Friday, 11 July 2008

अब आँखें हैं नया पड़ाव !

इन दोनों आंखों मे से कौन आपको ज्यादा खूबसूरत लग रही हैं ?
मुझे तो दायीं वाली आँख ज्यादा खूबसूरत लग रही है क्योंकि इसकी पुतली बेलाडोना के प्रभाव में अधिक फैल गयी है !!

एक जैव विज्ञानी की नजर में आँखे मानव शरीर की बहुत प्रभावी संवेदी अंग हैं। नारी की आंखों का तो कहना ही क्या। साहित्य में नारी की आंखों पर बहुत कहा सुना गया है। लोकजीवन में आंखों को लेकर कितने ही मुहाबरे गढ़े गये है- नजरें चुराना, नजर लगाना, नजर दिखाना/मिलाना आदि आदि। वैज्ञानिको की राय में बाहरी दुनिया की 80 प्रतिशत जानकारी हमें इन आंखों के जरिये ही मिलती है।
उन संस्कृतियों में भी जहाँ नारी शरीर की सभी इन्द्रियों /ज्ञानेिन्द्रयों ,यहाँ तक कि मुंह को ढ़क कर रखने का रिवाज है, आंखों को खुला रखने की आजादी है। नारी के आंखों की तुलना में नर की आँखें जरा बड़ी होती हैं। हाँ ,नारी की आंखों की सफेदी ज्यादा जगह घेरती है। बहुत से समुदायों में नारी की अश्रुग्रिन्थया¡ काफी सक्रिय पायी गयी हैं। किन्तु ऐसा वहाँ के सांस्कारिक परिवेश की देन है। (जिसमें नर को बचपन से ही कम भावुक होने की हिदायत दी जाती है)आंखों आंखों के बीच होने वाले कुछ संकेत/इशारे उल्लेखनीय है जैसे आंखों की पलकों को चौड़ा कर विस्मय प्रगट करना।
भारतीय नृत्यांगनाओं में इस भाव को मेकअप के जरिये और भी उभार दिया जाता है। इसी तरह एक आँख का दबाना (आँख मारना) एक भेद भरा संकेत है, जिसका आदान-प्रदान घनिष्ठ लोगो-प्रेमी या मित्रों के बीच ही किया जाता है। इस संकेत का मतलब है कि `उन दोनों में कुछ ऐसा है जिससे दूसरे बेखबर हैं´´। किसी अनजान विपरीत सेक्स (पुरुष) की ओर इस संकेत के सम्प्रेषण का मतलब विपरीत लिंगी आकर्षण की मूक किन्तु स्पष्ट स्वीकारोक्ति भी हो सकती है। इसी भांति आँखें चार होना वह स्थिति है जिसमें प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे की आ¡खों में खोये हुए रह सकते हैं। पर इस संकेत का आदान-प्रदान दो घृणा करने वाले लोगों के बीच भी हो सकता है। वे भी काफी देर तक एक दूसरे को घूरते रह सकते हैं।
आंखों के ``मेकअप´´ में पलकों की विभिन्न शेड भी शामिल है- ताकि चेहरे के पूरे भूगोल में उनका प्रभुत्व विशेष रूप से बना रहे। जिससे लोग बरबस ही ऐसी आंखों और उसकी स्वामिनी की ओर आकिर्षत हो जाय। आंखों की सुन्दरता बढ़ाने के लिए आंखों में कुछ रसायनों (बेलाडोना) के प्रयोग का भी प्रचलन रहा है। इन रसायनों के प्रभाव में आंखों की पुतलिया¡ फैल जाती हैं, जो इन्हे और भी आकर्षक बनाती है।
प्रयोगों में यह स्पष्ट रूप से पाया गया है कि फैली/बड़ी पुतलियों वाले नारी चित्रों ने सिकुड़ी हुई पुतलियों वाले नारी चित्रों की तुलना में अधिक लोगों को आकिर्षत किया। यह भी देखा गया है कि ``प्यार की दृष्टि´ के दौरान महिलाओं की आंखों की पुतलिया¡ कुदरती तौर पर फैल जाती है और उनके आकर्षण में इजाफा करती हैं- आकर्षक दिखने के लिए इससे अच्छा और मुफ्त नुस्खा भला व दूसरा क्या होगा--बस ``देखिए मगर प्यार से ........."

4 comments:

Gyandutt Pandey said...

बड़े काम की चीज लगती है यह बैलाडोना। शायद मौर्य/गुप्त काल में विषकन्यायें इसका प्रयोग मुग्ध करने के लिये करती रही हों।
वैसे, यह अवश्य है कि आंखों के प्रकार और उसे स्टाइल से नचाने में वास्तव में आकर्षण है!

आशीष कुमार 'अंशु' said...

अरविन्द जी,
जानकारी के लिए आभार

दिनेशराय द्विवेदी said...

आँख जरा कम सुंदर है, नयन कहिए, दृग कहिए, लोचन कहिए... और भी बहुत हैं। इन नयनन की निराली छटा है। ये किसी को जिलाए हैं तो किसी को मारे हैं।
बेलाड़ोना एलोपैथी, होमियोपैथी और आयुर्वेद में महत्वपूर्ण औषध है।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Aapne bahut mahattavpoorna baat batayi- वैज्ञानिको की राय में बाहरी दुनिया की 80 प्रतिशत जानकारी हमें इन आंखों के जरिये ही मिलती है।
Thanks.