Wednesday, 22 July 2009

और सूर्य अंतर्ध्यान हो गए ...!


और अंतर्ध्यान हो गए सूर्य
एक्स रे फिल्टर से खीची फोटो में खग्रास सूर्य ग्रहण कुछ ऐसे दिखा
हम ५ बजे तक संतरविदास घाट पर पहुँच थे -अपने बायिनाकुलर और कार्ड बोर्ड आदि को सही सेटिंग देने में अभी बमुश्किल पल दो पल हुए होगें कि सूर्य देव बादलों के झुरमुट से सहसा प्रगट हो गए -रात में ,बल्कि ब्रहम बेला तक आसमान बिल्कुल साफ़ था -मगर बिल्कुल सूर्योदय के ठीक पहले तेज हवाओं के साथ बादलो के बड़े बड़े ढूहे -बगूले उठ उठ कर हमें डराने लगे -और फिर शुरू हुआ सूरज और बादलों की आँख मिचौली का खेल -और लो ग्रहण का स्पर्श हो गया -ठीक ५ बज कर तीस मिनट पर ! मेरे साथ बी एच यूं के अभिषेक मिश्र भी थे और मेरा पूरा परिवार -दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉ . प्रसाद अपने शौकिया फोटोग्राफर बेटे के साथ खास तौर पर फ्लाईट से इसी घटना को देखने आयी थीं ! बादलो की आँख मिचौली से हमारा दिल धक् धक् कर रहा था -हमने बायिनाकुलर से प्रतिवर्तित फोटो सफ़ेद कार्डबोर्ड पर लेना शुरू कर दिया ! बगल के अस्सी घाट पर मीडिया का जमघट दिखायी दे रहा था !


मैं और अभिषेक बायिनाकुलर से परावर्तित चित्र के अध्ययन में जुटे रहे

ग्रहण के पूर्णता का आरम्भ ६ बज कर २४ मिनट और २३ सेकेण्ड से हुआ और चरम अवस्था ६ बज कर २५ मिनट ४४ सेकेण्ड पर आयी और कुल ३ मिनट सात सेकेण्ड तक सूर्य अंतर्ध्यान हो गए -अद्भुत नजारा था -जब सम्पूर्ण खग्रास हुआ अचानक धुंधलके बहुत गहरे हो गए -रात घिर आयी ! शुक्र ग्रह सिर के ठीक ऊपर चमक उठा -बनारस के सरे घाट बिजली के लट्टुओं से आलोकित हो गए ! एक अद्भुत सा रोमांच -हर्ष और भय सा महसूस हुआ !




और जब दिन में ही रात हो गयी !

और तभी वह डाईमंड रिंग सी रचना भी आसमान में आलोकित हो गयी यह चन्द्रमा के बिल्कुल समतल सतह न होने से विशाल दर्रों और गड्ढों से खग्रास सूर्य के समय निकल पड़ने वाले तीव्र प्रकाश पुंजहै -फोटोग्राफी का जिम्मा मेरे बेटे कौस्तुभ और बेटी प्रियेषा ने संभाल लिया था -मगर कैमरा साधारण ही था -मैं और अभिषेक बयिनाक्यूलर से आ रहे क्रमिक चित्रों का अध्ययन कर रहे थे -अभी तो बस इतना ही कुछ और यादगार बातें फिर !


और हीरक अंगूठी कुछ ऐसे बनी
थोडा एनलार्ज कर के देखें

Tuesday, 21 July 2009

उन पलों का इंतज़ार ......बेकरार !

एलार्म तो लगाया था पौने चार का मगर नीद उड़न छू है तीन बजे से ! इस समय चार बज कर बीस मिनट हो रहे हैं -उन पलों की बेकरार प्रतीक्षा है जब सूर्य अंतर्ध्यान हो जायेगें -पूरा परिवार इस सदी की एक बड़ी घटना को देखने के लिए तैयार हो रहा है -मैं तो दैनिक प्रातःकालीन कार्यों से निवृत्त हो चुका हूँ -सबसे खुशी की बात यह है की आसमान बिल्कुल साफ़ है -मानो प्रकृति सूर्यग्रहण के इस अविस्मर्णीय नजारे का तोहफा बनारस वासियों को देना चाह रही हो ,
दूसरे शहर वालों को इससे ईर्ष्या हो सकती है !

मैं बस कुछ मिनटों में यहाँ से निकल कर करीब ४५ मिनट की ड्राईव पर बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी केपीछे गंगा नदी के एक घाट "सामने घाट " तक पहुंचून्गा जहाँ सदी के इस भव्य नजारे को निरखने के वैज्ञानिक ताम झाम विश्वविद्यालय के अप्लायड भौतिकी विभाग द्बारा किया गया है -हमने भी बाईनाकुलर और सफ़ेद कार्ड बोर्ड रख लिया है जहाँ सूर्य की रिवर्स इमेज लेकर ग्रहण के बढ़ते चरण का दीदार करेगें -एंड हियर वी गो ! गूगल बाबा तो आज पूरे काले हुए जाते हैं !



मिलते हैं फिर आज ही पूरी ख़बर लेकर ! इंतज़ार कीजियेगा !

Monday, 20 July 2009

अदृश्य होना एक साक्षात प्रगट देवता का !



चाँद की छत्र छाया धरती पर ..........इस चित्र के जीवंत रूप को यहाँ जरूर देखें !


कल यहीं हमने चर्चा की थी हमारे साक्षात देवता सूर्य के ग्रहण के कुछ मिथकीय पहलुओं की ! फिर से याद दिला दूँ कि राहु -केतु नामक एक ही दैत्य के सर और धड को सूर्यग्रहण -चंद्रग्रहण के लिए उत्तरदायी माना गया है- यह कितना रोचक है कि ईसा के हजारो साल पहले ही भारतीय ज्योतिषियों को पता था कि आकाश (खगोल पथ ) पर सूर्य के आभासी भ्रमण पथ को प्रत्येक माह चन्द्रमा भी दो बार काटता है एक उत्तर की ओर से और फिर दक्षिण की ओर से -यही कटान के दोनों बिन्दु -ल्यूनर नोड -चन्द्र बिन्दु -राहू केतु कहे गए और इसी कटान की ही कुछ विशेष कोण की स्थितियों में ग्रहण लग जाता है मतलब सूरज पर चाँद की चकती कुछ ऐसा फिट बैठती है कि चन्द्र्छाया धरती पर सूर्यग्रहण का भान करती है ! इस पर्यवेक्षण के बाद ही राहू केतु के मिथक ने जन्म लिया होगा और पुराण शैली में जन मानस को यह कथा बतायी गयी होगी जिससे लोगों का बहुधा यह सवाल कि सूर्य और चन्द्रमा को यह क्या हो जाता है का एक संतोषप्रद उत्तर मिल जाय ! मगर दुखद है कि आज भी जनता उसी दैत्य राहु के कोप से आक्रान्त अपने प्यारे सूरज के दुःख दर्द के निवारण हेतु उपवास व्रत रखती है -पवित्र नदियों में डुबकियां लगाती है ! फलित ज्योतिषी इस माहौल में -बहती गंगा में हाथ धो लेते हैं -इस वैज्ञानिक युग में भी वही सदियों पुरानी कहानी को जिन्दा बनाये हुए हैं -अफ़सोस !




एक फलित ज्योतिषी का बनाया चित्र जो सूर्य और चन्द्रमा के भ्रमण पथों के कटान को राहु केतु मानता है ! ( आधुनिक ज्योतिर्विज्ञान सूर्य को स्थिर मानता है और यही सच है मगर हमें आसमान में सूर्य ही चलता दिखता है जैसा कि इस चित्र में दर्शित है -चित्र को कृपया क्लिक कर बड़ा कर लें )



अमावस्या यानि न्यू मून डे को चन्द्रमा की एक ऐसी स्थिति हो जाती है जब वह सूर्य और धरती के बीच ऐसी सांयोगिक स्थिति में आ जाता है कि सूर्य का प्रकाश अवरुद्ध हो जाता है -सांयोगिक इस लिए कि सूर्य की चकती चन्द्र चकती से ४०० गुना बड़ी है और अद्भुत संयोग यह कि पृथ्वी से सूर्य की दूरी भी पृथ्वी -चद्र दूरी का ४०० गुना ही है जुलाई माह में जब चन्द्रमा अपने अंडाकार पथ पर धरती से बहुत करीब होता है चन्द्र चकती सूर्य की चकती पर बिल्कुल फिट बैठ जाती है -लिहाजा सम्पूर्ण सूर्य ग्रहण लग जाता है -नीचे के चित्र में यह साफ़ दृष्टिगत है -

चन्द्रमा की सम्पूर्ण छाया अम्ब्रा एक पट्टी तरह धरती पर बढ़ती जाती है और पूर्ण ग्रहण दिखाती है !

अब २२ जुलाई का सूर्यग्रहण इस शती का सबसे बड़ी अवधि का ग्रहण है -ऐसा कोई ग्रहण २११४ में ही दिखेगा .यहअलग अलग जगहों से कुछ कुछ मिनटों के लिए खग्रास /सम्पूर्ण दिखेगा -भारत में सूरत ,बडोदरा ,इंदौर ,भोपाल ,जबलपुर ,इलाहाबाद ,वाराणसी .पटना और सिलीगुडी की भौगोलिक पट्टी पर पूरा दिखेगा -प्रातः ६ बज कर २१ मिनट से चन्द्रमा की छाया की केन्द्रीय रेखा भारत के पश्चिम तट से आरम्भ होगी और सूर्य को चपेट में ले लेगी -अपने आरम्भिक समय में ही यह पूर्ण सूर्यग्रहण का पथ २०५ किलोमीटर चौडा होगा ! सूरत में सम्पूर्ण सूर्यग्रहण ३ मिनट १४ सेकेण्ड (क्षितिज से सूर्य की ऊँचाई महज ३ डिग्री ) ,इंदौर में तीन मिनट पाँच सेकेण्ड ,भोपाल में ३ मिनट ९ सेकेण्ड ,वाराणसी में ३ मिनट ७ सेकेण्ड तथा पटना में तो ३ मिनट ४७ सेकेन्ड पूर्ण ग्रहण दिखेगा ! पटना के निकटवर्ती क्षेत्रों से सूर्य की ऊँचाई १३-१४ डिग्री ऊपर हो जाने से यह ग्रहण वहाँ से बहुत अच्छादिखेगा -मगर यह जुलाई का महीना भले ही वर्षा कम हो रही हो बादलों से आच्छादित है -आज भी पूरी तरह से आसमान को बादलों ने ढँक रखा है -इसलिए मैं तो पहले से ही अपने उत्साह को अनुशासित कर रहा हूँ जबकि मेरे एक मित्र की खगोलप्रेमी मित्र वायुयान से यह नजारा देखने आज हीयहाँ दिल्ली से पहुँच रही हैं -सनक भी अजब होती है ! एक ब्लॉगर मित्र कानपूर से आने वाले थे -उनका कन्फर्मिंग फोन फिर से अभी आया नही है !




वह अम्ब्रा पट्टी जिस पर सम्पूर्ण ग्रहण दिखेगा !


पूर्ण सूर्यग्रहण सबसे अधिक समय तक दोपहर में जापान के रुऊक्यू द्वीप से ६ मिनट ३९ सेकेण्ड तक दिखेगा !सम्पूर्ण ग्रहण की स्थिति में आसमान में बुध ,शुक्र और मंगल तथा बृहस्पति को देखा जा सकता है -हाँ क्षितिज पर नीचा होने के कारण पूर्व में बुध और पशिम में बृहस्पति को देखने में थोड़ा मुश्किल हो सकती है !

चित्र विकीपीडिया एवं कुछ अन्य वेब स्रोतों से

अरे, एक साक्षात देवता का सहसा अदृश्य हो जाना !

मिथकों का राहु जो सूर्य को निगल लेता है -ऐसी मान्यता है !
कैसा लगेगा जब एक साक्षात देवता परसों २२ जुलाई को सहसा अदृश्य हो जायेगें ! बात सूर्य देवता की हो रही है जो २२ जुलाई प्रातः ६ बज कर २१ मिनट से अदृश्य होते होते कुछ मिनटों के लिए पूरी तरह अदृश्य हो जायेगें -यानी सम्पूर्ण /समग्र सूर्य ग्रहण ! सूर्य हमारे नजरों के सामने उपस्थित /दृश्यमान एक साक्षात देवता है -बाकी किस्से कहानियों में भले प्रगट होते हैं ,वैसे तो अदृश्य ही रहते हैं -मगर सूर्य सदैव प्रगट देव हैं .मगर इन पर भी ग्रहण लग रहा है -और ये कुछ मिनटों के लिए ही सही अदृश्य होने वाले हैं !


आख़िर सूर्यग्रहण क्यों लगता है ? यह सवाल जब हजारो साल पहले लोगों ने गुनी जनों /तत्कालीन बुझक्कडो से पूंछा होगा तो अपने तब के ज्ञान और कल्पनाशीलता के मुकाबले उन्होंने लोगों की जिज्ञासा शान्त करने के लिए जो कुछ कहानी गढी होगी वह विश्व के मिथकों का एक रोचक दास्तान बनी -भारत में यह कथा अदि समुद्र मथन से जुड़ती है जिसमें मंथन से निकले कई रत्नों मे से एक अमृत के बटवारे में राहु का छुप कर देवताओं के बीच आ धमकना सूर्य और चन्द्रमा से छिपा नही रह गया तो उन्होंने विष्णु को इशारे से इस घुसपैठिये राक्षस के बारे में बता दिया और उन्होंने झटपट सुदर्शन चक्र से राहु का सर काट दिया , धड केतु बन गया -अब चूंकि वह अमृत पान तब तक कर चुका था इसलिए जिंदा रह कर आज भी सूर्य और चन्द्रमा को रह रह कर मुंह का ग्रास बना लेता है ! अब यह कहानी आउटडेटेड हो गयी है -आज हमें पता है की सूर्य की परिक्रमा के दौरान धरती और चन्द्रमा जो ख़ुद धरती की परिक्रमा करता है ऐसे युति बना लेते हैंकि सूरज के प्रकाश को देख नही पाते तब सूर्य ग्रहण लग जाता है ! दरअसल राहु केतु का कोई अस्तित्व नही है ! यह महज कपोल कल्पना है -हाँ ज्योतिषीय गणनाओं की परिशुद्धि के लिए इन्हे छाया ग्रह मानकर काम चलाया जाता है !

भारतीय वान्गमय में सूर्यग्रहण का पहला उल्लेख जयद्रथ वध के मिथक को माना जाता है -निहत्थे अभिमन्यु को जयद्रथ द्वारा नृशंस तरीके से मार दिए जाने से क्षुब्ध अर्जुन प्रतिज्ञा करते हैं कि अगले ही दिन सूर्यास्त के पूर्व वे अगर जयद्रथ को नही मार पाते तो प्राण त्याग देगें -ख़ुद की चिता बनाकर ! मगर दूसरे दिन तो अभूतपूर्व सैन्य -व्यूह रचना के चलते दिन बीत चला ,सूर्य डूबने को आया और लो डूब भी गया मगर जयद्रथ तक अर्जुन नहीं पहुँच सके ! लिहाजा उनकी चिता बनाई गयी और वे जैसे ही चिता पर आरूढ़ हुए सूर्य फिर से चमचमा उठा -कृष्ण मानो तैयार बैठे थे -जयद्रथ अर्जुन की अन्त्येष्टि देखने को उतावला सामने ही था -कृष्ण के एक इशारे से धनुर्धर अर्जुन ने जयद्रथ का सर काट दिया -सूर्य अब अस्ताचल की ओर बढ़ चुके थे ! महाभारत की कथा में सूर्य को ढकने का कौशल कृष्ण के सुदर्शन चक्र को जाता है मगर जरा सी समझ से आप इस पूरे वृत्तांत के मर्म को समझ सकते हैं -दरअसल यह एक सम्पूर्ण ग्रहण ही था और जिसकी जानकारी कृष्ण को थी और उन्होंने यह जानते हुए जयद्रथ वध की रणनीति बनाई थी जो कामयाब हुयी !

कितनी बार सूर्यग्रहण लगा है -मगर आदमी का बाल भी बांका नही हुआ है ! इस बार भी कुछ नही होने वाला है !
अरे सब आज ही लिख दूंगां तो कल परसों क्या लिखूंगा ?
कल सूर्यग्रहण के वैज्ञानिक पक्ष को सामने रखूंगा ! और परसों भी !





Sunday, 19 July 2009

बला की खूबसूरती पर मडराते खतरे : पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (5)-(डार्विन द्विशती विशेष ब्लागमाला )

चिडियों में प्रायः नर ही ज्यादा चमकदार और तड़क भड़क पंखों - डैनो वाले होते हैं मादाएं अनाकर्षक ! ऐसा भला क्यों ?
जिन पक्षी प्रजातियों जैसे मोर में नर बहुसंगिनी (पाली गैमस ) सहवासी होता है उनमें मादाएं बहुत ही साधारण दिखने वाली होती हैं -वे ही अंडे देने ,सेने से लेकर बच्चों /चूजों की परवरिश का मुख्य जिम्मा संम्भालती हैं -नर जैसी बला की खूबसूरती उन्हें परभक्षी शिकारियों का शिकार बना सकती हैं और फिर संतति/वंश परम्परा भी खतरे में पड़ सकती है ! लिहाजा कुदरत ने उन्हें खूबसूरती नही बख्शी ! इन प्रजातियों में नर शिशुओं के लालन पालन का कोई जिम्मा नही संभालता -बस अपने सुंदर और भड़कीले रंगों हाव भाव से मादा को रिझाता है और रति प्रसंग को अंजाम देकर अपनी जैवीय जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है -अपने पर्ने याचन के दौरान यदि वह किसी परभक्षी का शिकार भी हो जाता है तो मानो उसी पल का इंतज़ार कर रहा उसका प्रतिद्वंद्वी नर हरम को संभाल लेता है !

आखिर जब तड़क भड़क रंग प्रतिरूपों से नर पक्षी को इतना खतरा है तो फिर कुदरत ने उसे इतना भड़कीला बनाया ही क्यों की वह परभक्षी शिकारी के आँख की किरकिरी बन जाय ? व्यव्हारविदों का कहना है कि दरअसल चमकीले पंख स्वस्थ और चुस्त -स्फूर्त नर के चयन में मादा को उकसाते हैं -इन्हे प्रणय याचन का शार्ट कट कहा जाता है -जो नर जितना ही अधिक चमकदार है वह उतना ही स्वस्थ है -मादाएं उसकी ओर उतनी ही सहजता से आकृष्ट होंगीं -पर यहीं खतरा भी है ! यह चमक और भड़कीलापन शिकारियों को भी उतनी ही सहजता से आकर्षित करता है -जीवन और मौत की यह लुकाछिपी प्रक्रति के आँगन में चलती रहती है !


मोरिनी को रिझाता मोर


कुछ एक संगिनी (मोनोगैमस ) प्रजाति के पक्षियों में भी नर आकर्षक होता है मगर यहाँ भी मादा ही सारा प्रसूत और बच्चों की सेवा सुश्रुषा का जिमा संभालती है -नर यहाँ भी उठल्लू का चूल्हा ही रहता है बस निठल्ला -कोई काम काज नही बस प्रणय याचन ,मादा का निषेचन ,बस छुट्टी ! ऐसे नर को शिकारी चट कर जायं तो क्या फर्क पड़ता है -वंशावली तो कायम ही रहेगी !

बहुगामी प्रजातियों में नर मोर की खूबसूरती अपनी पराकाष्ठा पर पहुँची हुयी है -यहाँ मादा उसी नर से संसर्ग की हामी भरती है जिसके पंख प्रारूप बेहद चमकदार और भड़कीले हों बाकी के नर इस स्वयम्बर /रासलीला को दूर से बस निहारते ही रह जाते हैं !

मोर के चित्ताकर्षक नृत्य को यहाँ और यहाँ भी देख सकते हैं ! मादा तो न्योछावर है पर पास ही किसी शिकारी की भी गृद्ध दृष्टि मोर पर हो सकती है !

Wednesday, 15 July 2009

पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (4)-कैसे कैसे लैंगिक संकेत ? (डार्विन द्विशती विशेष )

पशु पक्षियों के प्रणय याचन में प्रजाति पहचान का मामला भी बड़ा जटिल है -जहाँ एक सरीखे ही असंख्य प्राणी प्रजातियाँ हों ,यह कैसे सुनिश्चित हो कि प्रेम की अभिव्यक्ति अपनी ही प्रजाति के जोड़े से हो पायेगी ? इसलिए कुदरत ने प्रजातियों को विशेष पहचान चिह्न और प्रणय याचन के तौर तरीकों की अलग सौगात सौंपी है -जिससे कोई भूल चूक न हो और सही जोड़े ही प्रणय संसर्ग कर सकें अन्यथा विपरीत प्रजाति सयोगों से वंश बेलि बढ़ नही पायेगी ! इस कुदरती व्यवस्था के चलते क्या मजाल कि कोई एक प्रजाति किसी दूसरी प्रजाति से जोड़ा गान्ठने लगे !

जैव विदों ने उन तौर तरीकों जिनसे किन्ही अलग थलग प्रजातियों में यौनिक संसर्ग न होने पाये -प्रजनिक पृथक्करण प्रलाणी ( reproductive isolation mechanism ) कहा है और इनमें प्रणय याचन के अलग अलग तरीके ,अलग अलग प्रणय काल (ब्राडिंग पीरियड ) , शारीरिक बनावट आदि शामिल है । विकास की सीढी पर कई निचली श्रेणी के प्राणियों में यद्यपि प्रजनिक पृथक्करण प्रणाली थोड़ी ढीली ढाली सी है -मतलब उनमें विभिन्न गैर प्रजातियों में भी कभी कभार आकस्मिक संकरण हो जाता है ! ऐसा इसलिए भी है की कई निचले स्तर के प्राणियों में बाह्य निषेचन होता है आंतरिक गर्भाधान नहीं.जैसे जब मछलियों की कुछ प्रजातियाँ एक साथ प्रजनन करती हैं तो उनके अंडे और शुक्राणुओं की विशाल फौज जल धाराओं में गुत्थम गुत्था होती रहती हैं और गैर प्रजातियों के शुक्राणु और अंडे आपस में टकरा जाते हैं -सारी बोलने के बजाय वे निषेचन को तरजीह दे देते हैं ,इसलिए प्रकृति में रोहू ,कतला ,नैन मछली प्रजातियों के विभिन्न संकर रूप भी देखने को मिल जाते हैं -ऐसे उदाहरण दूसरे प्राणियों - जानवरों में भी हैं .मगर ऊँची प्रजातियों में गैर प्रजातीय यौन संसर्ग अपवाद हैं -गोरिल्ला और चिम्पांजी के वर्ण संकर नहीं मिलते !

इसी तरह नर मादा के बीच परस्पर पहचान के लैंगिक संकेत भी मुखर होते हैं -मगर यहाँ भी कई प्रजातियों में जैसे कई पक्षी प्रजातियों में लैंगिक पहचान बहुत गौण होती है जहां नर मादा की पहचान मुश्किल है -अब जैसे बुजेरिगर पक्षी (जिसे लव बर्ड कहने का प्रचलन है ) में नर के चोंच के ऊपर का हिस्सा -सेरे ,गहरा नीला होता है जबकि मादा में यही भाग भूरा होता है ! मगर यदि किसी नर की चोंच के इस ऊपरी हिसे को पेंट से भूरा कर दिया जाता है तो दूसरे नर उसी को मादा समझ कर यौन याचन और संसर्ग के प्रयास शुरू कर देते हैं और मादा के भूरे हिस्से को गहरा नीला पेंट कर देने पर नर उसकी ओर से बेरुखी अख्तियार कर लेते हैं !

बुजेरिगर -बाएँ मादा ,दायें नर (चोंच के ऊपर के सेरे से पहचाने ,जो मादा में भूरा और नर में नीला है !)

कई दूसरे लैंगिक संकेत गैर वयस्कों और वयस्कों के बीच फर्क करते हैं जैसे जेब्रा फिंच पक्षी के अवयस्क सदस्यों की चोंच काली होती है और मादा तथा वयस्कों की गहरी लाल -जब इन अवयस्कों की काली चोच लाल नेल पालिश से लाल कर दी गयी तो नर पक्षी यहाँ तक की खुद उनके पिता उनसे यौन संसर्ग पर उतारू हो गए ! उनकी जान फिर से नेल पालिश रिमूवर से लाल रंग हटाने के बाद ही छूटी !


जेब्रा फिंच पक्षी की वयस्क मादा की चोंच लाल होती है और अवयस्क की भूरी
विकास वाद के अनुसार सभी प्राणी एक दूसरे से गहरे सम्बन्धित हैं और उनमें व्यवहार का विकास भी पृथक तौर पर नहीं बल्कि एक क्रमिक रूप में हुआ हैं -ऊपर के अध्ययनों के मानवीय संदर्भ में क्या फलितार्थ /निहितार्थ हैं , अनेक व्यवहार शास्त्री ,समाज जैविकी विद इसे जानने समझने में जुटे हुए हैं !
जारी ......