Showing posts with label Dooms Day Reports. Show all posts
Showing posts with label Dooms Day Reports. Show all posts

Friday, 22 May 2015

भारतीय भूकम्पों का यहाँ छुपा है राज!

नेपाल के भूकम्प ने वैज्ञानिकों में भारतीय महाद्वीप के खिसकने में एक नयी नई अभिरुचि उत्पन्न कर दी है। भूवैज्ञानिकों की एक टीम द्वारा अभी 4 मई 2015 के जर्नल नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित एक अध्ययन में भारत के महाद्वीप के 8 करोड़ साल पहले यूरेशिया की ओर इतनी तेजी से चले जाने एक विवरण दिया गया है. 


इस  चित्रकार -कृति में दुनिया १४ करोड़ वर्ष पहले कैसी थी यह दर्शाया गया है जब भारत एक विशाल भूभाग गोंडवाना का हिस्सा था-दाहिनी ओर आज की दुनिया है। आभार: अर्थस्काई 

14 करोड़ से भी अधिक वर्ष पहले, भारत दक्षिणी गोलार्ध के गोंडवाना नामक एक विशाल महाद्वीप का हिस्सा था। लगभग 12 करोड़ साल पहले भारत का इंगित हिस्सा अलग हो गया और प्रति वर्ष लगभग पांच सेंटीमीटर की रफ़्तार से उत्तर की ओर पलायन करना शुरू कर दिया। फिर, 8 करोड़ साल पहले, इसने अचानक प्रति वर्ष लगभग 15 सेंटीमीटर की रफ़्तार पकड़ी और  5 करोड़ साल पहले यूरेशिया से आ टकराया  जिसने हिमालय को जन्म दिया। 


भूवैज्ञानिकों ने इस तीव्र रफ़्तार की व्याख्या की पेशकश की है जिसके अनुसार भारत दो सबडक्शन जोन के संयोजन के खिंचाव से उत्तर की ओर खींच लिया गया था - यह टेक्टोनिक प्लेटों  पर दुहरे खिंचाव के कारण हुआ । भूवैज्ञानिकों ने इस नए मॉडल में हिमालय से प्राप्त मापों को भी शामिल किया है जिससे एक "डबल सबडक्शन" प्रणाली के होने का पुष्ट प्रमाण मिला है जिससे यही कोई 8 करोड़ साल पहले भारतीय भूभाग के यूरेशिया की ओर उच्च गति पर बहाव का आधार मिल गया।

भूगर्भिक रिकार्ड के आधार पर, इस खिंचाव से भारत गोंडवाना से अलग हो 12 करोड़ वर्ष पहले टूटना शुरू हुआ. फलतः भारत टेथिस महासागर में भटकते हुए ऊपर उठता गया । 8 करोड़ साल पहले, यह अचानक प्रति वर्ष 150 मिलीमीटर की दर से ऊपर उठा और यूरेशिया से टकरा गया. अफ्रीका मेडागास्कर और ऑस्ट्रेलिया से अलग होने के बाद भारत बहुत तेजी से ऊपर बढ़ा था .. यूरेशिया की ओर!

अभी यह खिसकाव चल ही  रहा है ! मतलब भूकम्पों का अाना अभी थमेगा नहीं!

Monday, 11 February 2013

टल जायेगी यह आसमानी बला भी ......!


धरती का एक निकटवर्ती क्षुद्रग्रह -2012 DA14 हमारे काफी पास से 15 फरवरी(2013)  को गुजर जाने वाला है जो किसी आसमानी बला से कम नहीं है . मगर प्रेम दिवस आराम से मनाकर आराम फरमाएं ,कोई खतरा नहीं है। नभ वैज्ञानिकों ने जोड़ घटा कर देख लिया है कि यह  धरती से टकराने वाला नहीं है हालांकि यह धरती से चंद्रमा की कक्षा से भी कम दूरी (27,680किमी ) तक आएगा . यहाँ तक की यह हमारे तमाम भूस्थिर कृत्रिम संचार उपग्रहों (communications satellites) की परिधि के भी भीतर .तक आ जाएगा ,यही नहीं यह अब तक धरती के इतने पास से बिना नुकसान पहुंचाए गुजर जाने वाला सबसे बड़ा क्षुद्र ग्रह है .
यह क्षुद्र ग्रह खुली  आँखों से तो नहीं दिखेगा मगर इसे अंतर्जाल पर दिखाने के इंतजाम किये गए हैं . तो क्या होगा जब यह धरती के सबसे करीब से गुजर जाएगा? उत्तर है कुछ नहीं :-) कम से कम इस बार तो घबराने की कोई बात नहीं है . यह इतने कम गुरुत्व का है कि इसके चलते न तो कोई ज्वार उठेगा और न ही ज्वालामुखी भभक उठेगें . हाँ लगता है अपने टीवी चैनेल और भारत के फलित ज्योतिषी  अभी तक इससे बेखबर हैं नहीं तो अब तक हो हल्ला मच गया होता .
क्षुद्र ग्रह का भ्रमण पथ (साभार ,अर्थस्काई )
हाँ क्षुद्र ग्रहों /ग्रहिकाओं और धूमकेतुओं के धरती से टकराने की संभावनाओं से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता -बहुत से लोग मानते हैं कि धरती पर प्रलय के कई कारणों में से एक ये भी हो सकते हैं . कोई छह करोड़ पहले ऐसे ही एक टकराव से डायनासोर के लुप्त हो जाने के कयास हैं . साईबेरिया के तुंगुस्का क्षेत्र में पिछली शती(1908)  भी ऐसे ही एक महा विस्फोट में बहुत विनाश हुआ था . अब जैसे यही गृह है -पूरा 45 मीटर लम्बा और करीब एक लाख तीस हजार मेट्रिक टन भारी है -धरती से इसके टकराने का मतलब है एक साथ अनेक  परमाणु /हाईड्रोजन बमों का फूट  पड़ना-अर्थात महाविनाश! प्रलय! खुदा न खास्ता ऐसा कोई क्षुद्र ग्रह धरती से टकरा जाय तो 2,4 मेगाटन टी एन टी ऊर्जा निकलेगी -ऐसा ही एक छोटा पुच्छल तारा या क्षुद्र ग्रह जब तुंगुस्का से टकराया था तो सारे रेनडियर जानवर मारे गए थे और पूरा वन क्षेत्र विनष्ट हो गया था हालांकि कोई विशाल गड्ढा नहीं पाया गया है . भारत की लोनार झील के भी किसी क्षद्र ग्रह  के टकराने से वजूद में आने की बात कही जाती है . पुष्कर का विशाल जलाशय भी ऐसी ही बना होगा क्योंकि वहां की जन श्रुतियों में आसमान से एक विशाल ब्रह्म कमल के आ टकराने का जिक्र है . तो ऐसे क्षुद्र ग्रह समूची धरती को तो तबाह नहीं कर सकते मगर हाँ एक भरे पूरे शहर का तो सफाया कर ही सकते हैं।
नक्षत्र विज्ञानी इस पर चौबीसों नज़र रखे हुए हैं कोई फ़िक्र की बात नहीं है . सूरज का इसका परिभ्रमण पथ धरती सरीखा है और यह निरंतर अपने भ्रमण पथ पर धरती से दूर पास आता  जाता रहा है -कहते हैं यह 2020 में फिर करीब से गुजरेगा मगर तब भी टकराहट की संभावना नहीं है !

Saturday, 12 March 2011

सुनामी का सितम :सवाल और सबक

जापान में सुनामी के महाविध्वंस ने एक बार फिर जता  दिया है कि कुदरत के कहर के आगे मनुष्य कितना बौना और बेबस है .वैसे तो जापान भूकंप का देश ही कहा जाता है और इस लिहाज से वहां रोजाना की इस आपदा से जूझने को लोग तैयार रहते हैं मगर इस बार रिक्टर  स्केल पर ८.९ की तीव्रता के भूकंप के फ़ौरन बाद आयी विकराल सुनामी  ने मुझे फिल्म २०१२ के प्रलय -दृश्यों की याद दिला दी -फिल्म के कई दृश्य तो ऐसे हैं कि मानो फिल्म  निर्देशक ने जापान की इसी सुनामी को ही अपनी दिव्य दृष्टि से देख लिया हो ....किन्तु क्षोभ की बात यह है कि मानव मनीषा द्वारा  भविष्य का पूर्वाभास कर लेने के बाद भी इनसे निपटने की पुख्ता तैयारी  नहीं होती  और एक महाविनाश अपने दंश से मानवता को कराहता छोड़ जाता है ....काश भविष्य की  विभीषिकाओं का खाका खीचने वाली विज्ञान कथा फिल्मों से ही कुछ सबक लिया गया होता ...
 साई फाई फिल्म २०१२ का एक खंड प्रलय सा दृश्य 

कितना अभागा और अभिशप्त देश है जापान जिस बिचारे की मानों ऐसे ही हादसों से गुजरते रहने की नियति बन गयी है -दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान नाभकीय बमों ने दो शहरों-नागासाकी  और  हिरोशिमा  का लगभग खात्मा ही कर दिया था -आये दिन भूकंप वहां आते ही रहते हैं -फिर भी जापान वासियों का जज्बा तो देखिये वे फिर उठ बैठते हैं और  सीना ताने सिर उठाये खड़े ही नहीं हो जाते सारी दुनिया की एक बड़ी आर्थिक शक्ति भी बन जाते हैं ..जापान  विश्व की तीसरी बड़ी आर्थिक शक्ति है ....मानवीय जिजीविषा की यह एक मिसाल है .इस बार तो जापान के बीस से ज्यादा शहरों  में सुनामी से कहर बरपा दिया -कई शहर तो नेस्तनाबूद हो गए हैं ! चलती ट्रेनें ,जहाज तक को लहरों ने लील लिया है ..लहर लहर शमशान का नजारा है   ....नाभिकीय आपात काल भी घोषित कर दिया गया है क्योकि  परमाणु रियेक्टरों को भारी क्षति पहुँची है .  परमाणुवीय  विकिरण का खतरा उत्पन्न हो गया है और इसके क्या गंभीर परिणाम हो सकते हैं इसे भला जापान से बेहतर कौन समझ सकता है जहाँ नागासाकी हिरोशिमा में आज भी विकिरण जनित जन्मजात विकलांगता अभिशाप बनी हुयी है .
 जापान में महासुनामी के  विध्वंस का एक दृश्य : १०-११  मार्च २०११

सबसे  हैरानी  वाली बात  यह है कि क्या जापान के भविष्य- नियोजकों ने इतने बड़े खतरे का कोई आकलन नहीं किया था? और यदि किया था तो क्या इसके लिए पर्याप्त तैयारियां नहीं की गयीं? कोई भी कह सकता है कि  भला कुदरत के आगे किसकी चल पाती है? मगर इस मुद्दे को ऐसे ही चलताऊ जवाब से नहीं टरकाया जा सकता ....हम विज्ञान और प्रौद्योगिकी की किस प्रगति पर इतना गुमान करते हैं -मतलब साफ़ है प्रकृति की विनाश लीलाओं से निपटने के लिए अभी भी हमारे उपाय और तैयारियां नाकाफी है -हमारे जोखिम बचाव के इंतजाम  बचकाने हैं और आपदा प्रबंध शोचनीय!  अगर जापान जैसे देश में जोखिम पूर्वाभास ,हादसा मूल्यांकन और आपदा प्रबंध की यह स्थति है तो जरा सोचिये अपने भारत में अगर खुदा न खास्ता ऐसी बड़ी सुनामी आ  जाए तो क्या होगा? कुछ महानगरों का वजूद ही नक़्शे से मिट जाएगा .

भारत का एक बड़ा हिस्सा (पेनिस्युला ) समुद्र से घिरा है हमारे कई महानगर भी लबे तट हैं ..मुम्बई ,कोलकाता ,कोचीन गुजरात गोवा और द्वीपों की एक बड़ी श्रृखला सब सागर सहारे ही हैं ...हमें फ़ौरन जापान की इस महा काल सुनामी से सबक लेने होंगें -एक दूरगामी रणनीति बनानी होगी ..भगवान् भरोसे रहने की मानसिकता से उबरना होगा और तमाम अनुत्पादक परियोजनाओं ,कामों से ध्यान हटाकर एक ठोस परियोजना को मूर्त रूप देकर अपने बंदरगाहों और तटीय शहरों को यथासंभव सुनामी -प्रूफ करना होगा ...भारत की एक सुनामी हमें पहले ही चेतावनी दे चुकी है ...लेकिन हम अभी भी बेखबर है -यहाँ जोखिम और आपदा प्रबंध को लेकर कोई गंभीर सोच अभी भी नीति नियोजकों में नहीं है -और सबसे बढ़कर हमारी राजनीतिक इच्छाशक्ति को तो मानों काठ मार गया है  ...यह देश बड़े से बड़े घोटालों के लिए उर्वर बनता जा रहा है ...माननीय सासंदों के लिए निर्माण कार्यों का बजट २ करोड़ से पांच करोड़ करने का चिंतन तो यहाँ है मगर भारत के भविष्य के अनेक मुद्दों पर हमारी दृष्टि धुंधलाई सी हो गयी है ....यह स्थिति  कतई उचित नहीं कही जा सकती ..आईये हम इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठायें या फिर एक जापान  सरीखी किसी नियति के लिए तैयार रहें ...

Wednesday, 23 February 2011

सौर सुनामी चुपके से आयी और चली भी गयी.....

सारी दुनिया जब वैलेंटाईन समारोहों में मुब्तिला थी एक सौर लपट उठी और धरती को अपने आगोश में लेने चल पडी -मानो यह एक अन्तरिक्षीय वैलेंटाईन का नजारा हो!बहरहाल वैज्ञानिकों ने अब राहत की सांस ली है की इस सौर ज्वाला  ने धरती पर ज्यादा क़यामत नहीं ढाई ....जैसा कि २००३ में दुनिया के कई देशों में सौर ज्वालाओं के चलते ब्लैक  आउट की नौबत आ गयी थी -रेडिओ सिग्नल और विद्युत् आपूर्ति तक लडखडा गयी थी ..विगत  14 फरवरी  को सौर  ज्वालाओं का तूफान  पिछले अनेक सौर लपटों की तुलना में कम शक्तिशाली था , लेकिन इसने डरा  तो दिया ही था ....

 इक सौर लपट जो  उठी है अभी 
 
दरअसल सौर लपटें सूरज के सतह पर उसकी आंतरिक विद्युत चुम्बकीय गतिविधियों से निकली अपार ऊर्जा है जो कभी कभी सूरज की समस्त ऊर्जा के दस फीसदी तक भी जा पहुँचती है -यह अन्तरिक्ष में बेलगाम दौड़ पड़ती है ...और धरती तक भी दो चक्रों में आ पहुँचती है -जिसमें पहले चक्र में तो इसका प्रकाश है जो विद्युत् चुम्बकीय चमक के रूप में धरती तक बस मिनटों में आ पहुँचता है जो विगत १३ तारीख की ही रात में आ पहुंचा था और वैलेंटाईन की पूर्व संध्या पर ही धरती का संस्पर्श कर चुका था -दूसरा उप परमाणवी कणों का भभूका है जिसे धरती का चुम्बकीय कवच रोकने में सफल होगा ,हाँ  संचार प्रणालियां अस्त-व्यस्त जरुर हो सकती हैं और उपग्रहों और अंतरिक्षयात्रियों के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है।मगर लगता है संकट टल गया है .

दरअसल सौर गतिविधियों का एक ११ वर्षीय चक्र है जिसका नया दौर बस शुरू ही हुआ है .. और सौर ज्वालाओं जैसी गतिविधि की सक्रियता एक आम बात है -जिसे वैज्ञानिकों की भाषा में कोरोनल मॉस इजेक्शन भी      कहते हैं .कुछ लोगों ने इसका एक और रोचक नामकरण किया है -सौर सुनामी! फिलहाल यह समझ लीजिये कि एक सौर सुनामी चुपके से आयी और चली भी गयी है ..हाँ चुम्बकीय कणों ने ध्रुवों पर इन्द्रधनुषी आभा जरुर बिखेरी!आप स्पेस वेदर  डाट काम पर इन सौर लप्यों की ताजा तरीन जानकारी पर नजर रख सकते हैं!यूनिवर्स टुडे पर भी नजरें गडाई जा सकती हैं .





Wednesday, 26 January 2011

बात फिर उसी तारे की जिसे प्रलय का अग्रदूत माना जा रहा है...दीदार कर ही लीजिये ..

जी हाँ उस तारे की चर्चा यहाँ और यहाँ पहले भी हो चुकी है मगर बात अभी भी बाकी है ... ओरियान यानि हिन्दी के मृग नक्षत्र का बेटलजूस यानि  आर्द्रा तारा इन दिनों सुर्खियों में है ....कल रात मैंने भी इसकी भव्यता को नंगी आँखों से निहारा -आज रात या इन दिनों किसी भी रात आप इसे देख सकते हैं -यहाँ तक शहरों की चुंधियाती रोशनी में भी ...रात आठ साढ़े आठ बजे छत पर जाइए ...लगभग अपने सिर के ऊपर तनिक दक्षिण  दिशा में निहारिये -एक साथ तीन तारे त्रिशंकु सरीखे दिखेगें और इसी के थोडा बाएं तरफ ही तो है यह आर्द्रा तारा जो लाल चमक लिए है ...यह बस अपने अस्तित्व की अंतिम  घड़ियाँ गिन रहा है या फिर समाप्त हो चुका है और अब जो हम देख रहे हैं वह तकरीबन ६०० वर्ष पहले इस तारे के विनाश के ठीक पहले की लालिमा हो सकती है ....दावे हैं कि जब इसके सुपरनोवा बनने की रोशनी धरती पर आयेगी तो यह एक दूसरे सूरज की तरह चमक उठेगा ...मायन कलेंडर के अनुसार २०१२ में दुनिया ख़त्म हो जायेगी -अब कुछ कल्पनाशील लोग इस तारे यानि आर्द्रा के धरती के दूसरे सूरज बन जाने के साथ ही इसे क़यामत का तारा भी   मान    बैठे हैं ....
.ओरियान मंडल के तीन तारों के  बाईं ओर है आर्द्रा 

मजेदार बात तो यह हुई है कि एक खगोल -फोटोग्राफर स्टेफेन गुईसार्ड ने मायन सभ्यता के ध्वंसावशेष के एक मंदिर  के गुम्बज के ठीक ऊपर चमकते इस तारे की एक रोमांचपूर्ण तस्वीर  उतारी है जो यहाँ दिख रही है -यह उनकी तनिक शरारत सी है ताकि २०१२ वाले प्रलय के दावों में थोड़ी और नमक मिर्च लग जाए -मगर इस बात से दीगर जरा उस चित्र को तो देखिये जो सचमुच कितना  रोमांचपूर्ण लग रहा है अपने विनाश के मुहाने पर आ पहुंचे  इस तारे का दृश्य!आप प्रतिभा के धनी इस फोटोग्राफेर की सराहना किये बिना नहीं रह पायेगें ठीक वैसे ही जैसे बैड अस्ट्रोनामी ब्लॉग के फिल प्लेट उनकी फोटोग्राफी की प्रशन्सा करते नहीं अघाते ..

गौर करने की बात यह है कि मायन सभ्यता   ही नहीं हमारे कई मंदिरों और स्थापत्य के नमूनों की स्थापना में भी खगोलिकी का बहुत सहारा लिया गया है ...नक्षत्रों   से मंदिरों के  कोणों और परिमापों को संयोजित किया गया  है ....हमारे पूर्वज पोथी पत्रों   से नहीं बल्कि सीधे आसमान को निहारते थे और उन्हें आकाश में तारों और ग्रहों की स्थितियों का आज के बहुसंख्यक लोगों की तुलना में अच्छा ज्ञान भी था ....कन्याकुमारी के मंदिर में सूर्योदय की पहली किरण अपरिणीता पार्वती की नथ पर पड़ती है जो हीरे की है ..और सारा पूजा मंडप  आलोकित हो उठता है ......मतलब यह मंदिर प्रत्येक मौसम में सूर्योदय की किरणें किस्समान बिंदु पर अवश्य  पड़ेगी इस सटीक गणना के साथ निर्मित हुआ है .....इधर देखा जा रहा है कि  हमारे कुछ उत्साही लोग  अपने पूर्वजों की खगोलीय क्षमताओं की खिल्ली उड़ाते हैं मगर उन्हें खुद भी आकाशीय ग्रहों और तारों के बारे में अपने पूर्वजों की  तुलना में नगण्य सी जानकारी है ....मगर जैसा कि फिल कहते हैं उन्हें अतिज्ञानी  भी मानने की जरुरत नहीं है - कई मायनों  में उनकी बेबसी समझी  जा सकती है उनके पास   साधारण से दूरदर्शी तक न थे जिनकी एक विकसित श्रृखला हमारे पास आज है!उन्होने अपनी नंगी आँखों से ही खुले आसमान को निहारा और कृषि और बाद में धर्मों से अनेक  ग्रहों नक्षत्रों के सम्बन्ध जोड़े ...

यह कितना रोचक हैं न कि जिन तारों और नक्षत्रों को उन्होंने निहारा आज उनके वंशधरों के रूप में हम भी हम उन्ही  को देख रहे हैं और हमारी आगे की पीढियां भी उन्हें इसी तरह देखेंगी ....ये एक तरह से हमारी पीढ़ियों को जोड़ने वाले प्रकाश पुंज हैं ....मायन लोगों ने आर्द्रा तारे को क्यों मंदिर के गुम्बज के सापेक्ष प्राथमिकता दी होगी ? क्या उनके वंशधर इसकी गुत्थी सुलझा लेगें -या उन्होंने लाल तारे के रूप में उसके अवसान को अनुमानित कर लिया था और विदाई के तौर पर उसकी स्मृति में एक भव्य इमारत तैयार कर गए होंगें!

 आपसे गुजारिश है आज या किसी एक रात को पूरे परिवार के साथ असमान में  चमकते इस तारे -आर्द्रा का दीदार कर ही लीजिये ..पता नहीं यह कल हो या न हो!तारे को खोजने में यहाँ दिया चित्र उपयोग में लायें!


Wednesday, 25 November 2009

क्या प्रलय सचमुच इतना करीब है ? कौन जाने यह दबे पांव आ ही न जाय !

आगामी २०१२ में प्रलय की अनेक संभावनाएं व्यक्त हो रही है ! एक ब्लाकबस्टर फ़िल्म भी अभी अभी रिलीज हुई है नाम है २०१२!
हिन्दी नाम रखा गया है प्रलय की शुरुआत! क्या फिलम है भाई!हौलनाक,दहशतनाक ,खौफनाक सब विशेषण पानी मांगते नजर आते हैं! कमजोर दिल वालों का हार्ट अटैक हो सकता है -बिलीव मी! मैं तो इंटरवल में ही पनाह मांग गया -बार बार दिल को यकीन दिलाया कि भैये ये हकीकत नहीं है तब जाकर उसने बल्लियों उछलना छोड़ा! आप भी मजबूत कलेजा करके ही इस फ़िल्म को देखें! सच  कह रहा हूँ -इसे कैजुअली लिए तो भुगतिएगा! इस फ़िल्म में धरती का महाविनाश दिखाया गया है!कारण तो बोगस विज्ञान(गलत ढंग और तौर तरीके से पेश हुआ विज्ञान ) है कि सौर ज्वालाओं की अधिकता के चलते न्यूट्रिनो (एक नाभिकीय अनावेषित कण ) की बौछार से धरती का गर्भथल  पिघल उठता है और ऊपरी परतें दरक जाती हैं ,और दरकती चली  जाती हैं -महाद्वीप के महाद्वीप नष्ट होते जाते हैं -भयंकर सुनामियाँ उन्हें लीलती चलती हैं! जैसे खुद महाकाल अपने जबड़ों को खोल सारी दुनिया को निगल लेने को उद्यत हो गया हो! मानवता का वजूद मिटने को है ! एक नई प्रलय आ धमकी है!

कहानी: धरती में पड़ती दरारें और भूकंप जैसी घटनाओं की जांच के संबंध में एक अमेरिकी भूवैज्ञानिक एड्रियन (श्वेतल एजिफर) को अपने एक दोस्त वैज्ञानिक सतनाम (जिम्मी मिस्त्री) से मिलने के लिए भारत आना पड़ता है। सतनाम एड्रियन को दिखाता है कि किस तरह से धरती का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। एड्रियन वापस जाकर इसकी रिपोर्ट अमेरिकी राष्ट्रपति थॉमस विल्सन (डैनी ग्लोवर) के सचिव कार्ल (ऑलिवर प्लैट) को सौंपता है। कुछ अन्य देशों के राष्ट्रपतियों की बैठक के बाद यह साफ हो जाता है कि तीन वर्षो बाद यानी 2012 में धरती का विनाश हो जाएगा।"
मगर क्या यह सब हकीकत में बदल सकता है? क्या २०१२ में प्रलय आने वाली है? क्या उसके पहले नहीं आ  सकती? आने वाली प्रलय अगर वह आई तो कैसी होगी? जल प्रलय? जिसमे सारी दुनिया जल समाधि  लेगी! या फिर अग्नि प्रलय जिसमे सूर्य नेजे पर (धरती के बहुत करीब ) आ जायेगा और धरती भक्क से जल उठेगी! सारीं मानवता  स्वाहा! आखिर ऐसी हे तो होगी प्रलय? मगर वैज्ञानिकों की राय में धरती पर आने वाली आपदाओं में किसी पथभ्रष्ट धूमकेतु या फिर उल्का पिंड या क्षुद्र ग्रह/ग्रहिका की ज्यादा भूमिका हो सकती है जो अचानक ही धरती के परिवेश/कक्षा  में आकर जल कर या सीधे टकरा कर प्रलय सी तबाही मचा सकते हैं! जैसे कि कहा जाता है कि कोई ६ करोड़ वर्ष पहले ऐसी ही एक घटना में डायनोसोर लुप्त हो गए थे!सौ वर्ष पहले रूस के तुंगुस्का में भी एक ऐसी ही घटना में लाखो जीव जंतुओं का सफाया हो चुका है!


प्रलय का कोई दिन मुक़र्रर नहीं है -यह दबे पांव आ  भी सकती है -संभावनाएं हैं मगर २०१२ में ही ऐसा हो कौन निश्चितता से  कह सकता है ? प्रलय आनी होगी तो कभी भी आ  सकती है -आसमान के रास्ते ! दबे पांव ! मगर हम भी तैयार है बल्कि हो रहे हैं ! मेरी माने तो मस्त रहे -धरती का बाल बांका भी नहीं होने वाला है ! मगर मेरी इस बात में क्या दम है -सही आपत्ति है आपकी मगर यह एक अंतर्बोध है जिसके वजूद को विज्ञान की पद्धति में भी इनकार नहीं किया जा सका है !