Wednesday, 30 July 2008

एक क्रांतिकारी विचार के १५० वर्ष !

डार्विन का खूब उपहास उडाया गया
मैं ज्ञान विज्ञान के प्रति अपने दायित्व से चूक जाउंगा यदि यह जानकारी आप से साझा नही करता।

इसी १ जुलाई को एक उस क्रांतिकारी विचार के १५० वर्ष पूरे हो गए जिसमें चार्ल्स डार्विन और अल्फ्रेड वालेस नामक वैज्ञानिक द्वय के संयुक्त अध्ययन के परिणामों की घोषणा लन्दन में हुयी थी.कुहराम मच गया जब वैज्ञानिक तथ्यों को आधार लेकर यह जाहिर किया गया कि मनुष्य किसी दैवीय सृजन का परिणाम नहीं बल्कि जीव जंतुओं के विकास का ही प्रतिफल है .इससे बाईबिल की मान्यताओं की चूले हिल गयीं जो यह बताते नही अघाता था /है कि किस तरह इश्वर ने संसार का सृजन किया और आदमी की पसली से हौवा निकली .डार्विन -वैलेस के सिद्धांत ने इन विचार धाराओं को अन्तिम धक्का दे दिया ।

बड़ी चिल्ल पों मची -लन्दन की लीनियन सोसायटी ने बहस मुहाबिसे आयोजित किए -इसमे से ही एक में चर्च के बिशप विल्बरफोर्स ने डार्विन के पुरजोर समर्थक और उनके बुलडाग कहे जाने वाले थामस हेनरी हक्सले से पूछा था कि -

'जनाब आप किस तरफ़ से बन्दर के औलाद हैं अपने नाना की तरफ से या बाबा की ओर से .....'

निर्भीक हक्सले ने जो जवाब दिया वह इतिहास की सुर्खियों मे सज गया ।

उन्होंने कहा कि ,विल्बर फोर्स की तरह वाचाल और धूर्त ज्ञानी दम्भियों -नए ज्ञान को जानबूझ कर विवादित बनाए वाले किसी मनुष्य की बजाय वे एक बन्दर का वंशज होना पसंद करेंगे ।

जुलाई माह में ही इस तकरार के १५० वर्ष पूरे हो रहें हैं मगर अफ़सोस कि आज भी समूची दुनिया में सृजन्वाद अपना फन फैला रहा है .वैचारिक क्रान्ति का क्या फायदा हुआ ?

अभी तो इतना ही इस विषय पर साईब्लोग एक सीरीज करेगा जल्दी ही -जो डार्विन के प्रति मेरी श्रद्धांजलि होगी !

11 comments:

Cyril Gupta said...

अरविन्द जी, डार्विन का उपहास तो आज भी उड़ाया जाता है. हम शापित हैं उन हजारों साल पुरानो धर्मों को ढोने के लिये जिनके बढ़ाने वाले खुद बन्दरों से थोड़ी ही ज़्यादा समझ रखते थे.

दिक्कत यह है कि धार्मिक विश्वास का प्रसार करने वाले लोगों में अपनी बकवास के प्रसार के लिये अति-उत्साह है.

दिनेशराय द्विवेदी said...

डार्विन का मुझ पर बहुत उपकार है। बारह की उम्र में जब घर में उपलब्ध धार्मिक ग्रंथ पढ़ चुका था। और वर्तमान दुनियाँ कैसे बदली जाए? इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा था। तब डार्विन और मैंडल ने मुझे राह दिखाई जो मोर्गन को और बाद में एंगेल्स और मार्क्स को पढ़ कर पूरी हुई।
मानव जाति कभी भी डार्विन से उऋण नहीं हो सकती।

जितेन्द़ said...

अच्‍छी जानकारी मि‍ली।शुक्रि‍या।

बाल किशन said...

बस सिर्फ़ स्कूल की किताबों में पढ़ने के बाद हम तो डार्विन को भुला ही चुके थे आपने आज फ़िर याद दिला दिया.
आपकी नै श्रंखला का इंतज़ार है.

vipinkizindagi said...

अच्‍छी जानकारी

Gyandutt Pandey said...

वाह, थामस हेनरी हक्सले वाह!!! क्या जवाब दिया।

उन्मुक्त said...

यह इतिहास का सबसे प्रसिद्ध वाद विवाद माना जाता है। ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़ पर तीन मुकदमे चल चुके हैं जिस में पहला उसके खिलाफ और बाकी उसके पक्ष में। चलिये मैं भी उनके बारे में लिखूंगा।

anitakumar said...

आप की डार्विन की श्रंखला का इंतजार रहेगा

राज भाटिय़ा said...

आज यहां शान्ति हे, शुकर
अरविन्द जी डार्विन के बारे काफ़ी पढा हे, आप के लेख ने एक बार फ़िर याद दिला दिया इन्हे.

Nilam said...

priya arvindji;
aapse me itana hi kahunga ka ki darwin ka vikaaswad purnataya sidhdha nahi hau hai. Darwin ke vicharo me kuch sachchai ho sakti hai kintu we purna stya nahi hai. Yaad rahe ki vigyaan nahi parntu philosophy ne darwin ko jordaar takkar di hai. Kisi bhi sidhdhant ya vichaar ko vigyan hone ke liye ye jaruri hai ki use viparit sakshsho ke dwara miththya sabit kiya ja sake. Prantu samanantar gene tranfer hona paya jane ke baad ye vikaasvaad ke liye sambhav nahi raha. (ye vichar mere nahi jane mane pashchimi darshanik Karl Pauper ke hain). Jivanuo ke baare mai socha jata tha ki veh samuh me nahi parntu akele hi rahte hai aur yogyatam jivit rahata hai, parntu bite dhahak mai yah sabit ho chuka hai ki lagbhag saare jivaanu "quorum sensing(QS)" prakiya mai samuhik rup se bhaag lete hai. QS ke dwara ve apne shikaar par samuhik rup se hamala karte hai(manushya ya anya jivo par), parntu is dauran sirf yogytam hi nahi kamjor jivaanu bhi bach nikalte hai, yadi aisa hai to jivaanuo ka vikaas kaise hua aur ab bhi kyon ho raha hain?

Nilam said...

priya arvindji;
aapse me itana hi kahunga ka ki darwin ka vikaaswad purnataya sidhdha nahi hua hai. Darwin ke vicharo me kuch sachchai ho sakti hai kintu ve purna stya nahi hai. Yaad rahe ki vigyaan nahi parntu philosophy ne darwin ko jordaar takkar di hai. Kisi bhi sidhdhant ya vichaar ko vigyan hone ke liye ye jaruri hai ki use viparit sakshsho ke dwara miththya sabit kiya ja sake. Prantu samanantar gene tranfer hona paya jane ke baad ye vikaasvaad ke liye sambhav nahi raha. (ye vichar mere nahi jane mane pashchimi darshanik Karl Pauper ke hain). Jivanuo ke baare mai socha jata tha ki veh samuh me nahi parntu akele hi hamla karte hai aur yogyatam jivit bach nikalate hai, parntu bite dhahak mai yah sabit ho chuka hai ki lagbhag saare jivaanu "quorum sensing(QS)" prakiya mai samuhik rup se bhaag lete hai. QS ke dwara ve apne shikaar par samuhik rup se hamala karte hai(manushya ya anya jivo par), parntu is dauran sirf yogytam hi nahi kamjor jivaanu bhi bach nikalte hai, yadi aisa hai to jivaanuo ka vikaas kaise hua aur ab bhi kyon ho raha hain?