Showing posts with label Popular Science. Show all posts
Showing posts with label Popular Science. Show all posts

Thursday, 5 July 2012

पिंकी प्रामाणिक के लिंग की प्रमाणिक जांच कब तक?


अंतरराष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी पिंकी प्रामाणिक की लैंगिक पहचान का मुद्दा गहराता जा रहा है। जाहिर है उसके बाह्य लैंगिक प्रमाण पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे में गुणसूत्रों की जांच ही अब एकमात्र भरोसेमंद और प्रामाणिक विकल्प बचा है। आश्चर्य है कि जिस देश में डीएनए विश्लेषण से पैतृकता तक की पहचान अब आम बात हो गयी हो वहां किसी के लिंग की पहचान को लेकर इतना घमासान मचा हुआ है जबकि अवैध रूप से लिंग पहचान का यह धंधा भारत की गली कूचो में बैठे डॉक्टरों तक चलता रहा है। मगर वहां मकसद कन्या भ्रूण की पहचान और गर्भ समापन का रहता है। जहां एक देश, एक व्यक्ति और समाज की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हो, वहां एक छोटी सी जांच का इतना लटकाया जाना आश्चर्य में डालता है। यह दूसरे देशों के सामने भी भारत में तकनीकी स्तर की अक्षमता का गलत नज़ारा पेश करता है।

बार बाडी से लिंग की पहचान 

वैसे भ्रूण के लिंग की जांच की प्रक्रिया जो अम्नियोसेंटेसिस कहलाती से लिंग की जांच सहजता से हो जाती है और पता लग जाता है कि भ्रूण लड़की का है या लड़के का....मतलब लड़की के दो लैंगिक गुणसूत्र समान होते हैं जो अंग्रेजी के एक्स एक्स सरीखे दिखते हैं। लड़के में एक एक्स आधा टूटा हुआ दिखता है। लेकिन वयस्क में इसी टेस्ट के लिए उसका कोई ऐसा ऊतक (कोशिका समूह ) जांच के लिए लेना होता है जिसमें कोशिका विभाजन तेज गति से चलता हो -जैसे अस्थि मज्जा (बोन मैरो)। बोन मैरो लेकर उसे अल्कोहल और एसिटिक अम्ल के एक निश्चित अनुपात में डालकर प्रिजर्व करने के बाद एक विधि जिसे कैरियो टाईपिंग कहते हैं के जरिये गुणसूत्रों का मानचित्रण होता है। अगर लैंगिक गुणसूत्रों के जोड़े असमान हैं मतलब एक एक्स दूसरा वाई तो वह लड़का है और अगर दोनों समान हैं तो लडकी मतलब एक्स एक्स। 
               
पुरुष गुणसूत्रों का प्रोफाईल 
एक  और जांच है जिसे बार बॉडी टेस्ट कहते हैं। इससे किसी महिला होने की सहज ही पुष्टि हो जाती है। यह बेहद आसान विधि है और मिनटों में संपन्न की जा सकती है। और इसका उतक केवल गालों की अंदरुनी खुरचन से ही मिल सकता है। इसमें मइक्रोस्कोप में एक ख़ास रासायनिक रंग से रंगे ऊतक में एक काला धब्बा दिखता है जो महिला होने की प्रामाणिक पुष्टि  है.  .                                                                                                        

                                                                                                                        
                                                                                                                        नारी गुणसूत्र 

ये दोनों तरीके भारत में भी सहज है आम हैं और पूरी दुनिया में दशकों से आजमाए जा रहे हैं मगर खिलाड़ी पिंकी का मामला इतना रहस्यमय क्यों बनाए रखा गया है, यह आश्चर्यजनक है और कई निहितार्थों की ओर संकेत करता है। क्या वह सचमुच एक एक्स वाई लड़का है? तब तो भारत की भी पूरी दुनिया में बड़ी किरकिरी होगी और कई लोगों पर कार्रवाई भी। क्या इसीलिए ही इस मामले को दबाया जा रहा है? जो भी हो आज की इस वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी समृद्ध दुनिया में ऐसे सच को ज्यादा दिनों तक दबाया नहीं जा सकेगा। सच अब बिना विलम्ब के हमारे और दुनिया सामने आ जाना चाहिए । अब यह किसी एक देश से जुड़ा मसला न होकर अंतरराष्ट्रीय बन चुका है।


मगर कई ऐसे मामले हैं जिनमें सेक्स का गुणसूत्रीय सत्यापन भी जटिल हो जाता है जो लैंगिक गुणसूत्रों के असामान्यता के चलते होता है .पिंकी प्रामाणिक का अगर ऐसा भी कोई मामला है तो भी वह सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा सकता ?
विशेष सूचना:ओलम्पिक असोसिएशन ने अब स्पर्धाओं में भाग लेने के लिए लैंगिक सत्यापन की बाध्यता समाप्त कर दी है!  


Tuesday, 12 June 2012

भारत में पहली बार मकड़ियों का हमला

ऐसी घटना भारत में पहले कभी नहीं घटी। असम के सादिया शहर में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान भगदड़ मच गयी जब रहस्यमयी मकड़ियों का एक विशाल झुण्ड न जाने कहां से आ गया। इन मकड़ियों ने लोगों पर हमला कर दिया। जिन्हें इन मकड़ियों ने डसा उनमें से दो के मरने की खबर है। हालांकि शवों का पोस्टमॉर्टम नहीं हो पाया मगर कुछ कीट विज्ञानी मानते हैं कि ये मकड़ियां विषैली रही होंगी। चूंकि भारत में ये मकड़ियां पहले कभी देखी नहीं गईं इसलिए इन्हें लेकर विश्वभर के कीट विज्ञानियों में जिज्ञासा है। यहां तक कि विश्व प्रसिद्ध टाइम पत्रिका ने भी इस खबर को प्रमुखता से 4 जून 2012 के अंक में प्रकाशित किया है। मकड़ियों का यह आक्रमण पिछले महीने में देखा गया था और एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार ने इस पर ख़ास 'स्टोरी' की थी।
टैरनटूला   से मिलते जुलते  ऐसे ही थे वे मकड़े 

डिब्रूगढ़ और गुवाहाटी विश्वविद्यालय के कीट विज्ञानियों ने इस मकड़ी या मकड़े को पहचानने में असमर्थता व्यक्त की है मगर कहा है कि ये विश्व के एक खौफनाक विशाल मकड़े टैरनटुला के परिवार की हो सकती हैं। एक दूसरे कीट विज्ञानी ने कहा कि यह दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया मूल की मकड़ी ब्लैक विशबोन हो सकती है। मगर ऑस्ट्रेलिया की मकड़ी आखिर यहां कैसे आ पहुंची? मधुमक्खियों का झुंड में हमले करना एक आम घटना है और हॉलीवुड की कई फिल्मों में मधुमक्खियों के झुंडों में हमले के खौफनाक दृश्य भी दिखाए गए हैं। हालांकि हॉलीवुड मकड़ियों के हमले पर भी फिल्में बना चुका है। '8 लेग्ड फ्रीक्स' काफी चर्चित हुई थी। मगर मकड़ियों/मकड़ों का ऐसा आक्रमण कम से कम भारत में तो अब तक कहीं से सूचित नहीं है।
'8 लेग्ड फ्रीक्स' का एक दृश्य 
ब्रितानी प्रकृति विज्ञानी विजय के सिंह ने कहा है कि मकड़ियों का झुंड में हमला करना एक बहुत कम घटने वाली घटना है। उनके अनुसार पर्यावरण में हुआ कोई असामान्य परिवर्तन उनकी जनसंख्या वृद्धि को उकसा सकता है। जैसे पिछले वर्ष ऑस्ट्रेलिया में बाढ़ के पश्चात मकड़ियों के एक विशाल झुंड ने खेतो को मकड़जालों में तब्दील कर दिया था। पाकिस्तान में भी आयी विशाल बाढ़ के पश्चात मकड़ियों ने पेड़ पौंधों को मानो ढक सा दिया हो। सदिया की मकड़ियों को पहचान के लिए महाराष्ट्र के मकड़ी संस्थान (इन्डियन सोसायटी ऑफ अरैक्नोलॉजी) को भेजा गया है।
बहुत से लोग कई तरह के जीव जंतुओं को डर के चलते भरीपूरी आंख से देख भी नहीं सकते। मकड़ी ऐसे टॉप टेन भयावने जंतुओं की सूची में है। गोलियेथ टैरनटुला सबसे बड़ा मकड़ा है जो छोटी हमिंग चिड़ियों को भी अपना शिकार बना लेता है। यह एक फुट तक बड़ा हो सकता है और इसके विषदंत भी काफी बड़े होते हैं। माना जा रहा है कि सादिया का मकड़ा इसी नस्ल से मिलता जुलता है। इस तरह के मकड़ा-आक्रमण ने भारतीय मकड़ी विज्ञानियों की पेशानी पर बल ला दिया है। आगे की खोजबीन जारी है।

Saturday, 15 October 2011

झींगुरों का रुनझुन यौन जीवन ...सुन सुन ...कहीं कुछ हमसे तो नहीं कहता?

अब भला इन क्षुद्र प्राणियों के इस निजी जीवन में किसी की क्या रूचि हो सकती है ..मगर मानवों एक एक ऐसा जिज्ञासु तबका है जो यहाँ भी  ताक झाँक लगाये रहता है -मतलब कीट व्यवहार विज्ञानियों का और मजेदार यह है कि ये इन हेय  प्राणियों के व्यवहार के भी निहितार्थ उच्च प्राणियों-मनुष्य  के व्यवहार से जोड़ते हैं . अब एक ताजा अध्ययन को ही लें जो करेंट बायलाजी शोध जर्नल में छपा है और जिसके मुख्य शोध वैज्ञानिक -लेखक  डॉ.रोलैंडो राड्रिग मुनोज हैं -इन्होने झींगुरो के यौन जीवन पर शोध करके पूर्व प्रचलित कई जानकारियों का खंडन किया है ..ऐसा माना जाता था कि झींगुरों में नर के प्रणय निवेदन के बाद मांदा द्वारा सर्व समर्थ नर के चुनाव और यौन संसर्ग के पश्चात भी ताक लगाये कुछ दूसरे नरों की लह जाती थी और सबसे बाद के नर के गर्भाधान से वजूद में आये अंडे ही आगामी पीढी में ज्यादा योगदान करते हैं ...ऐसा  दूसरे दूसरे कीटों में में भले  है मगर झींगुरों की शोध के अधीन आयी प्रजाति (Gryllus campestris) में तो ऐसा नहीं पाया गया है ...

झींगुरो का यौन जीवन के अध्ययन की प्रजाति (Gryllus campestris)
लैंगिक चुनाव में मादा द्वारा एक वांछित नर से संसर्ग के बाद भी दूसरे नरों के साथ जुडनें में खुद मादा की सहमति/ सहभागिता/झुकाव  का मुद्दा बड़ा ही विचारणीय रहा है ....कुत्तों में भी यही बहु -आधान व्यवहार दिखता है ....जहाँ एक मादा कई कुत्तों के साथ संसर्ग करती है ..इस व्यवहार के जैवीय वैकासिक बिंदु पर वैज्ञानिकों का गहन चिंतन मनन चलता ही रहा है -जब एक नर से ही संतति वहन का नैसर्गिक उद्येश्य पूरा होता हो तो फिर दूसरे नरों से संसर्ग की भला क्या आवश्यकता ....प्रकृति के ऐसे गूढ़ रहस्यों पर अभी भी पर्दा पूरी तरह उठा नहीं है मगर इनके पीछे छुपे गुह्य कारणों को व्यवहार वैज्ञानिक (ईथोलोजिस्ट ) जैवीय विकास के परिप्रेक्ष्य में समझने बूझने का प्रयास करते हैं और सामान्यतः समझ में न आने वाली इन गुत्थियों के  हल का प्रयास करते हैं ....मजे की बात यह है कि मौजूदा झींगुर प्रजाति में मादा दूसरे नरों की अभिलाषा नहीं रखती .....

इन 'क्षुद्र' प्राणियों पर दिन रात फोकस  अपने दो लाख से ज्यादा वीडियो फुटेज के श्रमशील अध्ययन के बाद डॉ.रोलैंडो राड्रिग मुनोज और उनकी टीम इस प्रेक्षण को बिना संदेह बयाँ कर पायी कि यहाँ मात्र एक नर से ही संसर्ग के बाद संतुष्ट हो रहने वाली झींगुर की रक्षा में नर झींगुर बड़ा ही मुस्तैद  रहता है और भले ही किसी शिकारी पक्षी का वह  खुद शिकार हो जाय सद्य गर्भित मादा को अपनी मांद में घुस जाने तक वह आक्रान्ता को उलझाये रखता है ....और प्रायः खुद वीरगति को प्राप्त हो जाता है ...और इसी का इनाम है उसे कि आगामी पीढी /संतति /वंशधर खुद उसी के ही होते हैं किसी गैर के नहीं ....इस प्राणोत्सर्ग कर देने वाले प्यार के मंजर में फिर दूसरे नरों  का आखिर क्या काम?  अब इसके मानवी निहितार्थ पर भी तनिक चिंतन कर लीजिए...नारी के लिए हर लिहाज से एक ही समर्थ पुरुष /पति संतति वहन के लिए प्रयाप्त है ....न न ऐसा कोई अध्ययन मनुष्य के संदर्भ में हुआ हो तो मुझे नहीं पता मगर ऐसे विचार तो मन में आ ही सकते हैं ....प्राकृतिक विकास की प्रक्रिया में भी ऐसे ही नर का चयन ज्यादा संभावित है क्योकि वह अपनी ही सरीखी समर्थ संतति के  जन्म/वजूद को सुनिश्चित कर रहा है ..

जो भी हो , इस झींगुर प्रजाति में तो बहरहाल तांक झाँक और मौके की तलाश में लगे नरों के लिए निराशा ही निराशा है ..मादा की भी कोई ऐसी रुझान नहीं है ...क्योकि वह खुद भी और उसकी वंश बेलि ऐसे नर के सामीप्य -संरक्षण में सुरक्षित है ...जब अगली पीढी तक सुरक्षित हो जाय तो  और भला चाहिए भी क्या ..पूरी रिपोर्ट यहाँ है ....

Sunday, 18 April 2010

ज्वालामुखी के धुएं ने मचाया कुहराम -सभी यूरोपीय उड़ाने रद्द!

आईसलैंड का एक  ज्वालामुखी ईजाफज्जल्लाजोकुल्ल   (Eyjafjallajokull) -(अजीब नाम है,लगता है अल्लाह का सबसे प्यारा ज्वालामुखी  है !) के फटने से कई यूरोपीय देश इससे निकलने वाले गर्द गुबार (ऐश -धुयें ) में डूब गए हैं -जिससे हवाई यातायात की कमर ही टूट गयी है -विदेश यात्रा पर गए हमारे प्रधानमन्त्री को रास्ता बदल कर आने को मजबूर होना पडा है .इसे ९/११ की घटना के बाद हवाई यातायात की सबसे बड़ी रुकावट के रूप में देखा जा रहा है -यूरोप के सभी देशों ने अपनी उड़ाने रद्द कर दी हैं -करीब ९ अरब डालर प्रतिदिन के नुकसान  की आशंका है .बहुत से यात्री बीच में फंसे हुए हैं और सहायता की गुहार लगा रहे हैं! बी बी सी की इस रिपोर्ट के वीडियो में गर्द और गुबार की आंधी  को तो देखिये !

यह ज्वालामुखी अभी पिछले माह ही सक्रिय हुआ है और भरी मात्रा में गर्द गुबार वातावरण में छोड़ रहा है .यह एक ग्लेशिअर का ज्वालामुखी  है जिसके सक्रिय हो जाने के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं और भयानक बाढ़ की आशंका भी उत्पन्न हो गयी है .इस गर्द गुबार में सिलिका -शीशा के तिनके हैं जो वायुयानों के इंजन को भारी नुक्सान पंहुचा सकते हैं -उनमें विस्फोट तक कर सकते हैं -विंड स्क्रीन को धूसर कर सकते हैं -ऐसा कहना है यूनिवर्सिटी कालेज सेंटर लंदन के हजार्ड रिसर्च सेंटर के बिल मैक्क्ग्येरे का जो इस विषय के विशेषज्ञ  हैं .

नार्वे,स्वीडन  ,फिनलैंड और डेनमार्क की सभी ४००० उड़ाने तो पहले ही रद की जा चुकी थीं अब और दूसरे  यूरोपीय देशों -फ्रांस स्पेन आदि ने भी  अपनी उड़ाने बंद करने का फैसला लिया है .एअर इण्डिया ने भी अपनी कई यूरोपीय  उड़ाने रद  कर दी हैं .कहा जा रहा है यह स्थिति अभी कम से कम एक सप्ताह तक तो रहेगी ही .एयर इंडिया ने यूरोप और उत्तरी अमेरिका के लिए अपने सभी उड़ानों को रद्द करने की अधिकारिक घोषणा आज यहां की।  दिल्ली और मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से विमान से यात्रा करने वाले हजारों घरेलू और विदेशी यात्री प्रभावित हुए हैं।ब्रिटेन के प्राकृतिक पर्यावरण अनुसंधान परिषद् का  एक वैज्ञानिक दल अपनी जांन  जोखिम में डाल कर डोनियर २२८ के हवाई सर्वेक्षण के जरिये इस गुबार के अध्ययन   में जुट गया है -नतीजे वायुयान यात्राओं को  बहाल करने में मददगार  हो सकते हैं .


यह सब तो किसी पर्यावरणीय  आतंकवाद से कम नहीं लगता -सोचिये जरा अगर आतंकवादी इन कुदरती कारकों को किसी तरह सक्रिय करने में सफल हो जायं तो कितना बड़ा कुहराम मच सकता है ..इस ओर भी सजग निगाह होनी चाहिए !
धुयें का एक दृश्य यहाँ पर है! 

ज्वालामुखी विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर पीटर सम्मंड यहाँ ऐसे ज्वालामुखियों के विस्फोट का विज्ञान समझा रहे हैं !

Wednesday, 14 April 2010

कौतूहल का फंडा बना तोते का अंडा !

ताज्जुब की बात है आज दो खबरों में तोते को पिजरे में ही अंडा देने का समाचार सुर्ख़ियों में है और दोनों अलग अलग जगहों से ...एक खबर बनारस से है तो दूसरी समस्तीपुर बिहार से ....और दोनों ही दैनिक जागरण में ....अमूमन भारतीय तोते पिजरों में अंडे नहीं देते जो कि एक सामान्य अवलोकन की बात है .हाँ बुजेरिगर्स जिन्हें  आम तौर पर लोग लव बर्ड्स भी कह देते हैं (जबकि वे अलग प्रजाति हैं ) पिजरे में अंडे दे देते हैं और उनसे बच्चे भी निकलते हैं ..मगर तोते आम तौर पर पिजरे में अंडे नहीं देते ..जो बात मुझे हैरानी में डाल रही है वह यह है कि एक ही समय में यह अनहोनी सी घटना दो अलग अलग प्रान्तों में घटी है और दोनों ही रिपोर्ट एक ही समाचार पत्र समूह के दो अलग संस्करणों में छपी है ...समय एक है ,घटनाएं अलग अलग स्थानों की ...यह कोई प्लांटेड खबर तो नहीं है ?


कुछ लोगों को यह ताज्जुब लगता है बिना नर के मादा अंडे नहीं दे सकती -लोग भूल जाते हैं कि फ़ार्म के मुर्गी के अंडे बिना नरों के साहचर्य के ही निअकलते हैं -हाँ निषेचन के लिए नर का साथ रहना जरूरी है -अन्यथा मादा में अनिषेचित अंडे का अविकास सहज तौर पर होता है और समयानुसार उनके अंडे बाहर आ ही जायेगें -वे निषेचित हों या अनिषेचित ..मगर तोते को पिजड़े में अंडे देने का समाचार मैंने पहली  बार सुना तो इन्टरनेट खंगाला और पाया कि यह कोई नई घटना नहीं है -मगर एक ही कालावधि में दो सुदूर  जगहों पर ऐसी घटना का एक साथ घटना जरूर हैरानी में डालता है .यह तोतों का प्रजनन काल है तो यह संभव ही है और बदलते  पर्यावरण और पर्यावास के नाश होने के कारण अगर तोते पिजड़े में अंडे दे रहे हैं तो इसे पक्षी विज्ञानियों को एक नए नजरिये से देखना होगा ! क्या इनका प्रजनन व्यवहार बदल रहा है? 

Saturday, 20 March 2010

मदमस्त मिलन इक ऐसा हो जाये....चाह न मिलने की कोई रह जाए

 मदमस्त मिलन इक ऐसा हो जाये , शुक्राणु कोष आजीवन मिल जाए  ,  चाह न मिलने की कोई रह जाए .....न न यह कोई कविता नहीं बल्कि एक हकीकत है कितनी ही चीटियों, मधुमक्खियों ,ततैयों और दीमकों का सेक्स जीवन ऐसा ही होता है .इन कीट परिवारों की मादाएं बस कुछ देर या दिनों के ही प्रणय उड़ान में अपने नर संगियों से जीवन भर के लिए शुक्राणु -गिफ्ट प्राप्त कर धारण  कर लेती हैं जिससे वे अपने अण्डों का निषेचन करती रहती है -संगी कीट की भूमिका ख़त्म!.नर संगियों में इस प्रणय उड़ान में मादा कीट का सानिध्य प्राप्त करने की  होड़ ही नहीं भयंकर  मारकाट भी मचती है और प्रायः  एक विजेता नर कीट मादा से संसर्ग कर उसे जीवन भर के शुक्राणु उपहार से धन्य/पूर्णकाम  कर जाता है ....

कभी कभी जब ऐसा हो जाता है की मादा अपने एकल प्रणय उड़ान में कई नर संगियों से संसर्ग कर लेती है तो उन सभी के शुक्राणुओं में सबसे पहले मादा के अंडाणु तक कौन पहुंचे इसकी होड़ शुरू हो जती है .कोपेनहेगेंन विश्वविद्यालय की सुसेन्न देंन  बोएर ने अपने अनुसन्धान में पाया है कि विभिन्न नर कीटों के शुक्राणु परस्पर ऐसे स्राव छोड़ते हैं जिससे प्रतिस्पर्धी शुक्राणु निष्क्रिय तो हो जाय मगर वह खुद तो सुरक्षित और अति सक्रिय बने रहें  -जब सभी ऐसी ही युक्ति अपनाते हैं तो एक अजीब सा कोलाहल मच उठता है और इसी जद्दोजहद में कोई एक शुक्राणु तैयार अंडे को निषेचित कर देता है .और यह क्रम चलता ही रहता है जब तक कोई भी नाद निषेचन को शेष रहता है . यह जीवंत जंग  आगे भी चलती रहती  है मादा-"रानी " के नए अण्डों की खेप के आते ही यही माजरा फिर शुरू हो जाता है .लीफ कटर चीटी प्रजाति में  शुक्राणुओं के बीच जब मार काट अपने चरम पर पहुँच जाती है तो वह एक प्रेमिल फुहार रूपी स्राव से सभी शुक्राणुओं को शांत कर देती  है .और उन्हें कुछ देर  राहत देकर फिर से एक नए युद्ध को तैयार  करती है .

                                                      एक "उड़ान प्रणय" मधु मक्खी में

कीट पतंगों के सामाजिक जीवन में वैसे तो एक निष्ठता एक नियम सा ही है -मतलब केवल एक संगी से संसर्ग मगर कुछ मादाएं बहु संगी सम्बन्ध बना लेती हैं और वहां शुक्राणु युद्ध की नौबत आ जाती है .मगर ऐसे युद्ध को मादा ज्यादा प्रोत्साहित नहीं करती क्योंकि यह उसकी जीवन भर की जमा पूजी होती है और इसकी अधिक क्षति उसके अनवरत प्रजननं को बाधित कर सकता है -इसलिए अधिक उग्र और आक्रामक शुक्राणुओं पर वह अपने  प्रेमिल स्राव फुहार से नियंत्रण रखती है .ताकि शुक्राणुओं का क्षय कम से कम हो और उसकी अनवरत जनन क्रिया अबाध "दुधौ नहाओ पूतौ  फलो " की तर्ज पर चलती रहे और भावी कीट साम्राज्य रक्षित हो सके .

Sunday, 4 October 2009

वैज्ञानिकों ने जाना चिर युवा होने का राज !

अखबारों में  यह खबर सुर्खियों में है ! कभी च्यवन ऋषि ने चिर युवा बने रहने का नुस्खा हासिल किया था च्यवनप्राश के रूप में ! मगर आज का च्यवनप्राश मानकों पर खरा नहीं उतरता ! उम्र की ढलान को रोकने के लिए दुनिया भर में वैज्ञानिक कब से लगे हुए हैं -नए नए नुस्खों और माजूमों के साथ ! नित नई नई पेशकशें ! और अब यह -

वैज्ञानिकों का नया दावा है कि है कि बढ़ती आयु और आयु संबंधी बीमारियों का उपचार संभव है। हाल ही में चूहों व बंदरों पर किए गए शोध में वैज्ञानिकों ने जीवनकाल बढ़ाने के तरीके को खोज निकाला है। इससे इंसान लंबे समय तक युवा रह सकेगा।


यूनिवर्सिटी कालेज लंदन के इंस्टीट्यूट आफ हेल्दी एजिंग के वैज्ञानिकों ने मानव जींस 'एस6 कायिनेज 1' [एस6के1] में हेरफेर कर उम्र बढ़ाने वाले प्रोटीन के उत्पादन को रोके रहने में सफलता पायी है । चूहों पर किये गए प्रयोगों में शोधकर्ताओं   ने यह भी पाया है कि  कैलोरी खपत की मात्रा को 30 प्रतिशत तक घटाकर जीवनकाल को 40 फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है। अमेरिकी पत्रिका 'साइंस' में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक एस6के उत्पादन को रोककर भी यही फायदे हासिल किए जा सकते हैं। इसके लिए आहार  में कमी करने की कोई जरूरत नहीं। एस6के1 भोजन में बदलाव के बारे में शरीर की प्रतिक्रिया निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाता है।



देखा गया की ऐसे चूहों जिन के जीन में वांछित बदलाव कर दिए गए थे अन्य चूहों से २० फीसदी अधिक काल तक जिए -वे कुल ९५० दिन जिए आम चूहों से १६० दिन अधिक ! इन चूहों में टाईप २ मधुमेह जैसी बीमारियां भी नहीं हुईं ! उनकी  टी कोशिकाएं जो रोगरोधी होती हैं भी तरोताजा देखी गयीं -मतलब उम्र के बढ़ने  के साथ मनुष्य की रोग रोधन क्षमता का ह्रास होना भी इस अध्ययन से प्रमाणित हुआ है !वेलकम ट्रस्ट द्वारा पोषित इस अध्ययन से जुड़े डेविड जेम्स का कहना है की "इस अध्यन से हम उम्र की बढ़त को रोकने का सहसा ही एक कारगर नुस्खा पा गए हैं ! चूहों पर इस शिद्ध के बाद मेटफोमिन नामक दवा का ट्रायल अब मनुष्य पर किया जाएगा ! रापामायासिन  भी सामान प्रभावों वाले औषधि के रूप में देखी जा रही है !



 

Tuesday, 11 August 2009

अन्तरिक्ष में आतिशबाजी !

पर्सिज तारामंडल को लोकेट करें -चित्र पर क्लिक्क करें
जी हाँ ,गूगल बाबा की पैनी निगाहें आगाह कर रही हैं कि अन्तरिक्ष में आज रात एक अद्भुत नजारा दिखेगा जिसे आधीरात के बाद उत्तरी पूर्वी क्षितिज में देखा जा सकेगा ! यह अद्भुत दृश्यावली पर्सिज उल्का वृष्टि (Perseid meteor shower) कहलाती है -आसमान में लुक्क -लुक्कारे छूटते हैं .आम आदमी को लगता है देवता लोग आतिशबाजी का लुत्फ़ उठा रहे हों ! वैसे भी बरसात का जिम्मा इन्द्रदेव ने इस बार संभाला ही नही है उन्हें फुरसत ही फुरसत है आतिशबाजी खेलने की ! मगर इस आकाशीय आतिशबाजी का कारण तो कुछ और ही है -होता यह है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते हुए प्रत्येक वर्ष उस नियत स्थान पर जा पहुँचती है जो एक धूमकेतु स्विफ्टटटल का परिभ्रमण पथ है और जहाँ उससे उत्सर्जित मलबा /कचरा जमा है ! जब धरती के परिवेश से इस कचरे के धूल धक्कड़ टकराते है तो जल उठते हैं और हमें आसमानी आतिशबाजी का नजारा दिखता है !

अन्तरिक्ष में वह जगह जहाँ हमारी धरती स्विफ्ट टटल के परिभ्रमण पथ से गुजरती है पर्सिज तारामंडल (perseid constellation ) का पृष्ठभूमि लिए हुए दिखती है -इसलिए इस घटना को पर्सिज उल्का वृष्टि भी कहते हैं !यह प्रत्येक वर्ष १०-१२ अगस्त को अपने चरम पर होती है -आज यह नजारा अपने उरूज पर होगा ! आप अगर इन दिनों आसमान के तारों को गिन रहे हो या बादलों की खोज में निगाहें रात में भी आसमान की ओर बार बार उठ जा रही हों तो पक्का दिखेगा यह नजारा आपको -हाँ निगाहें उत्तरी पूर्वी क्षितिज की ओर रखियेगा -पानी की बूंदों की बौछार की बजाय इस बार उल्कों की बौछार /बरसात से ही दिल बहला लीजिये ! एक बार यह अनुभव भी सही!
यह वीडियो भी देख लीजिये !

Tuesday, 21 October 2008

दूर के नहीं अब चंदामामा !

चंद्रयान का रूट चार्ट
भारत का चन्द्र विजय अभियान शुरू हो गया ..आज सुबह ही चंद्रयान -१ चन्द्रमा की दूरी नापने चल पडा है -उसे आंध्रप्रदेश के सतीश धवन अन्तरिक्ष केन्द्र श्रीहरिकोटा से छोडा जा चुका है और वह पल पल चाँद की दूरी को हमसे कम कर रहा है -भारत के लिए भी अब चाँद ज़रा पास खिसक आया है .मानव रहित चंद्रयान -१ दो वर्षों के चन्द्र विजय अभियान पर निकल पडा है .यह एक तरह का रोबोटिक अभियान है जो चन्द्र सतह का एक त्रिविमीय नक्शा तैयार करेगा और बेशकीमती खनिजों की उपस्थिति भी मार्क करेगा .
यह अभियान ख़ास तौर पर चन्द्र ध्रुवों की सतह और सतह के नीचे बर्फ की मौजूदगी की भी पड़ताल करेगा और भविष्य के नाभिकीय संलयन ऊर्जा स्रोत हीलियम -३ की भी प्रचुरता का पता लगायेगा जिसकी धरती पर बेहद कमी है .मगर यह नाभिकीय ऊर्जा का एक अपार स्रोत है .साथ ही टाईटेनियम जैसे दुर्लभ तत्व की खोजबीन भी की जानी है .यह मिशन चाँद के पास और दूर के हिस्सों की भी पड़ताल करेगा ।
चंद्रयान-१ जिस पोलर सैटलाईट लांच वेहकल पर आरूढ़ है वह उसे एक पृथ्वी परिक्रमा पथ पर जा छोडेगा .जहाँ से वह चाँद की टेढी राह पर निकल चलेगा -जैसे ही वह चाँद की गुरुत्व सीमा में आयेगा कई मोटरें दगेगीं जिससे उसकी गति धीमी पड़ जायेगी .अब यह चाँद की लगभग वृत्ताकार कक्षा में १००० किमी ऊपर होगा और ४-५ दिनों में चाँद के १०० कमी नजदीक तक पहुँच जायेगा .
इस यान के साथ ही कई देशों के प्रोब भी हैं जिसकी चर्चा साईब्लाग पर पहले हो चुकी है .अब भारत ,चीन ,जापान और दक्षिण कोरिया सतेलाईट छोड़ने के बड़े मुनाफे वाले व्यवसाय पर नजरें जमाये हैं और अपने अन्तरिक्ष कार्यक्रमों को एक अंतर्रास्त्रीय सम्मान और आर्थिक लाभ के नजरिये से भी देख रहे हैं .
चीनियों की अन्तरिक्ष की चहलकदमी से अभी पिछले ही माह वह विश्व का तीसरा देश हो गया जिसने ऐसी क्षमता हासिल की है .
अफ़सोस यह है कि भारत के चन्द्र विजय अभियान को इस देश में ही सराहना नही मिल रही है -लोगों का कहना है कि भारत जैसे गरीब देश में जहाँ अभी भी लोगों को जीने खाने की मूलभूत सुविधाएं तक मुहैया नही हुयी हैइन कार्यकर्मों में संसाधनों को पानी की तरह बहाया जाना बुद्धिमानी नही है -इस अभियान पर तकरीबन ४ अरब रुपये खर्च हो रहे हैं .

Saturday, 27 September 2008

प्रलय की एक नई सुगबुगाहट .......!

कही ऐसा ही तो कोई क्षुद्र ग्रह नहीं आ टपकेगा धरती पर ?
मीडिया की बलिहारी ,प्रलय (जो नही आई ) के एक खौफनाक सदमें से हम अभी अभी गुजरे हैं.पर अब प्रलय की जो नई सुगबुगाहट सुनाई दे रही है उसमें तो दम ख़म है .अब जो चेतावनी है वह किसी आसमानी जलजले की संभावनाओं की आहट दे रही है -बकौल खगोल विदों के धरती पर प्रलय अन्तरिक्ष से यहाँ आ टपकने वाले किसी क्षुद्र ग्रहिका या अचानक नमूदार हो जाने वाले धूमकेतु से हो सकती है .तो क्या दबे पाँव आ सकती है प्रलय ?
अन्तरिक्ष अन्वेषियों के एक संगठन ने संयुक्त राष्ट्र में इस मामले को उठाने की सोची है .वैसे संयुक्त राष्ट्र ने अन्तरिक्ष में धरती के करीब के घुमंतू पिंडों पर कड़ी नजर रखने के लिए बाकायदा एक कमेटी बना रखी है जिसकी बैठक अगले वर्ष विएना में होनी तय है .खगोलविद इसी कमेटी में ही आसमानी जलजले की ओर पुरजोर तरीके से सम्बन्धित लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहते है ।
अगर अचानक कोई पथभ्रष्ट घुमंतू पिंड धरती की ओर लपक पड़े तो क्या होगा ?हम कैसे उसकी टकराहट को रोक पायेंगे ?हमें इसकी काफी तैयारियां समय से कर लेनी होगी .मगर कैसी तैयारियां ? हमें सारी धरती पर कई जगहों पर बहुत शक्तिशाली दूरदर्शियों को स्थापित करना होगा और धरती के सन्निकट के अन्तरिक्ष में हर वक्त नजर गडाए रखनी होगी .ऐसे दूरदर्शी अगले १५ वर्षों में करीब १० लाख घुमंतू पिंडों पर नजर रखेंगे जिन में ८ से १० हजार खतरनाक हो सकते हैं .कुछ खगोल विदों का मनाना है कि एक छोटे से स्टोर नुमा कमरे के बराबर का भी भटका हुआ पिंड धरती पर भारी तबाही मचा सकता है जो तकरीबन ४० हजार हिरोशिमा बमों की बराबरी कर सकता है .और एकाध किलोमीटर का पिंड तो लाखों हिरोशिमा बमों के विध्वंस को मात दे सकता है .जिनसे सारी धरती ही तबाह हो जायेगी .यदि ऐसा कुछ ज़रा भी संभावित हुआ तो यह वैश्विक आपातकाल का मंजर बनेगा .क्या उन्हें समय रहते हम अन्तरिक्ष में ही किसी तकनीक से विनष्ट कर सकेंगे ? या उनके पथ में ज़रा सा भी बदलाव कर आसन्न बला को धरती से टाल सकेंगे ?ऐसे खतरे से कोई पूजा पाठ तो हमें बचा नहीं सकेगा ,केवल वैज्ञानिक -तकनीक ही हमारा तारणहार बनेगी !इसलिए आज ही से ऐसी तैयारियों के लिए प्रबल जनमत को तैयार करना और राजनीतिक पहल की जरूरत है ।
यह पूरी ख़बर मशहूरअमरीकन वैज्ञानिक पत्रिका में सुर्खियों में है -यहाँ देखें .

Monday, 15 September 2008

What do atom smashers do?

Friends,
I am very indebted to Shastree J.C .Philip a physicist of great repute who has written this article on my request for Sciblog .The aim of the article is to communicate the intricacies of the Geneva 's so called dooms day experiment in a lucid manner so that the same could be easily understood by even a lay person.In this backdrop,now its for you to read and decide yourself as to what extent Shastree ji has done justice to this artile .
Smashing or taking apart a thing to explore it is usually done by curious children, but not always. Even self-respecting scientist on the cutting edge of physics also do this, particularly if they are working in nuclear or particle physics.
The value of crashing particles at the atomic level or below became known when in 1909 when Hans Geiger and Ernest Marsden performed the gold foil experiment under the direction of Rutherford. They took an extremely thin gold foil and bombarded it with alpha particles. Conventional wisdom in physics of that time told them that all the alpha particles should comfortably penetrate the gold foil and should keep going in a near-straight-line from the source of alpha particles. Only minimal and random deviation from a straight-line path was expected.
However, the actual deviation was very high and eventually they noticed that many alpha particles simply bounced back. This was similar to a machine-gun bullet getting bounced back from a paper tissue, and told them that the picture of matter that was popular in physics at that time needed radical modification. Rutherford solved the puzzle by proposing a model of atom which was close to truth. From this time onwards physicists discovered that colliding particles against each other and studying the after-effects is a great probe into the unseen.
Atoms are so tiny that no microscope in the world can show an atom, and thus collisions have become our microscope, telescope, and everything to see into the atoms. By 1960 it became clear that even protons and neutrons have inner structure, and scientists once again realized that if one cannot see the atom using a microscope, one might as well forget seeing these smaller particles. Thus smashing protons and neutrons against each other became all the more important to study their inner structure and working.
Particle-accelerators were built in early twentieth century for performing collision experiment with mathematical precision, and almost all information in sub-atomic physics comes from these experiments. They soon realized that the greater the energy with which particles are smashed, the greater will be the possible fragment and the information gleaned from these. This resulted in an ever increasing demand for collision-power and the contemporary result is the Large Hadron Collider in Switzerland. This 27 kilometer machine accelerates protons and makes two such beams collide. September 2008 is the month this machine is getting tested. Once the initial tests are over, the machine might be used for the next 20 to 30 years for ever-increasing ambitious projects. There is also talk of a 100 kilometer accelerator to be built in the USA.
The September run of the LHC attracted worldwide attention when two scientists made bizarre claims about the possible doom from these experiments. Common man, not familiar with the experiments that have been taking place in physics, became disturbed quickly. The media, ever hungry for juicy bit of presentation, only added fuel in the fire. Thus there was worldwide fear among common people. But the experiment came and went away, exactly as those in physics knew would happen.
There is a long way to go. Perhaps the machine will be used for the next 25 years. Meanwhile the 100 kilometer machine might come up in the USA, helping physicists to probe deeper into sub-sub atomic matter.
------------------------------------
Shastri JC Philip: The author has done work in quantum-nuclear physics, and did research on the quark structure of protons and neutrons (the hadron family). His website is a www.Sarathi.info

Monday, 8 September 2008

मस्त रहें ज्ञान जी और आप सभी ,प्रलय नहीं आने वाली !

लार्ज हेड्रान कोलायीडर एक्सेलेरेटर -यही वह मशीन है जिसे लेकर हो हल्ला मचा हुआ है !
मैं इस विषय को साईब्लोग पर नहीं लेने वाला था पर आज अल्लसुबह ज्ञान जी की इस पोस्ट ने झकझोरा !उन्होंने परोक्ष ही सही मेरे कर्तव्य बोध को जगाया कि भई यदि अपने को ज़रा भी जन हितैषी मानते हो तो विज्ञान से जुड़े इस मामले पर आम जनकी समझ में कुछ इजाफा करो ।
पता नहीं दुनिया को ख़त्म होने के प्रचार के पीछे कौन सी मानसिकता काम करती है -ऐसा कई बार पहले भी हो चुका है .२०१२ में किसी आसमानी जलजले से दुनिया के खात्में की बात हो ही रही थी कि अब यह नया शिगूफा आ धमका .कल यानी १० सित्मबार को क़यामत आने वाली बात को कुछ मीडिया चैनल टी आर पी की फेर में दर्शकों के बीच जोर शोर से ले जाकर उन्हें डरा धमका रहे हैं .पर इत्मीनान रखें कल भी सुबह चिडियों की चहचहाहट से शुरू होगी और सुबहे बनारस और अवध की शामें गुलज़ार होंगी -दुनिया की आपाधापी बदस्तूर जारी रहेगी .हिन्दी ब्लॉग जगत पर नर नारी द्वंद्व जारी रहेगा औरउनकी मनुहार होती रहेगी जो जाने को कह रहे हैं -यानी दुनिया वैसी ही चलती रहेगी ।
पर यह माजरा आख़िर है क्या ? कोई ख़ास नहीं बस भौतिकी के कुछ परीक्षण किए जाने वाले हैं स्विट्जरलैंड में जहाँ यूरोपियन रिसर्च आर्गनाईजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च कुछ मूल भौतिकी के कणों पर कल ही परीक्षण करने वाली है .कई किलोमीटर की इस मशीन में नाभकीय प्रोटान कणों को टकराया जायेगा .ऐसी मशीने भौतिकी की भाषा में सायिक्लोत्रान कहलाती हैं जो नाभकीय कणों की गति को भी काफी तेज कर सकती है ।
इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम १९८० से ही शुरू हो गया था .कल वह सुनहरा दिन है जब इसे कुछ मूलभूत प्रयोंगों के लिए उपयोग में लाया जायेगा .फ्रांस और स्विजरलैंड की सीमा पर जेनेवा के निकट स्थित सबसे बड़े इस पार्टिकिल एक्स्लेरेटर काम्प्लेक्स में लार्ज हैड्रान कोलायीडर वैसे एक भीमकाय मशीन है पर यहाँ से मौत की किरणे नहीं बल्कि जीवन की किरणे फूटेंगी -कैसे ?
आईये बताएं -कल के प्रयोग से नाभकीय कणों के जरिये इस समय की एक बड़ी समस्या बन रहे नाभकीय कचरे को विनष्ट किया जा सकेगा .कैंसर के उपचार में नाभकीय किरणों के व्यापक उपयोग को हरी झंडी मिल सकेगी ! साथ ही धरती के वायुमंडल में कास्मिक बौछारों से बनने वाले बादलों की प्रक्रिया को सही तरह से समझा जा सकेगा जिससे हमें मौसमों के नियमन में सुविधा होगी ।ये तो हैं मनुष्य के सीधे लाभ की बातें ,साथ ही कई अकादमिक बहसों जैसे ब्रह्मांड के निर्माण की पहेलियों को भी समझा जा सकेगा । इससे विनाशक अंधकूप नहीं बनेंगे बल्कि जीवन की रोशनी छलक उठेगी ! और दुनिया इस आलोक में पहले से भी सुन्दर दिखेगी ,हम फिर कल मिलेंगे ! आमीन !!

Sunday, 31 August 2008

भारतीय भस्मासुरी भीमकाय भांटा अब थाली की शोभा बढाएगा !

Courtesy :Brinjal dimond kiran
भांटा बोले तो बैगन यानी ब्रिनज्ल ....यह भारत का पहला जेनेटिकली माडिफाईड फ़ूड (जी एम् फ़ूड ) बनने को बेताब है .बैंगन का भुरता /चोखा और कलौंजी के क्या कहने यम् यम् ....खाईये तो बस उंगलियाँ चाटते रह जाईये ।लेकिन भला यह भस्मासुरी भीमकाय का विशेषण ?यह क्या बला है ?
प्यारे मित्रों यह बला ही है -भला वह कैसे तो आईये इसे समझने के लिए एक कहानी सुनें .सन १८१८ में मशहूर ब्रितानी कवि पी बी शैली की पत्नी मेरी शैली ने एक उपन्यास लिखा था -जिसमे डॉ फ्रैन्केंसटीन को एक कृत्रिम मानव बनाने का चस्का लगता है और वे कई शवगृहों से लाशों के अंग प्रत्यंग दूंढकर लाते हैं और उनमें विद्युत् का संचार करते हैं -एक बहुत ही घिनौना प्राणी तैयार हो जाता है और डॉ उससे डर कर भागतेैं और अंततः उसके द्वारा सपरिवार मारे जाते हैं -यह एक दुखांत कथा है .फ्रैकेंसटीन नामक यह उपन्यास विश्व का पहला वैज्ञानिक उपन्यास माना जाता है .जिसका संदेश यह है कि -बिना बिचारे जो करे सो पाछे पछताय ......और जब वैज्ञानिकों ने अब पाराजीनी फसलें यानी किसी एक प्राणी के जीन को निकाल कर दूसरे प्राणी मे डालने का उपक्रम शुरू किया है तो विचारकों ने इसे भी एक फ्रैंक्सटीनियन काम धाम ही माना है .मसलन ध्रुवों की फ्लाउन्दर मछली के जीन को निकाल कर टमाटर में डाल देना ..जिससे टमाटर फ्रिज में लंबे समय तक चिकना और फूला Mसा बना रहे -क्योंकि उसमें एंटी फ्रीज जीन जो मिला है .अब आप यह टमाटर यदि खाते हैं तो एक तो यदि आप शकाहारी हैं तो धरम नष्ट भ्रष्ट हुआ और न जाने लांग रन में यह आपकी अंतडियों में क्या गुल खिलाये .ऐसे भोज्य पदार्थों को सारी दुनिया में फ्रंकेंसटीन फ़ूड कहा जा रहा है -इन्हे जेनेटिकली बदल्दिया गया है .ऐसे अनेक भोज्य पश्चिमीं बाजारों में और चोरी छिपे यहाँ भी बिकने लगे है -
भारत में पराजीनी फलों -फसलों पर कड़ी नजर के लिए एक समिति है -GEAC -जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी - जो यद्यपि इस समय विवादों में घिरी है मगर जल्दी ही भारत के लिए पहले जी एम् बैगन का उपहार जारी करने वाली है .
तो यह भस्मासुर और भीमकाय का क्या मतलब है ?अरे भाई !याद कीजिये शंकर और भस्मासुर की कथा जिसमें शंकर जी ने बिना आगा पीछा सोचे उस राक्षस को वरदान दिया और फिर मुसीबत में पड़ गए .तो मैंने भारतीय मनीषा के लिए फ्रैकेंसटीन के बजाय अपना जाना पहचाना भस्मासुर नाम चुना है -तो ये फिर भीमकाय क्या ?
ये बैगन बड़े बड़े आकार के होंगे इसलिए भीमकाय भी !
अब आप बताएं कि क्या भस्मासुरी बैगन आपको पसंद आयेगा ?



Friday, 22 August 2008

जीन डोपिंग का आया ज़माना ......

क्या जमैका वासी जन्मजात धावक हैं ?
खेल प्रतिस्पर्धाओं के लिए डोपिंग एक गंदा शब्द है .चीन में ओलम्पिक प्रतिस्पर्धाएं परवान पर हैं .डोपिंग को लेकर एक आशंका हमेशा ऐसे माहौल पर तारी रहती है .स्टेरायड डोपिंग का ज़माना लगता है लद गया है अब जीन डोपिंग की चर्चाएँ जोर पकड़ रही हैं !क्या है ये जीन डोपिंग ?
आईये इसे समझने का प्रयास करें ।
जीन डोपिंग जैवप्रौद्योगिकी की ऐसी नयी प्राविधि है जिसमें उन जीनों को शरीर में प्रविष्ट कराया जा सकता हैजिनसे शारीरिक क्षमता में अभूतपूर्व और अविश्वसनीय परिवर्तन आ जाय .ऐसे जीन शरीर की लाल रक्त कणिकाओं को बढ़ा देने वाले हो सकतेहैं जिससे एथेलीट को अपने परफार्मेंस के दौरान अधिक से अधिक आक्सीजन मिल सके और वह थके नहीं -इसी तरह एक जीन ऐसा खोजा गया है जो पैरों की एक मांसपेशी को काफी मजबूती दे सकता है और दौडों को जीतने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है .दरसल ये खोंजे चिकित्साविज्ञान की वे खोजें हैं जिनसे पीड़ित मानवता को राहत मिल सकती है -रक्ताल्पता का उपचार हो सकता है ,पेशियों के ढीलापन वाले रोगी ठीक हो सकते है -पर इनके खेलों -खास कर विश्व स्पर्धाओं में दुरूपयोग की संभावनाओं का डर बढ़ता ही जा रहा है -मुश्किल है कि कई प्रचलित डोपिंग के तरीकों जिन्हें पहचाना जा सकता है के ठीक विपरीत इनकी पकड़ अभी तक मुश्किल है -क्योंकि जीन कुदरती प्रणाली का हिस्सा बन जाते हैं और पहचान में नही आ पाते ।
एक सनसनी खेज बात बतायी है कोस्मो ने अपने ब्लॉग पर -उनके अनुसार ७० फीसदी जमैका वासियों में एक जीन है जो Actinen A नामक मांस पेशी को मजबूती देता है -मतलब ? जमैका वासी दौडों में कुदरतीतौर पर मजबूत हैं .इन सारे विषयों को न्यू साईंटिस्ट पत्रिका ने ओलम्पिक के अवसर पर कवर किया है -आप की रूचि हो तो यहाँ देख सकते हैं ।
मैं यह सोच रहा हूँ कि आख़िर भारतीयों को कुदरत ने ऐसे कोई गुण क्यों नही दिए जहाँ एकाध ओलम्पिक रिकार्ड मिल जाने को ही लोग झ्न्खते रहते हैं .ऐसे लोगों को ढूंढ कर उन्हें रिजर्वेशन देने का वक्त आ गया है ! क्यों ?

Tuesday, 19 August 2008

वे अजन्मी बच्चियां !

अम्नियोसेंटेसिस तकनीक का भी दुरूपयोग
आज की बी बी सी की यह समाचार प्रस्तुति दरअसल एक दर्दभरी दास्तान है -भारत में मादा भ्रूण पात की घटनाओं में तेजी आयी है जब कि लिंग के आधार पर यह भेदभाव या लैंगिक जांच यहाँ कानूनन अपराध है .अल्ट्रासाउंड तकनीक का दुरूपयोग मादा भ्रूणों को नष्ट कराने के लिए बढ़ता ही जा रहा है .स्टीव ब्रैडशा की रिपोर्ट यह खुलासा करती है कि भारत सचमुच नारियों के लिए अभी भी एक कष्टप्रद देश ही है .रिपोर्ट में जो आंकडा उधृत है वह बताता है कि देश में हर वर्ष १० लाख मादा भ्रूण विनष्ट हो रहे हैं -यह सचमुच एक बड़ी संख्या है .दिली में एक हजार लड़कों की तुलना में महज ८८१ लड़कियों का लिंग अनुपात रह गया है ।रिपोर्ट में बंगलौर आदि शहरों के भी हालत का वर्णन है .
यह संयोग ही है कि इस रिपोर्ट से भी कहीं ज्यादा गंभीर अध्ययन का ब्योरा अभी अभी अनवरत ने भी जारी किया है .साईब्लाग की दृष्टि में दरअसल यह ऐसा मुद्दा है जो विज्ञान के सामाजिक सरोकारों की ओर ध्यान आकर्षित करता है -अल्ट्रा साउंड तकनीक उदर संबन्धी बीमारियों के निदान के लिए विकसित की गयी थी .पर मनुष्य ने इसका दुरूपयोग करना शुरू कर दिया है .इसी तरह दूसरी लिंग भेद की तकनीक है अम्नियोसेंटेसिस जिसमें कुछ गर्भजल को सीरिंज से निकाल कर जांच कर गुणसूत्रों के जरिये नर मादा लिंग की जांच प्रसव के पहले हो जाती है .यह तकनीक भी चोरी छिपे प्रयोग में लाई जा रही है .यह तकनीक अल्ट्रा साउंड की तुलना में प्रसवपूर्व जेनेटिक जांच के लिए ज्यादा प्रामाणिक है .मगर यह केवल उन स्थितियों में जेनेटिक परामर्श के लिए विकसित हुयी थी जब भावी नर या नादा संतान किसी लायिलाज जेनेटिक बीमारी से ग्रस्त होने की परबल संभावना रखते हों -पर अफ़सोस की यह तकनीक भी भारत में केवल मादा गर्भ की शिनाख्त और उसे विनष्ट करने के दुष्कर्म में इस्तेमाल हो रही है .यहाँ विज्ञान और तकनीकतथा वैज्ञानिक दोषी नही -दोषी हमारी आदिम मानसिकता है जो आज भी गुफाओं के कैद से मुक्त नही हो पायी है ।
एक बड़ा जनांदोलन ही हमें इस आदिम मानसिकता से मुक्ति दिला सकता है -इसमें वैज्ञानिकों को भी आगे आना होगा !

Tuesday, 27 May 2008

मंगल पर उतर गया है 'अमर पक्षी '!




अरब ऑर यूनानी मूल की एक दंतकथा के मुताबिक वहाँ के रेगिस्तानी भागों मे एक पक्षी हुआ करता है -PHOENIX-अग्नि पक्षी ,जिसके बारे में दंत कथा है कि वह सैकड़ों साल जिंदा रहता है ख़ुद बी ख़ुद अपने को भस्मीभूत कर लेता है ऑर इच्छा मुताबिक फिर अपनी राख से ही उत्पन्न हो उठता है -समूहे चार्वाक दर्शन को इस तरह चुनौती देते इस 'अमर पक्षी 'ने अब एक नया कारनामा कर दिखाया है .धरती के दिक्काल से परे जाकर अब यह मंगल की धरती पर यह सकुशल उतर गया है .जी हाँ ,यह चर्चा है नासा द्वारा मंगल की धरती पर उतारे गए जल[ऑर जीवन ]खोजी यान की जो कल से ही अन्तरिक्ष मे जीवन खोजी वैज्ञानिकों ऑर स्पेस तक्नीसियनों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है ।
फीनिक्स का मुख्य काम मंगल की धरती के आर्कटिक क्षेत्र में पिछले एक लाख वर्षों के बीच जमा पानी [यदि वह सचमुच मौजूद रहा है तो ......]को खोज निकालना है .इसके जिम्में दूसरी प्राथमिकता का काम होगा वहाँ मिटटी का रासायनिक विश्लेषण ताकि यह जाना जा सके कि जीवन दाई तत्वों -कार्बन ,नायीत्रोजन ,फास्फोरस आदि की वहाँ क्या मौजूदा स्थिति है .वह यह भी देखेगा कि कोई ऐसा कम्पाउंड तो वहाँ नही है जो जैवीय विकास के लिए विषम स्तिती पैदा करदे ।
कई वैज्ञानिक ऐसा सोचते हैं कि वहाँ जरूर कोई ऐसा जीवन -जीवाणु मिल जायेगा जो बर्फानी चट्टानों मे जमा-दबा होगा ऑर सुरक्षित होगा ,ठीक वैसे ही जैसे कि अभी कुछ वर्षों पहले धरती के ही आर्कटिक क्षेत्र में एक जीवाणु -Carnobacterium pleistocenium पाया गया जिसके बारे में एक एक्जोबायालोजिस्ट [जो धरती से बाहर जीवन की खोज मे जुटा हो वह वैज्ञानिक ] रिचर्ड हूवर ने कहा कि वह ३२ हजार वर्ष पुराना है मगर तरोताजा है .ऐसे ही बहुत सम्भव है कि मंगल की बर्फीली धरती भी ऐसे जीवाणुओं को अपने गर्भ मे छिपाए हो ऑर माकूल माहौल में वे पनप उठें ।
जो भी हो अमर पक्षी की नामराशी वाले नासा के यान ने एक करिश्मा तो कर ही दिखाया है अब हमे उत्सुकता से यह इंतज़ार है कि इस पक्षी की चोंच में आने वाले मंगल की मिटटी से हमें इस लल्छौहं ग्रह के बारे मे ऑर नया क्या पता लगता है .मंगल की ओर कूँच करने की रणभेरी बज चुकी है ---चलिए हम भी कोरस मे शामिल हों-मंगल भवन अमंगल हारी ....[बायाँ चित्र अमर पक्षी -स्रोत सौजन्य -विकिपीडिया ;दायाँचित्र -मंगल पर जा उतरा है फीनिक्स -नासा के वेब साईट से साभार .]

Thursday, 22 May 2008

यह है महाझींगा-जैंट फ्रेश वाटर प्रान !


यह है महाझींगा-जैंट फ्रेश वाटर प्रान , जो कभी गंगा और सहायक नदियों मे इफरात मिलता था .यह समुद्राभिमुखी प्रवासी प्राणी है जिसका मतलब यह कि यह नदियों से समुद्र की ओर प्रजनन के लिए कूँच करता था .इसलिए कि इसके विकास की प्रक्रिया में लार्वा स्तर पर समुद्री पानी की उपस्थिति बेहद जरूरी है .जब से हुगली नदी पर फरक्का बाँध बना इनका प्रवास प्रजनन बाधित हो गया .लिहाजा आज हालत यह है कि पूरी कि पूरी महाझींगा मात्स्यिकी गंगा ऑर सहायक नदियों से विलुप्त हो चुकी है ।

मगर अब इस महत्वपूर्ण मात्स्यिकी सम्पदा को तालाबों मे पुनर्वासित कराने के प्रयास हो रहे हैं ,जिसमे वाराणसी ,उत्तर प्रदेश में सफलता मिल गयी है .महाझींगा को स्कैम्पी के व्यापारिक नाम से सारी दुनिया में जाना जाता है -जो एक अंतर्द्वीपीय व्यंजन है ऑर काफी महंगा है .इसका आज का रेट ६८० रूपये प्रति किलो है। जाहिर है इसके बाहरी निर्यात से भारी विदेशी मुद्रा कमाने के द्वार खुल रहे हैं -मुझे संतोष है कि बनारस के मत्स्य पालकों ने इसमे लीड ले लिया है .आज यहाँ के काशी विद्यापीठ तालाब ब्लाक में कंदवा गाव के एक साधारण से मछली व्यवसायी

श्री राजेन्द्र के तालाब पर मैं गया तो वहाँ से निकले झींगो के आकार प्रकार से खुश हो गया .ग्रीस्मावकाश मना रही बेटी प्रियेषा भी साथ थी जो विस्मय से झींगों का फोटो ले रही थी .इस एक चित्र में एक नर झींगे की गहरी ब्लू टांगें प्रमुखता से दिख रही हैं .मैं भी हूँ चित्र में .......आप मुझमें ऑर झींगे मे फ़र्क तो कर ही लेंगे ,यदि पहले कभी झींगा न भी देखा तो भी .........



Tuesday, 13 May 2008

चूजे की यह राम कहानी !


ये बिचारे शकर खोरा नाम की चिडिया के चूजे हैं -अभी ठीक ठीक उड़ना नही आया है .घोसले से बार बार गिर पड़ते हैं ।अब बिचारी माँ कहाँ तक झेले ,तब भी प्राण प्रण से इनकी जीवन रक्षा मे जुटी है बेचारी ...मगर घोसले मे तो डाल नही सकती ,यह काम खेल कूद मे मगन हमारे ग्रामीण बच्चों के जिम्मे है .अभी बिटिया गावं गयी थी तो उसे चूजे की यह राम कहानी देखने को मिली ..उसने पहले तो चूजे महराज की फोटो मोबाईल से उतारी ऑर आगे की जानकारी के लिए मामला मुझे सौंप दिया ।
यह पर्पिल सनबर्ड का नवजात है .यह बहुत छोटी चिडिया है -बस अंगूठे के बराबर -नर प्रणय काल में बैंगनी -नीलापन लिए रहता है ,मादा का उपरी भाग भूरा तथा नीचे का पीलापन लिए होता है . प्रणय काल के अलावा दोनों एक जैसे ही लगते हैं -हाँ नर के गले से एक गहरी काली पट्टी पेट तक जाती है . हिन्दी मे इसे शकर खोरा ऑर गाँव देश मे फुल्चुसकी भी कहते हैं .हमारे यहाँ अब चिडियों मेआम लोगों की रूचि न के बराबर रह गयी है .यह चिंता की बात है ।
छायांकन :प्रियषा मिश्रा

Thursday, 8 May 2008

Tributes to Albert Hofmann [January 11, 1906 – April 29, 2008]!


Chemist Albert Hofmann has died at the age of 102 on April 30, 2008.He is credited inter ailia for the isolation of lysergic acid diethylamide, or LSD in 1938 while working in Sandoz chemical company. The new substance, however, aroused no special interest in our pharmacologists and physicians; testing it further was therefore discontinued.

Five years later however he found himself in a dreamlike state and he finally confirmed that the substance was related to the lysergic acid -diethylamide tartrate he had just started working with and his dream like state might have been due to accidental absorption through his fingernails, he recorded.

He narrated the story in following way,’There seemed to be only one way of getting to the bottom of this. I decided on a self-experiment.” He took LSD hundreds of times, but regarded it as a powerful and potentially dangerous psychotropic drug that demanded respect. More important to him than the pleasures of the psychedelic experience was the drug’s value as a revelatory aid for contemplating and understanding what he saw as humanity’s oneness with nature.

A ‘Minor’ Planet Named After a Kerala Zoology Professor!


We are used up seeing Indian streets and buildings named after politicians but now a rare honour has been bestowed upon a Keralite environmentalist, Dr. Sainudeen Pattazhy by naming a minor planet of the solar system after him which shall be now called "5718 Pattazhy".

Dr. Sainudeen Pattazhy is professor of zoology at the S.N. College in Kollam, Kerala. NASA has announced recently that it will name the minor planet in recognition to his pioneering work he has done in the field of environmental research. There are around 400,000 ‘minor planets’ or asteroids in the solar system, of which 185,685 have well defined orbits and have been allotted numbers by the International Astronomical Union (IAU). Around 14,000 of them have been given names mainly after their discoverer astronomers.

“I was so happy when NASA informed me that my name has been selected for naming a minor planet. It’s known as 5178 Pattazhy. Actually, a US-based scientist of Indian origin Mr. Rajamohan had discovered it in 1989. He proposed my name and NASA accepted it,” Pattazhy said.

Pattazhy came into prominence for his study on the red rain phenomenon of Kerala which occurred in 2001. His research proved that the red colour of the rains was due to a geological process and had nothing to do with alien life. Before his work there was an argument that it had some alien connections .He showed that the queer phenomenon was due to certain peculiar environment prevailing in Kerala during the period in question. Pattazhy’s suggestions on the health hazards posed by mobile towers are still pending with the Union Ministry of Environment. According to him, the radiation would affect people residing within 300 meters of the towers.

Sainudeen said that he felt elated that his non- descript village Pattazhy in Kollam district of Kerala was now in prominence and found a 'celestial niche' of its own.