Sunday, 12 October 2008

पुरूष पर्यवेक्षण -और अब दंत छवि का अवलोकन !

वरदंत की पंगति कुंद कली .........छवि मोतिन माल अमोलन की .कवि की इस अभिव्यक्ति को समझने लिए आपमें सौदर्य बोध के साथ ही प्रकृति -निरीक्षण का भी खासा अनुभव होना चाहिए ,अब अगरआपने कुंद पुष्प की कलियों को नहीं देखा है तो इसका अर्थ समझने से रहे .खैर मोतियों की माला तो बहुतों ने देखी है ,यहाँ उनसे दांतों की पंक्ति बद्ध शोभा की तुलना हुई है .सचमुच सुंदर पंक्तिबद्ध दांत मुंह की शोभा में चार चाँद लगाते हैं -कास्मेटिक सर्जरी के जरिये अब दांतों को और भी सुंदर और प्रेजेंटेबल बनया जा रहा है .सुंदर स्वच्छ दातों को उदघाटित करता मुक्त हास भला किसे अपनी ओर आकर्षित नहीं करता -नर नारी में यह बात समान है .दांतों में आभूषण जड्वाने के भी परम्परा विश्व की अनेक संस्कृतियों में रही है .भारत में लोगबाग दांतों पर सोने की परत चढ़वाते आए हैं .यह उनके सामाजिक स्तर और समृद्धि का परिचायक भी है -ऐसे शौकीन लोग प्रायः दिख जाते हैं । शायद कोई ब्लॉगर भाई भी स्वर्णमंडित दंत लिए हों ! महाभारत का वह मार्मिक प्रसंग तो याद है ना आपको जब दानी कर्ण ने अपने स्वर्णमंडित दांत ही सूर्य को अर्पित कर दिए थे ।
अब दांतों से जुडी थोड़ी अंदरूनी बात हो जाय .हमारे वानर कपि बन्धुबांधवों की ही भाति मनुष्य का मुंह मूलतः खाद्य सामग्रियों की जांच पड़ताल और चबाने के उद्द्येश्य से बना है जिसमें दांतों की मुख्य भूमिका है .किसी बच्चे को देखिये वह हर चीज मुंह में डाल डाल कर माँ बाप को तंग किए रहता है .मगर उम्र बढ़ने के साथ ही अन्य पशुओं की तुलना में यह खाद्य जांच पड़ताल हाथों के जिम्मे हो जाती है ।यहाँ तक किमनुष्य में दांतों से किसी को काट खाने की जरूरत भी कम होने लगती है -मार पीट का जिम्मा भी हाथ ही संभालते है -अपवाद के तौर पर कटखने आदमी भी दीखते हैं मगर यह आत्मरक्षा का अन्तिम विकल्प ही है -जब हाथ लाचार हो जायं .बच्चे अक्सर काट लेते हैं .जैसे कि बड़े बन्दर तो दातों से अक्सर कटखना प्रहार करते हैं - मगर वयस्क मनुष्य में दांतों से रक्षा का यह काम हांथों द्वारा संभाल लिए जाने से उसके दांत दीगर जानवरों की तुलना में छोटे होते गए हैं .उसके हिंस्र कैनायिन दांत तो बहुत ही छोटे हैं .अब दांत खाना चबाने की ही सीमित भूमिका में रह गए हैं .या फिर जाडें में ठण्ड से कटकटानें या असह्य दर्द में भिंच जाने या फिर सोते समय किसी दमित क्रोध के प्रगटीकरण के लिए कटकटानें के ही काम आते हैं .यह हमारे उस कपि अतीत का ही एक अभिव्यक्ति शेष है जब हारता बनमानुष दातों के इस्तेमाल पर आ उतरता था ,अब जब भी किसी को आप सोते वक्त दांत किटकिटाते देंखे तो जान लें कि वह किसी दबंग से टकराहट में हार खाकर स्वप्न में उससे बदला ले रहा है ।
दांत का चमकता इनामेल मनुष्य के शरीर का कठोरतम हिस्सा है -मगर ज्यादा सूगर खाने वाले इसे लैक्टिक अम्ल के निर्माण के चलते सडा गला डालते हैं .भारत में तो गनीमत है मगर पशिमी देशों मे ज्यदातर जवान होकर अपनी बत्तीसी का बड़ा हिस्सा गवां चुके होते है -दंत सर्जरी के आभारी ऐसे लोग कृत्रिम दांतों का सेट लगा कर चिर युवा से लगते हैं .हमें दांत के दो सेट -बचपन के दूध के दांत और बाद वाले वयस्क दांत कुदरत से तोहफे में मिले हैं.काश शार्क मछली की तरह हमारे भी ऐसे दांत होते जो गिरने पर हमेशा नया उग आते हैं !

10 comments:

seema gupta said...

काश शार्क मछली की तरह हमारे भी ऐसे दांत होते जो गिरने पर हमेशा नया उग आते हैं !
" wow what a great thought, fir to old age mey bhee koee problem nahee hotee, ya fir ye hotta ke hr waqt hum kehte kee abhee to dudh ke dant hee nahee tute..ha ha ha , apart from this joke, really it is very very informative artical, i always grab some thing new from this blog'

regards

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत बढ़िया जानकारी है यह

mamta said...

विषय और लेख दोनों ही पसंद आए ।

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

दांतों के बारे में वैज्ञानिक ही नहीं साहित्‍यक जानकारी भी मिली। शुक्रिया।

Gyandutt Pandey said...

बहुत सही। दांत और नाखून शायद मानव के सबसे मूल अस्त्र रहे हैं।
और दांतों की उपयोगिता तो कभी कम नहीं होने वाली।
दांत का झड़ना बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक भय है - वयस्क में भी और बच्चे में भी!

Gyandutt Pandey said...

और प्रारम्भ की बाबा तुलसी की पंक्तियां तो बहुत अच्छी लगीं।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

यह मनुष्य ही है जिस की दंत पंक्ति की तुलना किसी और दंत पंक्ति से किया जाना संभव नहीं है।

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत उपयोगी जानकारी दी आपने ! और शार्क मछली के बारे में तो आज ही पता चला ! काश हम भे भी पृक्रति इस तोहफे से नवाजती तो आनंद आ जाता !

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

दाँतों का रूप आकार देखकर किसी व्यक्ति के आचरण और प्रकृति के विषय में कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं क्या?

हाथी के दाँत, और कुत्ते के दाँत से मनुष्य भी कुछ प्रेरणा लेने लगे हैं... :) मेरी इच्छा थी कि आप दाँत काटी रोटी के रिश्तों पर भी कुछ प्रकाश डालते।

बस, यह सब जुमले आपका सुन्दर और रोचक आलेख पढ़ते-पढ़ते दिमाग में यूँ ही चटर-पटर कर रहे थे तो मैने इनको यहाँ अकारण यहाँ चेंप दिया:)

सचमें आपकी मेहनत ने वाकई ग़जब रंग जमाया है। बधाई।

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुन्दर जानकारी, धन्यवाद