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Wednesday, 10 June 2015

नीली गोली के बाद अब गुलाबी गोली को हरी झंडी!

पुरुषों के बेहतर प्रदर्शन के लिए मददगार विख्यात नीली गोली (वियाग्रा) के बाद अब अमेरिकन महिलाओं को भी जल्द ही महिला यौन रोग के उपचार के नाम पर पहली बार " गुलाबी वियाग्रा ' मुहैया हो जाएगी जिसे कामेच्छा बढ़ाने की (विवादास्पद गोली ) का खिताब मिल जाएगा।  एफडीए के एक पैनल द्वारा इसे फिलहाल ट्रायल की मंजूरी  दे दी गयी है। 18-6 वोट से , खाद्य एवं औषधि प्रशासन के विशेषज्ञों के एक पैनल ने इस प्रयोगात्मक दवा फ्लिबेनसरिन ( flibanserin) को हरी झंडी दे दी है.मगर  इसके प्रयोग से निम्न रक्तचाप , चक्कर आना और बेहोशी आदि के आनुषंगिक प्रभावों से बचने के लिए सावधानियां भी सुझाई गयी हैं।



जैसे पुरुषों में वियाग्रा से यौनक्रिया के प्रदर्शन में सुधार हुआ  उसी तरह से यह गोली महिलाओं के सेक्स जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि कर सकती है। लेकिन एक मूल अंतर यह है जहां वियाग्रा पुरुष अंग में रक्त प्रवाह को बढ़ाकर यौन क्रिया के निष्पादन क्षमता एवं समय को मात्र "हाइड्रॉलिक" तरीके से बढ़ाता है 'गुलाबी गोली' महिला कामुकता में अप्रत्यक्ष तरीके से प्रभाव डालती है. यह मस्तिष्क के कुछ रसायनों के स्रवण को प्रभावित करती है। विशेषज्ञों के परामर्श के अनुसार महिला को सोते समय एक 100 मिलीग्राम की गोली लेनी होगी। इससे सुखमूलक रसायन डोपामाइन का स्रवण जहां बढ़ेगा वही संतुष्टि के रसायन सेरेटोनिन का स्रवण कम हो जाएगा!


इस दवा की मालिक कंपनी - उत्तरी कैरोलिना स्थित एक  फार्मास्यूटिकल्स के लिए यह  बड़ी जीत है। अमेरिका के महिला राष्ट्रीय संगठन के अध्यक्ष टेरी ओ 'नील ने कहा कि "मुझे लगता है कि यह गोली महिलाओं की कामुकता की बेहतर समझ और एक स्वस्थ तरीके से उनके द्वारा अपनी कामुकता के नियमन की दिशा में एक बड़ा कदम है." वैज्ञानिकों और दवा कंपनियों में ब्लॉकबस्टर दवा वियाग्रा की सफलता के पश्चात महिलाओं की यौन समस्याओं का इलाज करने के लिए एक गोली के विकास और विपणन पर वर्षों से  प्रयास चल रहे थे.

फ्लिबेनसरिन के समर्थकों द्वारा पुरुषों के लिए  वियाग्रा सहित  कई यौन - रोग दवाओं को मंजूरी देने किन्तु कामेच्छा की कमी से पीड़ित अमेरिकी महिलाओं की एफडीए द्वारा लगातार उपेक्षा की शिकायत की जाती रही है. आलोचकों द्वारा यौन बराबरी के बजाय दुहरे मानदंड का भी आरोप लगाया जा रहा था। जबकि दवा के विरोधियों का दावा था कि एक भावनात्मक मुद्दे के नाम पर दवा कंपनी एक अनावश्यक गोली बाज़ार में उतार कर मुनाफा कमाना चाहती है।

यद्यपि अभी गुलाबी गोली को व्यापक स्तर पर इस्तेमाल की अंतिम मंजूरी नहीं मिली है किन्तु ऍफ़ डी  ए के अनुमोदन के उपरान्त यह महिलाओं में  रजोनिवृत्ति के  पहले  हीन  यौनेच्छा एवं अन्य यौन विकारों के उपचार में कारगर होगी जैसा की अमेरिका की लगभग ४८ लाख महिलायें इसकी शिकार हैं. महिला स्वातंत्र्य  की दिशा में भी इस कदम को देखा जा रहा है!

Friday, 21 September 2012

महिलाओं को यौन कर्म घृणित लगता है,जिम्मेदार पुरुष ही होते हैं!


तनिक सोचिये, सहवास (सेक्स) एक तरह से असहज कार्य नहीं है? -पसीना और उसकी दुर्गन्ध,लार,वीर्य -द्रव तथा और भी असहज स्थितियां ! एक सर्वे के मुताबिक़ बहुत से लोगों ख़ास कर आधी दुनिया के नुमायिन्दों को यह बहुत अनकुस(खराब) लगता है मगर वे फिर भी इसके लिए तैयार हो जाती हैं .आखिर क्यों? नीदरलैंड में इस विषय पर शोध किया गया है और एक रिपोर्ट टाईम पत्रिका ने प्रकाशित की है !
शोधार्थियों का अध्ययन बताता है कि सामान्यतः  महिलायें अगर उत्तेजित न की जायं तो उन्हें सहवास में कोई रूचि नहीं होती बल्कि वे इसे एक जुगुप्सा भरा कार्य मानती हैं . उनकी उत्तेजित अवस्था ही उनके जुगुप्सा प्रतिक्रिया को शमित करती है और वे सहवास की उन क्रियाओं -क्रीडाओं में सहयोग करने ;लगती हैं जिन्हें अन्यथा वे पसंद नहीं करतीं . ग्रोनिंजन विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने ९० महिलाओं पर अपने इस प्रेक्षण को प्रमाणित करने के लिए प्रयोग किये . उन्हें तीन समूहों में बांटा. एक समूह को कामोद्दीपक वीडियो दिखाए गए . दूसरे समूह को ऐसे रोमांचक वीडियो दिखाए गए जिनसे शरीर में ऐडरेलिन का प्रवाह बढ़ता हो जैसे रीवर राफ्टिंग और स्काई डाईविंग -इनमें भी वे उद्वेलित हुईं मगर वह कामोत्तेजना से पृथक का उद्वेलन था . तीसरे समूह को कोई सामान्य सा वीडियो दिखाया गया . 
तदनंतर उन्हें कुछ बहुत अप्रिय से ,अनकुस से काम करने को दिए गए जैसे किसी गिलास में कीड़ा (नकली ) पड़े द्रव को पीना,पहले से ही इस्तेमाल हुए टिश्यू पेपर से हाथ साफ़ करना ,ऐसे बिस्किट खाना जो कीड़े के समूह जैसे दिख रहे थे या फिर इस्तेमाल हुए कंडोम के भीतर उंगली डालना. पाया गया कि जिस समूह ने कामोत्तेजक वीडियो देखा था उसने इंगित कामों को करने में अपेक्षाकृत काफी कम असहजता दिखाई. यह साफ़ था कि उनके कामोद्वेलन ने उनकी कई जुगुप्सात्मक प्रवृत्तियों को तिरोहित कर रखा था .
उक्त अनुसन्धान के जरिये शोधार्थियों ने यह प्रमाणित करना चाहा कि सहवास जैसी गतिविधि के  असहज होते हुए भी लोग उसमें इसलिए संलिप्त हो जाते हैं क्योकि वे कामोत्तेजित हो उठते  हैं या कर दिए जाते हैं  -काम -क्रिया विशेषज्ञ  भी महिलाओं के सहवास पूर्व काम -उद्वेलन के पहलू पर पर ज्यादा जोर देते हैं . इस अध्ययन का एक प्रबल पक्ष यह है कि इसके परिणामों के मद्दे नज़र उन महिलाओं जिनका यौन जीवन असामान्य है या जो सेक्स को जुगुप्सा मानती हैं के लिए कारगर सेक्स थिरेपी इजाद हो सकती है . आज भी ऐसे कई मामले सामने आते हैं जिनमें महिलायें सहवास के बाद अपनी अत्यधिक साफ़ सफाई ,बार बार नहाने सरीखे कार्यों में लग जाती हैं . पुरुषों के लिए भी यह अध्ययन महत्वपूर्ण है जिन पर यौन क्रिया के पूर्व यौन -सहकर्मी को पूर्णतया कामोद्वेलित करने का दायित्व होता है .अन्यथा सहवास केवल एकतरफा आनंद बन कर रह जाता है -सहकर्मी के लिए केवल एक त्रासद अनुभव!  यही कारण है कि महिलाओं में सेक्स के प्रति एक विराक्ति भाव घर कर जाता है  और जोड़ों का यौन जीवन असहज और असामान्य हो उठता है जिसके  ज्यादातर जिम्मेदार पुरुष ही होते हैं!  

Saturday, 29 January 2011

चुम्बन विज्ञान यानि फिलेमैटोलाजी के बारे में क्या जानते हैं आप ?

कहाँ चुम्बन जैसा सरस मन हरष विषय और कहाँ विज्ञान की नीरसता ..आईये मानवीय सर्जना के इन दोनों पहलुओं में तनिक सामंजस्य बिठाने का प्रयास करे .. चुम्बन के विज्ञान(philematology )  पर एक  नजर डालते हैं! 
विज्ञान की भाषा में चुम्बन -आस्कुलेशन(osculation)   किन्ही भी दो व्यक्तियों के बीच की  सबसे घनिष्ठ अभिव्यक्ति है जिसके चलते कितनी ही साहित्यिक ,सांगीतिक और चित्रकलाओं की गतिविधियाँ उत्प्रेरित - अनुप्राणित हुयी हैं ...कहते हैं कुछ चुम्बनों या उनकी दरकार ने इतिहास के रुख को भी पलट दिया है ..मगर यह सब यहाँ विषयांतर हो जाएगा -यहाँ साईंस ब्लॉग की भी मर्यादा तो बनाए रखनी है न ..बाकी सब के लिए तो क्वचिदन्यतोपि है ही ....निश्चय ही  चुम्बन एक नैसर्गिक सी लगने वाली अनुभूति है मगर क्या यह सहज बोध प्रेरित गतिविधि है ? आकंडे कहते हैं कि दुनिया में तकरीबन दस फीसदी लोग आपस में अधरों का स्पर्श  तक नहीं होने देते ..तब  भी इसे आखिर क्या सार्वभौमिक सांस्कृतिक गतिविधि मान ली जाय ? बहुत से वैज्ञानिक इसे महज सांस्कृतिक गतिविधि नहीं मानते .....चुम्बनों का पारस्परिक विनिमय साथी के कितनी ही जानकारियों का अनजाने ही साझा करा देती है ...हम प्रेम रसायनों -फेरोमोंस का साझा करते हैं ....  प्रेम रसायनों(डोपा माईन,सेरोटोनिन आदि )    का एक पूरा काकटेल ही साझा हो जाता है और हमारे सामजिक बंध को और मजबूती दे देता है ,तनाव घटाता है ,उत्साह उत्प्रेरण और हाँ सुगम यौनिकता की राह भी प्रशस्त करता है यानि जैसा भी  संदर्भ /अवसर हो .....हम पर एक जनून तो तारी हो ही जाता है -यह सचमुच प्रभावकारी और सशक्त है -आजमाया हुआ नुस्खा है अगर किसी ने न आजमाया हो तो फिर हाथ कंगन को आरसी क्या ? 

सहज चुम्बन दिव्य सुखाभास की अनुभूति देता है ...और मस्तिष्क के 'प्रेमिल क्षेत्रों' को प्रेरित कर प्रेम रसायनों का एक पूरा डोज रक्त धमनियों में उड़ेल देता है ...यह सब महज सामाजिक औपचारिकताओं से भी निश्चय ही अलग एक कार्य व्यापार का संसार सृजित करता है ....हम जानते हैं हमारे नर वानर कुल के कुछ सदस्य अपने बच्चों को मुंह से मुंह खाना खिलाने के दौरान अधरों के संपर्क में आते हैं और शायद चुम्बन-व्यवहार का उदगम   इसी गतिविधि से ही  हुआ हो मगर ज्यादातर वैज्ञानिक मानते हैं कि इसका उदगम और विकास साथी के लैंगिक चयन में भी  भूमिका निभाते हैं -इसी दौरान साथी की शारीरिक जांच भी इस लिहाज से हो जाती है कि उनका जोड़ा संतति वहन के लिए  पूर्णतया निरापद है भी या नहीं ...मतलब संतानोत्पत्ति और उनके लालन  पालन में तो कहीं कोई लफड़ा नहीं रहेगा -यह सब रासायनिक परीक्षण चुम्बन के  दौरान ही अनजाने हो जाता है ....कितने ही प्रेम सम्बन्ध इन्ही कारणों से आगे नहीं बढ़ पाते -रासायनिक लाल झंडी है चुम्बन ....फिर शुरू होता है तुम अलग मैं अलग की कहानी और असली माजरा समझ में नहीं आता ...कई बार तो पहला चुम्बन ही निर्णायक हो जाता है ..अवचेतन तुरत फुरत भांप जाता है की अरे यह नामुराद तो बच्चे की जिम्मेदारी नहीं उठा पायेगा ...वैज्ञानिकों की माने तो चुम्बन भावी घनिष्टतम संपर्कों की देहरी है ..लाघ गए तो चक्रव्यूह का  अंतिम फाटक भी फतह नहीं तो देहरी पर ही काम तमाम .....
तो यह चुम्बन -आलेख शेरिल किरशेंनबौम की 'द साईंस आफ किसिंग' पुस्तक से परिचय कराने के लिए और किसी को नजराने के लिये लिखा गया है ...और अगर आपमें और अधिक जिज्ञासा जगा सका तो अंतर्जाल अवगाहन का विकल्प तो आपके पास है ही -हम विज्ञान संचारको का काम बस प्यासे को कुंए तक पंहुचा देना भर है ....पानी आप खुद निकालिए और पीजिये .....
एक मिनट का यह वीडियो भी देख सकते हैं ....



http://www.youtube.com/watch?v=7ykfQANwS_w&feature=player_embedded

Tuesday, 27 July 2010

यौनिक रिश्तों की पड़ताल के कुछ नए परिणाम !

टाइम पत्रिका का ताजा एशियन संस्करण एक लीड स्टोरी समेटे  हुए हैं .कौगर (cougar sex ) यौन सम्बन्ध पर .अब कौगर क्या है आप खुद क्लिक कर पढ़ें .भारतीय समाज यौन मुद्दों पर खुलकर बात करने से कतराता है ,हमारे संस्कार ,हमारे कतिपय सुनहले नियम इसका प्रतिषेध करते हैं .और एक दृष्टि से यह उचित भी है .किन्तु जब ऐसी वर्जनाएं यौन कुंठाओं को जन्म देने लगे तो हमें कुछ स्वच्छन्दता लेनी चाहिए  -और वैज्ञानिक निष्कर्षों के प्रति एक खुली दृष्टि रखनी चाहिए -विचार विमर्श होते रहना चाहिए नहीं तो खाप पंचायतों जैसी हठधर्मिता ,भयावह सामाजिक स्थितियां भी मुखरित हो उठती हैं .

चलिए आज के मुद्दे पर विचार कर लिया जाय .नए अध्ययन  के मुताबिक़ जहाँ टीन एजर्स युवकों में यौन इच्छा प्रबल होती है   वहीं   मध्य  उम्र की महिलाओं में काम भावना अधिक पाई गयी है .टेक्सास विश्वविद्यालय के यौनिक मामलों के विशेषज्ञ डेविड बास और उनके तीन छात्रों के नए शोध अध्ययन में पाया गया है कि ३०  वर्ष से ऊपर की किन्तु ४७ से कम  उम्र की महिलाओं में यौन भावना की तीव्रता होती है .उनकी यौन सबंध बनाने की फ्रीक्वेन्सी  भी १८ से २६ वर्ष की युवतियों  से अधिक होती है .यही वह तबका है जिसे यौनिक सम्बन्धों में ज्यादा लिप्त पाया गया है यहाँ तक कि आकस्मिक और एक रात्रि की  घनिष्टता तक में भी ये अधिक स्वच्छंद  हैं.

इसके उलट पुरुषों में यौनिक सक्रियता टीन एजेर्स में सबसे अधिक होती है और फिर एक स्थायित्व पा लेती है और जीवन भर उसी पर थमी रहती है .७० वर्ष के ऊपर तक के पुरुषों में यौनिक सक्रियता एक आम बात है  जबकि रजो निवृत्ति के बाद स्त्रियों में यौन रुझान घटने लगती है .तो आखिर स्त्रियाँ अपने टीन एज और  बीसोत्तरी वर्षों के उपरान्त के  मध्यवर्ती उम्र में ही इतनी यौन सक्रिय क्यों होती हैं ? ऐसा इसलिए है कि जैसे ही उनकी रजोनिवृत्ति नजदीक आने लगती है उनकी सगर्भता की संभावनाएं न्यून होने लगती हैं  और इसलिए नैसर्गिक प्रेरणा से वे ज्यादा  यौन सम्बन्ध के लिए तत्पर रहती  हैं ...

चूंकि  टीन अवस्था वैसे ही काफी उर्वर होती है इस काल में सगर्भता  के लिए यौनिक सम्बन्ध बनाने की अतिरिक्त तत्परता की आवश्यकता ही नहीं रहती ..ज्यादातर अवांछित  गर्भधारण  टीनएजर्स में ही देखा जाता है इसलिए उन्हें सावधान भी रहना चाहिए .  .मगर उम्र के मध्यकाल में उन्हें खुद  सक्रिय होना होता है . उम्र की यह अवधि  २७ से ४७ के वर्ष के बीच पाई गयी है .पाया गया कि १८ से २६ और पुनः ४७ से आगे की उम्र में स्त्रियों में यौन संपर्कों मे खास रूचि नहीं रहती ..यह दोनों अवधियाँ गर्भ धारण की दृष्टि से विशेष है -एक में गर्भ धारण सहज ही हो जाता  है जबकि बाद में इसकी नौबत ही नहीं रह जाती ..अतः  २७ से ४७ वर्ष की उम्र ऐसी होती है कि इसमें उनके स्थायी सहचर/पति  से दीगर अस्थायी सम्बन्धों की संभावनाएं बढी हुई होती हैं .
 डेविड बास ने एक  चर्चित  पुस्तक  भी लिखी  है -
इन निष्कर्षों के भारतीय निहितार्थों पर विचार आमंत्रित हैं !


Saturday, 20 March 2010

मदमस्त मिलन इक ऐसा हो जाये....चाह न मिलने की कोई रह जाए

 मदमस्त मिलन इक ऐसा हो जाये , शुक्राणु कोष आजीवन मिल जाए  ,  चाह न मिलने की कोई रह जाए .....न न यह कोई कविता नहीं बल्कि एक हकीकत है कितनी ही चीटियों, मधुमक्खियों ,ततैयों और दीमकों का सेक्स जीवन ऐसा ही होता है .इन कीट परिवारों की मादाएं बस कुछ देर या दिनों के ही प्रणय उड़ान में अपने नर संगियों से जीवन भर के लिए शुक्राणु -गिफ्ट प्राप्त कर धारण  कर लेती हैं जिससे वे अपने अण्डों का निषेचन करती रहती है -संगी कीट की भूमिका ख़त्म!.नर संगियों में इस प्रणय उड़ान में मादा कीट का सानिध्य प्राप्त करने की  होड़ ही नहीं भयंकर  मारकाट भी मचती है और प्रायः  एक विजेता नर कीट मादा से संसर्ग कर उसे जीवन भर के शुक्राणु उपहार से धन्य/पूर्णकाम  कर जाता है ....

कभी कभी जब ऐसा हो जाता है की मादा अपने एकल प्रणय उड़ान में कई नर संगियों से संसर्ग कर लेती है तो उन सभी के शुक्राणुओं में सबसे पहले मादा के अंडाणु तक कौन पहुंचे इसकी होड़ शुरू हो जती है .कोपेनहेगेंन विश्वविद्यालय की सुसेन्न देंन  बोएर ने अपने अनुसन्धान में पाया है कि विभिन्न नर कीटों के शुक्राणु परस्पर ऐसे स्राव छोड़ते हैं जिससे प्रतिस्पर्धी शुक्राणु निष्क्रिय तो हो जाय मगर वह खुद तो सुरक्षित और अति सक्रिय बने रहें  -जब सभी ऐसी ही युक्ति अपनाते हैं तो एक अजीब सा कोलाहल मच उठता है और इसी जद्दोजहद में कोई एक शुक्राणु तैयार अंडे को निषेचित कर देता है .और यह क्रम चलता ही रहता है जब तक कोई भी नाद निषेचन को शेष रहता है . यह जीवंत जंग  आगे भी चलती रहती  है मादा-"रानी " के नए अण्डों की खेप के आते ही यही माजरा फिर शुरू हो जाता है .लीफ कटर चीटी प्रजाति में  शुक्राणुओं के बीच जब मार काट अपने चरम पर पहुँच जाती है तो वह एक प्रेमिल फुहार रूपी स्राव से सभी शुक्राणुओं को शांत कर देती  है .और उन्हें कुछ देर  राहत देकर फिर से एक नए युद्ध को तैयार  करती है .

                                                      एक "उड़ान प्रणय" मधु मक्खी में

कीट पतंगों के सामाजिक जीवन में वैसे तो एक निष्ठता एक नियम सा ही है -मतलब केवल एक संगी से संसर्ग मगर कुछ मादाएं बहु संगी सम्बन्ध बना लेती हैं और वहां शुक्राणु युद्ध की नौबत आ जाती है .मगर ऐसे युद्ध को मादा ज्यादा प्रोत्साहित नहीं करती क्योंकि यह उसकी जीवन भर की जमा पूजी होती है और इसकी अधिक क्षति उसके अनवरत प्रजननं को बाधित कर सकता है -इसलिए अधिक उग्र और आक्रामक शुक्राणुओं पर वह अपने  प्रेमिल स्राव फुहार से नियंत्रण रखती है .ताकि शुक्राणुओं का क्षय कम से कम हो और उसकी अनवरत जनन क्रिया अबाध "दुधौ नहाओ पूतौ  फलो " की तर्ज पर चलती रहे और भावी कीट साम्राज्य रक्षित हो सके .

Thursday, 18 March 2010

दुनियाँ जहाँ नर गर्भ धारण करते हैं !

बोलो गर ऐसा हो तो क्या हो ? नर गर्भ धारण करने लगें और नारियां इस दायित्व से मुक्त हो जायं ? जीव जगत में पहले से ही कुछ ऐसे रोचक उदाहरण है जहाँ पहले से ही यह वाकया वजूद में आ चुका है -हाँ यह बहुत  दुर्लभ है और केवल समुद्री घोड़ो ,पाईप  मछली और जल दैत्यों तक ही सीमित है .नरों में गर्भाशय की प्रतीति कराती  एक पालन  पोषण थैली होती है यानि  ब्रूड पाउच जिसमें मादाएं अपना अंड डाल देती हैं और अब नर की पूरी जिम्मेदारी होती है कि वह उनका पालन पोषण करता रहे .क्या प्राणी जगत के ये सबसे अच्छे डैडी हैं ?

मगर शायद  नहीं क्योंकि पाईप फिश पर हुए एक ताजा अनुसन्धान से यह तय हो गया है कि इस प्रजाति का नर अण्डों के पालन पोषण में पक्षपात करता है -यह केवल अपने मन के मुताबिक़ अण्डों को तो पोषण पाउच में रखता है बाकी को बेरहमी से उलीच (गर्भपात ) देता है .जाँच परख के दौरान पाया गया है कि वह केवल उन मादाओं का ही अंडा पालता है जिसे वह यौनिक रूप से आकर्षक पाता है बाकी के अंडे पालने में उसे कोई रूचि नहीं रहती .यह तो नर सगर्भता का एक काला पक्ष ही हुआ न? वह कमतर यौनिक आकर्षण वाली मादाओं के अंडे उलीच कर (गर्भपतन) करके अपनी ऊर्जा  और सामर्थ्य को ज्यादा यौनिक आकर्षण वाली मादा से संसर्ग हेतु  बचा कर रखता है .

वैज्ञानिक इन प्रेक्षणों के मानवीय संदर्भों को भी समझने में लगे हैं -फिलहाल आप इस वीडियो को देखिये -

यहाँ कुछ हटके भी देखिये

जीव जंतुओं में नर सगर्भता(प्रिगनैन्सी) के रोचक उदाहरण! 

Monday, 8 March 2010

नर नारी समानता का आख़िरी पाठ

हमने अभी तक देखा कि गुफाकाल से ही नर नारी के कार्य विभाजनों में फर्क के बावजूद भी उनके बीच सामाजिक स्तर का कोई  फर्क नहीं था बल्कि पुरुषों की तुलना में नारियां एक समय में एक  साथ ही कई कामों का कुशलता से संचालन करती थीं और उनकी यह क्षमता आज भी विद्यमान है. जबकि अमूमन पुरुष एक समय में किसी एक मुख्य कार्य में ही ध्यानस्थ हो जाता है जो उसके प्राचीन काल की आखेटक प्रक्रति /प्रवृत्ति की ही जीनिक अभिव्यक्ति -शेष है. प्राचीन प्रागैतिहासिक काल में में नर और नारी को तब के कबीलाई समाजों में बराबर का स्थान था बल्कि कहीं कहीं नारी ज्यादा प्रभावी रोल में थी -ईश्वरीय शक्ति से युक्त भी क्योकि वह सृष्टि -सर्जक थी -प्रजनन और संतति संवहन की मुख्य अधिष्ठात्री -यही कारण था कि पहले के कितने समाज मातृसत्तात्मक भी थे-नारियों की तूती बोलती थी और यहाँ तक कि  ईश्वर का  आदि स्वरुप भी खुद ममत्व का ,नारी का ही था -आदि शक्ति रूपी देवियाँ पहले प्रादुर्भाव में आयीं -अगर हम खुद अपने सैन्धव सभ्यता की बात करें तो भी यही इंगित होता है कि तत्कालीन समाज में नारी का स्थान ऊंचा था और आर्यों से पराजित और पुरुषों का समूह संसार होने के बाद  आर्यों द्वारा पोषित वैदिक संस्कृति में भी नारी पूर्व की ही भांति प्रतिष्ठित  बनी रही -वैदिक काल की अनेक ऋषि पत्नियों का सम्मान जनक उल्लेख हमें इसकी याद दिलाता है -यहाँ विस्तार विषय से विचलन हो जायेगा .. अस्तु ...मगर कालांतर में स्थितियां बदलीं और तेजी से बदलती रहीं.

नर नारी की समानता का संतुलन तब डगमगाता गया जब मानव जनसंख्या तेजी से बढी ,नगर और कस्बे  बढ़ते  चले गए और कबीलाई मानव नागरिक बनने लग गया -मानवीय संदर्भ में एक नए सांस्कृतिक विकास की देंन -धर्म (रेलिजन ) के बढ़ते प्रभावों ने अब कई विकृतियों को जन्म देना शुरू किया -नागरीकरण और धर्म के मिलेजुले अजीब सम्बन्धों ने आदि शक्ति स्वरूपा देवियाँ को विस्थापित कर देव -देवताओं को केंद्र में लाना शुरू किया -ममत्व की जीवंत मूर्तियाँ अब अधिकारवादी पुरुष देवों में बदलती गयीं -स्त्रीलिंग ईश्वर अब पुल्लिंग बन गया था! आदर्श हिन्दू जीवन शैली जो आज भी सैन्धव और आर्य संस्कृति का समन्वय किये  हुए  है आदि शक्ति रूपी देवियों और आदि देवों के बीच समान  साहचर्य ,समान श्रद्धा की ही पोषक बनी हुई है,किन्तु धर्म के सैद्धांतिक -कर्मकांडी स्वरुप में ही, व्यवहार में स्थिति बदल चुकी है .

लगता है  प्रतिशोधी पुरुष देवो ने पूरी दुनिया में ही अपने पवित्र प्रतिनिधियों के जरिये  कालांतर में और निरंतर भी खुद की धनाढ्य सत्ता और सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए अपनी पद- प्रतिष्ठा और अनुयायी पुरुष जमात को उच्च  सामाजिक स्तर देने का सिलसिला जारी रखा रखा है -नारी की अस्मिता को भी दांव पर लगाते हुए जो उत्तरोत्तर निम्न से निम्नतर सामाजिक स्तर पर पहुँचती रही -उससे उसके  सामाजिक उच्चता का वैकासिक जन्मसिद्ध अधिकार भी पुरुष देवताओं के बढ़ते वर्चस्व से छिनता चला गया - दरअसल उसी वैकासिक जन्मसिद्ध अधिकार की पुनर्प्राप्ति के प्रयास के तौर पर नारीवादी आंदोलनों को पहले तो पश्चिम से और अब उचित ही पूर्व से समर्थन मिला है .वे आज अपनी "आदि शक्ति" रूपी  सामाजिक सम्मान  की वापसी के लिए संघर्षरत हैं -अधिकारों की मांग कर रही हैं .और यह जायज भी है कम से कम भारतीय मनीषा के लिए तो अवश्य ही! देर सवेर उन्हें यह प्राप्त होकर ही रहेगा .मगर इन आंदोलनों को सही परिप्रेक्ष्य और स्पष्ट लक्ष्य की ओर संचालित होना होगा .वे कुछ भी नया नहीं मांग रही हैं बल्कि वास्तविकता तो यही है कि वे अपनी उसी खोयी हुई प्रतिष्ठा और ताकत की पुनर्वापसी चाहती हैं जो उन्हें अपने आदिकाल की भूमिका में प्राप्त था -स्वप्न साकार होने लग गए हैं!

Saturday, 6 March 2010

नर नारी समानता का अगला पाठ

हमने नर नारी समानता के कतिपय मूलभूत समाज जैविकीय पहलुओं को पिछले दिनों जांचा परखा .अब आगे . पश्चिम से शुरू हुए नारीवादी आंदोलनों के बाद /बावजूद आज भी सारी दुनिया के कई हिस्सों में नारी पुरुष की " प्रापर्टी " और उससे निम्न दर्जे की मानी जाती है -और यह निश्चित ही दुखद है - आज भी नारी समानता के लिए किये गए जेनुईन प्रयासों का का प्रभाव नही दिखता -एक व्यवहारविद के लिए भी यह  ट्रेंड उलझन में डालने वाला है कि लाखो वर्षों तक चलने वाले मानव विकास के दौरान ऐसा तो कभी नहीं था कि नारी पुरुष से कभी हीनता की स्थिति में रही हो -हाँ कार्य /श्रम विभाजन की दृष्टि से उनमें बटवारा तो था मगर अपने क्षेत्रों में तो ये दोनों ही श्रेष्ठ और निष्णात थे-इसलिए ही कालांतर के चिंतकों द्वारा भी बार बार यह कहा गया कि मानव जीवन रूपी रथ में नर नारी की भूमिका पहिये के समान ही है -और इनमें कोई छोटा या बड़ा नहीं हो सकता ,दोनों  समान हैं .

हमारे आदिम कार्य विभाजन में पुरुष एक दैनिक और दिन भर का  माने दिहाड़ी गृह त्यागी आखेटक था मगर सामाजिक जीवन की धुरी के रूप में स्त्रियाँ ही थीं जो अपने घर परिवार की देखभाल -दोनों पहर के भोजन की व्यवस्था ,बच्चों का पालन पोषण और कबीलाई बसाहट की साफ़ सफाई में लगी रहती थीं -जहाँ आखेट प्रबंध के चलते  पुरुष की एक समय में केवल एक काम  पर ध्यान में बेहतरी होती गयी वहीं नारियां उत्तरोत्तर  एक समय में एक साथ ही कई कामों को समान गुणवता के साथ सँभालने में दक्ष होती चली आई हैं -वे मल्टी टास्कर हैं -और इसका अनुभव मुझे भी गाहे बगाहे शिद्दत के साथ होता रहा है -एक रोचक और अंतर्जाल जगत से ही उदाहरण दूं -जहाँ बहुत से पुरुष जिसमें मैं भी सम्मिलित हूँ ही अंतर्जाल पर मानो टांग तोड़ कर बैठे रह जाते हैं -ब्लागिंग में मुब्तिला हो जाने पर उन्हें कुछ और नहीं सूझता (हाऊ पूअर न ? ) ठीक उसी समय अंतर्जाल प्रेमी नारियां एक साथ ही कई काम निपटाती रहती हैं -घर परिवार की देखभाल -खाना पीना ,चाय पानी ,आदि आदि -हमें उनसे चैटिंग करते समय भी यह अंदाजा नही रहता के उधर क्या क्या पापड बेले जा रहे हैं या कौन सी खिचडी पक रही है-मेरी तो एक महिला मित्र से इसे लेकर तक झक भी  होती रहती है मगर मैं मंद मंद मुस्कराता भी रहता हूँ उनके इस नैसर्गिक और प्रणम्य क्षमता को जनता जो हूँ -प्रगटतः कहने या प्रशंसा करने की आदत नहीं है इसलिए कहता नहीं .जाहिर हैं नारी इस मामले में तो निश्चित ही बेजोड़ है कि वह एक समय में एक साथ कई समस्याओं को संभाल सकती है -टैकल कर सकती है पुरुष ऐसी क्षमता अब सीखने लग गया है पर नारी की तुलना में बहुत कमजोर है .अ पूअर सोल ! हा हा !

नर नारी पारस्परिक व्यक्तिव का यह अंतर आज भी बहुत स्पष्ट और प्रामिनेंट है .सांस्कृतिक विकास के पहले एक लिंग दूसरे  पर हावी रहा  हो ऐसा तो कतई नहीं था  . वे अस्तित्व की रक्षा के लिए एक दूसरे पर हमेशा निर्भर रहे .मानव उभय  लिंगों में एक यह आदिम संतुलन तो रहा ही है कि वे समान रहे मगर अलग अलग से ...

मगर फिर ऐसा क्या होता गया कि नारी पर पुरुषों का अनुचित अधिपत्य शुरू हुआ ? कब से और क्यूं ??यह चर्चा हम आगे के लिए मुल्तवी करते हैं .....

Thursday, 4 March 2010

नर नारी समानता का दूसरा पाठ!

कल हमने बात की थी कि वयस्क पुरुष व्यवहार  जहाँ आज भी बचपन की मासूमियत और जोखिम उठाने की विशेषताये लिए हुए है वहीं वयस्क नारी आकृति  बाल्य साम्य अपनाए हुए है! नारी आकृति और पुरुष की आकृति में एक बड़ा फर्क प्राचीन वैकासिक काल से ही रहा है -प्राचीन काल के श्रम विभाजन ,जहां पुरुष एक कुशल आखेटक बन चुका था ,के चलते पुरुष को शरीर से ज्यादा मजबूत बनना था ,एथलीट माफिक जिससे उसे शिकार करने की दक्षता हासिल हो सके . नारी और पुरुष की आकृतियों का यह अंतर आज भी विद्यमान है .औसत  पुरुष के शरीर में जहां पेशियों का वजन २८ किलो होता है वहीं औसत नारी में पेशियाँ कुल १५ किग्रा ही होती हैं .टिपिकल पुरुष शरीर टिपिकल नारी शरीर से तीस फीसदी ज्यादा सशक्त,१० फीसदी ज्यादा भारी ,सात फीसदी ज्यादा उंचा होताहै .मगर नारी शरीर पर चूंकि गर्भ धारण का जिम्मा होता है अतः उसे भुखमरी की स्थितियों से बचाने के कुदरती उपाय के बतौर २५ फीसदी चर्बी  उसे अधिक मिली होती है जो पुरुष में मात्र १२.५ फीसदी ही होती है .
बस इसी चर्बी (puppy - fat ) की अधिकता के चलते नारी आकृति का बाल -साम्य लम्बे समय तक बना रहता है .चर्बीयुक्त  अपने गोलमटोल शरीर से बच्चे बड़े ही क्यूट लगते हैं -ऐसे बच्चों को देखते ही सहज ही उनकी ओर देखरेख और सुरक्षा के  लिए मन आकृष्ट  हो जाता है -व्यवहार शास्त्री इसे "केयर सालिसिटिंग व्यवहार" कहते हैं .कुदरत ने यही फीचर नारी आकृति में लम्बे समय तक रोके रखने की जुगत इसलिए लगाई ताकि वह नर साथी का सहज ही "केयर सालिसिटिंग रेस्पांस " प्राप्त करती रहे -आखिर संतति निर्वहन का बड़ा रोल तो उसी का था /है न ? अब देखिये कुदरत ने किस तरह गिन गिन कर नारी में दूसरे बाल्य फीचर भी लम्बे समय तक बनाए रखने की जुगत लगाई है -


नारी की आवाज की पिच पुरुष की तुलना में कहीं ज्यादा और  बच्चे जैसी है -गायिकाएं सहज ही बच्चे की आवाज  में पार्श्व ध्वनि दे देती हैं .भारी पुरुष-आवाजें जहां १३०-१४५ आवृत्ति प्रति सेकेण्ड हैं बहीं नारी का यह रेंज २३०-२५५ आवृत्ति प्रति सेकण्ड है .साफ़ है ,नारी आवाज विकास क्रम में अभी भी बाल सुलभता लिए हुए हैं .उनके चेहरे में भी आज भी वही बाल सुलभता दिखती है -जाहिर है पुरुष प्रथमतः सहज ही नारी की ओर किसी विपरीत सेक्स अपील की वजह से नहीं बल्कि अनजाने ही केयर सालिसिटिंग रेस्पांस के चलते आकृष्ट हो जाता है . जैसे किसी बाल मुखड़े को देख वह उसकी देखभाल और रक्षा की नैसर्गिक भावना और तद्जनित लाड- दुलार की भावना  के वशीभूत करता हो .नारी  की भौंहे ,ठुड्डी ,गाल और नाक सभी में बाल साम्यता आज भी दृष्टव्य है .

 इस चित्र को देखकर आपके मन में जो कुछ कुछ हो रहा है  वही है केयर सालिसिटिंग रिस्पांस
दरअसल मनुष्य आज भी एक नियोटेनस प्राणी है जो एक वह स्थति है जिसमें विकास के क्रम में जीव अपने लार्वल अवस्था में में ही प्रजननं करने लगते हैं -और यह लार्वावस्था एक स्थाई स्वरुप बन जाता है  -मनुष्य आज भी अपनी वयस्क अवस्था में भी लार्वल -बाल्य फीचर्स को अपनाए हुए है जिसके वैकासिक निहितार्थ हैं - ज्यादा बाल्य फीचर्स ज्यादा दुलार! .ज्यादा दुलार तो ज्यादा प्रजाति रक्षा और यह नारियों में पुरुष की तुलना में बहुत अधिक है -भले ही अभिभावक का ज्यादा दुलार बच्चों को कभी कभी बिगाड़ भी देता है मगर वह रक्षित तो रहता ही है -मगर अतिशय  दुलार प्रायः बच्चों की  शैतानियों को अनदेखा करता रहता है -मगर ऐसा नारियों के परिप्रेक्ष्य में तो नहीं लगता?क्यों ??

Wednesday, 3 March 2010

नर -नारी समान तो हैं ,मगर अलग से हैं!

पहले ही बोल देता हूँ -यह पोस्ट एक जैवविद के नजरिये से है. आपका मंतव्य अलग भी हो सकता है. इन दिनों मैंने खुद अपने आलोच्य विषयगत अल्प ज्ञान को अद्यतन करने के (नेक ) इरादे से वर्तमान वैश्विक साहित्य संदर्भों को टटोला और कई रोचक बाते सामने आई हैं जिन्हें आपसे साझा करना चाहता हूँ -जो साईब्लाग के पहले से पाठक रहे हैं उनका किंचित पुनश्चरण भी हो जायेगा -यह भी मंशा है (कठिन शब्दों का अर्थ कोई सुधी जन जानना चाहेगें तो दिया जा सकता है! ) .सबसे रोचक बात तो यह है कि आज भी वयस्क पुरुष जहां अपने व्यवहार में बाल्य सुलभता लिए हुए हैं वहीं युवा नारी आकृति की बाल्य साम्यता बरकरार है -आईये जानें कैसे -

पंद्रह वर्ष की अवस्था का किशोर - पुरुष नारी के मुकाबले १५ गुना ज्यादा दुर्घटना सहिष्णु होता है .ऐसा इसलिए है कि वह नारी की तुलना में इस उम्र तक भी बच्चों के खेल खेल में /के जोखिम उठाने की  ज्यादा प्रवृत्ति रखता है .यद्यपि उसकी यह वृत्ति उसे खतरों के ज्यादा निकट ले आती है मगर यह उन प्राचीन दिनों की अनुस्मृति शेष है जब नर झुंडों को शिकार की सफलता के लिए  अनेक जोखिम उठाने पड़ते थे. शिकारी झुंडों में अमूमन ६-७ पुरुष होते थे-नारियां शिकार झुण्ड में न सम्मिलित होकर घर की जिम्मेदारी उठाती थीं .पुरुषों का काम जोखिम उठाना ही था -और इसमें जन हानि की संभावना भी रहती थी -और इस उत्सर्ग के लिए पुरुष परिहार्य थे-उनके प्रजनक ह्रास के योगदान की उस शिकारी कुनबे के अन्य सदस्यों से प्रतिपूर्ति तो उतनी मुश्किल नहीं थी जितना किसी संतति वाहक  नारी का प्राणोत्सर्ग! इसलिए भी नारी  का  आखेट  में जाना अमूमन प्रतिबंधित था .रोचक बातयह है कि कुछ बड़े अपवादों को छोड़ दिया जाय तो कालांतर के युद्धों में भी नारियां नहीं जाती थीं -एक पौराणिक  संदर्भ राजा दशरथ का है जिहोने कैकेयी को युद्ध में साथ लिया था और कैकेयी ने अंततः उनकी प्राण रक्षा भी की थी. शिकार या युद्ध में नारियों का ह्रास सीधे आबादी के  प्रजननं दर के ह्रास का कारण  बन सकता था .हमें ध्यान में रखना होगा कि  प्राचीन काल (लाख वर्ष पहले ) में जहाँ आबादी बहुत  कम थी -प्रजनन दर का  ह्रास सचमुच जीवन मृत्यु का ही प्रश्न था .


अपने कबीलाई काल के केन्द्रीय रोल में नारियां आखेट का काम छोड़कर अन्य किसी काम में  खूब प्रवीण थीं -वे घर की देखभाल के साथ कई कामों को एक साथ करने में निपुण होती गयीं और उनकी यह क्षमता आज भी उनके  साथ है .वे उत्तरोत्तर एक मल्टी  टास्कर के रूप में दक्ष होती गयीं .एक साथ ही कई काम कर लेने की उनकी क्षमता आज भी स्पृहनीय है .उनकी वाचिक क्षमता (गांवों में कभी महिलाओं को झगड़ते देखा है ?) ,घ्राण क्षमता (पति के विवाहेतर सम्बन्धों को सूंघ लेने की क्षमता -हा हा ) ,स्पर्श ,और रंगों की संवेदनशीलता पुरुषों से अधिक विकसित है .वे एक कुशल सेवा सुश्रुषा करने वाली ,ज्यादा वात्सल्यमयी ,और  निरोगी(रोग प्रतिरोधी )   बनती गयी हैं .निरोगी होकर वे ज्यादा समर्थ माँ जो होती हैं -संतति वहन का भार उनके कन्धों पर ज्यादा ही है .इस तरह विकास के क्रम में पुरुषों के मस्तिष्क  ने बाल्यकाल के जोखिम उठाने के उनकी बाल सुलभ गतिविधियों को नारी के बालिका सुलभ गतिविधियों की तुलना में ज्यादा स्थायित्व दे दिया .
शिकार का जोखिम 

पुरुष जहाँ आज भी ज्यादा कल्पनाशील ,जोखिम उठाऊ और अड़ियल /दुराग्रही/जिद्दी /उद्दंड बना हुआ है नारियां ज्यादा समझदार और ध्यान देने वाली हैं .इन व्यवहारों का  साहचर्य एक दूसरे का परिपूरक बनता गया  और मनुष्य के विकास का झंडा लहराता आया है .
                                                             बहुधन्धी गृह कारज
नर नारी समान तो हैं मगर अलग से हैं -१(जारी... )

Monday, 19 October 2009

नारियां क्यों बनाती है यौन सम्बन्ध ? एक ताजातरीन जानकारी !

विश्वप्रसिद्ध साप्ताहिक पत्रिका टाईम(अक्टूबर ६ ,२००९) का यह ताजातरीन लेख  महिला सेक्सुअलिटी में रूचि रखने वालो /वालियों के लिए रोचक हो सकता है ! एलायिसा फेतिनी द्बारा लिखा  'व्हाई वीमेन हैव सेक्स " शीर्षक यह लेख हो सकता है यौन कुंठाओं वाले एक बड़े भू भाग के  भारतीय उपमहाद्वीप  का प्रतिनिधि  चित्रण न करता हो मगर एक प्रजाति के रूप में मनुष्य की सहचरी के गोपन व्यवहार का कुछ सीमा तक अनावरण करता ही है ! नैतिक मान्यताओं को लेकर आज बहुत कुछ अस्पष्ट और संभ्रमित  भारतीय मानस भले ही ऐसे अध्ययनों से प्रत्यक्षतः दूरी बनाए रखना चाहता हो मगर  ऐसे अध्ययनों के अकादमीय महत्व को सिरे से नकारा नहीं जा सकता !

टेक्सास विश्वविद्यालय के मनोविज्ञानी द्वय सिंडी मेस्टन और डेविड बस ने दुनिया भर से १००० के ऊपर महिलाओं को इस अध्ययन के लिए चुना और नतीजों को पुस्तकाकार रूप भी दे दिया है -उन्होंने २३७ कारण गिनाएं है की क्यों महिलायें यौन संसर्ग करती हैं /राजी होती हैं ! सबसे आश्चर्यजनक है की महज उदाद्त्त प्रेम ही यौन सम्बन्ध बनाने का अकेला सहज कारण  कम मामलों में पाया गया !  टाइम ने  यौन विषयक अध्येताओं का साक्षात्कार भी छापा है ! सार संक्षेप यहाँ प्रस्तुत है -विषय की समग्र समझ के लिए उक्त लेख और सम्बन्धित  कड़ियों के अनुशीलन की सिफारिश की जाती है !

नर - नारी यौन सम्बन्धों के पीछे शारीरिक आकर्षण ,सुखानुभूति (चरम  आनंद !) की चाह या प्रेमाकर्षण /अनुरक्त्तता जैसे अनेक कारण हो सकते हैं ,मगर नारी यौनोंन्मुखता के पीछे  भावात्मक लगाव की  भूमिका रेखांकित की गयी  है ! नारी, पुरुष से कहीं अधिक ऐसे मामलों में यौन सम्बन्ध की आकांक्षी हो उठती है जहाँ मानसिक /भावात्मक जुडाव महसूस करती है ! जबकि पुरुष प्रकृति वश   अवसर की ताक में भी  रहता है ! नारियां छोटे अवधि के सांयोगिक संबंधो को लेकर खास तौर पर सतर्क और "चूजी "  होती हैं ! पुरुष की यौन सम्बन्धों की चाह के पीछे सहकर्मियों में अपने स्टेटस को ऊंचा उठाने की भी मनोवृत्ति जहां आम तौर पर  देखी गयी है इस अध्ययन  में कुछ नारियों को भी इसी मानसिकता के वशीभूत पाया गया है !

नारियां यौन सम्ब्न्धोन्मुख  कब और क्यों होती हैं के जवाब में अध्येताओं का कहना है कि  उनमें भी यह चाह  लैंगिक आकर्षण ,भौतिक  सुख,प्रेम के प्रागट्य और किसी के प्रति लगाव की अभिव्यक्ति या उद्दीपित होने पर आवेग के शमन के लिए भी हो सकता है ! या फिर यह आत्म गौरव या यौन गौरव  (सेल्फ एस्टीम या सेक्स एस्टीम ) को ऊंचा  उठाने  ,लचीले सहचर को खुद तक आसक्त बनाए  रखने की युक्ति और कुछ मामलों में तो महज सर दर्द को दूर करने के उपाय (हाँ, यह कारगर है !) के रूप में यौन सम्बन्ध की अभिमुखता   देखी गयी है ! अध्येता द्वय ने कामक्रीड़ा की आर्थिकी पर भी एक भरा पूरा अध्याय  लिख मारा है जिसमें प्रतिदान (और प्रतिशोध की भी ! ) भावना लिए नारियों के यौन संसर्ग वर्णित हुए हैं ! कोई काम करने के लिए -भले ही वह घर के कूड़े की सफाई में सहयोग (याद आयी दीवाली ? ) ,रात्रिभोज का पक्का इंतजाम या फिर महंगे (स्वर्ण ) उपहार को यौन संसर्ग से हासिल करने की भी जुगत इस्तेमाल में है ! पुस्तक का एक अध्याय नारी यौन  सम्बन्धों  के काले अध्याय पर भी है जहां वे  धोखे का शिकार होती है ,छली जाती है और बलपूर्वक यौन कर्म में संयुक्त कर ली जाती है !


अध्ययन की एक चौकाने वाली जानकारी यह रही कि  महिलाओं ने कहीं कहीं सेक्स सम्बन्ध महज प्रतिशोध के लिए बनाए -धोखेबाज प्रेमी को यौन जनित रोगों का 'उपहार " अपनी सहेलियों  के जरिये या फिर ईर्ष्यावश सहेली के पहले से ही 'इंगेज्ड ' पार्टनर को कामपाश में बाँधने (मेट पोचिंग ) को भी बखूबी अंजाम दिया गया ! इस घटना को अंजाम देने वाली रोमान्चिताओं ने जहाँ यह स्व -कृत्य बखाना वहीं  इससे पीड़ित नारियों ने भी अपना दुखडा भी  रोया ! मैं इन दिनों खुद अंतर्जाल पर मेट हंटिंग (सावधान :नामकरण का कापीराईट मेरा है ) के एक रोचक यौन व्यवहार के अध्ययन में लगा हूँ ! नतीजा तो शायद गोपन ही रह जाय !

नारी यौनोंन्मुखता के पीछे बकौल डार्विन "फीमेल च्वायस " की बड़ी भूमिका है और यह आज भी सही है ! आज की आधुनिका भी  लाख डेढ़ लाख पहले की उसी आदि अफ्रीकी महिला की ही अविछिन्न वंशज है जिसने अपने निर्णय में कोई चूक नहीं की थी और सही पुरुष पुरातन के चयन से  हमारी वंश बेलि का मार्ग प्रशस्त कर दिया था  -एक लैंगिक निर्णय की सफल महिला की सफल जैवीय दास्ताँ है मानव विकास ! आज उसी महिला महान की वंशधर नारियां वैसी ही  यौन मानसिकता /मनोविज्ञान -पुरातन ज्ञान  का वरण किये हुए हैं जिसका जीवनीय मूल्य है ! उनका यौन चयन आज भी व्यापक मामलों में बेहतर उत्तरजीविता और प्रजनन सफलताओं की गारंटी है !


और यह हकीकत है कि  लैंगिक प्रतिस्पर्धा के जैवीय परिप्रेक्ष्य में "वरणीय नर " जल्दी ही प्रणय आबद्ध हो इंगेज्ड हो उठते  हैं -कोई न कोई उनकी अंकशायिनी बन ही जाती हैं -इस मानवता के परचम को भी तो बुलंद किये रहना है मेरे भाई !  सुयोग्य वर की तलाश इसलिए ही सदैव मुश्किल रहती है -योग्यतम जल्दी चुन जो लिए जाते हैं - कहीं  न कहीं प्रणय  पाश में बध ही जाते हैं. प्रेम या योजित किसी भी तरह के सम्बन्ध में   ! इसतरह योग्य पुरुष के लिए आज भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, नारियों में मनचाहे पुरुष चयन की प्रतिस्पर्धा जारी है !

पूरी किताब भले  न मिल सके इस पूरे आलेख का आस्वादन  यहाँ  मय समस्त कड़ियों और नयनाभिराम चित्रों के किया ही जा सकता है -मेरी सिफारिश है !

Monday, 14 September 2009

प्यार में ज़रा संभलना ......बड़े धोखे हैं इस राह में !

मानव प्यार की जटिलताओं को विवेचित करती लगातार यह  तीसरी पोस्ट इस श्रृखला की फिलहाल अंतिम कड़ी है ! इश्क से दीगर मसले और भी तो हैं ! प्रेम के जोडों में कई कुदरती अवरोधक (जिनकी चर्चा पिछले पोस्ट में हुयी है ) अनुपयुक्त साथी की पहचान कर उन्हें आगे बढ़ने से रोक देते हैं ताकि अनचाहे गर्भ धारण और बाद की झंझटों ,बच्चों के लालन पालन के साझे बोझ को उठाने की समस्याओं से बचा जा सके !

दिक्कत है कि हमारे कई सामाजिक रीति रिवाज जो दरअसल अनुपयुक्त  जोडों के मिलन  के निवारण के लिए ही आरम्भ हुए,जैसे स्वयंवर  ही ,कालांतर में मात्र (विवाह की  ) रस्मो अदायगी तक सीमित रह गए ! उपयुक्त वर के  तलाश की कवायद तो आज भी जारी दिखती है (वधू की कम ही ! ) ,कई उपक्रम किये जाते हैं ,पंडित -फलित ज्योतिषी गणना करते हैं ("गन्ना मिलाना ",=गुण मिलाना ) फिर एक आदर्श जोड़ा /जोड़ी को सामाजिक हरी झंडी मिल जाती है ! मगर पूर्वजों द्वारा सही जोड़े के मिलान की 'कुदरती जरूरत' की समझ जहां विस्मित करती है वहीं आजकल इसके नाम पर चल रहे समझौते इस व्यवस्था के मूल उद्येश्य पर  ही प्रश्नचिहन लगाते हैं !

विवाह के रूप में जितने  जोडों को सामाजिक स्वीकृति मिलती है उनमें  कुदरती तौर पर कितने फीसदी सही जोड़े होते हैं यह भी एक मुद्दा है ! इसी तरह बलात्कार और वैश्यावृत्ति में भी कुदरत के सही जोड़ा मिलान की व्यवस्था ध्वस्त हो रहती है ! ये  कुदरत की सच्चे प्यार से उपयुक्त जोड़ा बंधवाने की व्यवस्था को धता बताते मानव व्यवहार के बड़े उदाहरण रहे !

कुछ छोटे छोटे झांसे भी देकर गलत जोड़े बनने के मामले अध्ययन के दौरान प्रकाश में आये हैं - जहाँ कुदरत की अनपयुक्त को पहचाने की मशीनरी फेल हो जाती है ! मसलन कोई दुर्घटना हो गयी -प्लेन ,ट्रेन , मोटर क्रैश ,अग्निकांड ,बाढ़ -इस दौरान दूसरों की भलाई के लिए शरीर की एक और व्यवस्था सक्रिय हो उठती है -कुछ लोगों में बहुत तीव्रता के साथ प्राणोत्सर्ग (altruism )तक की भावना उछाल मारती है -इस दौरान किसी ने किसी को जान पर खेल कर बचा लिया तो अचानक  हादसे के चलते धमनियों में तुरत  बढ़ गए "हादसा हारमोन " ऐडरनलीन के प्रभाव में  शरीर की अनुपयुक्त जोड़े के पहचान के प्रक्रिया फेल कर जाती है और जोडों में एक आकर्षण/कृतज्ञता भाव उत्पन्न हो जाता  है . फिल्मों में छोटी मोटी दुर्घटनाओं के बाद नायक नायिका में पनपते प्रेम का दिखाया जाना अकारण नहीं  है !

  मगर सावधान यह संतानोत्पत्ति के लिए सही जोड़ा नहीं भी हो सकता है ! इसी तरह जो महिलायें  गर्भ निरोधक गोली नियमित तौर पर ले रही होती हैं उनमें भी सही गलत जोड़े के पहचान की कुदरती व्यवस्था जवाब दे जाती है -क्योंकि गर्भ  निरोधक जो स्वयं एक तीव्र प्रभाव वाले हारमोन हैं और नारी की अंडोत्सर्जन प्रक्रिया को बाधित करते हैं " साईड  इफेक्ट " में  सही जोड़े की पहचान को प्रभावित कर देते हैं ! पश्चिमी देशों में  एक अध्ययन में तो यह पाया गया कि गर्भ निरोधक गोलियों  के इस्तेमाल के दौरान बने प्रणय सम्बन्ध और  विवाहों में तलाक की दर बहुत ज्यादा है ! जाहिर है नकली प्रेमी इस दौरान "एम् एच सी " फैक्टर की पहचान को धता बता देता है !

वैसे भी इश्क का बुखार लम्बे समय तक नहीं  चलता यह या तो "सहचर प्रेम " ( companionate love !)  में तब्दील हो जाता है  या फिर शनैः शनैः मिट जाता है जब यह कुदरत की मूल प्रजनन /संतानोत्पत्ति की भावना को किन्ही कारणों से भी चरितार्थ नहीं कर पाता ! मानवीय संदर्भ में जो सबसे महत्वपूर्ण जैवीय मुद्दा है वह ऐसे जोड़ा  बंधन (पेयर बांडिंग ) को बढावा देने का है जो संतति की जिम्मेदारियों का कुशलतापूर्वक वहन कर सकें -महज मौज मस्ती ही नहीं ! इसलिए निरे रोमांस पर लगाम लग जाती  है और यह किसी की जिन्दगी को लम्बे वक्त तक तबाह नहीं करता -" सहचर प्रेम " में बदल जाता है या फिर मिट जाता है ! भले ही असफल प्रेम के अनगिनत किस्से कहानियाँ को जन्म देकर ! मनुष्य जैसा तार्किक (और अतार्किक !)प्राणी भी इक मुकाम पर इसलिए ऐसे इश्क से तोबा कर लेता है जो फलदायी न हो -उतरती जाए है रोमांस की खुमारी अहिस्ता आहिस्ता ! 

मगर इसका मतलब यह भी नहीं कि जोडों में रोमांस कुछ कमतर हो जाता है -यह सहचर प्रेम में तब्दील होकर अक्षुण हो उठता है -कई शादी शुदा जोडों में वर्षों उपरांत भी उनके ब्रेन का वह हिस्सा उद्दीप्त पाया जाता है जो कि इश्क के दीवानों में दमकता रहता है ! मगर ऐसे मामले अपवाद ही हैं !

Sunday, 13 September 2009

लवेरिया हुआ ,मगर हुआ क्यूं ?

कमीने इश्क के बाद जो कुछ और सामग्री इस बहुप्रिय विषय पर मेरे खलीते में थी उसे रिसायिकिल बिन में डाल दिया था ,मगर आज फिर उस बिन को खलिया कर निकाल लाया हूँ -अब चिट्ठे पर भी कभी कभार कुछ कचरा नहीं आयेगा तो फिर कैसे श्रेष्ठ रचनाओं की तुलनात्मक साख बनेगी ! लिहाजा इश्क ,प्रेम ,वासना ,यौनाकर्षण जो भी कह लें आप , पर कुछ और जानकारी लेकर बन्दा हाजिर है !

मगर पहले एक  पाठ दुहराई  हो जाय तो फिर मामला आगे बढे ! अब तक यह तय पाया गया कि कुदरत को इसकी तनिक भी परवाह नहीं कि हम लवेरिया या रोमांस के रस में कितना सरोबार और डूब उतरा रहे हैं ,उसका मकसद तो खास तौर पर यही रहता है कि उसकी जनन लीला बदस्तूर जारी रहे और प्रेम को समर्पित जोड़े (पेयर बांड ) संतानोत्पत्ति कर शिशुओं की देखभाल का भी जिम्मा  साथ उठायें ! बस इसी काम को अंजाम देने को कुदरत ने ये सारे चोचले गढे हैं !

पुरुष स्वभावतः सुन्दर चेहरों का चहेता है -"हर हंसी चेहरे का मैं तलबगार हूँ " .यही नहीं वह भावी सहचर में उन घटकों /अवयवों की भी चेतन -अवचेतन  तलाश करता है जो प्रजनन -उर्वरता की द्योतक हों . वह ऐसे स्पष्ट यौन संकेतकों  की तलाश करता है जैसे पतली कमर और चौडे कूल्हे जो प्रजनन की उर्वरता का पावरफुल संकेत देते  हैं ! इसी तरह नारियां भी चौडे और पुष्ट कंधे ,चौड़ी छाती , कसी मुश्कों  ,और भरी पूरी दाढी पर फिदा होती हैं -यह सारे लक्षण नर हारमोन के प्राबल्य को जताते हैं !

यौन गंध  सूघने में मनुष्य की नाक भी कोई नीची नहीं है .साबित हो चुका है कि  साथ साथ रहने वाली नारियों का मासिक चक्र मेल कर जाता है ! यह रासायनिक गंध संकेतो के जरिये ही संभव होता है ! पुरुषों का अवचेतन ही यह भाप लेता है कि अमुक नारी का अंडोत्सर्जन ( ओव्यूलेशन  )कब हो जाता है, जिस समय निषेचन की सम्भावना सबसे अधिक होती है ! इस काल में पुरुष सहचर उसके प्रति बहुत  केयरिंग ,याचनापूर्ण और चाँद  सितारे तोड़ने का  भी संकल्प लेने को उतारू दिखता है ! एक होता है मेजर हिस्टोकाम्पैटीबिलिटी फैक्टर ( एम् एच ऍफ़ ) जो यह क्ल्यू देता है कि प्रेमोन्मत जोड़े संतति वहन के योग्य हैं भी या नहीं ! इसका चूकिं गर्भ रक्षा से सीधा सम्बन्ध होता है और एक जैसे एम् एच ऍफ़ के रहते गर्भ रक्षा संभव नहीं है तो चुम्बन के समय लार के विनिमय से इसकी पहचान अवचेतन में ही जोड़े कर लेते हैं और समान होने पर प्रत्यक्षतः किसी न किसी बहाने से दूर होने लगते हैं !

हामरे कई सांस्कृतिक रीति रिवाजों में यौन वर्जनाओं के पीछे अनचाहे गर्भ और यौन जनित बीमारियों के रोक की ही कवायद होती है जो पुश्तैनी तौर पर चली आ रही हैं ! आज की आधुनिक जीवन शैली के "समागम पूर्व " व्यवहार -डेटिंग और पेटिंग भी जोडों की यौन उपयुक्तता की छान बीन के तरीके हैं जो उपयुक्त सहचर के चयन का मार्ग ही प्रशस्त करते हैं !  कुछ सच्चे जोडों के मस्तिष्क के अंदरूनी हिस्सों को फंक्शनल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजेस के जरिये देखा गया है जो अपनी सक्रियता के उच्च  बिंदु पर जा पहुँचते हैं जिसमें डोपामाईन रसायन के प्रमुख भूमिका होती है ! सक्रियता के ये पहचान बिंदु  वेंट्रल तैग्मेंटल एरिया में उभरते हैं -जिसकी आगे की प्रक्रिया को ऊपर का एक हिस्सा न्यूक्लियस अक्यूम्बेंस संभालता है जहाँ डोपामाइन के साथ अब सेरोटोनिन (यह केले में मिलता है -खूब खाईए केले मूड फ्रेश रहेगा ) भी आ मिलता है ! आगे स्नेह.वात्सल्य भावना का जिम्मा  आक्सीटोसिन नमक हारमोन निभाता है ! बच्चों के जन्म पर भी इसी आक्सीटोसिन का निकलना अधिक रहता है जो माँ में ममत्व उभारता है ! यहाँ  तक कि प्रसूति गृहों में सद्य प्रसूता के साथ की महिलाएं भी तीव्र ममत्व का अनुभव करती हैं -जाहिर हैं आक्सीटोसिन उनकी घ्राण इन्द्रिय को भी प्रभावित करता है !

ब्रेन का लव सिग्नल कौडेट  न्यूक्लियाई में होता है जो दोनों ओर यानि जोड़े में होता है -प्रेम के भावातीत भाव को यही प्रेरित करता है ! इस तरह कई जैव रसायन (opioids )  जब सक्रिय होते हैं तब  हम आप यह समझ लेते हैं किसी अमुक ने सुखद अनुभूतियों का पिटारा आपको सौंप दिया है जबकि यह खुद हमारा   ही मस्तिष्क होता है जो हमें  खुशियों की सौगात सौंपता
है !
अभी कुछ और है आगे ...

Sunday, 6 September 2009

यह इश्क कमीना -क्या सचमुच ?

प्रेम पर इधर कुछ गंभीर चिंतन मनन शुरू हुआ है जिसे आप यहाँ  ,यहाँ और यहाँ देख सकते हैं ! मंशा है कि इसी को थोड़ा और विस्तार दिया जाय ! हो सकता है कुछ लोग रूचि लें ! कबीर तो कह गए कि ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय -मगर यह 'ढाई आखर' है क्या और कोई इसे चाहे तो कैसे आजमा पाये जबकि अगरचे जुमला यह भी है कि प्यार किया नही जाता बल्कि हो जाता है !प्रेम का हो जाना तो एक बात है अन्यथा प्रेम करने का आह्वान एक अशिष्ट आग्रह की ओर संकेत भी करता है !

पहले तो हम यह बात साफ़ कर देना चाहते हैं कि प्रेम एक छतनुमा / छतरी -शब्द है इसके अधीन कई कई भाव पनाह पाते हैं ! प्रेम का भाव बहुत व्यापक है -भक्त -ईश्वर का प्रेम ,पिता- पुत्री /पुत्र ,माँ -बेटे /बेटी ,पति -पत्नी /प्रेयसी ,प्रेमी -प्रेमिका आदि आदि और इन सभी के प्रतिलोम (रेसीप्रोकल ) सम्बन्ध और यहाँ तक कि आत्मरति भी हमें प्रेमाकर्षण के विविध आयामों का नजारा कराते हैं !

हम यहाँ प्रेम के बहु चर्चित ,गुह्यित रूप को ही ले रहे हैं जो दो विपरीत लिंगियों के बीच ही आ धमकता है और कई तरह का गुल खिलाता जाता है और अंततः रति सम्बन्धों की राह प्रशस्त कर देता है ! आईये यही से आज की चर्चा शुरू करते हैं ! जब आप किसी के प्रति आकृष्ट होते हैं तो उसके प्रति एक भावातीत कोमलता अनुभूत होती है -एक उदात्त सी प्रशांति और पुरस्कृत होने की अनुभूति सारे वजूद पर तारी हो जाती है और यह अनुभूति देश काल और ज्यादातर परिस्थितियों के परे होती है -मतलब पूरे मानव योनि में इकतार -कहीं कोई भेद भाव नहीं -न गोरे काले का और न अमीर गरीब का !


इस अनुभूति के चलते आप कई सीमा रेखाएं भी तोड़ने को उद्यत हो जाते हैं -बस प्रिय जन की एक झलक पाने को बेताब आप, बस चले तो धरती के एक सिरे से दूसरे तक का चक्कर भी लगा सकते हैं -आसमान से तारे तोड़ लेने की बात यूं ही नहीं कही जाती ! कैसी और क्यूं है यह कशिश ?रुटगर्स विश्विद्यालय के न्रिशाश्त्री हेलन फिशर कहते हैं - लोग प्रेम के लिए जीते हैं मरते हैं मारते हैं ..यां जीने की इच्छा से भी अधिक प्रगाढ़ इच्छा प्रेम करने की हो सकती है !


सच है प्यार की वैज्ञानिक समझ अभी भी सीमित ही है मगर कुछ वैज्ञनिक अध्ययन हुए हैं जो हमें इस विषय पर एक दृष्टि देते हैं जैसे मनुष्य के 'जोड़ा बनाने ' की प्रवृत्ति ! प्रेम को कई तरीकों से प्रेक्षित और परीक्षित किया जा रहा है -चाक्षुष ,श्रव्य ,घ्राण ,स्पार्शिक और तांत्रिक -रासायनिक विश्लेषणों में विज्ञानी दिन रात जुटे हैं प्रेम की इसी गुत्थी को सुलझाने ! क्या महज प्रजनन ही प्रेम के मूल में है ?


आभासी दुनिया की बात छोडे तो फेरोमोन भी कमाल का रसायन लगता है जो एक सुगंध है जो अवचेतन में ही विपरीत लिंगी को पास आकर्षित कर लेता है -पर सवाल यह की किसी ख़ास -खास में ही फेरोमोन असर क्यों करता है ? समूह को क्यों नहीं आकर्षित कर लेता ! मगर एक हालिया अध्ययन चौकाने वाला है -मंचीय प्रदर्शन करने वाली निर्वसनाएं (स्ट्रिपर्स ) जब अंडोत्सर्जन (ओव्यूल्युशन ) कर रही होती हैं तो प्रति घंटे औसतन ७० डालर कमाती हैं , माहवारी की स्थिति में महज ३५ डालर और जो इन दोनों स्थितियों में नहीं होती हैं औसतन ५० डालर कमाती है -निष्कर्ष यह की ओव्यूल्यूशन के दौर में फेरोमोन का स्रावित होना उच्चता की दशा में होता है और वह पुरुषों की मति फेर देता है -फेरोमोन एक प्रेम रसायन है यह बात पुष्टि की जा चुकी है !


एक और अध्ययन के मुताबिक जब औरते ओव्यूलेट कर रही होती हैं तो उनके सहचर उनके प्रति ज्यादा आकृष्ट रहते हैं और पास फटकते पुरुषों से अधिक सावधान ! वैज्ञानिकों की माने तो प्रेम सुगंध केवल यह भान ही नहीं कराता की कौन सी नारी गर्भ धारण को बिलकुल तैयार है बल्कि यह इतना स्पेसिफिक भी होता है की एक सफल (जैवीय दृष्टि से -गर्भाधान की योग्यता और शिशु लालन पालन के उत्तरदायित्व की क्षमता ) जोड़े को ही करीब लाता है !


वैज्ञानिकों ने एक मेजर हिस्टो काम्पैबिलटी फैक्टर (एम् एच सी ) की खोज की है जो दरअसल एक जीन समूह है जो अगर नर नारी में सामान हो जाय तो गर्भ पतन की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं -ऐसे जोड़े प्रेम सुगंधों से आकर्षित नहीं होते ! इस शोध की पुष्टि कई बार हो चुकी है -एक सरल से प्रयोग में पाया गया की कुछ वालंटियर महिलाओं को अज्ञात लोगों की बनियाने सूघने को दी गयीं और बार बार उन्हें वही बनियाने सूघने में पसंद आयीं जिनके स्वामी विपरीत एम् एच सी फैक्टर वाले थे !

अभी प्रेम सुगंध का स्रवन जारी है .....




Sunday, 30 August 2009

मानव प्रजाति में प्रणय याचन और यौन संसर्ग : क्या कहते हैं व्यवहारविद ?

चित्र साभार : Lori Finnegan
इन्ही ब्लॉग पन्नो पर हमने पशु पक्षियों के प्रणय याचन प्रदर्शनों को निरखा परखा और अब बारी है मनुष्य प्रजाति में प्रणय व्यवहार के अवलोकन की -मनुष्य प्रजाति यानि होमो सैपिएंस सैपिएंस जो एक 'सामाजिक प्राणी ' है ! जैवविद प्रायः प्रजाति को पारिभाषित करने में यह भी कहते हैं की जो प्राणी आपस में निर्बाध प्रजनन कर संतति जनन कर लेते हैं वे एक प्रजाति के होते हैं ! यह परिभाषा भी मनुष्य को एक भरी पूरी प्रजाति होने का गौरव देती है ! मतलब धरती पर का कहीं का गोरा या काला ,नाटा -मोटा कद काठी का इन्सान इस परिभाषा को पूर्णतः साक्षात ,चरितार्थ कर सकता है !

तो आईये अनावश्यक विस्तार को तूल न देकर हम सीधे मुद्दे की बात करें -मनुष्य के प्रणय प्रदर्शनों पर मेरे संग्रह में जो बेहतरीन कृति है वह डेज्मांड मोरिस की " इंटीमेट बिहैवियर " है ! आईये इस मसले पर इसी पुस्तक के हवाले से कुछ गौर फरमाएं !

मनुष्य का प्रणय काल दीगर पशुओं की तुलना में काफी अधिक -एक वर्ष तक लंबा खिचता देखा जाता है ! मगर सहज तौर पर यह औसतन एक वर्ष का आका गया है ! मनुष्य की पारस्थितिकीय जटिलताओं के चलते इस समय में प्रायः कमी बेसी भी देखी जाती है ! (मतलब प्यार में धैर्य का साथ न छोडें या धैर्य आपका साथ न छोडे तभी गनीमत है ! ) ! इसी एक वर्ष की अवधि में प्रथम दृष्टि के कथित अनुभव के साथ ही यौनिक संसर्ग तक प्रणय याचन (कोर्टशिप ) के कई चरण /स्टेप्स घटित होते हैं ! ऐसा लगता है कि व्यवहार शास्त्री ( इथोलोजिस्ट ) रूहानी प्रेम (प्लैटानिक लव ) को अपने अध्ययन क्षेत्र के बाहर का विषय मानते हैं -वे प्यार की दीवानगी में देह की भूमिका ही सर्वोपरि मानते हैं !

घनिष्ठ सम्बन्ध की व्याख्या करते हुए डेज्मांड मोरिस कहते हैं कि बिना शरीर के किसी भाग के हिस्से के संस्पर्श हुए किसी के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध नही हो सकता ! मतलब बात बात में घनिष्ठ सबंध का दावा करने वालों में यह देखा जाना चाहिए कि उनके अंग उपांग कभी संस्पर्श के दौर से गुजरे भी है या नहीं ! अब हैण्डशेक तक न हुआ हो और दावे किए जायं कि अमुक से हमारा घणा /घनिष्ठ संबंध है तो एक इथोलोजिस्ट को इस पर आपत्ति हो सकती है ! गरज यह कि घनिष्ठ सम्बन्ध संस्पर्शों की बिना पर ही परवान चढ़ते हैं ! तो जाहिर है मनुष्य के प्रणय याचन से यौन संसर्ग तक की कथा दरअसल कड़ी दर कड़ी घनिष्ठ से घनिष्ठतम संस्पर्शों का ही फलीभूत होना है ! मोरिस ने इस पूरी प्रक्रिया को कई चरणों /स्टेप्स में यूँ बयान किया है ! (मूल कृति से साभार ) ( इस अंतर्जाल संस्करण को पढने की सिफारिश है )
1. eye to body.
2. eye to eye.
3. voice to voice.
4. hand to hand.
5. arm to shoulder.
6. arm to waist.
7. mouth to mouth.
8. hand to head.
9. hand to body.
10. mouth to breast.
11. hand to genitals.
12. genitals to genitals.
मतलब आंख से शरीर ,आँख से आँख ,आवाज से आवाज ,हाथ से हाथ ,हाथ से कंधे ,
हाथ से कमर ,मुंह से मुंह ( चुम्बन ) ,हाथ से सिर ,हाथ से शरीर का कोई भी हिस्सा -यौनांग छोड़कर ,
मुंह से वक्ष ,हाथ से यौनांग ,यौनांग से यौनांग ! (इति रति-लीलाः)

मगर यहाँ एक काशन है !प्यार के एक पावदान से ऊपर के पावदान पर पैर रखना इतना सहज नही है !
यह पुरूष के प्रणय साथी के निरंतर प्रतिरोध ,हतोत्साहन ,और अनिच्छा को झेलते जाने का एक जज्बा है -यह प्रकृति के फूल प्रूफ़ सुरक्षात्मक उपायों की एक व्यवस्था है ताकि किसी नाकाबिल /अक्षमं को प्रजननं का मौका न मिल जाय जिसमे नारी को जहमत ही जहमत उठानी पड़ती है -गर्भ धारण से शिशु के लालन पालन तक ! तो एक स्टेप से आगे के स्टेप पर जाते हुए कड़ी जैवीय छान बीन भी अपरोक्ष रूप से चलती रहती है -इसमें किसी भी स्तर पर भी क्वालीफाई न कर पाने पर प्यार के मैदान से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है -भले ही आप उसके बाद बेमिसाल उर्दू पोएट्री लिखते पाये जाएँ ! हाँ आश्चर्य है कि इतनी चाक चौबंद व्यवस्था के बाद भी कुछ चक्मेबाज अपनी घुसपैठ बना ही लेते हैं और नारी अभिशप्त होती है ! ऐसा क्यों होता है -विमर्श जारी है !

ऊपर के चरणों के अपवाद वेश्यावृत्ति और सामाजिक अनुष्ठानों -परिणय जो निश्चय ही प्रणय नही है में मिलते है जिनमे बताये गए स्टेप्स गडमड हो जाते हैं -इन पर चर्चा फिर कभी !