के काम आता है

arun prakash said...

khatana ki charcha kar ke aap ne srinkhala ko hi samapti ki ghoshana kar daali mano is par hi purush ki duniya hi samapt ho gayi ya aap aur shodh nahin karana chahate ! aapke shodh parak lekh ko sadhvaad khas kar itne samvedanshil mamle aur ang vishesh ko
lekin bhai log mahilaon ke khatne ke bare me achanak chintit kyon hai yeh samajh me nahin aata