Thursday, 5 June 2008

परोपकार ,एक इथोलोजिकल नज़रिया !

फायर !अरे भीतर कोई फँस गया है बिचारा ![फोटो सौजन्य -फायर प्रूफ़ ]
हमकितने परोपकारी हैं ? क्या हम किसी ऑर के भले के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर सकते हैं ?परोपकार का महात्म्य हमारे धर्म ग्रंथों मे विस्तार से है .परहित सरिस धर्म नही भाई !गीता तो उन्हें 'सुहृद 'कहती है जिन्हें नही चाहिए अपने उपकार का बदला । सुहृद को प्रत्युतपकार की चाह नही रहती . यानी नेकी कर दरिया में डाल .ऐसे मानव व्यवहार का भी विश्लेषण व्यवहार विदों ने किया है ।

व्यवहार विद मानव व्यवहार के उदाहरण पहले जंतु जगत में खोजते हैं .फिर मानवीय सन्दर्भ में उसकी व्याख्या करते हैं .जंतुओं में दूसरे या अपने परिवार के सदस्यों की जान बचाने की खातिर जान की बाजी लगाने के उदाहरण हैं -टिटहरी अपने अण्डों बच्चों को शिकारी से बचाने के लिए घायल होने का स्वांग रचती है और शिकारी को ललचाती हुयी कांपते तर्फते दूर तक निकल जाती है -यह समझ कर की शिकारी काफी दूर आ गया है और अब अंडे बच्चे सुरक्षित है -वह घायल होने का नाटक बंद कर फुर्र हो जाती है .घोसले पर लौट आती है .कौए अपने एक साथी की मौत पर कितना शोर शराबा करते हैं -सड़क जाम जैसा उपक्रम करते हैं .मानव में यह भाव भी पराकास्ठा तक पहुंचा हुआ है .वह अपने प्रियजन की रक्षा में जान तक देता हुआ देखा गया है -फ़र्ज़ कीजिये एक घर में आग लग गयी है ,एक कोई उसमे से निकल नही पाया है फँस गया है -यह कोई किसी का सगा हो सकता है नही भी हो सकता है -भीड़ स्तब्ध है ,क्या किया जाय -अचानक ही कोई हीरो सचमुच आ धमकता है -वेलकम फिल्म के नायक की तरह और वह 'कोई' सुरक्षित बचा लिया जाता है -बाहर से यह परोपकार -आत्मोत्सर्ग जैसा कुछ लगता है ,मगर यह सब हमारे जीनों का कमाल है ,उनकी परले दर्जे की स्वार्थपरता है -वे अपने को ,अपनी किस्म को बचाते है और बचाने वाला उन जीनों के झांसे में आ जाता है .हम दरअसल अपने जीनों के गुलाम हैं .उनकी गिरफ्त में हैं .तय पाया गया है की परोपकार के ऐसे जज्बे हमारे जीनों -वन्शाणुओं की अभिव्यक्ति हैं और अपनी प्रजाति की रक्षा के स्वार्थ से प्रेरित हैं -यह जेनेटिक सेल्फिश्नेस है .इसके कुछ और मानवीय पक्षों को हम अगली पोस्ट में कवर करेंगे .

5 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

परोपकार और व्यक्तिवाद को जीन्स से जोड़ कर देखने पर ऐसा नहीं लगता कि यह अपरिवर्तनीय है। मेरे विचार में इन गुणों को माँ-पिता, परिवार, गुरू और समाज से प्राप्त संस्कार ही तय करते हैं।

बाल किशन said...

काफ़ी रोचक और ज्ञानवर्धक लेख है.
आपको पढ़ कर संतुष्टि मिलती है.
आगे का इंतज़ार है.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Maanav vyavhar ko jeens se jod kar aapne logon ke saamne ek naya nazariya rakhkha hai.

Gyandutt Pandey said...

अरे मिश्र जी, यह तो विचित्र हो गया, वीरोचित स्वभाव अगर गुणसूत्र का खेल हो गया तो बेचारे एक्स्ट्रीम सेक्रिफाइस करने वाले का महत्व ही कम हो जायेगा।
दुर्योधन अपनी डायरी में एक पोस्ट ठेल कर पितामह और गांधारी-धृतराष्ट्र पर अपने गालबजाऊ व्यक्तित्व का ठीकरा उतार देगा!

उन्मुक्त said...

मेरे विचार से इसमें जीन्स और समाज दोनो को रोल है।