Showing posts with label Human Behaviour Psychlogy. Show all posts
Showing posts with label Human Behaviour Psychlogy. Show all posts

Tuesday, 26 November 2013

यादों की आंखमिचौली-झूठीं यादों का गड़बड़झाला!

सावधान! नए वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि कुछ यादें झूठी भी हो सकती हैं।  अर्थात आप कुछ ऐसा याद किये हुए हो सकते हैं जो आपके जीवन में घटा ही न हो। फिर भी आप शान से अपने संस्मरण में किसी ख़ास घटना और दृश्य का जिक्र कर सकते हैं और शेखी बघारते रह सकते हैं.ऐसी क्षद्म स्मृतियों की जन्म प्रक्रिया अभी ठीक से नहीं समझी जा सकी है मगर वैज्ञानिकों ने पुष्टि कर दी है कि इनका वजूद है और इनके चलते विषम स्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं।  अब किसी घटना के अगर आप कोर्ट में चश्मदीद गवाह बने जो वस्तुतः आपके सामने घटी ही नहीं मगर आपको पूरा भरोसा है कि आपने उसे देखा है तो आपकी गवाही किसी को जेल के सींखचों में डाल  सकती है या निकाल भी सकती है।

दिमाग का एक हिस्सा एमयिगडेला स्मृतियों को सहेजने का काम  करता है.अभी हाल में ही प्रोसीडिंग्स आफ नेशनल अकादेमी आफ साइंसेज में छपे अध्ययन से यह साफ़ पता लगता है कि सामान्य और और तेज याददाश्त वाले दोनों तरह के लोगों में यह स्मृति दोष समान रूप से पाया जाता है।  कुछ लोगों की याददाश्त बहुत अच्छी  होती है जिन्हे "highly superior autobiographical memory -HSAM" कहा जाता है।  प्रयोगों में पाया गया है कि इनकी याददाश्त भी इनके साथ आँख मिचौली कर सकती है -वे झूठे स्मृति प्रतिरूपों को भी याद रख सकते हैं , यह पूरा अध्ययन अभी हाल में ही टाईम पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।स्मृति विभ्रम या विकृति के इस अध्ययन को कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के मनोविज्ञानी लारेंस पैथीस के नेतृत्व में किया गया है। 

मजे की बात यह है कि चूहों पर किये गए अनुसन्धान में ऐसी छदम स्मृतियों को उत्पन्न करने में सफलता मिली है और ऐसे स्मृति पैटर्न को एक से दूसरे चूहे के दिमाग में भी आरोपित कर पाना सम्भव हुआ है।  
मेमोरी के लिए जिम्मेदार कोशायें/ द्रव्य (मेसेंजर आर एन ऐ आदि  ) ट्रांसफर एक से दूसरे चूहों में करना सम्भव हो गया है और इससे किसी छद्म स्मृति प्रतिरूप को भी एक चूहे से दूसरे चूहे तक में अंतरित किया जा सकता है।  यह अध्ययन भी प्रसिद्ध शोध पत्रिका साईंस के एक हालिया अंक में विस्तार से प्रकाशित हुआ है। स्मृति आरोहण के ऐसे अध्ययन मानवीय संदर्भ में कई सम्भावनाओं को जन्म देते हैं जिनमें जहाँ स्मृति दोषों को ठीक किया जा सकेगा ,बहुत बुरे अनुभवों की याद को हटाया  जा सकेगा वहीं इस तकनीक का बहुविध दुरुपयोग भी हो सकता है।  

अब हो सकता है कि आप  अपनी यादों की हकीकत को भी एक बार फिर से परखना चाहें। सम्भव है कि कोई कटु या मधुर याद जिसे आप सजोये हुए हैं वह अनायास ही एक वहम के रूप में आपकी धरोहर बनी हुयी हो।  

Friday, 21 September 2012

महिलाओं को यौन कर्म घृणित लगता है,जिम्मेदार पुरुष ही होते हैं!


तनिक सोचिये, सहवास (सेक्स) एक तरह से असहज कार्य नहीं है? -पसीना और उसकी दुर्गन्ध,लार,वीर्य -द्रव तथा और भी असहज स्थितियां ! एक सर्वे के मुताबिक़ बहुत से लोगों ख़ास कर आधी दुनिया के नुमायिन्दों को यह बहुत अनकुस(खराब) लगता है मगर वे फिर भी इसके लिए तैयार हो जाती हैं .आखिर क्यों? नीदरलैंड में इस विषय पर शोध किया गया है और एक रिपोर्ट टाईम पत्रिका ने प्रकाशित की है !
शोधार्थियों का अध्ययन बताता है कि सामान्यतः  महिलायें अगर उत्तेजित न की जायं तो उन्हें सहवास में कोई रूचि नहीं होती बल्कि वे इसे एक जुगुप्सा भरा कार्य मानती हैं . उनकी उत्तेजित अवस्था ही उनके जुगुप्सा प्रतिक्रिया को शमित करती है और वे सहवास की उन क्रियाओं -क्रीडाओं में सहयोग करने ;लगती हैं जिन्हें अन्यथा वे पसंद नहीं करतीं . ग्रोनिंजन विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने ९० महिलाओं पर अपने इस प्रेक्षण को प्रमाणित करने के लिए प्रयोग किये . उन्हें तीन समूहों में बांटा. एक समूह को कामोद्दीपक वीडियो दिखाए गए . दूसरे समूह को ऐसे रोमांचक वीडियो दिखाए गए जिनसे शरीर में ऐडरेलिन का प्रवाह बढ़ता हो जैसे रीवर राफ्टिंग और स्काई डाईविंग -इनमें भी वे उद्वेलित हुईं मगर वह कामोत्तेजना से पृथक का उद्वेलन था . तीसरे समूह को कोई सामान्य सा वीडियो दिखाया गया . 
तदनंतर उन्हें कुछ बहुत अप्रिय से ,अनकुस से काम करने को दिए गए जैसे किसी गिलास में कीड़ा (नकली ) पड़े द्रव को पीना,पहले से ही इस्तेमाल हुए टिश्यू पेपर से हाथ साफ़ करना ,ऐसे बिस्किट खाना जो कीड़े के समूह जैसे दिख रहे थे या फिर इस्तेमाल हुए कंडोम के भीतर उंगली डालना. पाया गया कि जिस समूह ने कामोत्तेजक वीडियो देखा था उसने इंगित कामों को करने में अपेक्षाकृत काफी कम असहजता दिखाई. यह साफ़ था कि उनके कामोद्वेलन ने उनकी कई जुगुप्सात्मक प्रवृत्तियों को तिरोहित कर रखा था .
उक्त अनुसन्धान के जरिये शोधार्थियों ने यह प्रमाणित करना चाहा कि सहवास जैसी गतिविधि के  असहज होते हुए भी लोग उसमें इसलिए संलिप्त हो जाते हैं क्योकि वे कामोत्तेजित हो उठते  हैं या कर दिए जाते हैं  -काम -क्रिया विशेषज्ञ  भी महिलाओं के सहवास पूर्व काम -उद्वेलन के पहलू पर पर ज्यादा जोर देते हैं . इस अध्ययन का एक प्रबल पक्ष यह है कि इसके परिणामों के मद्दे नज़र उन महिलाओं जिनका यौन जीवन असामान्य है या जो सेक्स को जुगुप्सा मानती हैं के लिए कारगर सेक्स थिरेपी इजाद हो सकती है . आज भी ऐसे कई मामले सामने आते हैं जिनमें महिलायें सहवास के बाद अपनी अत्यधिक साफ़ सफाई ,बार बार नहाने सरीखे कार्यों में लग जाती हैं . पुरुषों के लिए भी यह अध्ययन महत्वपूर्ण है जिन पर यौन क्रिया के पूर्व यौन -सहकर्मी को पूर्णतया कामोद्वेलित करने का दायित्व होता है .अन्यथा सहवास केवल एकतरफा आनंद बन कर रह जाता है -सहकर्मी के लिए केवल एक त्रासद अनुभव!  यही कारण है कि महिलाओं में सेक्स के प्रति एक विराक्ति भाव घर कर जाता है  और जोड़ों का यौन जीवन असहज और असामान्य हो उठता है जिसके  ज्यादातर जिम्मेदार पुरुष ही होते हैं!  

Saturday, 25 February 2012

फेसबुक दोस्ती पर शोधकर्ताओं की नज़र

दोस्त बनने ,दोस्ती होने जैसी मनुष्य की सामाजिक वृत्ति पर एक रोचक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने सोशल साईट फेसबुक की मदद ली है .क्या निजी रुचियाँ भी नए नए दोस्त बनने बनाने में मददगार होती हैं? बेशक . मगर यह इस पर निर्भर करता है कि आपकी अभिरुचि /हाबी क्या है? अगर आपकी संगीत में रूचि है तो संगीत  पसंद करने वाले दोस्त सहजता और जल्दी से आपकी ओर खिंचेगे जबकि अगर आप किताब पढ़ने के शौक़ीन हैं तो पुस्तक पढ़ाकू लोगों पर इसका असर नहीं होता -मतलब अपनी इस हाबी से आप फेसबुक पर भी लोगों को आकर्षित नहीं कर सकते....मतलब किताब पढ़ने का शगल आपको अंतर्जाल पर अकेला रखता  है ....

इन अध्ययनों को हाल ही में प्रोसीडिंग्स आफ नेशनल अकैडमी आफ सायिन्सेज में जगह मिली है .हार्वर्ड विश्वविद्यालय के तीन शोधार्थी -केविन लेविस,मार्को गोंजालेज और जेसन कौफमन ने  अपना अध्ययन फेसबुक पर मित्रों के आपसी अंतर्सबंधों पर केन्द्रित किया .यह अध्ययन इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि हम कैसे अपने मित्रों का चयन करते हैं और मित्रता कैसे अभिरुचियों और विचारों के के व्यापक संचार में भूमिका निभाती है ...कई वर्षों तक चलने वाला यह अध्ययन अंतर्जाल पर हमारे सामाजिक चयन के व्यवहार और समवयी सम्बन्धों को भी विश्लेषित करता है .

मानव जीवन में आपसी सम्बन्ध सामाजिक संरचना के  मूलभूत  आधार हैं .अतएव कौन किसे पसंद करता है यह अध्ययन  हमें मानवीय व्यवहार के कई पहलुओं जैसे सामजिक विलगाव ,असमानताओं ,सहमतियाँ -असहमतियां ,आपसी सहयोग ,अवसरों/.कैरियर  की उपलब्धता आदि पर एक स्पष्ट दिशानिर्देश  दे सकता है .मगर क्या अंतर्जाल पर विभिन्न संस्कृतियों ,देश काल परिस्थितियों,अभिरुचियों या पुस्तकों, सिनेमा  आदि की अलग अलग पसंद वाले लोगों पर ऐसा अध्ययन सचमुच कोई निर्णायक परिणाम दे सकेगा? विद्वानों में मतभेद भी है . फेसबुक पर प्रायः  लोग अपनी अभिरुचियों ,पसंदगी को हायिलायिट करते रहते हैं -ऐसे में क्या नए लोग उनकी पसंद के मुरीद हो जाते हैं या फिर समय के साथ उनके साथ ढल जाते हैं -इस अध्ययन में इन बिन्दुओं को भी लिया गया था . 

यह अध्ययन मुख्यतः  कालेज छात्रों पर किया गया और यह पाया गया कि समान संगीत और फिल्म  की अभिरुचि वास्तव में ज्यादा लोगों को आपस में जोड़ती है बनिस्बत पुस्तक प्रेमियों के ....यह नहीं होता कि मित्र बनने के बाद आप या आपके मित्र की आपस की रुचियाँ भी समान हो जायं -यह भले ही हो कि पहले की समान अभिरुचियाँ मित्रता की सोपान बनें .इस नए अध्ययन ने मानव व्यवहार के अब तक कई अस्पर्शित पहलुओं को उजागर किया है .