क्या किसी ज्योतिषी ने स्वाईंन फ्लू के इस तरह विश्व-व्यापी बन जाने की भविष्यवाणी की थी ? यहीं चिढ होती है मुझे ज्योतिषियों से ! हे ब्लागरों ,ज़रा सावधान हो जाओ और ये भविष्यवाणी सुनों ! मगर ऐसा कोई दावा नही कि ये सोलहो आने सच होगीं -ये वैज्ञानिक भविष्यवाणी बोले तो फोरकास्टिंग है ! सच भी हो सकती है नही भी ! इसका मकसद बस आपको खबरदार रखना है ! और समय रहते आप अपनी कोई प्लानिंग कर सकें इसलिए ये भविष्यवाणी की जा रही है ! ब्लॉग दुनिया के सारे -गत्यात्मक अथवा गैर गत्यात्मक सभी ज्योतिषी भी पढ़ लें -मैं स्वाईंन फ्लू की कुण्डली बांचने जा रहा हूँ -
आज की ताजा हालात -
स्वाईंन फ्लू अब वैश्विक महामारी का रूप ले चुका है इसमें कोई शंका नही है ! विश्व स्वास्थ्य संगठन अब इसके चेतावनी के अन्तिम स्तर यानि ६ की भी घोषणा करने वाला ही है ! अब तक यह १६ देशों में फैल चुका है ! ३६५ मामलों की पुष्टि हो चुकी है -६०० से अधिक लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं .भारत में भी इसका खतरा मंडरा रहा है ! महाराष्ट्र के जलगांव में १०० सूअरों के मरने से शंकाओं का माहौल गरम हो उठा है ! अभी चूकिं भारत के अधिकांश भाग तेज गरमी की चपेट में हैं इस पर कुछ अंकुश लगा हुआ रहेगा ! यह वाईरस ज्यादा तापक्रम पर सक्रिय नही रहता .मगर बेहद सावधानी की जरूरत है .इस बार खतरा कितना बड़ा है यह इसी से जान सकते हैं कि बर्ड फ्लू का चेतावनी स्तर अभी भी ३ पर कायम है जबकि यह महामारी अब ५ के स्तर से ६ तक पहुँचने वाली है !
अब कल क्या होगा ? मतलब क्या क्या हो सकता है ?
* मई माह बीतते बीतते पूरी दुनिया स्वाईंन फ्लू के पहले दौर ( फर्स्ट वेब ) के चपेट में आ जायेगी !
* दुनिया भर में रोग निवारण ,क्वैरेनटाईन शिविरों की स्थापना होगी -अमेरिका में तो इनकी भरमार होगी !
*जगह जगह रोड ब्लाक्स ,मिलिटरी पोस्ट और निगरानी ,मास्क और दास्ताने पहने लोग दिखेंगें ,जगह जगह स्वास्थ्य कर्मी लोगों की जांच , तापक्रम लेते दिखेंगें !
* देशी और अंतरास्ट्रीय हवाई यात्राये ,जमीनी परिवहन यकायक ठप पड़ सकते हैं !
*दैनिक उपभोग और खान पान के बिक्री स्टोर बंद हो जायेंगें -पेट्रोल पम्पों ,सरकारी दफ्तरों ,बैंको पर ताले लटकते नजर आयेंगें ! किसी प्रमुख अवकाश सा नजारा दिखेगा ! सड़कों पर कम कारें -टैफिक -बस मिलिटरी या पुलिस का भारी बंदोबस्त दिखेगा !
* फिर आएगा दूसरा दौर ( माईल्ड वेब ) -उपरोक्त स्थितियां और भी गंभीर हो उठेंगीं !
* वर्ष के अंत तक मारक लहर ( डेडली वेब ) भी आ जायेगी ! पूरी दुनिया में लोग मास्क पहने हुए होगें ! बाजार ,व्यावसायिक प्रतिष्ठान ,माल ,स्कूल कालेज अनिश्चित काल के लिए बंद हो जायेगें !
* लोगों को ज्यादातर घर के भीतर रहने को बाध्य होना होगा !
* समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था चरमरा उठेगी -मंदी का एक नया दौर शुरू होगा !
* लोगों के दैनिक क्रिया कलाप ,रोजगार बुरी तरह प्रभावित होगें -केवल बहुत जरूरी खरीद फ़रोख्त -औषधियों ,अत्यावश्यक वस्तुओं की ही होगी -घर से प्रायः निकलने की मनाही होगी !
* दो प्रतिशत मृत्यु दर की सम्भावना होगी !
ये स्थितियां आ सकती हैं और नही भी -यह आपको डराने के लिए नही बल्कि आगाह करने के लिए है ! ज्ञात रहे १९१८ में इसी विषाणु H1N1 के चलते पूरी दुनिया में ४-५ करोड़ लोग मौत के मुंह में समां गए थे ! आज ऐसे विषाणु आक्रमणों से निपटने की हमारे पास बढियां रणनीति और संसाधन हैं फिर भी हमें किसी भी स्तर पर भी लापरवाही नही दिखानी है ! विज्ञान संचारक ब्लागरों ने स्वाईंन फ्लू की ताजातरीन खबरे आप तक पहुचाने की एक कार्यनीति तैयार कर ली है ! आप यहाँ की एक खिड़की में रोज ताक झांक कर सकते हैं !
सन्दर्भ :
http://forecastfortomorrow.com/Files/swineflu.pdf
Science could just be a fun and discourse of a very high intellectual order.Besides, it could be a savior of humanity as well by eradicating a lot of superstitious and superfluous things from our society which are hampering our march towards peace and prosperity. Let us join hands to move towards establishing a scientific culture........a brave new world.....!
Saturday, 2 May 2009
मिट्ठू मियाँ को देखिये कैसे ठुमक ठुमक के नाच रहे हैं !
पशु पक्षियों की बुद्धि बड़े औसत दर्जे की होती है -मगर कुछ नए अध्ययन सचमुच चौकाने वाले हैं ! अनिरुद्ध पटेल नामक वैज्ञानिक की अगुआई में पक्षी वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह साबित कर दिया है की तोते की एक प्रजाति सल्फर क्रेस्टेड कोकैटू प्रजाति में संगीत की अच्छी खासी समझ है और वह सगीत के लय ताल पर ठुमके भी लगाता है ! जिस तोते पर यह अध्ययन किया गया है उसका नाम स्नोबाल है और इस अध्ययन से जानवरों में लय ताल की जैवीय अनुभूति के बारे में नयी जानकारियाँ मिल सकेगी ! सम्भव है यह अध्ययन मानसिक रुग्णता के रोगियों के इलाज में भी लाभदायक हो सके !
म्यूजिक का नाम है Backstreet Boys और स्नोबाल को उसके इस प्रदर्शन को लेकर बीक स्ट्रीट बॉय कहा जा रहा है ! आप भी जरूर इस नृत्य समारोह का लाभ उठाएं ! यहाँ !
Sunday, 26 April 2009
सावधान ! विश्वव्यापी बन सकता है अमरीका में फैला यह स्वायिन -फ्लू !

बुरी खबर है ! अमेरिका में सूअरों से उपजी एक फ्लू की महामारी तेजी से फैल रही है और आशंका व्यक्त की जा रही है कि कहीं यह पूरी दुनिया में महामारी ( Pandemic) बन कर फैल न जाय ! मेक्सिको में८० लोग मर चुके हैं . १३०० को जांच के दायरे में रखा गया है ! व्हाईट हाउस तक सकते में आ गया है ! अभी सुरक्षा तंत्र को ३ के स्तर पर मुस्तैद किया गया है -४ पर होते ही विश्वव्यापी खतरे की घंटी बज जायेगी !
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार फ्लू की यह नयी महामारी का प्रकोप मेक्सिको के १८ लोगों और यूं एस ये के २० लोगों में पक्के तौर पर देखी जा चुकी है -न्यू यार्क ,ओहियो ,कंसास ,टेक्सास और कैलिफोर्नियाँ में इस महामारी के फैलने की खबरे मिल रही हैं ! न्यूजीलैंड और स्पेन से भी ऐसे ही खबरें आ रही हैं ! अभी इसके बढ़ने के आसार हैं ! इस पर पारम्परिक फ्लू औषधियां भी काम नहीं कर रही हैं -हाँ नयी औषधियां टामिफलू और रेलेंजा थोड़ा कारगर हैं जिनकी पाँच करोड़ खुराकें आनन् फानन में जारी कर दी गयी हैं !
मेक्सिको में स्कूल कालेज बंद कर दिए गए हैं .लोगों को घूमने घामने के बजाय घर में ही कैद रहने की हिदायत दी जा रही है -कहा गया है लोग हाथों को साबुन से साफ़ करते रहें ! चीन में भी अलर्ट कर दिया गया है ! जिस वाईरस स्ट्रेन पर शंका है -H1N1 वह पक्षी ,मनुष्य और सूअरों के सम्मिलित जेनेटिक अवयवों को धारण किए हुए है और बहुत ही खतरनाक है !
भारत भी इस बीमारी के आसान टारगेट में हो सकता है क्योंकि यहाँ रोजाना हजारों लोग प्रभावित देशों ,मुख्यतः अमेरिका से आ रहे हैं ! बहुत सम्भव है आपके परिजन ही अवकाश बिताने अपने जन्म स्थान को लौट रहे हों ! उचित होता कि भारत सरकार मौके की नजाकत को समझते हुए तत्काल हाई अलर्ट घोषित करते हुए रोग निरोधन ( क्वैरेनटाय़ीन ) की व्यवस्था अमल में लाये ! हवाई अड्डे से उतरते ही यात्रियों को पृथक कक्षों ( आयिसोलेसन वार्ड्स ) में रोग निरोधन से आश्वस्त होने के बाद ही उन्हें खुले भ्रमण पर जाने दे !
हम कोई भी खतरा नही उठा सकते -हमारे पास टामीफ्लू औषधि का भी कोई बड़ा जखीरा नही है ! यह महामारी यहाँ फैलने न पाए इस लिए सारे एहतियातन कदम उठाये जाने चाहिए ! बिना देरी के फौरन ?! है कोई सुनने वाला ?
Sunday, 19 April 2009
पाँव छूता पुरूष पर्यवेक्षण -३ ( श्रृंखला समापन प्रविष्टि )
विश्व की कुछ संस्कृतियों खासकर भारत में किसी के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रर्दशित करने और आशीर्वाद प्राप्त करने की प्राचीन परम्परा रही है.यहाँ पाँव शरीर के एक गौण और उपेक्षित अंग होने के बावजूद भी पूजित और प्रतिष्ठित हैं ! मानो सम्मान देने वाला यह कह रहा हो की मेरे लिए तो आपके शरीर का यह निचला हिस्सा भी शिरोधार्य है .कहते हैं इसी श्रद्धाभाव के अधीन रहकर ही रामायण के एक प्रमुख पात्र लक्ष्मण ने कभी भी नायिका सीता के पाँव के ऊपर उन्हें देखा तक नही था ! भारत में भला पाँव का इससे बढ़कर महत्व भला और क्या हो सकता है की मात्र एक चरण पादुका ने वर्षों तक अयोध्या के सिंहासन पर आरूढ़ हो राज काज संभाला था ।
आईये तनिक देह की भाषा में पांवों के व्याकरण की भी एक पड़ताल कर ली जाय .आम जीवन में जब हम लोगों से मिलते जुलते हैं तो एक दूसरे के चेहरों पर वही भाव लाते हैं जो हम देखना दिखाना पसंद करते हैं .इस तरह हम अपने चेहरों पर मिथ्याभिव्यक्ति के तहत जबरन हंसी और हिकारत के भाव लाने में सिद्धहस्त हो जाते हैं .मगर जैसे जैसे पर्यवेक्षण का सिलसिला चेहरे से दूर निचले अंगों की ओर बढ़ता हैं हम पाते हैं वे उतनी दक्षता से मिथ्याभाव प्रगट नही कर पाते हैं -अब निचले अंगों के हाव भाव मानों उत्तरोत्तर चेहरे की अभिवयक्ति की मानों चुगली करने लग जाते हैं .हाँथ शरीर के लगभग आधे हिस्से तक पहुँचते हैं तो वे सप्रयास चेहरे के झूंठ का अनुसरण करते तो हैं मगर इस उपक्रम में आधे ही सफल हो पाते हैं .यानि वे मुंहदेखी मुंहकही की आधी पोल तो खोल देते हैं ! किसी को संभाषण करते समय जरा उसके हांथों को भी देखते चलिए आपको ख़ुद आभास हो जायेगा की कहीं न कहीं कुछ विरोधाभास है ! साक्षात्कारों में भी और व्याख्यान के अवसरों पर वक्ताओं के लिए सबसे राहत की बात तो यह होती है कि उनके पाँव या तो मेज या फिर पोडियम के पीछे छुपे रहते हैं नहीं तो उनके चेहरे और पांवों के भावों के अंतरविरोधों की पोल खुल जाती ! ऐसे अवसरों पर पैर अक्सर हिलते डुलते रहते हैं मानों वे झूठ और फरेब की दुनिया से भाग निकलना चाहते हों ।
आज भी बहुत से लौकिक कार्यों में बाएँ पाँव को अशुभ और दायें को शुभ माना जाता है -मजे की बात तो यह है कि जब सेना दुश्मन को नेस्तनाबूद करने की आक्रामक मुद्रा में निकले को उद्यत होती है तो वही पुराने रिवाज के अधीन ही लेफ्ट राईट मार्च ही करती है -यानि पहले बायाँ पैर आगे ! अज लेफ्ट राईट मार्च करने वाले रंगरूट भला इस पुराने ज्ञान से कहाँ भिग्य होते हैं ?
पुरूष पर्यवेक्षण की यह श्रृखला यही समाप्त होती है ! यह मेरे नववर्ष के एक संकल्पों में था और मन आज एक गहन प्रशांति के भाव से भर उठा है कि मैंने यह उत्तरदायित्व आज पूरा कर लिया ! मैं इस श्रृखला के प्रशंसकों और आलोचकों दोनों का समान भाव से कृतग्य हूँ कि उनके सतत उत्प्रेरण से यह काम आज अंजाम पर पहुच गया -शिख से नख तक की यह पुरूष पर्यवेक्षण श्रृखला पूरी हो गयी ! मैं ख़ास तौर पर उस सुमुखि ( व्यक्तित्व ) का आभारी हूँ जिनके आग्रह और आह्वान ( भले ही उसका कोई भी मकसद रहा हो ) पर मैंने यह प्रोजेक्ट स्वीकार किया !
अब यह मौलिक काम / शोध प्रबंध जो पहली बार चिट्ठाजगत में शोभित /चर्चित हुआ पिछली श्रृंखला -नारी नख शिख सौन्दर्य के साथ ही समाहित हो " नर -नारी नख शिख सौन्दर्य " शीर्षक से शीघ्र प्रकाश्य है !
आईये तनिक देह की भाषा में पांवों के व्याकरण की भी एक पड़ताल कर ली जाय .आम जीवन में जब हम लोगों से मिलते जुलते हैं तो एक दूसरे के चेहरों पर वही भाव लाते हैं जो हम देखना दिखाना पसंद करते हैं .इस तरह हम अपने चेहरों पर मिथ्याभिव्यक्ति के तहत जबरन हंसी और हिकारत के भाव लाने में सिद्धहस्त हो जाते हैं .मगर जैसे जैसे पर्यवेक्षण का सिलसिला चेहरे से दूर निचले अंगों की ओर बढ़ता हैं हम पाते हैं वे उतनी दक्षता से मिथ्याभाव प्रगट नही कर पाते हैं -अब निचले अंगों के हाव भाव मानों उत्तरोत्तर चेहरे की अभिवयक्ति की मानों चुगली करने लग जाते हैं .हाँथ शरीर के लगभग आधे हिस्से तक पहुँचते हैं तो वे सप्रयास चेहरे के झूंठ का अनुसरण करते तो हैं मगर इस उपक्रम में आधे ही सफल हो पाते हैं .यानि वे मुंहदेखी मुंहकही की आधी पोल तो खोल देते हैं ! किसी को संभाषण करते समय जरा उसके हांथों को भी देखते चलिए आपको ख़ुद आभास हो जायेगा की कहीं न कहीं कुछ विरोधाभास है ! साक्षात्कारों में भी और व्याख्यान के अवसरों पर वक्ताओं के लिए सबसे राहत की बात तो यह होती है कि उनके पाँव या तो मेज या फिर पोडियम के पीछे छुपे रहते हैं नहीं तो उनके चेहरे और पांवों के भावों के अंतरविरोधों की पोल खुल जाती ! ऐसे अवसरों पर पैर अक्सर हिलते डुलते रहते हैं मानों वे झूठ और फरेब की दुनिया से भाग निकलना चाहते हों ।
आज भी बहुत से लौकिक कार्यों में बाएँ पाँव को अशुभ और दायें को शुभ माना जाता है -मजे की बात तो यह है कि जब सेना दुश्मन को नेस्तनाबूद करने की आक्रामक मुद्रा में निकले को उद्यत होती है तो वही पुराने रिवाज के अधीन ही लेफ्ट राईट मार्च ही करती है -यानि पहले बायाँ पैर आगे ! अज लेफ्ट राईट मार्च करने वाले रंगरूट भला इस पुराने ज्ञान से कहाँ भिग्य होते हैं ?
पुरूष पर्यवेक्षण की यह श्रृखला यही समाप्त होती है ! यह मेरे नववर्ष के एक संकल्पों में था और मन आज एक गहन प्रशांति के भाव से भर उठा है कि मैंने यह उत्तरदायित्व आज पूरा कर लिया ! मैं इस श्रृखला के प्रशंसकों और आलोचकों दोनों का समान भाव से कृतग्य हूँ कि उनके सतत उत्प्रेरण से यह काम आज अंजाम पर पहुच गया -शिख से नख तक की यह पुरूष पर्यवेक्षण श्रृखला पूरी हो गयी ! मैं ख़ास तौर पर उस सुमुखि ( व्यक्तित्व ) का आभारी हूँ जिनके आग्रह और आह्वान ( भले ही उसका कोई भी मकसद रहा हो ) पर मैंने यह प्रोजेक्ट स्वीकार किया !
अब यह मौलिक काम / शोध प्रबंध जो पहली बार चिट्ठाजगत में शोभित /चर्चित हुआ पिछली श्रृंखला -नारी नख शिख सौन्दर्य के साथ ही समाहित हो " नर -नारी नख शिख सौन्दर्य " शीर्षक से शीघ्र प्रकाश्य है !
Friday, 17 April 2009
पाँव छूता पुरूष पर्यवेक्षण -2
हमने गतांक में जाना कि कैसे आज के जूते मोजे वाले आधुनिक मानव के लिए उसके पाँव की आदिम गंध क्षमता एक बड़ी मुसीबत बन चुकी है ! बस फायदा केवल सौन्दर्य प्रसाधन की निर्माता कम्पनियों को है जो पैरों को साफ़ सुथरा बनाए रखने के नित नए उत्पादों को लांच कर मालामाल हो रही हैं ! हमारी एक जबरदस्त आदिम क्षमता की कितनी बुरी गत बन चुकी है ! आईये आगे बढ़ें !
जिस तरह शिनाख्त के मामलों में हमारे अन्गुलि छाप बड़े काम के हैं उससे ज़रा भी कमतर नहीं है हमारे पाँव की उँगलियों की छाप ! यह भी मनुष्य दर मनुष्य पहचान की जीवंत दस्तावेज हैं ! मगर अब चूंकि पांवों की अंगुलियाँ ज्यादातर मोजे और जूतों की आवरण लिए रहती हैं ये प्रायः छुपी रहती हैं और अपराधी तक को भी इन्हे ढंकने के लिए अतिरिक्त दस्तानों की जरूरत ही कहाँ पड़ती है ! उनके लिए तो मोजे ही स्थायी दास्ताने बने रहते हैं . इसलिए ही अपराध स्थल से उँगलियों के निशान लेने का प्रचलन रहा है -और पद गंध के अनुसरण के लिए कुत्तों का सहारा लिया जाता है !
कुछ और पद पदावलियाँ ! पाँव के तलवे और एंडी के चमड़ी का रंग सदैव जन्मजात ही रहता है -भले ही इन्हे कितना "सन टेन " किया जाय ! ये हमेशा सफ़ेद या कंट्रास्ट कलर लिए रहते हैं -जिससे इच्छित भाव सिग्नलों को और भी उभार कर सम्प्रेषित किया जा सके ! पाँव की नीचे की चमड़ी और हथेली की चमड़ी का कंट्रास्ट रंग में होना एक मकसद से है ! अब खुली हथेली /पंजे का अंदरूनी चमड़ी का भाग किस तरह आशीर्वाद के पारम्परिक भूमिका के साथ ही एक प्रमुख राष्टीय राजनीतिक दल का प्रचार चिह्न बना हुआ है इस सन्दर्भ में दृष्टव्य है ! मगर याद कीजिये कैसे इसी पैर के तलवे की चमक कृष्ण के लिए जानलेवा भी बन गयी जिन्हें एक व्याध ने उनके तलवे की कौंध के चलते सर संधान से उन्हें तब हत किया था जब वे बिचारे सद्य समाप्त महाभारत की सोच में विचार मग्न किसी वन में बैठे थे ! तथ्य यह है कि पाँव और हथेली की चमड़ी में रंगोत्पादक मिलानिन तत्व नही होता या नगण्य होता है !
सबसे आश्चर्यजनक तो यह ही कि हाथों की विकलांगता में यही पाँव ही सहरा बन जाते हैं ! आपने हाथों के विकलांग ऐसे कई साहसी लोगों की शौर्य कथाएं भी देखी सुनी होगी जिन्होंने असम्भव कामों को भी पांवों से अंजाम दे दिया ! लिखने का काम ,चित्रकारी और यहाँ तक कि मैंने पांवों से एक नाई को हजामत-दाढी बनाते देखा है ! फिजी और भारत में भी कई लोग दहकते अंगारों पर पाँव डालते निकल जाने का हैरत अंगेज प्रदर्शन करते देखे गए हैं ! अभी तक इस प्रदर्शन की संतोषप्रद वैज्ञानिक व्याख्या नही हो पायी है !
प्राच्य -संस्कृति में जहाँ नर पांवों को मार्शल आर्ट की दीक्षा से विभूषित कर उसे एक प्रहार -आयुध के रूप में विकसित किया जाता रहा है वहीं नारी को पावों को और भी स्त्रैण बनाए रखने का कुचक्र रचा गया है -इन्हे छोटा बनाए रखने की यातनाएं चीन में दिए जाने का एक नृशंस इतिहास रहा है ! इन दिनों भारत में जूतम पैजार का जो नजारा दिख रहा है वह पाँव पर्यवेक्षण के संदर्भ में भी बड़ा मौजू है ! किसी पर जूता फेंकना भले ही अपमानजनक कृत्य हो मगर किसी से मिलने के पहले जूता उतार देना एक तरह से उसका सम्मान करना ही हुआ ! उसका स्वामित्व स्वीकारना हुआ ! अब मंदिरों और कई पूजा स्थलों के बाहर जूता निकलने के पीछे अपने आराध्य का सम्मान ही तो है ! अब हमारे "देव तुल्य " नेताओं से मिलने के पहले भी जूता बाहर ही निकालने की आचार संहिता बस लागू ही होने वाली है !
जिस तरह शिनाख्त के मामलों में हमारे अन्गुलि छाप बड़े काम के हैं उससे ज़रा भी कमतर नहीं है हमारे पाँव की उँगलियों की छाप ! यह भी मनुष्य दर मनुष्य पहचान की जीवंत दस्तावेज हैं ! मगर अब चूंकि पांवों की अंगुलियाँ ज्यादातर मोजे और जूतों की आवरण लिए रहती हैं ये प्रायः छुपी रहती हैं और अपराधी तक को भी इन्हे ढंकने के लिए अतिरिक्त दस्तानों की जरूरत ही कहाँ पड़ती है ! उनके लिए तो मोजे ही स्थायी दास्ताने बने रहते हैं . इसलिए ही अपराध स्थल से उँगलियों के निशान लेने का प्रचलन रहा है -और पद गंध के अनुसरण के लिए कुत्तों का सहारा लिया जाता है !
कुछ और पद पदावलियाँ ! पाँव के तलवे और एंडी के चमड़ी का रंग सदैव जन्मजात ही रहता है -भले ही इन्हे कितना "सन टेन " किया जाय ! ये हमेशा सफ़ेद या कंट्रास्ट कलर लिए रहते हैं -जिससे इच्छित भाव सिग्नलों को और भी उभार कर सम्प्रेषित किया जा सके ! पाँव की नीचे की चमड़ी और हथेली की चमड़ी का कंट्रास्ट रंग में होना एक मकसद से है ! अब खुली हथेली /पंजे का अंदरूनी चमड़ी का भाग किस तरह आशीर्वाद के पारम्परिक भूमिका के साथ ही एक प्रमुख राष्टीय राजनीतिक दल का प्रचार चिह्न बना हुआ है इस सन्दर्भ में दृष्टव्य है ! मगर याद कीजिये कैसे इसी पैर के तलवे की चमक कृष्ण के लिए जानलेवा भी बन गयी जिन्हें एक व्याध ने उनके तलवे की कौंध के चलते सर संधान से उन्हें तब हत किया था जब वे बिचारे सद्य समाप्त महाभारत की सोच में विचार मग्न किसी वन में बैठे थे ! तथ्य यह है कि पाँव और हथेली की चमड़ी में रंगोत्पादक मिलानिन तत्व नही होता या नगण्य होता है !
सबसे आश्चर्यजनक तो यह ही कि हाथों की विकलांगता में यही पाँव ही सहरा बन जाते हैं ! आपने हाथों के विकलांग ऐसे कई साहसी लोगों की शौर्य कथाएं भी देखी सुनी होगी जिन्होंने असम्भव कामों को भी पांवों से अंजाम दे दिया ! लिखने का काम ,चित्रकारी और यहाँ तक कि मैंने पांवों से एक नाई को हजामत-दाढी बनाते देखा है ! फिजी और भारत में भी कई लोग दहकते अंगारों पर पाँव डालते निकल जाने का हैरत अंगेज प्रदर्शन करते देखे गए हैं ! अभी तक इस प्रदर्शन की संतोषप्रद वैज्ञानिक व्याख्या नही हो पायी है !
प्राच्य -संस्कृति में जहाँ नर पांवों को मार्शल आर्ट की दीक्षा से विभूषित कर उसे एक प्रहार -आयुध के रूप में विकसित किया जाता रहा है वहीं नारी को पावों को और भी स्त्रैण बनाए रखने का कुचक्र रचा गया है -इन्हे छोटा बनाए रखने की यातनाएं चीन में दिए जाने का एक नृशंस इतिहास रहा है ! इन दिनों भारत में जूतम पैजार का जो नजारा दिख रहा है वह पाँव पर्यवेक्षण के संदर्भ में भी बड़ा मौजू है ! किसी पर जूता फेंकना भले ही अपमानजनक कृत्य हो मगर किसी से मिलने के पहले जूता उतार देना एक तरह से उसका सम्मान करना ही हुआ ! उसका स्वामित्व स्वीकारना हुआ ! अब मंदिरों और कई पूजा स्थलों के बाहर जूता निकलने के पीछे अपने आराध्य का सम्मान ही तो है ! अब हमारे "देव तुल्य " नेताओं से मिलने के पहले भी जूता बाहर ही निकालने की आचार संहिता बस लागू ही होने वाली है !
Wednesday, 15 April 2009
....और अब पाँव छूता पुरूष पर्यवेक्षण !
पाँव छूता पुरूष पर्यवेक्षण !जैवीय विकास की गाथा में मनुष्य ही अकेला प्राणी है जिसके पूरे शरीर का भार उसके दोनों पांवों पर ही टिका है -जाहिर है मनुष्य के दोनों पाँव ही उसे संभाले रहने और संतुलित बनाये रखने की भूमिका में हैं ! चाहे हम पहाड़ की ऊंचाई चढ़ रहे हों या फिर सुरंग की गहराईयाँ नाप रहे हों यही पाँव हमें आगे पीछे ,दायें बाएँ लुढ़क जाने से भी बचाते हैं ! नहीं तो एक बेजान पुतले को ज़रा थोडा सा आगे पीछे और दायें बाएँ धकेलिए बस फर्क समझ में आ जायेगा ....ये दोनों पाँव ही हैं जो हमें संभाले रखते हैं ! !
महान चित्रकार अन्वेषी लियोनार्दो डा विंची ने मनुष्य के पाँव को उसकी इन्ही विशेषताओं के चलते अभियांत्रिकी का मास्टरपीस और कलात्मकता का अनुपम उदाहरण कहा था .मनुष्य का पाँव २६ हड्डियों ,११४ अस्थि बंधों (लिगामेंट ) और २० तरह की मांशपेशियों की मौजूदगी के कारण ही इस उत्कृष्टता को प्राप्त हुआ है ! लम्बी पदयात्राएं राजनीतिक लाभ के लिए ही नही स्वास्थ्य लाभ के लिए भी बड़ी मुफीद सिद्ध हुयी हैं ! यह पाया गया है कि ९० -१०० वर्ष के दीर्घ जीवी भी पदयात्राओं के मुरीद रहे हैं बल्कि नियमित तौर पर कई किलोमीटर लम्बी यात्राओं के शौकीन रहे हैं ! यह कूता गया है कि एक सामान्य स्वास्थ्य का मनुष्य जीवन भर में एक करोड़ से भी अधिक डग भर लेता है !
आप को यह जानकार हैरत होगी कि पाँव के अंगूठे और तलवे एक तरह के पाँव गंध छोड़ते रहते हैं और आज भी कई मूल आस्ट्रेलियाई कौमें परिजन और दोस्त दुश्मन की पहचान के लिए पदचिह्नों को सूंघने का उपक्रम करती हैं ठीक वैसे ही जैसे प्रशिक्षित कुत्ते मुलजिमों की आवाजाही को सूंघ कर भांप लेते हैं ! हाँ वे इस काम में काफी दक्ष हैं क्योंकि वे ऐसे लोगों के पैरों की गंध भी सूंघ लेते हैं जो अपने पैरों को मोजे और जूते से पूरी तरह ढंके रहते है !
तनाव के क्षणों में मनुष्य के तलवे से पर्याप्त स्राव निकलता है जो मोजे और जूते तक को भी नही बख्शता ! और जब जीवाणुओं की फौज उस स्राव या पसीने को विघटित करती है तो उनसे निकलने वाली दुर्गन्ध आस पास के लोगों को भी बेचैन करती है ! अब जिन लोगों के मोजे बहुत बदबू करते हैं तो जान लीजिये वह बन्दा तनाव में रहकर बड़ी मात्रा में पाँव गंध को निःसृत कर रहा है और मोजे की साफ़ सफाई के प्रति भी सचेष्ट नही है ! ऐसे लोगों को तो प्रति दिन अपने मोजे को साफ़ करते रहना चाहिए ताकि जीवाणुओं की छावनी वहाँ काबिज न हो जाय !
ऐसे तनाव के क्षणों में पसीने से लबरेज मोजे और जूतों के द्वारा छोड गए गंध को सहज ही इंगित कर लेना एक ब्लड हाऊंद कुत्ते के लिए तो बहुत ही आसान है !यह बहुत सम्भव है कि हमारे पुरखों में कुछ ऐसे भेदिये भी जरूर रहे होंगें जो दोस्त और दुश्मन के पदचिह्नों को सूंघ कर उनका अता पता रखते हों -कब कौन बस्ती में दबे पाँव आया और कौन निकल गया ! आज के सभ्य मानव में यह क्षमता तो क्षीण होती गयी है मगर यह एक नयी मुसीबत के रूप में हमारे सामने है -लोगों के मोजों से निकलने वाली असहनीय दुर्गन्ध के रूप में !
Tuesday, 7 April 2009
पुरूष पर्यवेक्षण की अगली चाल !

धावक की दौड़ चाल -स्प्रिंट ! ( ऐविअरी )
बात पुरूष- चालों की चल रही थी ...मैं फिर यह स्पष्ट कर दूँ कि ऐसा नहीं है कि जिन चाल प्रारूपों की चर्चा यहाँ हो रही है उन पर महज पुरुषों का ही एकाधिकार है -मगर पुरूष पर्यवेक्षण में नारी की ख़ास चालों के जिक्र का औचत्य नही इसलिए उनकी खास चालों का जिक्र भी यहाँ नही है ! अब आईये गत चाल से आगे चलें !
...........
१८ -अकडू चाल ( the strut ) -अति आत्मविश्वास की अकड़ भरी चाल -इठलाने का प्रदर्शन !
१९ -अति अकडू चाल (the swagger ) -अकडू पॅन की पराकाष्ठा दिखाती चाल -चाल से ही शेखी बघारना .
२०- अकडू मगर कुछ दोस्तानी चाल (the roll )-अकड़पन तो है मगर लहजा दोस्ताना .रास्ते में कोई मिला तो उसका रुक कर /मुड कर हालचाल भी पूछने की सदाशयता का प्रदर्शन !
२१-सभ्रांत चाल -(the stride ) -सभ्रांत ,ऊंचे तबके अभिजात्य वर्ग की ख़ास चाल -लंबे डग /कदम की चाल ..अब महिलाओं की भी पसंद !
२२- धब धब चाल ( the tramp )-कोल्हू के बैल वाली चाल मगर डग भरना जल्दी जल्दी !
२३-कमजोर की चाल ( the lope ) -ऐसे कमजोर सीकियाँ पहलवान की चाल जिसे चलते हुए देखकर ऐसा भान हो कि यह बन्दा अगर चलता ही नही गया तो शरीर को संभाल नही पायेगा और आगे भहरा उठेगा !
२४-चौंक चाल (the dart ) -चौंक कर खिसक चलने की चाल -स्त्रियों में एक डरी सहमी चाल ,तेज और व्यग्र ,इधर जायं या उधर जाय -अनिर्णय की चाल !
२५- पैर घसीटा चाल ( the slog ) -लम्बी दूरी की तेज चाल मगर पावों को लगभग घसीटते हुए से !
२६-उतावली चाल ( the hurry) - उतावले पॅन और हडबडी की चाल जैसे कोई तात्कालिक काम आ पड़ा हो -दौड़ पड़ने के ठीक पहले जैसी चाल !
२७-दौड़ धूप की चाल (the bustle ) -तीव्रता और व्यग्रता लिए दौड़ भाग की चाल
२८-उछल कूद की चाल (the prance ) -नाचने कूदने फांदने की चंचल चाल -बच्चे किशोरों की ।
२९- सेहत की चाल (the jog )-सेहत बनाने की नीयत से सुबह सुबह की मंथर दौड़ ! मगर सावधान बड़ी उम्र के लोग बिना डाक्टर की सलाह के इसे न अपनाएं .कहीं लेने के देने ना पड़ जायं -सेहत सुधरने के बजाय बिगड़ ना जाय ।
३०-चल कदम दर कदम, चाल -(the march ) -मिलिटरी स्टाईल की चाल -तेज कदम ,कदमके फासले लंबे ,हाथों का आगे पीछे होते रहना ।
३१ -हंस कदम चाल -( the goose step ) मार्च करने की ऊपरी स्टाईल का ही एक नाटकीय रूप -कैसे परेडों के दौरान पैर बिल्कुल सख्त -लम्बवत /सीधा रखते हुए आगे बढ़ते हैं !
३२ -दौड़ चाल ( the run ) -शिकार के लिए दौड़ पड़ने की याद दिलाती चाल -आगे झुक कर पैरों को जमीन पर मजबूती से टिका कर आगे की ओर उछलते हुए दौड़ लगा देना .चहलकदमी में जहाँ किसी भी समय जहाँ दोनों पैर अथवा एक पैर जमीन पर होता है -इस दौड़ चाल में महज एक पैर जमीन पर अथवा कोई भी पैर जमीन पर नही हो सकते !
३३- कम दूरी की दौड़ ( the sprint ) -प्रति सेकेण्ड ४-५ पग की बहुत तेज चाल की छोटी दौड़ ! इसमें जमीन पर एंडी नही पड़ती बस पैर का पंजा जमीन पर आता रहता है !
तो ये रहीं वे चालें जिनमें अधिकाँश का हम अपने जीवन में स्वेच्छा और भावनात्मक कारणों से या सामाजिक जरूरतों के मुताबिक उपयोग करते हैं !
टांगों की कुछ संकेत भागिमायें भी हैं .जैसे जंघे पर ताली का प्रहार -ताल ठोकना ! यह विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में चुनौती देने ,ललकारने ( महाभारत के लगभग अवसान पर तालाब के भीतर छुपे दुर्योधन को बाहर निकालने के उपक्रम में उसे उकसाने के लिए भीम बार बार ताल ठोकते हैं ) ,आश्चर्य और हर्ष ,शर्म ,दुःख और अति आनंद के लिए इस भंगिमा को अपनाया जाता है !
और एक भंगिमा है पैरों को टेकने की -घुटने की -एक पैर का घुटना टेंकना या फिर दोनों पैर के घुटने टेंक देना -यह स्वामित्व स्वीकारने की भंगिमा है । मगर दोनों पैर अब असीम /सर्वोच्च सत्ता के सामने ही टेंकने का रिवाज है !
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