काफी समय तक यही माना जाता रहा की मनुष्य की जीभ चार मूल स्वाद ग्रहण कर सकती है -मीठा ,खट्टा,कसैला/तीता और नमकीन .स्वाद की अनुभूति में गंध की भी अहम् भूमिका होती है -जुकाम के समय व्यंजनों का स्वाद न मिलने का कारण यही है ! मगर ठीक १०० साल पहले जापान एक प्रोफेसर किकुने एकेडा ने एक समुद्री सेवार (सी वीड ) से निकले पदार्थ "अजीनोमोटो" से पाँचवे स्वाद का जायका लोगों को दिलवाया. "अजीनोमोटो" यानि ग्लूटामेट (जो एक नान -एसेंसियल अमीनो अम्ल है) को चखने से एक नए स्वाद की अनुभूति लोगों को हुई ! और यही आगे चल कर पांचवा स्वाद कहलाया .बताते चलें कि नान एसेंसियल अमीनो अम्ल वे हैं शरीर जिनका उत्पादन कर सकता है और एसेंसियल अमीनो एसिड वे होते हैं जिनका उत्पादन शरीर नहीं कर सकता और जिन्हें बाहर से लेना जरूरी हो जाता है . पाँचवे स्वाद का नामकरण हुआ युमामी (Umami ) जो जापानी शब्द है जिसका हिन्दी में कामचलाऊ अर्थ है "स्वादिष्ट"!अगर अब कोई पूंछे की स्वाद कितने प्रकार का होता है तो मीठा ,खट्टा ,कसैला /तीता और नमकीन के साथ युमामी का जिक्र करना न भूलें .
ग्लूटामेट का इस्तेमाल हम अक्सर चायनीज व्यंजनों में करते हैं - अपने यहाँ मशहूर "चायनीज" व्यंजनों - चाओमिन ,चिली पनीर ,मंचूरियन आदि में मोनोसोडियम ग्लूटामेट (एम् एस जी ) ई -६१ डाला जाता है ! इसका व्यापारिक निर्माण जापान की अजीनोमोटो (Ajinomoto Kabushiki) नाम से जानी जाने वाली कम्पनी करती है जो दुनिया में इस पदार्थ के सम्पूर्ण खपत का अकेले ३३% आपूर्ति करती है ! इसलिए ही आम बोल चाल की भाषा में ग्लूटामेट अजीनोमोटो बन गया !
अजीनोमोटो (Aji no Moto = “Essence of Taste,”) का शाब्दिक अर्थ है स्वाद का सत्व ! यही मोनो सोडीअम ग्लूटामेट है जिसकी खोज केकुने इकेदा ने किया और १९०९ में इसे जापान में ही पेटेंट करा लिया ! मुझे याद है मैंने पहली बार MSG(मोनोसोडियम ग्लूटामेट) का स्वाद तब चखा था जब मैगी उत्पादों(नेस्ले) का भारत में चलन शुरू हुआ था -यही कोई बीसेक वर्ष पहले !वैसे इसके पहले ही अजीनोमोटो नाम से यह पदार्थ पंसारी /किराना की दुकानों पर भी मिल जाता था ! मैंने बाद में जाना कि अरे यही अजीनोमोटो ही मोनोसोडियम ग्लूटामेट है ! लेकिन तब तक मैगी ने अच्छा खासा पैसा खलीते से निकाल लिया था ! तब मैगी इसका व्यापार स्वाद वर्धक के रूप में छोटी पुड़ियों में कर रही थी ! मुझे तभी इसका स्वाद भाया था और अब तो आज के बच्चों की यह पहली पसंद बन गया है ! अनेक वैज्ञानिक परीक्षणों में पाया गया है कि यह मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए निरापद है बशर्ते मात्रा का नियंत्रण रखा जाय !
पके टमाटरों में और चीज उत्पादों में कुदरती तौर पर ग्लूटामेट मिलता है ! इसमें सोडियम आयन की मात्रा भी खाने वाले सामान्य नमक से काफी कम होती है -मतलब स्वास्थ्य की दृष्टि से ब्लड प्रेशर आदि के कुछ मामलों में साधारण नमक का यह बेहतर विकल्प हो सकता है ! कई पके फलों और खमीर वाले फरमेंटएड खाद्य पदार्थों में यह पर्याप्त मात्रा में मिलता है -पके टमाटर में तो भरपूर ही - २५०-३०० मिली ग्राम /प्रति १०० ग्राम ! और माँ के दूध में भी इसकी मौजूदगी (०.०२%) होती है !फिर तो इसका स्वाद बचपन से हमारे मुंह लगा हुआ है ! वैसे भी मानुष जाति यानि हम ठहरे चटोरे जनम के ....
तो पांचवे स्वाद की कहानी कैसी लगी ? खट्टी या मीठी ?...या युमामी !
Science could just be a fun and discourse of a very high intellectual order.Besides, it could be a savior of humanity as well by eradicating a lot of superstitious and superfluous things from our society which are hampering our march towards peace and prosperity. Let us join hands to move towards establishing a scientific culture........a brave new world.....!
Monday, 12 October 2009
Wednesday, 7 October 2009
क्या आप बता सकते हैं कि.....
क्या आप बता सकते हैं कि हिरन और मृग में क्या अंतर है ? या फिर उत्तरप्रदेश का राज्य पशु और पक्षी क्या है ? घड़ियाल और मगरमच्छ में क्या अंतर है ? या कौन सा पक्षी है जो अपने पंखों से ही पतवारों का काम लेकर तैरता भी है ? सवाल दर सवाल मगर सब के सही जवाब ! और उत्तर बड़े बूढों ने नहीं दिए बल्कि बच्चों ने उमग उमग कर ये उत्तर दिए -मन बाग बाग हो गया ! अवसर था चौवन्वे वन्य जीव सप्ताह (१-७ नवम्बर ) के समापन आयोजन का ! जो आज वन विभाग के सौजन्य सारनाथ के मृगदाव पार्क में सम्पन्न हुआ !
हमने कार्यक्रमों के औपचारिक समापन के बाद वन्य वशुओं का पालतू बाद भी देखा और उन्हें कुछ खिलाया भी ! नीचे चित्र देखिये इसमें आगे की ओर तो कृष्ण मृग है (ब्लैक बग -antelope ) और पीछे चीतल, जो हिरन (deer ) है ! जान लें कि जो हर साल सींगे गिरा देता है वह हिरन है और जो जीवन एक ही सींग से गुजर देता है वह मृग -बच्चों को भी बता देगें यह प्लीज ! और हाँ उत्तर प्रदेश का राज्य पशु बारहसिंगा (हिरन ) है-
और पक्षी सारस यानि क्रौंच (crane ) ! (पहले जानते रहे इसे ? खैर कोई बात नहीं इस बार के वन्य पश्य सप्ताह पर ही जान लें ! ) घडियाल की लम्बी थूथन होती है जिस के सिरे पर एक घरिया (एक तरह का छोटा मिट्टी का पात्र ) नुमा रचना होती है जबकि मगर का थूथन तिकोना लिए होता है ! और पेंग्विने अपने डैनों से तैरती हैं ! कोयल और पपीहा नीड़ परिजीवी हैं यानि घोसला नहीं बनाती बल्कि दूसरे के घोसले में अंडे पारती हैं -कोयल कौए के और पपीहा सतबहनी (बैबलर ) के ....इन क्विज का जवाब बच्चे बेलौस देते गए और मुख्य अतिथि से इनाम झटकते गए .

आप भी भारतीय वन्य जीवन से बच्चों को अवगत करने का सिलसिला शुरू करे ! इस वन्य जीव सप्ताह पर यही आह्वान है !
वाराणसी वृत्त के वन संरक्षक श्री आर एस हेमंत कुमारके साथ मैं
अपने देश में नई पीढी अब जीव जंतुओं की जानकारी के प्रति चैतन्य हो रही है -यह सचमुच बहुत ही सुखद है ! आज वन्य जीवों की जानकारी की ओर बच्चों की रुझान बढ़ने के लिए कई कार्यक्रम /प्रतियोगिताएं आयोजित हुईं जिनमे वन्य जीवन पर चित्रकारी .,निबंध प्रतियोगिता ,भाषण आदि प्रमुख रहे ! मैं इस अवसर पर उपस्थित होकर धय्न्य हुआ -आज का पूरा दिन वहीं बीता ! प्रभागीय वनाधिकारी (डिविजनल फारेस्ट ऑफीसर ) श्री लालाराम बैरवा (आई ऍफ़ एस ) ने कल ही मेरी वन्य जीवों की अभिरुचि को लक्ष्य कर आज के कार्यक्रम में निमंत्रित किया था ! वाराणसी वृत्त के वन संरक्षक श्री आर एस हेमंत कुमार जो मूलतः आंध्र प्रदेश के हैं और उत्तर प्रदेश कैडर के सीनियर आई ऍफ़ एस हैं मुख्य अतिथि रहे -विनम्र ऐसे कि मुझसे तब तक मुख्य अतिथि बनने और उस विशिष्ट्तम कुर्सी पर बैठने का आग्रह करते रहे जब तक कि मैंने किंचित बल से ही उन्हें उस कुर्सी पर आसीन नहीं करा दिया ! वे ही उसके सर्वथा योग्य भी थ .कार्यक्रम का सञ्चालन श्री ओ पी गुप्ता उप संभागीय वनाधिकारी ने किया ! श्री आर एस यादव रेंज आफीसर ने कार्यक्रमों का संयोजन किया ! कार्यक्रम में बच्चों ने ही नहीं बच्चियों ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया
हमने कार्यक्रमों के औपचारिक समापन के बाद वन्य वशुओं का पालतू बाद भी देखा और उन्हें कुछ खिलाया भी ! नीचे चित्र देखिये इसमें आगे की ओर तो कृष्ण मृग है (ब्लैक बग -antelope ) और पीछे चीतल, जो हिरन (deer ) है ! जान लें कि जो हर साल सींगे गिरा देता है वह हिरन है और जो जीवन एक ही सींग से गुजर देता है वह मृग -बच्चों को भी बता देगें यह प्लीज ! और हाँ उत्तर प्रदेश का राज्य पशु बारहसिंगा (हिरन ) है-
और पक्षी सारस यानि क्रौंच (crane ) ! (पहले जानते रहे इसे ? खैर कोई बात नहीं इस बार के वन्य पश्य सप्ताह पर ही जान लें ! ) घडियाल की लम्बी थूथन होती है जिस के सिरे पर एक घरिया (एक तरह का छोटा मिट्टी का पात्र ) नुमा रचना होती है जबकि मगर का थूथन तिकोना लिए होता है ! और पेंग्विने अपने डैनों से तैरती हैं ! कोयल और पपीहा नीड़ परिजीवी हैं यानि घोसला नहीं बनाती बल्कि दूसरे के घोसले में अंडे पारती हैं -कोयल कौए के और पपीहा सतबहनी (बैबलर ) के ....इन क्विज का जवाब बच्चे बेलौस देते गए और मुख्य अतिथि से इनाम झटकते गए .

आप भी भारतीय वन्य जीवन से बच्चों को अवगत करने का सिलसिला शुरू करे ! इस वन्य जीव सप्ताह पर यही आह्वान है !
Monday, 5 October 2009
गंगा की गोद की सिसकती सूंस को मिला राष्ट्रीय जल जंतु का दर्जा
वन्य जीव सप्ताह (१ अक्तूबर -७अक्तूबर ) में इससे अच्छी खबर कोई हो नहीं सकती ! पिछले तकरीबन पचास सालों से मनाये जा रहे इस सरकारी पर्व पर इससे अच्छी बात मैंने कभी नहीं देखी सुनी-यह वन्यजीव सप्ताह भी एक और औपचारिक सरकारी आयोजन के रूप में सिमट गया होता मगर अब यह यादगार बन गया है -सूंस (डालफिन) को राष्ट्रीय जल जंतु का दर्जा दे दिया गया है ! सूंस गंगा की गोद में न जाने कब से सिसक सिसक कर अपनी जान की दुहाई मांग रही थी -अब सरकार के कानो पर जू रेंग गयी है !
वात्सल्यमयी गंगा न केवल हमारी वरन अनेक जल जंतुओं की प्राण दायिनी रही हैं -मगर कृतघ्न ,लोभी और अदूरदर्शी मानव के पर्यावरण विरोधी कारनामों से गंगा की छाती विदीर्ण होती रही है -उसकी आँचल की छाव तले पल बढ़ रहे अनेक जीवो की जान पर बन आई है -जिसमें सबसे बुरी गति गंगा की डालफिन (Platanista gangetica ) यानि अपनी सूंस की हुई है -दरअसल गांगेय सूंस एक विलक्षण प्राणी है -यह अंधी है बेचारी मगर मनुष्य की मित्र है ! हिन्दी में तो सूंस मगर बंगाल में सुसक या सिसुक और संस्कृत में सिसुमार के नाम से विख्यात इस जलीय जीव का अस्तित्व संकट में पड़ गया है !
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में अभी कल ही सम्पन्न राष्ट्रीय गंगा रीवर बेसिन अथारिटी की बैठक में जब बिहार के मुख्य मंत्री नितीश कुमार ने गंगा की डालफिन को राष्ट्रीय जलीय जंतु बनाए जाने की घोषणा की तो इसे सहज ही स्वीकार कर लिया गया .इस तरह नितीश कुमार अब जीव जंतु प्रेमियों के भी हीरो बन गये हैं ! सूंसों की संख्या तेजी से गिरी है और ये अब २०० से भी कम रह गयीं है -मादा सूंस नर से बड़ी होती है और दूर से देखने में भैंस के छोटे से बच्चे की तरह लगती है काली सी मगर दिल वाली ऐसी कि कई डूबते लोगों की सहायता के भी इसके किस्स्से सुने गए हैं ! बाढ़ के दिनों में ऐसा लगता है कि भैसके बच्चे पानी के भीतर अठखेलियाँ खेल रहे हों ! गंगा की डाल्फिने समुद्र में प्रवेश नहीं करतीं और शायद इनकी मुसीबत का एक करण यह भी है -बाकी डालफिन प्रजातियाँ फिर भी समुद्र की अपार जलराशि में अपनी वंश रक्षा कर ले रही हैं .
बाघ के राष्ट्रीय पशु और मोर के राष्ट्रीय पक्षी घोषित होने के बाद गंगा की डालफिन को राष्ट्रीय जल जंतु का दर्जा दे दिया गया है -इस तरह अब गंगा की डालफिन के जीवन मृत्य का प्रश्न अब हमारी राष्ट्रीय पहचान से जुड़ गया है ! यह वन्य जीव अधिनियम १९७२ के अधीन पहले से ही अबध्य प्राणी है -शिड्यूल एक में है ! अब यह राष्ट्रीय गौरव का भी प्रतीक बन गयी है ! मुख्यमंत्री नितीश कुमार की इस पहल के लिए वे वाहवाही के हकदार हैं .
वात्सल्यमयी गंगा न केवल हमारी वरन अनेक जल जंतुओं की प्राण दायिनी रही हैं -मगर कृतघ्न ,लोभी और अदूरदर्शी मानव के पर्यावरण विरोधी कारनामों से गंगा की छाती विदीर्ण होती रही है -उसकी आँचल की छाव तले पल बढ़ रहे अनेक जीवो की जान पर बन आई है -जिसमें सबसे बुरी गति गंगा की डालफिन (Platanista gangetica ) यानि अपनी सूंस की हुई है -दरअसल गांगेय सूंस एक विलक्षण प्राणी है -यह अंधी है बेचारी मगर मनुष्य की मित्र है ! हिन्दी में तो सूंस मगर बंगाल में सुसक या सिसुक और संस्कृत में सिसुमार के नाम से विख्यात इस जलीय जीव का अस्तित्व संकट में पड़ गया है !
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में अभी कल ही सम्पन्न राष्ट्रीय गंगा रीवर बेसिन अथारिटी की बैठक में जब बिहार के मुख्य मंत्री नितीश कुमार ने गंगा की डालफिन को राष्ट्रीय जलीय जंतु बनाए जाने की घोषणा की तो इसे सहज ही स्वीकार कर लिया गया .इस तरह नितीश कुमार अब जीव जंतु प्रेमियों के भी हीरो बन गये हैं ! सूंसों की संख्या तेजी से गिरी है और ये अब २०० से भी कम रह गयीं है -मादा सूंस नर से बड़ी होती है और दूर से देखने में भैंस के छोटे से बच्चे की तरह लगती है काली सी मगर दिल वाली ऐसी कि कई डूबते लोगों की सहायता के भी इसके किस्स्से सुने गए हैं ! बाढ़ के दिनों में ऐसा लगता है कि भैसके बच्चे पानी के भीतर अठखेलियाँ खेल रहे हों ! गंगा की डाल्फिने समुद्र में प्रवेश नहीं करतीं और शायद इनकी मुसीबत का एक करण यह भी है -बाकी डालफिन प्रजातियाँ फिर भी समुद्र की अपार जलराशि में अपनी वंश रक्षा कर ले रही हैं .
बाघ के राष्ट्रीय पशु और मोर के राष्ट्रीय पक्षी घोषित होने के बाद गंगा की डालफिन को राष्ट्रीय जल जंतु का दर्जा दे दिया गया है -इस तरह अब गंगा की डालफिन के जीवन मृत्य का प्रश्न अब हमारी राष्ट्रीय पहचान से जुड़ गया है ! यह वन्य जीव अधिनियम १९७२ के अधीन पहले से ही अबध्य प्राणी है -शिड्यूल एक में है ! अब यह राष्ट्रीय गौरव का भी प्रतीक बन गयी है ! मुख्यमंत्री नितीश कुमार की इस पहल के लिए वे वाहवाही के हकदार हैं .
Sunday, 4 October 2009
वैज्ञानिकों ने जाना चिर युवा होने का राज !
अखबारों में यह खबर सुर्खियों में है ! कभी च्यवन ऋषि ने चिर युवा बने रहने का नुस्खा हासिल किया था च्यवनप्राश के रूप में ! मगर आज का च्यवनप्राश मानकों पर खरा नहीं उतरता ! उम्र की ढलान को रोकने के लिए दुनिया भर में वैज्ञानिक कब से लगे हुए हैं -नए नए नुस्खों और माजूमों के साथ ! नित नई नई पेशकशें ! और अब यह -
वैज्ञानिकों का नया दावा है कि है कि बढ़ती आयु और आयु संबंधी बीमारियों का उपचार संभव है। हाल ही में चूहों व बंदरों पर किए गए शोध में वैज्ञानिकों ने जीवनकाल बढ़ाने के तरीके को खोज निकाला है। इससे इंसान लंबे समय तक युवा रह सकेगा।
यूनिवर्सिटी कालेज लंदन के इंस्टीट्यूट आफ हेल्दी एजिंग के वैज्ञानिकों ने मानव जींस 'एस6 कायिनेज 1' [एस6के1] में हेरफेर कर उम्र बढ़ाने वाले प्रोटीन के उत्पादन को रोके रहने में सफलता पायी है । चूहों पर किये गए प्रयोगों में शोधकर्ताओं ने यह भी पाया है कि कैलोरी खपत की मात्रा को 30 प्रतिशत तक घटाकर जीवनकाल को 40 फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है। अमेरिकी पत्रिका 'साइंस' में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक एस6के उत्पादन को रोककर भी यही फायदे हासिल किए जा सकते हैं। इसके लिए आहार में कमी करने की कोई जरूरत नहीं। एस6के1 भोजन में बदलाव के बारे में शरीर की प्रतिक्रिया निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाता है।
देखा गया की ऐसे चूहों जिन के जीन में वांछित बदलाव कर दिए गए थे अन्य चूहों से २० फीसदी अधिक काल तक जिए -वे कुल ९५० दिन जिए आम चूहों से १६० दिन अधिक ! इन चूहों में टाईप २ मधुमेह जैसी बीमारियां भी नहीं हुईं ! उनकी टी कोशिकाएं जो रोगरोधी होती हैं भी तरोताजा देखी गयीं -मतलब उम्र के बढ़ने के साथ मनुष्य की रोग रोधन क्षमता का ह्रास होना भी इस अध्ययन से प्रमाणित हुआ है !वेलकम ट्रस्ट द्वारा पोषित इस अध्ययन से जुड़े डेविड जेम्स का कहना है की "इस अध्यन से हम उम्र की बढ़त को रोकने का सहसा ही एक कारगर नुस्खा पा गए हैं ! चूहों पर इस शिद्ध के बाद मेटफोमिन नामक दवा का ट्रायल अब मनुष्य पर किया जाएगा ! रापामायासिन भी सामान प्रभावों वाले औषधि के रूप में देखी जा रही है !
वैज्ञानिकों का नया दावा है कि है कि बढ़ती आयु और आयु संबंधी बीमारियों का उपचार संभव है। हाल ही में चूहों व बंदरों पर किए गए शोध में वैज्ञानिकों ने जीवनकाल बढ़ाने के तरीके को खोज निकाला है। इससे इंसान लंबे समय तक युवा रह सकेगा।
यूनिवर्सिटी कालेज लंदन के इंस्टीट्यूट आफ हेल्दी एजिंग के वैज्ञानिकों ने मानव जींस 'एस6 कायिनेज 1' [एस6के1] में हेरफेर कर उम्र बढ़ाने वाले प्रोटीन के उत्पादन को रोके रहने में सफलता पायी है । चूहों पर किये गए प्रयोगों में शोधकर्ताओं ने यह भी पाया है कि कैलोरी खपत की मात्रा को 30 प्रतिशत तक घटाकर जीवनकाल को 40 फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है। अमेरिकी पत्रिका 'साइंस' में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक एस6के उत्पादन को रोककर भी यही फायदे हासिल किए जा सकते हैं। इसके लिए आहार में कमी करने की कोई जरूरत नहीं। एस6के1 भोजन में बदलाव के बारे में शरीर की प्रतिक्रिया निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाता है।
देखा गया की ऐसे चूहों जिन के जीन में वांछित बदलाव कर दिए गए थे अन्य चूहों से २० फीसदी अधिक काल तक जिए -वे कुल ९५० दिन जिए आम चूहों से १६० दिन अधिक ! इन चूहों में टाईप २ मधुमेह जैसी बीमारियां भी नहीं हुईं ! उनकी टी कोशिकाएं जो रोगरोधी होती हैं भी तरोताजा देखी गयीं -मतलब उम्र के बढ़ने के साथ मनुष्य की रोग रोधन क्षमता का ह्रास होना भी इस अध्ययन से प्रमाणित हुआ है !वेलकम ट्रस्ट द्वारा पोषित इस अध्ययन से जुड़े डेविड जेम्स का कहना है की "इस अध्यन से हम उम्र की बढ़त को रोकने का सहसा ही एक कारगर नुस्खा पा गए हैं ! चूहों पर इस शिद्ध के बाद मेटफोमिन नामक दवा का ट्रायल अब मनुष्य पर किया जाएगा ! रापामायासिन भी सामान प्रभावों वाले औषधि के रूप में देखी जा रही है !
Monday, 21 September 2009
हरित क्रांति के प्रणेता तथा पद्मविभूषण से सम्मानित नारमैन बोरलाग नहीं रहे !
कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलाग
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और पद्म विभूषण से सम्मानित जाने माने कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलाग नहीं रहे .विकासशील दुनिया में भूख से लड़ने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए उन्हें १९७० में प्रसिद्ध नोबेल शान्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था .वे 95 साल के थे .विगत १२ सितम्बर को कैंसर से उनका निधन हुआ !1960 और 1990 के बीच बोरलाग ने गेहूं उत्पादन को भारत में चौगुना बढाकर 'हरित क्रांति' का स्वप्न साकार कर दिखाया .1950 के दशक में बोरलाग और उनकी टीम ने रोग प्रतिरोधी, उच्च गेहूं की किस्में पैदा की और विकसित खेती के तरीके में सुधार किया. अपने काम से विकासशील देशों में भुखमरी से लाखों लोगों को बचाने में निर्णायक भूमिका निभायी .भारत के प्रमुख कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन ने हिंदू को बताया, "वह असाधारण मानवता प्रेमी थे , एक भूख से मुक्त दुनिया को साकार करने को प्रतिबद्ध उनका योगदान बहुआयामी था - वे एक साथ ही वैज्ञानिक , राजनैतिक और मानवतावादी थे . "
बोरलाग ने 1986 में विश्व खाद्य पुरस्कार शुरू करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की जो अब खाद्य और कृषि के लिए नोबेल पुरस्कार माना जाता है .
नोर्मन ने एक बार कहा था: 'मैं घोर गरीबी , भूख और मानव दुख के बीच में व्यक्तिगत तौर पर आराम से नहीं रह सकता , निंदा और गरीबी के जीवन में रह रहे परिवारों से दुनिया में शांति नहीं हो सकती ..."
Monday, 14 September 2009
प्यार में ज़रा संभलना ......बड़े धोखे हैं इस राह में !
मानव प्यार की जटिलताओं को विवेचित करती लगातार यह तीसरी पोस्ट इस श्रृखला की फिलहाल अंतिम कड़ी है ! इश्क से दीगर मसले और भी तो हैं ! प्रेम के जोडों में कई कुदरती अवरोधक (जिनकी चर्चा पिछले पोस्ट में हुयी है ) अनुपयुक्त साथी की पहचान कर उन्हें आगे बढ़ने से रोक देते हैं ताकि अनचाहे गर्भ धारण और बाद की झंझटों ,बच्चों के लालन पालन के साझे बोझ को उठाने की समस्याओं से बचा जा सके !
दिक्कत है कि हमारे कई सामाजिक रीति रिवाज जो दरअसल अनुपयुक्त जोडों के मिलन के निवारण के लिए ही आरम्भ हुए,जैसे स्वयंवर ही ,कालांतर में मात्र (विवाह की ) रस्मो अदायगी तक सीमित रह गए ! उपयुक्त वर के तलाश की कवायद तो आज भी जारी दिखती है (वधू की कम ही ! ) ,कई उपक्रम किये जाते हैं ,पंडित -फलित ज्योतिषी गणना करते हैं ("गन्ना मिलाना ",=गुण मिलाना ) फिर एक आदर्श जोड़ा /जोड़ी को सामाजिक हरी झंडी मिल जाती है ! मगर पूर्वजों द्वारा सही जोड़े के मिलान की 'कुदरती जरूरत' की समझ जहां विस्मित करती है वहीं आजकल इसके नाम पर चल रहे समझौते इस व्यवस्था के मूल उद्येश्य पर ही प्रश्नचिहन लगाते हैं !
विवाह के रूप में जितने जोडों को सामाजिक स्वीकृति मिलती है उनमें कुदरती तौर पर कितने फीसदी सही जोड़े होते हैं यह भी एक मुद्दा है ! इसी तरह बलात्कार और वैश्यावृत्ति में भी कुदरत के सही जोड़ा मिलान की व्यवस्था ध्वस्त हो रहती है ! ये कुदरत की सच्चे प्यार से उपयुक्त जोड़ा बंधवाने की व्यवस्था को धता बताते मानव व्यवहार के बड़े उदाहरण रहे !
कुछ छोटे छोटे झांसे भी देकर गलत जोड़े बनने के मामले अध्ययन के दौरान प्रकाश में आये हैं - जहाँ कुदरत की अनपयुक्त को पहचाने की मशीनरी फेल हो जाती है ! मसलन कोई दुर्घटना हो गयी -प्लेन ,ट्रेन , मोटर क्रैश ,अग्निकांड ,बाढ़ -इस दौरान दूसरों की भलाई के लिए शरीर की एक और व्यवस्था सक्रिय हो उठती है -कुछ लोगों में बहुत तीव्रता के साथ प्राणोत्सर्ग (altruism )तक की भावना उछाल मारती है -इस दौरान किसी ने किसी को जान पर खेल कर बचा लिया तो अचानक हादसे के चलते धमनियों में तुरत बढ़ गए "हादसा हारमोन " ऐडरनलीन के प्रभाव में शरीर की अनुपयुक्त जोड़े के पहचान के प्रक्रिया फेल कर जाती है और जोडों में एक आकर्षण/कृतज्ञता भाव उत्पन्न हो जाता है . फिल्मों में छोटी मोटी दुर्घटनाओं के बाद नायक नायिका में पनपते प्रेम का दिखाया जाना अकारण नहीं है !
मगर सावधान यह संतानोत्पत्ति के लिए सही जोड़ा नहीं भी हो सकता है ! इसी तरह जो महिलायें गर्भ निरोधक गोली नियमित तौर पर ले रही होती हैं उनमें भी सही गलत जोड़े के पहचान की कुदरती व्यवस्था जवाब दे जाती है -क्योंकि गर्भ निरोधक जो स्वयं एक तीव्र प्रभाव वाले हारमोन हैं और नारी की अंडोत्सर्जन प्रक्रिया को बाधित करते हैं " साईड इफेक्ट " में सही जोड़े की पहचान को प्रभावित कर देते हैं ! पश्चिमी देशों में एक अध्ययन में तो यह पाया गया कि गर्भ निरोधक गोलियों के इस्तेमाल के दौरान बने प्रणय सम्बन्ध और विवाहों में तलाक की दर बहुत ज्यादा है ! जाहिर है नकली प्रेमी इस दौरान "एम् एच सी " फैक्टर की पहचान को धता बता देता है !
वैसे भी इश्क का बुखार लम्बे समय तक नहीं चलता यह या तो "सहचर प्रेम " ( companionate love !) में तब्दील हो जाता है या फिर शनैः शनैः मिट जाता है जब यह कुदरत की मूल प्रजनन /संतानोत्पत्ति की भावना को किन्ही कारणों से भी चरितार्थ नहीं कर पाता ! मानवीय संदर्भ में जो सबसे महत्वपूर्ण जैवीय मुद्दा है वह ऐसे जोड़ा बंधन (पेयर बांडिंग ) को बढावा देने का है जो संतति की जिम्मेदारियों का कुशलतापूर्वक वहन कर सकें -महज मौज मस्ती ही नहीं ! इसलिए निरे रोमांस पर लगाम लग जाती है और यह किसी की जिन्दगी को लम्बे वक्त तक तबाह नहीं करता -" सहचर प्रेम " में बदल जाता है या फिर मिट जाता है ! भले ही असफल प्रेम के अनगिनत किस्से कहानियाँ को जन्म देकर ! मनुष्य जैसा तार्किक (और अतार्किक !)प्राणी भी इक मुकाम पर इसलिए ऐसे इश्क से तोबा कर लेता है जो फलदायी न हो -उतरती जाए है रोमांस की खुमारी अहिस्ता आहिस्ता !
मगर इसका मतलब यह भी नहीं कि जोडों में रोमांस कुछ कमतर हो जाता है -यह सहचर प्रेम में तब्दील होकर अक्षुण हो उठता है -कई शादी शुदा जोडों में वर्षों उपरांत भी उनके ब्रेन का वह हिस्सा उद्दीप्त पाया जाता है जो कि इश्क के दीवानों में दमकता रहता है ! मगर ऐसे मामले अपवाद ही हैं !
दिक्कत है कि हमारे कई सामाजिक रीति रिवाज जो दरअसल अनुपयुक्त जोडों के मिलन के निवारण के लिए ही आरम्भ हुए,जैसे स्वयंवर ही ,कालांतर में मात्र (विवाह की ) रस्मो अदायगी तक सीमित रह गए ! उपयुक्त वर के तलाश की कवायद तो आज भी जारी दिखती है (वधू की कम ही ! ) ,कई उपक्रम किये जाते हैं ,पंडित -फलित ज्योतिषी गणना करते हैं ("गन्ना मिलाना ",=गुण मिलाना ) फिर एक आदर्श जोड़ा /जोड़ी को सामाजिक हरी झंडी मिल जाती है ! मगर पूर्वजों द्वारा सही जोड़े के मिलान की 'कुदरती जरूरत' की समझ जहां विस्मित करती है वहीं आजकल इसके नाम पर चल रहे समझौते इस व्यवस्था के मूल उद्येश्य पर ही प्रश्नचिहन लगाते हैं !
विवाह के रूप में जितने जोडों को सामाजिक स्वीकृति मिलती है उनमें कुदरती तौर पर कितने फीसदी सही जोड़े होते हैं यह भी एक मुद्दा है ! इसी तरह बलात्कार और वैश्यावृत्ति में भी कुदरत के सही जोड़ा मिलान की व्यवस्था ध्वस्त हो रहती है ! ये कुदरत की सच्चे प्यार से उपयुक्त जोड़ा बंधवाने की व्यवस्था को धता बताते मानव व्यवहार के बड़े उदाहरण रहे !
कुछ छोटे छोटे झांसे भी देकर गलत जोड़े बनने के मामले अध्ययन के दौरान प्रकाश में आये हैं - जहाँ कुदरत की अनपयुक्त को पहचाने की मशीनरी फेल हो जाती है ! मसलन कोई दुर्घटना हो गयी -प्लेन ,ट्रेन , मोटर क्रैश ,अग्निकांड ,बाढ़ -इस दौरान दूसरों की भलाई के लिए शरीर की एक और व्यवस्था सक्रिय हो उठती है -कुछ लोगों में बहुत तीव्रता के साथ प्राणोत्सर्ग (altruism )तक की भावना उछाल मारती है -इस दौरान किसी ने किसी को जान पर खेल कर बचा लिया तो अचानक हादसे के चलते धमनियों में तुरत बढ़ गए "हादसा हारमोन " ऐडरनलीन के प्रभाव में शरीर की अनुपयुक्त जोड़े के पहचान के प्रक्रिया फेल कर जाती है और जोडों में एक आकर्षण/कृतज्ञता भाव उत्पन्न हो जाता है . फिल्मों में छोटी मोटी दुर्घटनाओं के बाद नायक नायिका में पनपते प्रेम का दिखाया जाना अकारण नहीं है !
मगर सावधान यह संतानोत्पत्ति के लिए सही जोड़ा नहीं भी हो सकता है ! इसी तरह जो महिलायें गर्भ निरोधक गोली नियमित तौर पर ले रही होती हैं उनमें भी सही गलत जोड़े के पहचान की कुदरती व्यवस्था जवाब दे जाती है -क्योंकि गर्भ निरोधक जो स्वयं एक तीव्र प्रभाव वाले हारमोन हैं और नारी की अंडोत्सर्जन प्रक्रिया को बाधित करते हैं " साईड इफेक्ट " में सही जोड़े की पहचान को प्रभावित कर देते हैं ! पश्चिमी देशों में एक अध्ययन में तो यह पाया गया कि गर्भ निरोधक गोलियों के इस्तेमाल के दौरान बने प्रणय सम्बन्ध और विवाहों में तलाक की दर बहुत ज्यादा है ! जाहिर है नकली प्रेमी इस दौरान "एम् एच सी " फैक्टर की पहचान को धता बता देता है !
वैसे भी इश्क का बुखार लम्बे समय तक नहीं चलता यह या तो "सहचर प्रेम " ( companionate love !) में तब्दील हो जाता है या फिर शनैः शनैः मिट जाता है जब यह कुदरत की मूल प्रजनन /संतानोत्पत्ति की भावना को किन्ही कारणों से भी चरितार्थ नहीं कर पाता ! मानवीय संदर्भ में जो सबसे महत्वपूर्ण जैवीय मुद्दा है वह ऐसे जोड़ा बंधन (पेयर बांडिंग ) को बढावा देने का है जो संतति की जिम्मेदारियों का कुशलतापूर्वक वहन कर सकें -महज मौज मस्ती ही नहीं ! इसलिए निरे रोमांस पर लगाम लग जाती है और यह किसी की जिन्दगी को लम्बे वक्त तक तबाह नहीं करता -" सहचर प्रेम " में बदल जाता है या फिर मिट जाता है ! भले ही असफल प्रेम के अनगिनत किस्से कहानियाँ को जन्म देकर ! मनुष्य जैसा तार्किक (और अतार्किक !)प्राणी भी इक मुकाम पर इसलिए ऐसे इश्क से तोबा कर लेता है जो फलदायी न हो -उतरती जाए है रोमांस की खुमारी अहिस्ता आहिस्ता !
मगर इसका मतलब यह भी नहीं कि जोडों में रोमांस कुछ कमतर हो जाता है -यह सहचर प्रेम में तब्दील होकर अक्षुण हो उठता है -कई शादी शुदा जोडों में वर्षों उपरांत भी उनके ब्रेन का वह हिस्सा उद्दीप्त पाया जाता है जो कि इश्क के दीवानों में दमकता रहता है ! मगर ऐसे मामले अपवाद ही हैं !
Sunday, 13 September 2009
लवेरिया हुआ ,मगर हुआ क्यूं ?
कमीने इश्क के बाद जो कुछ और सामग्री इस बहुप्रिय विषय पर मेरे खलीते में थी उसे रिसायिकिल बिन में डाल दिया था ,मगर आज फिर उस बिन को खलिया कर निकाल लाया हूँ -अब चिट्ठे पर भी कभी कभार कुछ कचरा नहीं आयेगा तो फिर कैसे श्रेष्ठ रचनाओं की तुलनात्मक साख बनेगी ! लिहाजा इश्क ,प्रेम ,वासना ,यौनाकर्षण जो भी कह लें आप , पर कुछ और जानकारी लेकर बन्दा हाजिर है !
मगर पहले एक पाठ दुहराई हो जाय तो फिर मामला आगे बढे ! अब तक यह तय पाया गया कि कुदरत को इसकी तनिक भी परवाह नहीं कि हम लवेरिया या रोमांस के रस में कितना सरोबार और डूब उतरा रहे हैं ,उसका मकसद तो खास तौर पर यही रहता है कि उसकी जनन लीला बदस्तूर जारी रहे और प्रेम को समर्पित जोड़े (पेयर बांड ) संतानोत्पत्ति कर शिशुओं की देखभाल का भी जिम्मा साथ उठायें ! बस इसी काम को अंजाम देने को कुदरत ने ये सारे चोचले गढे हैं !
पुरुष स्वभावतः सुन्दर चेहरों का चहेता है -"हर हंसी चेहरे का मैं तलबगार हूँ " .यही नहीं वह भावी सहचर में उन घटकों /अवयवों की भी चेतन -अवचेतन तलाश करता है जो प्रजनन -उर्वरता की द्योतक हों . वह ऐसे स्पष्ट यौन संकेतकों की तलाश करता है जैसे पतली कमर और चौडे कूल्हे जो प्रजनन की उर्वरता का पावरफुल संकेत देते हैं ! इसी तरह नारियां भी चौडे और पुष्ट कंधे ,चौड़ी छाती , कसी मुश्कों ,और भरी पूरी दाढी पर फिदा होती हैं -यह सारे लक्षण नर हारमोन के प्राबल्य को जताते हैं !
यौन गंध सूघने में मनुष्य की नाक भी कोई नीची नहीं है .साबित हो चुका है कि साथ साथ रहने वाली नारियों का मासिक चक्र मेल कर जाता है ! यह रासायनिक गंध संकेतो के जरिये ही संभव होता है ! पुरुषों का अवचेतन ही यह भाप लेता है कि अमुक नारी का अंडोत्सर्जन ( ओव्यूलेशन )कब हो जाता है, जिस समय निषेचन की सम्भावना सबसे अधिक होती है ! इस काल में पुरुष सहचर उसके प्रति बहुत केयरिंग ,याचनापूर्ण और चाँद सितारे तोड़ने का भी संकल्प लेने को उतारू दिखता है ! एक होता है मेजर हिस्टोकाम्पैटीबिलिटी फैक्टर ( एम् एच ऍफ़ ) जो यह क्ल्यू देता है कि प्रेमोन्मत जोड़े संतति वहन के योग्य हैं भी या नहीं ! इसका चूकिं गर्भ रक्षा से सीधा सम्बन्ध होता है और एक जैसे एम् एच ऍफ़ के रहते गर्भ रक्षा संभव नहीं है तो चुम्बन के समय लार के विनिमय से इसकी पहचान अवचेतन में ही जोड़े कर लेते हैं और समान होने पर प्रत्यक्षतः किसी न किसी बहाने से दूर होने लगते हैं !
हामरे कई सांस्कृतिक रीति रिवाजों में यौन वर्जनाओं के पीछे अनचाहे गर्भ और यौन जनित बीमारियों के रोक की ही कवायद होती है जो पुश्तैनी तौर पर चली आ रही हैं ! आज की आधुनिक जीवन शैली के "समागम पूर्व " व्यवहार -डेटिंग और पेटिंग भी जोडों की यौन उपयुक्तता की छान बीन के तरीके हैं जो उपयुक्त सहचर के चयन का मार्ग ही प्रशस्त करते हैं ! कुछ सच्चे जोडों के मस्तिष्क के अंदरूनी हिस्सों को फंक्शनल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजेस के जरिये देखा गया है जो अपनी सक्रियता के उच्च बिंदु पर जा पहुँचते हैं जिसमें डोपामाईन रसायन के प्रमुख भूमिका होती है ! सक्रियता के ये पहचान बिंदु वेंट्रल तैग्मेंटल एरिया में उभरते हैं -जिसकी आगे की प्रक्रिया को ऊपर का एक हिस्सा न्यूक्लियस अक्यूम्बेंस संभालता है जहाँ डोपामाइन के साथ अब सेरोटोनिन (यह केले में मिलता है -खूब खाईए केले मूड फ्रेश रहेगा ) भी आ मिलता है ! आगे स्नेह.वात्सल्य भावना का जिम्मा आक्सीटोसिन नमक हारमोन निभाता है ! बच्चों के जन्म पर भी इसी आक्सीटोसिन का निकलना अधिक रहता है जो माँ में ममत्व उभारता है ! यहाँ तक कि प्रसूति गृहों में सद्य प्रसूता के साथ की महिलाएं भी तीव्र ममत्व का अनुभव करती हैं -जाहिर हैं आक्सीटोसिन उनकी घ्राण इन्द्रिय को भी प्रभावित करता है !
ब्रेन का लव सिग्नल कौडेट न्यूक्लियाई में होता है जो दोनों ओर यानि जोड़े में होता है -प्रेम के भावातीत भाव को यही प्रेरित करता है ! इस तरह कई जैव रसायन (opioids ) जब सक्रिय होते हैं तब हम आप यह समझ लेते हैं किसी अमुक ने सुखद अनुभूतियों का पिटारा आपको सौंप दिया है जबकि यह खुद हमारा ही मस्तिष्क होता है जो हमें खुशियों की सौगात सौंपता
है !
अभी कुछ और है आगे ...
मगर पहले एक पाठ दुहराई हो जाय तो फिर मामला आगे बढे ! अब तक यह तय पाया गया कि कुदरत को इसकी तनिक भी परवाह नहीं कि हम लवेरिया या रोमांस के रस में कितना सरोबार और डूब उतरा रहे हैं ,उसका मकसद तो खास तौर पर यही रहता है कि उसकी जनन लीला बदस्तूर जारी रहे और प्रेम को समर्पित जोड़े (पेयर बांड ) संतानोत्पत्ति कर शिशुओं की देखभाल का भी जिम्मा साथ उठायें ! बस इसी काम को अंजाम देने को कुदरत ने ये सारे चोचले गढे हैं !
पुरुष स्वभावतः सुन्दर चेहरों का चहेता है -"हर हंसी चेहरे का मैं तलबगार हूँ " .यही नहीं वह भावी सहचर में उन घटकों /अवयवों की भी चेतन -अवचेतन तलाश करता है जो प्रजनन -उर्वरता की द्योतक हों . वह ऐसे स्पष्ट यौन संकेतकों की तलाश करता है जैसे पतली कमर और चौडे कूल्हे जो प्रजनन की उर्वरता का पावरफुल संकेत देते हैं ! इसी तरह नारियां भी चौडे और पुष्ट कंधे ,चौड़ी छाती , कसी मुश्कों ,और भरी पूरी दाढी पर फिदा होती हैं -यह सारे लक्षण नर हारमोन के प्राबल्य को जताते हैं !
यौन गंध सूघने में मनुष्य की नाक भी कोई नीची नहीं है .साबित हो चुका है कि साथ साथ रहने वाली नारियों का मासिक चक्र मेल कर जाता है ! यह रासायनिक गंध संकेतो के जरिये ही संभव होता है ! पुरुषों का अवचेतन ही यह भाप लेता है कि अमुक नारी का अंडोत्सर्जन ( ओव्यूलेशन )कब हो जाता है, जिस समय निषेचन की सम्भावना सबसे अधिक होती है ! इस काल में पुरुष सहचर उसके प्रति बहुत केयरिंग ,याचनापूर्ण और चाँद सितारे तोड़ने का भी संकल्प लेने को उतारू दिखता है ! एक होता है मेजर हिस्टोकाम्पैटीबिलिटी फैक्टर ( एम् एच ऍफ़ ) जो यह क्ल्यू देता है कि प्रेमोन्मत जोड़े संतति वहन के योग्य हैं भी या नहीं ! इसका चूकिं गर्भ रक्षा से सीधा सम्बन्ध होता है और एक जैसे एम् एच ऍफ़ के रहते गर्भ रक्षा संभव नहीं है तो चुम्बन के समय लार के विनिमय से इसकी पहचान अवचेतन में ही जोड़े कर लेते हैं और समान होने पर प्रत्यक्षतः किसी न किसी बहाने से दूर होने लगते हैं !
हामरे कई सांस्कृतिक रीति रिवाजों में यौन वर्जनाओं के पीछे अनचाहे गर्भ और यौन जनित बीमारियों के रोक की ही कवायद होती है जो पुश्तैनी तौर पर चली आ रही हैं ! आज की आधुनिक जीवन शैली के "समागम पूर्व " व्यवहार -डेटिंग और पेटिंग भी जोडों की यौन उपयुक्तता की छान बीन के तरीके हैं जो उपयुक्त सहचर के चयन का मार्ग ही प्रशस्त करते हैं ! कुछ सच्चे जोडों के मस्तिष्क के अंदरूनी हिस्सों को फंक्शनल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजेस के जरिये देखा गया है जो अपनी सक्रियता के उच्च बिंदु पर जा पहुँचते हैं जिसमें डोपामाईन रसायन के प्रमुख भूमिका होती है ! सक्रियता के ये पहचान बिंदु वेंट्रल तैग्मेंटल एरिया में उभरते हैं -जिसकी आगे की प्रक्रिया को ऊपर का एक हिस्सा न्यूक्लियस अक्यूम्बेंस संभालता है जहाँ डोपामाइन के साथ अब सेरोटोनिन (यह केले में मिलता है -खूब खाईए केले मूड फ्रेश रहेगा ) भी आ मिलता है ! आगे स्नेह.वात्सल्य भावना का जिम्मा आक्सीटोसिन नमक हारमोन निभाता है ! बच्चों के जन्म पर भी इसी आक्सीटोसिन का निकलना अधिक रहता है जो माँ में ममत्व उभारता है ! यहाँ तक कि प्रसूति गृहों में सद्य प्रसूता के साथ की महिलाएं भी तीव्र ममत्व का अनुभव करती हैं -जाहिर हैं आक्सीटोसिन उनकी घ्राण इन्द्रिय को भी प्रभावित करता है !
ब्रेन का लव सिग्नल कौडेट न्यूक्लियाई में होता है जो दोनों ओर यानि जोड़े में होता है -प्रेम के भावातीत भाव को यही प्रेरित करता है ! इस तरह कई जैव रसायन (opioids ) जब सक्रिय होते हैं तब हम आप यह समझ लेते हैं किसी अमुक ने सुखद अनुभूतियों का पिटारा आपको सौंप दिया है जबकि यह खुद हमारा ही मस्तिष्क होता है जो हमें खुशियों की सौगात सौंपता
है !
अभी कुछ और है आगे ...
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