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Tuesday, 12 June 2012

भारत में पहली बार मकड़ियों का हमला

ऐसी घटना भारत में पहले कभी नहीं घटी। असम के सादिया शहर में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान भगदड़ मच गयी जब रहस्यमयी मकड़ियों का एक विशाल झुण्ड न जाने कहां से आ गया। इन मकड़ियों ने लोगों पर हमला कर दिया। जिन्हें इन मकड़ियों ने डसा उनमें से दो के मरने की खबर है। हालांकि शवों का पोस्टमॉर्टम नहीं हो पाया मगर कुछ कीट विज्ञानी मानते हैं कि ये मकड़ियां विषैली रही होंगी। चूंकि भारत में ये मकड़ियां पहले कभी देखी नहीं गईं इसलिए इन्हें लेकर विश्वभर के कीट विज्ञानियों में जिज्ञासा है। यहां तक कि विश्व प्रसिद्ध टाइम पत्रिका ने भी इस खबर को प्रमुखता से 4 जून 2012 के अंक में प्रकाशित किया है। मकड़ियों का यह आक्रमण पिछले महीने में देखा गया था और एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार ने इस पर ख़ास 'स्टोरी' की थी।
टैरनटूला   से मिलते जुलते  ऐसे ही थे वे मकड़े 

डिब्रूगढ़ और गुवाहाटी विश्वविद्यालय के कीट विज्ञानियों ने इस मकड़ी या मकड़े को पहचानने में असमर्थता व्यक्त की है मगर कहा है कि ये विश्व के एक खौफनाक विशाल मकड़े टैरनटुला के परिवार की हो सकती हैं। एक दूसरे कीट विज्ञानी ने कहा कि यह दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया मूल की मकड़ी ब्लैक विशबोन हो सकती है। मगर ऑस्ट्रेलिया की मकड़ी आखिर यहां कैसे आ पहुंची? मधुमक्खियों का झुंड में हमले करना एक आम घटना है और हॉलीवुड की कई फिल्मों में मधुमक्खियों के झुंडों में हमले के खौफनाक दृश्य भी दिखाए गए हैं। हालांकि हॉलीवुड मकड़ियों के हमले पर भी फिल्में बना चुका है। '8 लेग्ड फ्रीक्स' काफी चर्चित हुई थी। मगर मकड़ियों/मकड़ों का ऐसा आक्रमण कम से कम भारत में तो अब तक कहीं से सूचित नहीं है।
'8 लेग्ड फ्रीक्स' का एक दृश्य 
ब्रितानी प्रकृति विज्ञानी विजय के सिंह ने कहा है कि मकड़ियों का झुंड में हमला करना एक बहुत कम घटने वाली घटना है। उनके अनुसार पर्यावरण में हुआ कोई असामान्य परिवर्तन उनकी जनसंख्या वृद्धि को उकसा सकता है। जैसे पिछले वर्ष ऑस्ट्रेलिया में बाढ़ के पश्चात मकड़ियों के एक विशाल झुंड ने खेतो को मकड़जालों में तब्दील कर दिया था। पाकिस्तान में भी आयी विशाल बाढ़ के पश्चात मकड़ियों ने पेड़ पौंधों को मानो ढक सा दिया हो। सदिया की मकड़ियों को पहचान के लिए महाराष्ट्र के मकड़ी संस्थान (इन्डियन सोसायटी ऑफ अरैक्नोलॉजी) को भेजा गया है।
बहुत से लोग कई तरह के जीव जंतुओं को डर के चलते भरीपूरी आंख से देख भी नहीं सकते। मकड़ी ऐसे टॉप टेन भयावने जंतुओं की सूची में है। गोलियेथ टैरनटुला सबसे बड़ा मकड़ा है जो छोटी हमिंग चिड़ियों को भी अपना शिकार बना लेता है। यह एक फुट तक बड़ा हो सकता है और इसके विषदंत भी काफी बड़े होते हैं। माना जा रहा है कि सादिया का मकड़ा इसी नस्ल से मिलता जुलता है। इस तरह के मकड़ा-आक्रमण ने भारतीय मकड़ी विज्ञानियों की पेशानी पर बल ला दिया है। आगे की खोजबीन जारी है।

Monday, 28 May 2012

वे बड़े कि हम ......


मनुष्य के संज्ञानबोध का फलक बहुत सीमित है .हम एक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम के उपरी छोर के गामा विकिरणों और निचले स्तर के अल्ट्रा वायलेट फ्रीक्वेंसी के बीच हिस्से के प्रति ही संवेदित हो पाते हैं ,उसका संज्ञान ले पाते हैं . यही हमरा दृश्य क्षेत्र है . इसे हमारा दृश्य संवेदी अंग रंगों में देखता है जहाँ नीले के ठीक ऊपर अल्ट्रा वायलेट -परा बैगनी क्षेत्र है जिसे कीट पतंगे तो देख लेते हैं मगर हम नहीं ...यही बात आवाज के साथ भी है जहाँ हमारी  सीमाएं निर्धारित हैं -चमगादड़ उच्च तरंग दैर्ध्य वाली वे परा ध्वनियाँ सुन लेते हैं जिनका हमें भान  तक नहीं होता ...और हाथी बहुत कम तरंग दैर्ध्यो वाले आवाज में संवाद कर सकते है और वह भी हमारे पल्ले नहीं पड़ता . 

कुछ मछलियाँ विद्युत् तरंगों के सहारे गंदे पानी में भी गंतव्य तक जा पहुँचती हैं और यह क्षमता  भी मनुष्य में नदारद है . हम धरती के चुम्बकीय क्षेत्र की अनुभूति से भी वंचित हैं जिसका लाभ उठाकर बहुत से पक्षी प्रवास गमन करते हैं . और हम बरसात के बादल भरे  दिनों  में आकाश के उन सूर्य -प्रकाश के ध्रुवित पुंजों को भी लक्षित नहीं कर पाते जिनसे मधुमक्खियाँ सहारा पा अपने छत्ते और फूलों के बीच आने जाने का  रास्ता तय करती हैं ... 

मगर हमारी सबसे बड़ी अक्षमता  है स्वाद और गंध के मामले की जिसमें हम सभी जीव जंतुओं से पिछड़ गए हैं .जीव जगत के ९९ फीसदी सदस्य चाहे वे बड़े जानवरों से लेकर कीड़े मकोड़े  तक क्यों न हो रासायनिक /गंध के इस्तेमाल से  संवाद कर लेते  हैं . इन रसायनों को वैज्ञानिक फेरोमोन कहते हैं . गंध की क्षमता में ब्लड हाउंड कुत्तों और रैटल स्नेक के सामने हम निरे लल्लू ही हैं ... अपनी गंध और स्वाद की अनुभूति की अक्षमताओं ने मनुष्य को इतना लाचार कर दिया है कि इनसे जुड़े बहुत से अनुभवों के लिए वह तरह तरह की उपमाएं ढूंढता फिरता है .. मतलब  गंध और स्वाद के बखान के लिए मनुष्य के पास बहुत कम शब्द संग्रह है . हालांकि मनुष्य इन कमियों की भरपाई के लिए तरह तरह के यंत्र /डिवाईस-जुगतें बना रहा है . कृत्रिम संवेदी नाक है तो जीभ की कृत्रिम स्वाद कलिकाएँ प्रयोगशालाओं में बनायी जा रही हैं जिनके लिए जीव जंतु माडल के रूप में चयनित किये गए हैं . 

नए प्रयोगों में  मनुष्य की निर्भरता जीव जंतुओं पर बढ़ती जा  रही है ..फिर भी हम अपने को सर्वोच्च मानने के मुगालते में ही हैं .... 

Saturday, 15 October 2011

झींगुरों का रुनझुन यौन जीवन ...सुन सुन ...कहीं कुछ हमसे तो नहीं कहता?

अब भला इन क्षुद्र प्राणियों के इस निजी जीवन में किसी की क्या रूचि हो सकती है ..मगर मानवों एक एक ऐसा जिज्ञासु तबका है जो यहाँ भी  ताक झाँक लगाये रहता है -मतलब कीट व्यवहार विज्ञानियों का और मजेदार यह है कि ये इन हेय  प्राणियों के व्यवहार के भी निहितार्थ उच्च प्राणियों-मनुष्य  के व्यवहार से जोड़ते हैं . अब एक ताजा अध्ययन को ही लें जो करेंट बायलाजी शोध जर्नल में छपा है और जिसके मुख्य शोध वैज्ञानिक -लेखक  डॉ.रोलैंडो राड्रिग मुनोज हैं -इन्होने झींगुरो के यौन जीवन पर शोध करके पूर्व प्रचलित कई जानकारियों का खंडन किया है ..ऐसा माना जाता था कि झींगुरों में नर के प्रणय निवेदन के बाद मांदा द्वारा सर्व समर्थ नर के चुनाव और यौन संसर्ग के पश्चात भी ताक लगाये कुछ दूसरे नरों की लह जाती थी और सबसे बाद के नर के गर्भाधान से वजूद में आये अंडे ही आगामी पीढी में ज्यादा योगदान करते हैं ...ऐसा  दूसरे दूसरे कीटों में में भले  है मगर झींगुरों की शोध के अधीन आयी प्रजाति (Gryllus campestris) में तो ऐसा नहीं पाया गया है ...

झींगुरो का यौन जीवन के अध्ययन की प्रजाति (Gryllus campestris)
लैंगिक चुनाव में मादा द्वारा एक वांछित नर से संसर्ग के बाद भी दूसरे नरों के साथ जुडनें में खुद मादा की सहमति/ सहभागिता/झुकाव  का मुद्दा बड़ा ही विचारणीय रहा है ....कुत्तों में भी यही बहु -आधान व्यवहार दिखता है ....जहाँ एक मादा कई कुत्तों के साथ संसर्ग करती है ..इस व्यवहार के जैवीय वैकासिक बिंदु पर वैज्ञानिकों का गहन चिंतन मनन चलता ही रहा है -जब एक नर से ही संतति वहन का नैसर्गिक उद्येश्य पूरा होता हो तो फिर दूसरे नरों से संसर्ग की भला क्या आवश्यकता ....प्रकृति के ऐसे गूढ़ रहस्यों पर अभी भी पर्दा पूरी तरह उठा नहीं है मगर इनके पीछे छुपे गुह्य कारणों को व्यवहार वैज्ञानिक (ईथोलोजिस्ट ) जैवीय विकास के परिप्रेक्ष्य में समझने बूझने का प्रयास करते हैं और सामान्यतः समझ में न आने वाली इन गुत्थियों के  हल का प्रयास करते हैं ....मजे की बात यह है कि मौजूदा झींगुर प्रजाति में मादा दूसरे नरों की अभिलाषा नहीं रखती .....

इन 'क्षुद्र' प्राणियों पर दिन रात फोकस  अपने दो लाख से ज्यादा वीडियो फुटेज के श्रमशील अध्ययन के बाद डॉ.रोलैंडो राड्रिग मुनोज और उनकी टीम इस प्रेक्षण को बिना संदेह बयाँ कर पायी कि यहाँ मात्र एक नर से ही संसर्ग के बाद संतुष्ट हो रहने वाली झींगुर की रक्षा में नर झींगुर बड़ा ही मुस्तैद  रहता है और भले ही किसी शिकारी पक्षी का वह  खुद शिकार हो जाय सद्य गर्भित मादा को अपनी मांद में घुस जाने तक वह आक्रान्ता को उलझाये रखता है ....और प्रायः खुद वीरगति को प्राप्त हो जाता है ...और इसी का इनाम है उसे कि आगामी पीढी /संतति /वंशधर खुद उसी के ही होते हैं किसी गैर के नहीं ....इस प्राणोत्सर्ग कर देने वाले प्यार के मंजर में फिर दूसरे नरों  का आखिर क्या काम?  अब इसके मानवी निहितार्थ पर भी तनिक चिंतन कर लीजिए...नारी के लिए हर लिहाज से एक ही समर्थ पुरुष /पति संतति वहन के लिए प्रयाप्त है ....न न ऐसा कोई अध्ययन मनुष्य के संदर्भ में हुआ हो तो मुझे नहीं पता मगर ऐसे विचार तो मन में आ ही सकते हैं ....प्राकृतिक विकास की प्रक्रिया में भी ऐसे ही नर का चयन ज्यादा संभावित है क्योकि वह अपनी ही सरीखी समर्थ संतति के  जन्म/वजूद को सुनिश्चित कर रहा है ..

जो भी हो , इस झींगुर प्रजाति में तो बहरहाल तांक झाँक और मौके की तलाश में लगे नरों के लिए निराशा ही निराशा है ..मादा की भी कोई ऐसी रुझान नहीं है ...क्योकि वह खुद भी और उसकी वंश बेलि ऐसे नर के सामीप्य -संरक्षण में सुरक्षित है ...जब अगली पीढी तक सुरक्षित हो जाय तो  और भला चाहिए भी क्या ..पूरी रिपोर्ट यहाँ है ....

Sunday, 17 July 2011

तोते अपने बच्चों को उनके नाम से पुकारते हैं

तोते आवाजों की नक़ल में उस्ताद तो हैं ही ,अब यह भी पता चला है कि वे अपने बच्चों का बाकायदा नामकरण करते हैं और उन्हें उन्ही नामों से पुकारते भी हैं .कार्नेल विश्वविद्यालय में वेनेजुएला के जंगलों में पाए जाने वाले हरी कूबड़ के तोतों पर हुए इस अध्ययन से पक्षी -प्रतिभा और व्यवहार की यह हैरतन्गेज जानकारी हुयी है .
प्रोसीडिंग्स आफ द  रायल सोसायटी बी के अभी हाल के अंक (१३ जुलाई ,२०११) में इस अध्ययन की रिपोर्ट आयी है .

यह पाया गया है कि हरे कूबड़ वाले तोतों की इस प्रजाति जो अपेक्षाकृत छोटे तोतों की एक प्रजाति है -६ से ७ अंडे अपने घोसलों में देती है और करीब एक पखवारे में इनसे बच्चे निकल आते हैं जो बहुत असहाय से होते हैं ...आपको पता होगा कि पक्षी जगत में दो तरह के बच्चे /चूजे जन्मते हैं -एक तो अंडे से बाहर निकलते ही दौड़ने भागने वाले 'प्रीकासिअल' और दूसरे असहाय से एक मांस लोथड़े के सदृश पड़े रहने वाले 'ऐलट्रिसीयल '....तोते इस दूसरे तरह के बच्चे देते हैं ....अध्येता कार्ल बर्ग कहते हैं कि ये तोते मनुष्य की भांति एक ख़ास अलग अलग "वोकल सिग्नेचर टोन "  से अपने बच्चों को बुलाते हैं और वे बच्चे भी उन्ही ध्वनि पैटर्न को अपने नाम के रूप में याद रखते हैं ! 
Green-rumped parrotlets from Venezuela. Image credit: Nicholas Sly

वैज्ञानिक बर्ग मनुष्य और तोतों के इस शिशु नामकरण व्यवहार के कई साम्यों की जिक्र करते हैं -मनुष्य -शिशु भी लम्बे समय तक असहाय से होते हैं और ये तोते के बच्चे भी -नाम से इनके संबोधन से दैनंदिन के इनके लालन पालन में इनके ध्यान के आकर्षण में सुभीता हो जाती है -तोते भी मनुष्य के बच्चों की तरह अपना नाम ताउम्र याद रखते हैं .उनके मां बाप  भी अपने बच्चों के नाम याद रखते हैं -और मां बाप ही नहीं  कुनबे के दूसरे लोग भी बच्चों को और उनके बड़े होने पर भी उनके नाम से संबोधित करते हैं -यह बात मनुष्य और तोते में कामन है ! है न मजेदार बात ? 


कोई आश्चर्य नहीं, मानव आबादी के निकट  रहने वाले तोते अपने मित्र और शत्रु मानवों का भी नामकरण न कर देते हों -कनवां,मर्कहवा ,कलूटवा,कलमुहिया टाईप नाम -क्या आप इस विषय पर शोध करना चाहेगें ? 


Wednesday, 12 January 2011

सर्दी में सांप से सामना

सांप का नाम सुनते ही जहां लोगों के शरीर में एक सर्द सिहरन दौड़ जाती है वहीं अगर सर्दी में किसी सांप का सामना हो जाय तो सन्निपात का होना तय समझिये .ताज्जुब की बात यह है की मिर्जापुर शहर के महुवरिया मोहल्ले में पिछले आठ जनवरी की हाड कपाऊं ठण्ड में जबकि पारा पांच और तीन डिग्री सेल्शियस के बीच अठखेलियाँ कर रहा था सर्प महराज ने एक मेढक को पकड़ ही तो लिया -वे नाली के सहारे मकान में घुसने के फिराक में थे या शायद वहां पहले से ही मौजूद मेढक ने उन्हें ललचाया तो वे सर्दी में भी पेट पूजा को उद्यत हो गए .

धामन की  कुण्डली  में निरीह मेढक
      
 फिर तो वहां कोलाहल मचा ..मकान मालिकान लाठी बल्लम से लैस साँप पर भारी पड़े और कुछ ही पलों में शिकारी खुद शिकार हो गया ...आज भी किसी भी साँप चाहे वह कितना ही विषहीन और अहानिकर क्यूं न हो को देखते ही मार डालने की आदिम प्रवृत्ति बनी हुयी है ...हां मेढक राम बच गए और जाके राखे साईयाँ मार सके ना कोय की कहावत को एक बार फिर चरितार्थ कर गए .इस पूरे मामले में जो सबसे हैरत में डालने वाली बात है और जिसके कारण यह पोस्ट लिखनी पडी वह यह है की जाड़े में ये निम्न वर्गीय प्राणी शीत निष्क्रियता यानी हाईबर्नेशन में चले जाते हैं -यही कारण है मेढक छिपकली और सांप इन दिनों नहीं दीखते -इनमें वातावरण के तापक्रम के उतार चढाव के मुताबिक़ शरीर का तापक्रम बदलता रहता है -इसलिए शीत निष्क्रियता इनकी जीवन रक्षा का एक उपाय है -लेकिन इस समय भी सांप और मेढक की सक्रियता का  दिखना एक दुर्लभ दृष्टांत है जिसे यहाँ रिपोर्ट किया जा रहा है!

मेढक जिन भारतीय सापों के मीनू में सबसे ऊपर है वे हैं चेकर्ड कीलबैक पनिहा सांप -नैट्रिक्स पिस्कैटर जिसके शरीर पर शतरंज के खानों की तरह चित्र पैटर्न होते हैं और दूसरा है धामन सांप जिसे घोडापछाड़  के नाम से भी जानते हैं और जिसका वैज्ञानिक नाम है टायस  म्यूकोसिस है .ये दोनों ही नितांत निरापद और अहानिकर सांप है .पनिहा सांप जहां ज्यादा लंबा नहीं होता -यह औसतन केवल डेढ़ हाथ -साढे तीन से चार फीट लंबा होता है इसलिए इसका एक बोलचाल का नाम डेढ़हा है जबकि धामन ग्यारह फीट तक लम्बी हो सकती है .धामन को चूहे भी बहुत प्रिय हैं जबकि पनिहा सांप मेढक प्रेमी है ! 


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Tuesday, 28 December 2010

मानसरोवर से आये एक मेहमान से मुलाक़ात!

इन दिनों इलाहाबाद के संगम और वाराणसी में गंगा में हजारो की संख्या में प्रवासी पक्षी घोमरा (Larus brunicephalus ) डेरा डाले हुए हैं और इन्हें पर्यटक चारा भी खिलाने में मशगूल दिख रहे हैं .बल्कि सैलानियों के लिए ये आकर्षण का केंद्र बन गए हैं -आवाज देने पर झुण्ड के झुण्ड बिल्कुल पास आकर चारा झपट लेते हैं -हवाई करतब दिखाते हुए या फिर पानी की सतह पर झपट्टा मारकर .इनकी बोली काफी तेज, कर्कश है .पर्यटकों को चारे के रूप में लाई ,सस्ती नमकीन बेंचकर कुछ्का अच्छा धंधा भी चल पडा है .

मगर आश्चर्य यह है कि अखबारों में इनकी चित्ताकर्षक फोटो तो छप रही है ,ये वी आई पीज के लिए कौतुहल के विषय भी बन रहे हैं (सामान्य जानकारी से जो जितना ही रहित है भारत में वही सबसे बड़ा वी आई पी है :) ) मगर इनकी सही पहचान के बजाय तरह तरह के कयास ही लगाए जा रहे हैं -कोई कहता है कि ये साईबेरिया से आये फला पक्षी हैं तो कोई और कुछ ...दरअसल ये 'गल' की एक प्रजाति है -ब्राउन  हेडेड गल यानि सफ़ेद सिरी गल -हिन्दी में धोमरा या घोमरा .अब इसे शुभ्र सफ़ेद सिर के बजाय ब्राउन हेडेड क्यों कहते हैं कोई भाषा विद अच्छी तरह बता सकता है -शायद अंगरेजी में ब्राउन और सफ़ेद बालों का कोई भाषाई फर्क न हो!


गल की यह प्रजाति वैसे तो समुद्र के तटों ,बंदरगाहों पर मछलीमार बड़ी नौकायों के पीछे दिखती है मगर बड़ी नदियों में भी इनकी अच्छी खासी तादाद जाड़ों में दिखती है .ये प्रवासी पक्षी हैं ,जाड़ों में अक्टोबर माह तक लद्दाख और तिब्बत ,मानसरोवर और आसपास के झीलों जहां ये घोसला बनाती हैं उड़कर भरात की तमाम नदियों और समुद्र तटों तक आ पहुँचती हैं -इनकी एक काले सिरों वाली प्रजाति भी है जो इधर इक्का दुक्का ही दिखती है .सालिम अली जहाँ इनका मूल आवास तिब्बत और आस पास बताते हैं एक दूसरे पक्षीविद सुरेश सिंह ने अपनी पुस्तक भारतीय पक्षी में इन्हें यूरोपीय देशों का मूलवासी बताया है -यह खोज का विषय है -लगता तो यह है कि इनकी दो तीन नसले हैं जिन्होंने तिब्बत और यूरोपीय देशों में बसेरा  कर रखा है.



देखने में मनोहारी इन पक्षियों की आँखें सबसे खूबसूरत हैं और बड़े मासूम से दिखते हैं ये .अभी कल ही जब हम गंगा में नौकायन कर रहे थे-नाविक ने हाथ से ही एक को धर लिया -मैंने भी थोड़ी देर इन्हें दुलारा,पुचकारा फिर मुक्त कर दिया .जां की अमान पाते ही यह एक लम्बी उडान भरती हुई सुदूर क्षितिज में विलीन हो गयी .नाविक ने बताया कि यह जल्दी ही फिर अपने झुण्ड मेंआ  मिलगी ..उसे तब शायद अपने मानव मुठभेड़ की याद भी  न रहे ...चिड़ियों की याददाश्त भला ज्यादा थोड़े ही होती होगी -यह तो मनुष्यों की थाती है जो अच्छी  बुरी  घटनाओं के  पुलिंदे सहेज कर रखती है - दूसरों की कृतघ्नताएँ हम भूल पाते हैं भला !पक्षी ही भले हैं इस मामले में .
बहरहाल कुछ चित्र और यदि लोड हो सका तो एक वीडियो भी देखिये  इन मासूम पक्षियों से मेरी मुलाकात का और हाँ अब इन्हें पहचाने की भूल मत करिएगा !

Sunday, 11 July 2010

तीन दिल और तेज दिमाग वाले होते हैं ऑक्टोपस -आज क्या हारेंगे पॉल बाबा ?

जी हाँ आक्टोपस सचमुच बुद्धिमान होते है -उन सभी प्राणियों में तो निश्चित ही जिनमें रीढ़ नहीं होती ..आठ भुजाओं वाला यह जीव सचमुच रोमांचित करता है -इसलिए कामिक्स कहानियों ,कार्टूनों आदि में दिखता ही रहता है .जिन्होंने ली फाल्क की मशहूर मैन्ड्रेक जादूगर कामिक्स पढ़ा है उनके मन में 'अष्टपाद संगठन ' की असहज करने वाली यादें होगीं .
भविष्य वक्ता(?) ऑक्टोपस पॉल

अब विश्वकप फ़ुटबाल में भविष्यवाणी करने वाले एक जर्मन ऑक्टोपस ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खीचा है .यह सच है कि ऑक्टोपस बुद्धि का इस्तेमाल करते हैं मगर वे उन्हें किसी मानवीय  घटना का बिल्कुल सही सही पूर्वाभास हो जाय यह महज हास्यास्पद ही है .हाँ ओक्टोपसों के कई कारनामें ऐसे हैं जो आश्चर्य में डालते हैं -जैसे उनका बंद  शीशी /बोतल का कैप घुमाकर खोलना और अपना प्रिय पदार्थ प्राप्त कर लेना ..यह युक्ति उन्होंने बिना किसी प्राथमिक ट्रेनिंग के खुद सीखी .स्पष्ट है कि उनमें तर्क की क्षमता है .सभी आक्टोपस विषैले होते हैं मगर ब्लू रिंग्ड ऑक्टोपस तो मनुष्य के लिए भी घातक है .इस समुद्री जीव की ३०० से ऊपर प्रजातियाँ हैं ! ये बिचारे अल्पजीवी होते हैं -एक प्रजाति तो महज ६ माह में ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर देती है .और कुछ ४-५ वर्षों तक जीती हैं .ये एक नहीं तीन दिल वाले हैं!और तेज दिमाग के तो वे हैं ही !

प्रयोगशालों के परिणाम बताते है कि ऑक्टोपस तेजी से सीखते हैं -किसी युक्ति को देख देख कर और अनुभव से सीख  लेते हैं -मतलब इनमें याददाश्त भी होती है .ऑक्टोपस की एक प्रजाति ने नारियल को इकठ्ठा करना और इसी से अपना शरण स्थल बनाने की कला सीखी -वैज्ञानिकों ने इस दास्तान की वीडियो बनायी ! दुश्मनों से अपनी रक्षा के लिए ये काली रोशनाई जैसा पदार्थ निकालते हैं जिसमें शिकारी अँधा सो हो जाता है और ये भाग निकलता है
.
जर्मनी का ऑक्टोपस पॉल निश्चय तौर पर अपने ट्रेनर को फालो कर रहा है .दरअसल फ़ुटबाल विजेता की भविष्यवाणी उसका ट्रेनर ही कर रहा है -ऑक्टोपस बस उसका छुपा कमांड फालो कर रहा होता है . मतलब इस सबके पीछे एक मानव बुद्धि काम कर रही है -एक शातिराना बुद्धि ! कौन जाने आज ओक्टो बाबा हार ही न जाय ? मगर मानव  बुद्धि कहती है कि स्पेन की टीम तगड़ी है ! ..वही तो आक्टो बाबा भी बोल रहे हैं !

Wednesday, 26 May 2010

जिन्हें आपके सहानुभूति की दरकार है!

इन दिनों पेटा- 'पीपल फार द एथिकल ट्रीटमेंट्स ऑफ़ एनिमल्स ' जीव जंतुओं के प्रति मानवीय सहानुभूति को जुटाने में एक रायशुमारी में लागा हुआ है -मेरे पास  भी उनकी चिट्ठी आई है .दुनिया भर में वैज्ञानिक प्रयोगों के नाम पर  ,सौन्दर्य प्रसाधनों की जाँच के नाम पर और शिकार की प्रवृत्ति के शमन हेतु  जानवरों पर आज के कथित सभ्य मनुष्य द्वारा भी कम जोर जुल्म नहीं ढाए जा रहे हैं .ब्रिटेन में लोमड़ी का शिकार ,जापान द्वारा व्हेल , औए सील जैसे स्तनपोषियों का कत्ले आम ऐसी ही नृशंस घटनाएँ हैं .आज भी काम काज के सिलसिले पर जानवरों के प्रति सहानुभूति न दिखाकर उनसे अमानवीयता की बर्बर सीमा तक जाकर कार्य लिया जाता है -बैलगाड़ियों और भैसागाडियों को देखकर आपको ऐसा जरूर लगा होगा.


कई लोग देखा देखी जानवरों को पाल तो लेते हैं मगर उनका ध्यान नहीं रखते ..कई पालतू कुत्ते भी बदहाली की दशा में दिखते हैं .यह तो अच्छा हुआ कि अब ज्यादातर बंदूकों की जगह जानवरों को कैमरों से शूट किया जा रहा है मगर फिर भी इनके प्रति जन जागरूकता और सहानुभूति के लिए पता निरंतर प्रयास में जुटी एक वैश्विक चैरिटी संस्थान है .मैंने इसका सदस्य बनने का निर्णय लिया है और एक हजार रुपये की दान राशि इन्हें भेज रहा हूँ -इसके एवज में ये अपनी पत्रिका की एक वर्ष की सदस्यता भी देंगें .

मेरी सिफारिश है आप भी इस अभियान से जुड़े और जानवरों के प्रति सहानुभूति का जज्बा कायम करने में अपना सहयोग दें! मगर एक बात मेरी समझ में नहीं आती कि पेटा द्वारा जानवरों के प्रति नैतिकता की दुहाई को लेकर ऐसे चित्रों का प्रमोशन कही आपत्तिजनक तो नहीं ?

Saturday, 20 March 2010

मदमस्त मिलन इक ऐसा हो जाये....चाह न मिलने की कोई रह जाए

 मदमस्त मिलन इक ऐसा हो जाये , शुक्राणु कोष आजीवन मिल जाए  ,  चाह न मिलने की कोई रह जाए .....न न यह कोई कविता नहीं बल्कि एक हकीकत है कितनी ही चीटियों, मधुमक्खियों ,ततैयों और दीमकों का सेक्स जीवन ऐसा ही होता है .इन कीट परिवारों की मादाएं बस कुछ देर या दिनों के ही प्रणय उड़ान में अपने नर संगियों से जीवन भर के लिए शुक्राणु -गिफ्ट प्राप्त कर धारण  कर लेती हैं जिससे वे अपने अण्डों का निषेचन करती रहती है -संगी कीट की भूमिका ख़त्म!.नर संगियों में इस प्रणय उड़ान में मादा कीट का सानिध्य प्राप्त करने की  होड़ ही नहीं भयंकर  मारकाट भी मचती है और प्रायः  एक विजेता नर कीट मादा से संसर्ग कर उसे जीवन भर के शुक्राणु उपहार से धन्य/पूर्णकाम  कर जाता है ....

कभी कभी जब ऐसा हो जाता है की मादा अपने एकल प्रणय उड़ान में कई नर संगियों से संसर्ग कर लेती है तो उन सभी के शुक्राणुओं में सबसे पहले मादा के अंडाणु तक कौन पहुंचे इसकी होड़ शुरू हो जती है .कोपेनहेगेंन विश्वविद्यालय की सुसेन्न देंन  बोएर ने अपने अनुसन्धान में पाया है कि विभिन्न नर कीटों के शुक्राणु परस्पर ऐसे स्राव छोड़ते हैं जिससे प्रतिस्पर्धी शुक्राणु निष्क्रिय तो हो जाय मगर वह खुद तो सुरक्षित और अति सक्रिय बने रहें  -जब सभी ऐसी ही युक्ति अपनाते हैं तो एक अजीब सा कोलाहल मच उठता है और इसी जद्दोजहद में कोई एक शुक्राणु तैयार अंडे को निषेचित कर देता है .और यह क्रम चलता ही रहता है जब तक कोई भी नाद निषेचन को शेष रहता है . यह जीवंत जंग  आगे भी चलती रहती  है मादा-"रानी " के नए अण्डों की खेप के आते ही यही माजरा फिर शुरू हो जाता है .लीफ कटर चीटी प्रजाति में  शुक्राणुओं के बीच जब मार काट अपने चरम पर पहुँच जाती है तो वह एक प्रेमिल फुहार रूपी स्राव से सभी शुक्राणुओं को शांत कर देती  है .और उन्हें कुछ देर  राहत देकर फिर से एक नए युद्ध को तैयार  करती है .

                                                      एक "उड़ान प्रणय" मधु मक्खी में

कीट पतंगों के सामाजिक जीवन में वैसे तो एक निष्ठता एक नियम सा ही है -मतलब केवल एक संगी से संसर्ग मगर कुछ मादाएं बहु संगी सम्बन्ध बना लेती हैं और वहां शुक्राणु युद्ध की नौबत आ जाती है .मगर ऐसे युद्ध को मादा ज्यादा प्रोत्साहित नहीं करती क्योंकि यह उसकी जीवन भर की जमा पूजी होती है और इसकी अधिक क्षति उसके अनवरत प्रजननं को बाधित कर सकता है -इसलिए अधिक उग्र और आक्रामक शुक्राणुओं पर वह अपने  प्रेमिल स्राव फुहार से नियंत्रण रखती है .ताकि शुक्राणुओं का क्षय कम से कम हो और उसकी अनवरत जनन क्रिया अबाध "दुधौ नहाओ पूतौ  फलो " की तर्ज पर चलती रहे और भावी कीट साम्राज्य रक्षित हो सके .

Thursday, 6 August 2009

इक प्रणय कुटीर बने न्यारा : पशु पक्षियों के प्रणय प्रसंग (10)-(डार्विन द्विशती विशेष)

बना यह प्रणय कुटीर आलीशान
सबसे अनोखा प्रणय मंच कर्मी (स्टेज परफार्मर ) तो आस्ट्रेलियाई बोवर बर्ड है जिसकी १८ प्रजातियाँ हैं और सभी अपने अपने अनूठे तरीके से प्रणय पर्ण कुटीर का निर्माण मादा को रिझाने के लिए करती हैं -टूथ बिल्ड बोवरबर्ड घने जंगल की फर्श के एक नन्हे से टुकड़े को बड़ी परिश्रम से साफ़ करता है और तृन - तिनकों को बीन बीन कर एक आठ फीट का घेरा लिए हुए प्रणय कुटीर तैयार करता है और उसे तरह तरह की रंग बिरंगी चीजों से सजाता है .पत्तियों का उल्टा पीला भाग यह सामने की ओर करके पर्ण कुटीर पर चस्पा करता रहता है -मानो इसके प्रणय बसंत का भी संकेत रंग पीला ही हो ! पत्तियों की सजावट के बाद नाचना गाना शुरू हो जाता है !

बोवर बर्ड की दूसरी प्रजाति है एवेन्यू बिल्डर्स की जो अपने कुटीर में एक प्रेम गली का निर्माण करने में निपुण हैं और वह भी कोई बहुत संकरी नहीं ,अच्छी खासी चौड़ी जिससे उसकी महबूबा खरामा खरामा आराम से भीतर आ सके ! स्पाटेद बोवर बर्ड अपने प्रणय कुटीर को सफ़ेद रंग के साजो सामान से सजाती है -सफ़ेद हड्डी के टुकड़े ,पत्थर के टुकड़े ,छोटे घोंघों के सफ़ेद कवच आदि यह ढूंढ ढूंढ कर लाकर कुटीर के इर्द गिर्द बिखेरती है और मानो अपनी शान्ति प्रियता की मिसाल देना चाहती हो प्रणय संगिनी को ! फान बोवर बर्ड को हरा और गहरा नीला रंग पसंद है -सब प्रजातियों ने मानो कामवश हो इन्द्रधनुष के सभी रंगों को थोड़ा थोड़ा सा चुरा लिया हो ! डेविड अटेंन्ब्रो का यह वीडियो जरूर देखिये !

सबसे भव्य प्रदर्शन तो satin bower bird का है और इसप्रजाति पर व्यवहार विदों ने व्यापक अनुसंधान किया है .गहरे नीले काले रंग और नीली आंखों वाला नर अपने प्रणय कुटीर के एक हिस्से में एक ५ इंच चौड़ी रास गली बनाता है जिसकी दीवारें १२ इंच ऊंची और चार इंच मोटी होती हैं -कुटीर के उत्तरी सिरे पर यह रगीन वस्तुओं का मानो भानुमती का पिटारा ही चुरा लाता हो -तोतों के नीले पर ,नीले फूल ,नीले चेरी के फल ,नीले कांच के टुकड़े ,नीले फीते -रस्सी के टुकड़े ,नीले कपड़े ,नीले बटन और यहाँ तक की शहरी बस्ती के निकट के जंगलों में यह बसों के नीले टिकट ,धोबी घाट से ले उडे नीले रूमाल और थैले सभी कुछ .प्रणय की इस नीलिमा को प्रणाम ! गोपियों को कृष्ण का नीला रंग ही तो कहीं भा नही गया था -नील सरोरुह श्याम !

अब प्रणय के इस नीले रंग /ब्लू फिल्म का एक त्रासद पक्ष भी देखिये कि जब इन पक्षियों को अध्ययन के लिए बने बड़े पिजरों में दूसरी चिडियों के साथ रखा गया तो प्रणय काल में इन्होने दी गयी टहनियों और फुन्गों से कुटीर तो बना लिया मगर नीले रंग के अभाव में नैराश्य जनित क्रोध के चलते इन्होने नीले रंग की चिडियों को ही मार मार कर प्रणय कुटीर के सामने प्रदर्शित कर दिया -प्रेम के नाम पर निरीहों के बलि ! हे राम !

Monday, 3 August 2009

प्रणय घरौदे और अभिसार मंच !-पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (9)-(डार्विन द्विशती विशेष)



तीतरों
और बटेरों की कुछ प्रजातियों में तीतरों की एक प्रजाति सेज ग्राउस में मादा से संसर्ग की इतनी होड़ होती है बस केवल कुछ हर दृष्टि से सक्षम नर ही अपनी मुहीम में कामयाब हो पाते हैं -एक प्रेक्षण में पाया गया कि ४०० नरों में से केवल चार ही स्वयम्बर की इच्छुक ७४ फीसदी मादाओं से घनिष्ठ हो गए -बाकी सब के सब महज २६ प्रतिशत पर कामयाब हो पाये ! मतलब प्रणय शूरमा निकले केवल चार !
प्रणय रत नर मादा सेज ग्राउस

आस्ट्रेलिया की लम्बी पूंछो वाली लायिर बर्ड का नर तीन फिट के लगभग दस गीली मिट्टी के प्रणय घरौदें (love mounds ) बनाता है और अपने प्रणय याचन की विभिन्न भाव भंगिमाओं से मादा को रिझा लेता है !

लायिर बर्ड का प्रणय प्रदर्शन



इसी
तरह बर्ड आफ पैराडाईज घने जंगलों में जहाँ सूरज का प्रकाश तक नही पहुँचता जमीन के छोटे छोटे स्थलों की साफ़ सफाई करके अभिसार /स्वयम्बर मंच बनाते हैं और फिर घने लता गुलमो की कटाई छटाई करके प्रकाश की एक रेख स्वयम्बर मंच तक ला पाने में सफल हो जाते हैं -सूर्य की यह प्रकाश रेखा स्वयम्बर मंच पर मनो स्पाट लाईट का काम करती है ! फिर नर की नाच कूद मादा को रिझाने के लिए शुरू हो जाती है !
यह वीडियो जरूर देख लें !

Thursday, 30 July 2009

कैसे कैसे स्वयम्बर ?-पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (8)-(डार्विन द्विशती विशेष)

अब एरेना डिसप्ले मतलब रंगभूमि प्रदर्शन की कुछ बानगी भी देखिये जो आपके सामने यह भी खुलासा करेगी कि चिडियों की कुछ प्रजातियों में स्वयम्बर की क्या रूप रेखा है -मादाएं नर का चुनाव कैसे करती हैं ?

एक पक्षी है यूरोपियन सैंड पाईपर -भारत में भी प्रवासी है -ruff नर को कहते हैं reeve मादा को ! हिन्दी नाम है गेह वाला या कहीं कहीं बागवाद ! नर की उन्नत कलंगी होती है जो अपने रंगीले परो व कालर से सहज ही पहचाना जा सकता है .ये बसंत ऋतु के आगमन के साथ ही कुछ पारम्परिक रंग भूमियों पर अपना अनंग आसन जमा लेते हैं -नरों में उच्च अनंग आसन यानी पर्वत की चोटी को हथियाने की होड़ और घमासान मचता है. मतलब रंगभूमि का यह हिस्सा सबसे महत्वपूर्ण होता है जहां ज्यादा से ज्यादा नर पहुचने की कवायद करतेहैं- यह नरों की जमावट के कारण फूलों की सेज सा दीखता है -पहाड़ की चोटी , और सेज पिया की,वाह! क्या कहने! सबसे दबंग नर यहाँ कब्जा जमा लेते हैं और ढेर सारे दब्बू नर इर्द गिर्द जमा होते हैं !

मादाएं परिधि के दब्बू नरों की उपेक्षा कर चोटी के गहरे रंगों की कलगी वालों नरों की और आकर्षित होती हैं -उनके आगमन के साथ ही नर प्रणय याचन का जबरदस्त प्रदर्शन करते हैं -मादाएं मनचाहे नर का वरण करती हैं और घनिष्ठ संसर्ग के बाद स्वयंबर सम्पन्न हो जाता है ! प्रणय संसर्ग संपन्न होते ही मादाएं नरों को अलविदा कह देती हैं और अपने वात्सल्य बसेरे की और लौट चलती हैं जहां नीड का निर्माण और अंडे देने ,सेने ,शिशुओं का लालन पालन खुद करती हैं ।रंगभूमि में मादाओं का आगमन और प्रणय प्रसंग कुछ मिनटों में ही निपट जाता है .

यहाँ कुछ हैरतअंगेज भी घटता है. दरअसल इस महा -स्वयम्बर में दो तरह के नर होते है ,एक तो 'सेज पिया की ' पर कब्जा किये अखाडिया नर (रेसिडेंट मेल्स ) और दूसरे अखाडे के किनारे पर जमे लग्गू भग्गू या भडुआ नर (सैटेलाईट मेल्स )। अखाडिया नरों की कलगी गहरे रंग की होती है जबकि भडुआ नर फीकी कलगी वाले होते हैं ! मादा के साथ मुख्य यौन संसर्ग तो अखाडिया नर ही करते हैं मगर भडुआ नर भी किनारे से मादा पर कामुक गिद्ध दृष्टि जमाये रहते हैं ! और मजे की बात तो ये कि अखाडिया नरो से भडुआ नर बिलकुल भी नहीं झगड़ते बल्कि उनकी मिजाज पुरसी /ठकुर सुहाती में लगे रहते हैं! तो फिर इनकी जैवीय जरूरत ही क्या है ? रंगभूमि में फिर इनका क्या काम ?


जोहन फ्रेडरिच नौमान (1780-1857) का "लेक " का चित्रण


दरअसल भडुए नर अपनी उपस्थिति से चोटी /सेज पिया पर काबिज नरों की भीड़ का हिस्सा बनते हैं और मादाओं को दूर से यह अहसास दिला देते हैं कि वहां नरों की भीड़ अधिक है ! इस तरह वे अखाडिया नरो की मदद ही कर रहे होते हैं ! मादाओं का अवचेतन "अधिक नर ,उपयुक्त के चयन के अधिक अवसर " का अनुसरण करता है और वे पिया की सेज पर आ धमकती हैं ! फिर भी इससे भडुआ नरों का क्या सीधा लाभ ? क्या वे निरपेक्ष भाव से केवल अखाडिया नरों के यौन लाभ के लिए आत्मोत्सर्ग कर रहे होते हैं ? नहीं ! ये भी मौके की तलाश में होते हैं और अखाडिया नरो की आपसी प्रतिस्पर्धा जनित द्वंद्व युद्धों में यौनोन्मत्त मादा से क्षण भर के लिए भी विरत नर के स्थान पर ये सहसा ही आ धमकते हैं और ख़ुद द्वारा चयनित नर के युद्ध कौशल को निहार रही और उसके वापस लौटने की प्रतीक्षा कर रही मादा पर आरूढ़ हो जाते हैं -मानो कुदरत भी एक विचित्र असमंजस की स्थिति को बनाये रहती है और मादा के प्रतिकार के पूर्व ही भडुआ नर अपना शुक्र दान कर चुके रहते हैं -विजयी नर के आते आते ये फिर फुर्र से अखाडे के किनारे उड़ चलते हैं -परिस्थितियों का पूरा लाभ उठाने वाले घोर अवसरवादी भडुआ नर बस इन्ही चुराएं हुए काम केलि के तोहफों पर जीवन गुजार देते हैं।

कुछ और पक्षी प्रजातियों में स्वयम्बर की दास्तान जारी रहेगी .......

Monday, 27 July 2009

एक स्वयम्बर यहाँ भी है - पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (7)-(डार्विन द्विशती विशेष)


बर्ड आफ पैराडाईज का नर भी एक बहुगामी एरेना बर्ड है

इन दिनों एक सिने तारिका का रियलिटी -स्वयम्बर शो दूरदर्शन पर छाया हुआ है ! आईये हम आपको स्वयम्बर की प्रवृत्ति के उदगम के खोज यात्रा पर लिए चलते हैं चिडियों की मनमोहक दुनियां में ! यहाँ के स्वयम्बर के आगे बड़े बड़े स्वयम्बर भी फीके हैं ! वैसे तो चिडियों की 8700 प्रजातियों में से अधिकाँश में नर नारी का एकल जोड़ा ही सारी पैत्रिक /मातृत्व की जिम्मेदारियों का वहन करता है -मगर ८५ प्रजातियों में जो कुल के महज एक फीसदी हैं जोड़े नही बनते -इनमें नर बहुगामी होते हैं ,मतलब पालीगैमस ! मगर क्या मजाल किसी मादा से कोई जोर जबरदस्ती हो -यहाँ मादा ही एक विशाल स्वयम्बर में नर का वरण करती है -

इन चिडियों में कोई जोड़ा -बंध (पेयर बोंड) नही बनता .नर और मादा अल्प काल के लिए मिलते हैं -नर जीवन का सर्वोत्कृष्ट आकर्षक प्रदर्शन -प्रणय याचन करता है मादा वर माला डालती है -संसर्ग होता है और फिर मादा नर को छोड़ अलग चल देती है -नर अभी भी और मादाओं के लिए पलक पावडे ही बिछाए रहते हैं और अवसर का लाभ उठा कर एक से भी अधिक मादाओं से प्रणय सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं . इसके बाद नर मादा हमेशा के लिए बिछड़ जाते हैं -मादा घोसला बनाने ,अंडे सेने ,शिशुओं के लालन पालन का जिम्मा ख़ुद निभाती है, नर से कोई मतलंब नही रह जाता !

ये बहुगामी नर ,प्रणय लीला के सिवा बस उठल्लू के चूल्हा होते हैं ,कुछ करते धरते नहीं बस केवल प्रणय कला प्रवीण होते हैं और दिन रात कोई और काम धाम न करके अपने पौरुष प्रदर्शन में ही लगे रहते हैं -अपने डैनों ,पखों -परों को सजाना सवारना ही इनका मुख्य काम होता है ! चूकिं इनमें जोड़ा बाँधने की प्रवृत्ति नहीं होती अतः कई मादाओं से प्रणय बंध स्थापित करने में इन्हें कोई रोक टोक नहीं रहती .नरों में एक दूसरे से बढ़ चढ़ कर खूबसूरत दिखने की चाह और प्रतिस्पर्धा होती है -जो नर जितना ही स्फूर्त ,मुखर और चमक दमक लिए होता है वह मादाओं को उतना ही आकर्षित कर लेता है.

इन पक्षी प्रजातियों जिनमे मुख्य रूप से कई मुर्गों ,तीतर , बटेर ,रफ (नर)और रीव (मादा ) की पक्षी प्रजातियाँ आती हैं में एक विशाल स्वयम्बर का आगाज होता है -पहाडों की ऊंची एकांत निर्जन चोटियां सैकडों नरों से गुंजायमान हो कर "रंगभूमि "का नजारा पेश करती हैं ! इन पारम्परिक रंगभूमियों में आने वाले नर अपने पौरुष का बढ़ चढ़ कर प्रदर्शन शुरू कर देते हैं -मादाएं भी उसी रंगभूमि को चुनती हैं जहाँ ज्यादा नरों की भीड़ होती है -ताकि उनमे चुनाव के अधिक मौके मौजूद रहें ! मादाओं के आते ही एक साथ सारे नर प्रणय याचना शुरू कर देती है -मगर मादा ऐसा दिखाती है की जैसे कुछ हो ही नहीं रहा उसके सामने -प्रत्यक्षतः उदासीन सी वह नर लीलाओं का बस तटस्थ भाव से लेकिन बारीक निरीक्षण करती है -पक्षी प्रणय के इस रंगभूमि को अंग्रेजी में एरेना -arena या स्कैन्देनिविआयी भाषा में Leka मतलब "टू प्ले ' कहते हैं और यहाँ हो रहे प्रणय प्रदर्शन को 'एरेना डिस्प्ले '- इन पक्षियों का एरेना ही वह अभिसार स्थल है जो केवल प्रणय लीला का केंद्र है ,यहाँ घोसला बनाना ,शिशुओं का लालन पालन सभी वर्जित है -मादा नर से संसर्ग के बाद अन्यत्र घोसला बनाने और भावी पीढी के लालन पालन की तैयारियों की और चल देती है !

यह वर्णन अभी आगे भी है मगर अभी तो मुझे रामचरित मानस का वह प्रसंग याद हो आया -रंगभूमि जब सिय पगु धारी,देखि रूप मोहे नर नारी -मगर मनुष्य कितना विकसित हो गया है -यहाँ स्वयम्बर में राम को वरण करने के बाद सीता उनकी जीवन सगिनी बन जाती हैं मगर एरेना बर्ड्स में नर को मादा की परवाह कहाँ ?


अभी जारी रहेगा यह पक्षी प्रणय पुराण

Friday, 24 July 2009

......और हो आग दोनों तरफ़ बराबर लगी हुयी .... पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (6)-(डार्विन द्विशती विशेष ब्लागमाला )

जी हाँ ,इश्क में हो दोनों ओर आग बराबर लगी हुई की सोच का उदगम लगता है इन पशु पक्षियों के प्रणय याचन के व्यवहार से ही है -नर और मादा में काम विह्वलता की बराबरी और उनकी समकालिकता का होना जरूरी है तभी उनमें रति मिलन सम्भव है ! प्रणय याचन के व्यवहार इसी ओर उकसाते हैं ! यदि नर मादा में से कोई एक भी काम विह्वलता के समान स्तर पर नहीं पहुँच पाता तो रति प्रसंग सफलता पूर्वक संयोजित नही हो सकता .अनिश्चय की स्थिति प्रायः मादा की ओर से ही होती है अतः नर बार बार अपने चित्र विचित्र प्रणय व्यवहारोंकी पुनरावृत्ति करता रहताK है और यह एक भरे पूरे अनुष्ठान का रूप तक ले लेता है-बहुत कुछ किसी सेरीमनी जैसा ! जिससे मादा का असमंजस दूर हो जाय !

स्वार्ड टेल मछली का नर अपनी तलवार जैसी पूंछ से बार बार मादा के मुंह के सामने पंख झलने सा उपक्रम करता है -वह दूर भागना चाहती है तो भी नर उसका रास्ता रोक रोक कर अपनी पूंछ दिखाना चाहता है -यह तब तक चलता रहता है जब मादा भी पूर्ण समर्पण के लिए तैयार नही जाती


नर स्वार्ड टेल मादा को बार बार अपनी तलवारनुमा पूँछ दिखा कर रिझाता है


मछलियाँ प्रणय याचन के दौरान तीन तरह का व्यवहार प्रर्दशित करती है -भय (फियर ),आक्रामकता (एग्रेसन ) और यौन संसर्ग (mating) की उन्मुखता -यानि 'FAM '-जब तक पहले की दोनों प्रवृत्तियों का शमन नहीं होता -अंतिम यानि यौन संसर्ग हो पाना मुश्किल है !

नर स्टीकल बैक मछली का नर इतना आक्रामक हो उठता है की वह मादा के करीब आने पर उस पर भी आक्रमण कर सकता है -प्रणयातुर मादा अण्डों से भरा पेट तो दिखाती है मगर नर के पास आने पर भाग भी खडी होती है -मगर अण्डों से भरे पेट को देखते ही नर की आक्रामकता का शमन होने लगता है -वह मादा को खुद अपने बनाए गए नेस्ट -घोसले तक ले जाता है ,इसके दौरान वह एक विशेष तरह का टेढा मेढा नृत्य भी करता है ! यह नृत्य नर के उहा पोह को दर्शाता है की कही मादा के रूप में यह कोई आक्रान्ता हो जो उसके इतने परिश्रम से बनाए गए घोसले को उजाड़ दे !नर की इस दुविधा का लाभ उठाते ही मादा घोसले में घुस लेती है और मादा के घोसले में जाते ही नर की आक्रामकता नाटकीय तरीके से छू मंतर हो जाती है -वह मादा की पूँछ को बार बार आलोडित करता है -मादा अंडे दे देती है और नर उनपर अपने शुकाणुओं को छोड़ देता है -मगर तभी एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो जाती है -जैसे ही मादा अंडे दे देती है उसका पेट पिचक जाता है और नर उसे घोसले में आया कोई घुसपैठिया समझ लेता है और खदेड़ बाहर करता है ! अब नर ही अण्डों के सेने और बच्चे निकलने तक की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेता है !

स्टिकल बैक नर मादा को घोसले में घुसने को गाइड करता है और उसकी पूँछ को आलोडित करता है


पक्षियों में भी मादा की अनिच्छा को दूर करने के तरह तरह के प्रणय प्रदर्शन किये जाते हैं -जेब्रा फिंच नर मादा के सामने एक मजेदार नृत्य करता है -"कभी पास कभी दूर ' होने का और जैसे जैसे मादा उत्प्रेरित होती जाती है वह पास खिसकता आता है ! गौरया के नर को कभी प्रणय याचन /प्रदर्शन करते हुए देखिये -वह शिशुओं की तरह पंखों को सिकोड़ और सर नीचे कर मानो मादा से स्नेह -दुलार की याचना करता हो -मादा इस प्रदर्शन के वशीभूत हो प्यार करने की रजामंदी दे देती है.



जेब्रा फिंच का प्रणय नृत्य -वह धीरे धीरे मादा के निकट आता जाता है -एक रेखाचित्र


जो इन बारीक बातों को नहीं समझते उन्हें पशु पक्षियों के प्रणय व्यवहार अजीब से और हास्यास्पद लग सकते हैं -अब आप भी जब किसी पशु पक्षी को कोई अजीब सा व्यवहार करते देखें तो पहली इसी सम्भावना पर धयान दें की कहीं यह उसका प्रणय याचन तो नहीं है ?आपके प्राणी व्यवहार विद बनने के एक सुनहरे अवसर की शुरुआत हो सकती है यह ! आजमा के देखिये !