मानव प्यार की जटिलताओं को विवेचित करती लगातार यह तीसरी पोस्ट इस श्रृखला की फिलहाल अंतिम कड़ी है ! इश्क से दीगर मसले और भी तो हैं ! प्रेम के जोडों में कई कुदरती अवरोधक (जिनकी चर्चा पिछले पोस्ट में हुयी है ) अनुपयुक्त साथी की पहचान कर उन्हें आगे बढ़ने से रोक देते हैं ताकि अनचाहे गर्भ धारण और बाद की झंझटों ,बच्चों के लालन पालन के साझे बोझ को उठाने की समस्याओं से बचा जा सके !
दिक्कत है कि हमारे कई सामाजिक रीति रिवाज जो दरअसल अनुपयुक्त जोडों के मिलन के निवारण के लिए ही आरम्भ हुए,जैसे स्वयंवर ही ,कालांतर में मात्र (विवाह की ) रस्मो अदायगी तक सीमित रह गए ! उपयुक्त वर के तलाश की कवायद तो आज भी जारी दिखती है (वधू की कम ही ! ) ,कई उपक्रम किये जाते हैं ,पंडित -फलित ज्योतिषी गणना करते हैं ("गन्ना मिलाना ",=गुण मिलाना ) फिर एक आदर्श जोड़ा /जोड़ी को सामाजिक हरी झंडी मिल जाती है ! मगर पूर्वजों द्वारा सही जोड़े के मिलान की 'कुदरती जरूरत' की समझ जहां विस्मित करती है वहीं आजकल इसके नाम पर चल रहे समझौते इस व्यवस्था के मूल उद्येश्य पर ही प्रश्नचिहन लगाते हैं !
विवाह के रूप में जितने जोडों को सामाजिक स्वीकृति मिलती है उनमें कुदरती तौर पर कितने फीसदी सही जोड़े होते हैं यह भी एक मुद्दा है ! इसी तरह बलात्कार और वैश्यावृत्ति में भी कुदरत के सही जोड़ा मिलान की व्यवस्था ध्वस्त हो रहती है ! ये कुदरत की सच्चे प्यार से उपयुक्त जोड़ा बंधवाने की व्यवस्था को धता बताते मानव व्यवहार के बड़े उदाहरण रहे !
कुछ छोटे छोटे झांसे भी देकर गलत जोड़े बनने के मामले अध्ययन के दौरान प्रकाश में आये हैं - जहाँ कुदरत की अनपयुक्त को पहचाने की मशीनरी फेल हो जाती है ! मसलन कोई दुर्घटना हो गयी -प्लेन ,ट्रेन , मोटर क्रैश ,अग्निकांड ,बाढ़ -इस दौरान दूसरों की भलाई के लिए शरीर की एक और व्यवस्था सक्रिय हो उठती है -कुछ लोगों में बहुत तीव्रता के साथ प्राणोत्सर्ग (altruism )तक की भावना उछाल मारती है -इस दौरान किसी ने किसी को जान पर खेल कर बचा लिया तो अचानक हादसे के चलते धमनियों में तुरत बढ़ गए "हादसा हारमोन " ऐडरनलीन के प्रभाव में शरीर की अनुपयुक्त जोड़े के पहचान के प्रक्रिया फेल कर जाती है और जोडों में एक आकर्षण/कृतज्ञता भाव उत्पन्न हो जाता है . फिल्मों में छोटी मोटी दुर्घटनाओं के बाद नायक नायिका में पनपते प्रेम का दिखाया जाना अकारण नहीं है !
मगर सावधान यह संतानोत्पत्ति के लिए सही जोड़ा नहीं भी हो सकता है ! इसी तरह जो महिलायें गर्भ निरोधक गोली नियमित तौर पर ले रही होती हैं उनमें भी सही गलत जोड़े के पहचान की कुदरती व्यवस्था जवाब दे जाती है -क्योंकि गर्भ निरोधक जो स्वयं एक तीव्र प्रभाव वाले हारमोन हैं और नारी की अंडोत्सर्जन प्रक्रिया को बाधित करते हैं " साईड इफेक्ट " में सही जोड़े की पहचान को प्रभावित कर देते हैं ! पश्चिमी देशों में एक अध्ययन में तो यह पाया गया कि गर्भ निरोधक गोलियों के इस्तेमाल के दौरान बने प्रणय सम्बन्ध और विवाहों में तलाक की दर बहुत ज्यादा है ! जाहिर है नकली प्रेमी इस दौरान "एम् एच सी " फैक्टर की पहचान को धता बता देता है !
वैसे भी इश्क का बुखार लम्बे समय तक नहीं चलता यह या तो "सहचर प्रेम " ( companionate love !) में तब्दील हो जाता है या फिर शनैः शनैः मिट जाता है जब यह कुदरत की मूल प्रजनन /संतानोत्पत्ति की भावना को किन्ही कारणों से भी चरितार्थ नहीं कर पाता ! मानवीय संदर्भ में जो सबसे महत्वपूर्ण जैवीय मुद्दा है वह ऐसे जोड़ा बंधन (पेयर बांडिंग ) को बढावा देने का है जो संतति की जिम्मेदारियों का कुशलतापूर्वक वहन कर सकें -महज मौज मस्ती ही नहीं ! इसलिए निरे रोमांस पर लगाम लग जाती है और यह किसी की जिन्दगी को लम्बे वक्त तक तबाह नहीं करता -" सहचर प्रेम " में बदल जाता है या फिर मिट जाता है ! भले ही असफल प्रेम के अनगिनत किस्से कहानियाँ को जन्म देकर ! मनुष्य जैसा तार्किक (और अतार्किक !)प्राणी भी इक मुकाम पर इसलिए ऐसे इश्क से तोबा कर लेता है जो फलदायी न हो -उतरती जाए है रोमांस की खुमारी अहिस्ता आहिस्ता !
मगर इसका मतलब यह भी नहीं कि जोडों में रोमांस कुछ कमतर हो जाता है -यह सहचर प्रेम में तब्दील होकर अक्षुण हो उठता है -कई शादी शुदा जोडों में वर्षों उपरांत भी उनके ब्रेन का वह हिस्सा उद्दीप्त पाया जाता है जो कि इश्क के दीवानों में दमकता रहता है ! मगर ऐसे मामले अपवाद ही हैं !
Science could just be a fun and discourse of a very high intellectual order.Besides, it could be a savior of humanity as well by eradicating a lot of superstitious and superfluous things from our society which are hampering our march towards peace and prosperity. Let us join hands to move towards establishing a scientific culture........a brave new world.....!
Monday, 14 September 2009
Sunday, 13 September 2009
लवेरिया हुआ ,मगर हुआ क्यूं ?
कमीने इश्क के बाद जो कुछ और सामग्री इस बहुप्रिय विषय पर मेरे खलीते में थी उसे रिसायिकिल बिन में डाल दिया था ,मगर आज फिर उस बिन को खलिया कर निकाल लाया हूँ -अब चिट्ठे पर भी कभी कभार कुछ कचरा नहीं आयेगा तो फिर कैसे श्रेष्ठ रचनाओं की तुलनात्मक साख बनेगी ! लिहाजा इश्क ,प्रेम ,वासना ,यौनाकर्षण जो भी कह लें आप , पर कुछ और जानकारी लेकर बन्दा हाजिर है !
मगर पहले एक पाठ दुहराई हो जाय तो फिर मामला आगे बढे ! अब तक यह तय पाया गया कि कुदरत को इसकी तनिक भी परवाह नहीं कि हम लवेरिया या रोमांस के रस में कितना सरोबार और डूब उतरा रहे हैं ,उसका मकसद तो खास तौर पर यही रहता है कि उसकी जनन लीला बदस्तूर जारी रहे और प्रेम को समर्पित जोड़े (पेयर बांड ) संतानोत्पत्ति कर शिशुओं की देखभाल का भी जिम्मा साथ उठायें ! बस इसी काम को अंजाम देने को कुदरत ने ये सारे चोचले गढे हैं !
पुरुष स्वभावतः सुन्दर चेहरों का चहेता है -"हर हंसी चेहरे का मैं तलबगार हूँ " .यही नहीं वह भावी सहचर में उन घटकों /अवयवों की भी चेतन -अवचेतन तलाश करता है जो प्रजनन -उर्वरता की द्योतक हों . वह ऐसे स्पष्ट यौन संकेतकों की तलाश करता है जैसे पतली कमर और चौडे कूल्हे जो प्रजनन की उर्वरता का पावरफुल संकेत देते हैं ! इसी तरह नारियां भी चौडे और पुष्ट कंधे ,चौड़ी छाती , कसी मुश्कों ,और भरी पूरी दाढी पर फिदा होती हैं -यह सारे लक्षण नर हारमोन के प्राबल्य को जताते हैं !
यौन गंध सूघने में मनुष्य की नाक भी कोई नीची नहीं है .साबित हो चुका है कि साथ साथ रहने वाली नारियों का मासिक चक्र मेल कर जाता है ! यह रासायनिक गंध संकेतो के जरिये ही संभव होता है ! पुरुषों का अवचेतन ही यह भाप लेता है कि अमुक नारी का अंडोत्सर्जन ( ओव्यूलेशन )कब हो जाता है, जिस समय निषेचन की सम्भावना सबसे अधिक होती है ! इस काल में पुरुष सहचर उसके प्रति बहुत केयरिंग ,याचनापूर्ण और चाँद सितारे तोड़ने का भी संकल्प लेने को उतारू दिखता है ! एक होता है मेजर हिस्टोकाम्पैटीबिलिटी फैक्टर ( एम् एच ऍफ़ ) जो यह क्ल्यू देता है कि प्रेमोन्मत जोड़े संतति वहन के योग्य हैं भी या नहीं ! इसका चूकिं गर्भ रक्षा से सीधा सम्बन्ध होता है और एक जैसे एम् एच ऍफ़ के रहते गर्भ रक्षा संभव नहीं है तो चुम्बन के समय लार के विनिमय से इसकी पहचान अवचेतन में ही जोड़े कर लेते हैं और समान होने पर प्रत्यक्षतः किसी न किसी बहाने से दूर होने लगते हैं !
हामरे कई सांस्कृतिक रीति रिवाजों में यौन वर्जनाओं के पीछे अनचाहे गर्भ और यौन जनित बीमारियों के रोक की ही कवायद होती है जो पुश्तैनी तौर पर चली आ रही हैं ! आज की आधुनिक जीवन शैली के "समागम पूर्व " व्यवहार -डेटिंग और पेटिंग भी जोडों की यौन उपयुक्तता की छान बीन के तरीके हैं जो उपयुक्त सहचर के चयन का मार्ग ही प्रशस्त करते हैं ! कुछ सच्चे जोडों के मस्तिष्क के अंदरूनी हिस्सों को फंक्शनल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजेस के जरिये देखा गया है जो अपनी सक्रियता के उच्च बिंदु पर जा पहुँचते हैं जिसमें डोपामाईन रसायन के प्रमुख भूमिका होती है ! सक्रियता के ये पहचान बिंदु वेंट्रल तैग्मेंटल एरिया में उभरते हैं -जिसकी आगे की प्रक्रिया को ऊपर का एक हिस्सा न्यूक्लियस अक्यूम्बेंस संभालता है जहाँ डोपामाइन के साथ अब सेरोटोनिन (यह केले में मिलता है -खूब खाईए केले मूड फ्रेश रहेगा ) भी आ मिलता है ! आगे स्नेह.वात्सल्य भावना का जिम्मा आक्सीटोसिन नमक हारमोन निभाता है ! बच्चों के जन्म पर भी इसी आक्सीटोसिन का निकलना अधिक रहता है जो माँ में ममत्व उभारता है ! यहाँ तक कि प्रसूति गृहों में सद्य प्रसूता के साथ की महिलाएं भी तीव्र ममत्व का अनुभव करती हैं -जाहिर हैं आक्सीटोसिन उनकी घ्राण इन्द्रिय को भी प्रभावित करता है !
ब्रेन का लव सिग्नल कौडेट न्यूक्लियाई में होता है जो दोनों ओर यानि जोड़े में होता है -प्रेम के भावातीत भाव को यही प्रेरित करता है ! इस तरह कई जैव रसायन (opioids ) जब सक्रिय होते हैं तब हम आप यह समझ लेते हैं किसी अमुक ने सुखद अनुभूतियों का पिटारा आपको सौंप दिया है जबकि यह खुद हमारा ही मस्तिष्क होता है जो हमें खुशियों की सौगात सौंपता
है !
अभी कुछ और है आगे ...
मगर पहले एक पाठ दुहराई हो जाय तो फिर मामला आगे बढे ! अब तक यह तय पाया गया कि कुदरत को इसकी तनिक भी परवाह नहीं कि हम लवेरिया या रोमांस के रस में कितना सरोबार और डूब उतरा रहे हैं ,उसका मकसद तो खास तौर पर यही रहता है कि उसकी जनन लीला बदस्तूर जारी रहे और प्रेम को समर्पित जोड़े (पेयर बांड ) संतानोत्पत्ति कर शिशुओं की देखभाल का भी जिम्मा साथ उठायें ! बस इसी काम को अंजाम देने को कुदरत ने ये सारे चोचले गढे हैं !
पुरुष स्वभावतः सुन्दर चेहरों का चहेता है -"हर हंसी चेहरे का मैं तलबगार हूँ " .यही नहीं वह भावी सहचर में उन घटकों /अवयवों की भी चेतन -अवचेतन तलाश करता है जो प्रजनन -उर्वरता की द्योतक हों . वह ऐसे स्पष्ट यौन संकेतकों की तलाश करता है जैसे पतली कमर और चौडे कूल्हे जो प्रजनन की उर्वरता का पावरफुल संकेत देते हैं ! इसी तरह नारियां भी चौडे और पुष्ट कंधे ,चौड़ी छाती , कसी मुश्कों ,और भरी पूरी दाढी पर फिदा होती हैं -यह सारे लक्षण नर हारमोन के प्राबल्य को जताते हैं !
यौन गंध सूघने में मनुष्य की नाक भी कोई नीची नहीं है .साबित हो चुका है कि साथ साथ रहने वाली नारियों का मासिक चक्र मेल कर जाता है ! यह रासायनिक गंध संकेतो के जरिये ही संभव होता है ! पुरुषों का अवचेतन ही यह भाप लेता है कि अमुक नारी का अंडोत्सर्जन ( ओव्यूलेशन )कब हो जाता है, जिस समय निषेचन की सम्भावना सबसे अधिक होती है ! इस काल में पुरुष सहचर उसके प्रति बहुत केयरिंग ,याचनापूर्ण और चाँद सितारे तोड़ने का भी संकल्प लेने को उतारू दिखता है ! एक होता है मेजर हिस्टोकाम्पैटीबिलिटी फैक्टर ( एम् एच ऍफ़ ) जो यह क्ल्यू देता है कि प्रेमोन्मत जोड़े संतति वहन के योग्य हैं भी या नहीं ! इसका चूकिं गर्भ रक्षा से सीधा सम्बन्ध होता है और एक जैसे एम् एच ऍफ़ के रहते गर्भ रक्षा संभव नहीं है तो चुम्बन के समय लार के विनिमय से इसकी पहचान अवचेतन में ही जोड़े कर लेते हैं और समान होने पर प्रत्यक्षतः किसी न किसी बहाने से दूर होने लगते हैं !
हामरे कई सांस्कृतिक रीति रिवाजों में यौन वर्जनाओं के पीछे अनचाहे गर्भ और यौन जनित बीमारियों के रोक की ही कवायद होती है जो पुश्तैनी तौर पर चली आ रही हैं ! आज की आधुनिक जीवन शैली के "समागम पूर्व " व्यवहार -डेटिंग और पेटिंग भी जोडों की यौन उपयुक्तता की छान बीन के तरीके हैं जो उपयुक्त सहचर के चयन का मार्ग ही प्रशस्त करते हैं ! कुछ सच्चे जोडों के मस्तिष्क के अंदरूनी हिस्सों को फंक्शनल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजेस के जरिये देखा गया है जो अपनी सक्रियता के उच्च बिंदु पर जा पहुँचते हैं जिसमें डोपामाईन रसायन के प्रमुख भूमिका होती है ! सक्रियता के ये पहचान बिंदु वेंट्रल तैग्मेंटल एरिया में उभरते हैं -जिसकी आगे की प्रक्रिया को ऊपर का एक हिस्सा न्यूक्लियस अक्यूम्बेंस संभालता है जहाँ डोपामाइन के साथ अब सेरोटोनिन (यह केले में मिलता है -खूब खाईए केले मूड फ्रेश रहेगा ) भी आ मिलता है ! आगे स्नेह.वात्सल्य भावना का जिम्मा आक्सीटोसिन नमक हारमोन निभाता है ! बच्चों के जन्म पर भी इसी आक्सीटोसिन का निकलना अधिक रहता है जो माँ में ममत्व उभारता है ! यहाँ तक कि प्रसूति गृहों में सद्य प्रसूता के साथ की महिलाएं भी तीव्र ममत्व का अनुभव करती हैं -जाहिर हैं आक्सीटोसिन उनकी घ्राण इन्द्रिय को भी प्रभावित करता है !
ब्रेन का लव सिग्नल कौडेट न्यूक्लियाई में होता है जो दोनों ओर यानि जोड़े में होता है -प्रेम के भावातीत भाव को यही प्रेरित करता है ! इस तरह कई जैव रसायन (opioids ) जब सक्रिय होते हैं तब हम आप यह समझ लेते हैं किसी अमुक ने सुखद अनुभूतियों का पिटारा आपको सौंप दिया है जबकि यह खुद हमारा ही मस्तिष्क होता है जो हमें खुशियों की सौगात सौंपता
है !
अभी कुछ और है आगे ...
Thursday, 10 September 2009
मछली सुन्दर सलोनी ,मगर खतरनाक कितनी ?
मैं आज मानव प्रणय श्रृखला को आगे ले जाना चाहता था मगर न जाने किस अज्ञात प्रेरणा से इसी विषय से सम्बन्धित लगभग उन्ही तथ्यों के साथ एक पोस्ट फिर यहाँ आ गयी -अब स्तब्ध मैं अपने लिखे को कूड़े में मतलब फिलहाल रिसायिक्लिन बिन में डाल कर अब आपके लिए कुछ नया लेकर आया हूँ -वो कहते हैं न कि दुनिया में और भी गम हैं इक मोहब्बत के सिवा !
मैंने पिछले दिनों मैदानी कार्यों पर ज्यादा ध्यान लगाया और तभी यह कौंधा कि अपने काम के सिलसिलें से जुडी कुछ "वैज्ञानिक ,रचनात्मक .कलात्मक " बातों को अपनी सरकारी सेवक आचरण नियमावली के प्रावधानों के बिना उल्लंघन के आपके साथ साझा कर सकता हूँ ! तो क्यों नहीं इस छूट का लाभ उठाऊँ !
मैंने पिछले दिनों एक अफ्रीकी मूल की मछली टिलैपिया की चर्चा की थी जिसे चोरी छिपे घुसपैठियों ने भारत में ला दिया और आज इसने गंगा और सहायक नदियों में बाकी मछलियों को बाहर का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया है ! इन जीवों की स्थिति भी म्यान में बस एक तलवार की होती है ,बस यहाँ म्यान को वैज्ञानिक लोग niche -नीशे बोलते हैं -मतलब यह शब्द किसी भी जीव के एड्रेस और आक्यूपेशन -पते और काम दोनों का एक साथ बोध कराता है ! मतलब अगर टिलैपिया ने किसी niche को कब्जिया लिया है तो सीधा यह मतलब है कि उस niche में पहले से वास करने वाली मछली के दुर्दिन आ गये ! वह कालांतर में विलुप्त भी हो सकती है !
अभी टिलैपिया का आतंक बदस्तूर जारी है तभी एक और चोरी छिपे मछली प्रजाति भारत में बरास्ते बंगाल स्मगल हो आ गयी है और अभी जब मैंने इसे एक तालाब में अचानक देखा तो होश हवाश गुम -अरे यह तो पिरान्हा लग रही है जो अमेरिकन मूल की मछली है -अब बिचारा मछली पालक परेशान -"नहीं साहब यह रूप चंदा है -इसका जीरा (शिशु मीन ) मुझे एक एक रूपये में मिला है ! मैंने दो हजार खरीदे हैं -बंगालियों का कहना है कि यह बहुत जल्दी बढेगी ..." अब उसे कौन बताये कि यह मछली अमेरिका की कुख्यात पिरान्हा है जिसके बारे कहा जाता है और कुछ हद तक सच भी है कि यदि पिरान्हा से भरे टैंक में किसी बड़े जानवर को भी डाल दिया जाय तो बमुश्किल १५ मिनट में उसके शरीर पर मांस का एक रेशा भी नहीं बचेगा !केवल कंकाल ही रहेगा ! अब ऐसी मछली यदि खुली कुदरती जल धाराओं में आ गयी तो क्या कहर गुजरेगा यह सहज ही कल्पनीय है !
सुन्दर सलोनी मछली मगर खतरनाक कितनी ?
उत्तर प्रदेश से पिरान्हा परिवार की इस मछली की यह पहली रिपोर्ट मेरी जानकारी में है -जो प्रजाति -पहचान मैंने की है वह है -
Pygocentrus nattereri और जो चित्र मैंने लिया है वह भी देखिये -इसकी सुन्दरता पर मत जाईये -यह बहुत खतरनाक है !
अभी इन मछलियों को कानूनन बैन नहीं किया गया है ! जबकि इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक कमेटी भी है जो बाहरी जनन द्रव्यों -जर्म प्लाज्म के आंतरिक निवेशन की समीक्षा और रोक के लिए ही है ! हमें तो फील्ड में वही करना है जो निर्देश मिलेगा! बस इसकी रिपोर्ट ऊपर भेज देते हैं !
मैंने पिछले दिनों मैदानी कार्यों पर ज्यादा ध्यान लगाया और तभी यह कौंधा कि अपने काम के सिलसिलें से जुडी कुछ "वैज्ञानिक ,रचनात्मक .कलात्मक " बातों को अपनी सरकारी सेवक आचरण नियमावली के प्रावधानों के बिना उल्लंघन के आपके साथ साझा कर सकता हूँ ! तो क्यों नहीं इस छूट का लाभ उठाऊँ !
मैंने पिछले दिनों एक अफ्रीकी मूल की मछली टिलैपिया की चर्चा की थी जिसे चोरी छिपे घुसपैठियों ने भारत में ला दिया और आज इसने गंगा और सहायक नदियों में बाकी मछलियों को बाहर का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया है ! इन जीवों की स्थिति भी म्यान में बस एक तलवार की होती है ,बस यहाँ म्यान को वैज्ञानिक लोग niche -नीशे बोलते हैं -मतलब यह शब्द किसी भी जीव के एड्रेस और आक्यूपेशन -पते और काम दोनों का एक साथ बोध कराता है ! मतलब अगर टिलैपिया ने किसी niche को कब्जिया लिया है तो सीधा यह मतलब है कि उस niche में पहले से वास करने वाली मछली के दुर्दिन आ गये ! वह कालांतर में विलुप्त भी हो सकती है !
अभी टिलैपिया का आतंक बदस्तूर जारी है तभी एक और चोरी छिपे मछली प्रजाति भारत में बरास्ते बंगाल स्मगल हो आ गयी है और अभी जब मैंने इसे एक तालाब में अचानक देखा तो होश हवाश गुम -अरे यह तो पिरान्हा लग रही है जो अमेरिकन मूल की मछली है -अब बिचारा मछली पालक परेशान -"नहीं साहब यह रूप चंदा है -इसका जीरा (शिशु मीन ) मुझे एक एक रूपये में मिला है ! मैंने दो हजार खरीदे हैं -बंगालियों का कहना है कि यह बहुत जल्दी बढेगी ..." अब उसे कौन बताये कि यह मछली अमेरिका की कुख्यात पिरान्हा है जिसके बारे कहा जाता है और कुछ हद तक सच भी है कि यदि पिरान्हा से भरे टैंक में किसी बड़े जानवर को भी डाल दिया जाय तो बमुश्किल १५ मिनट में उसके शरीर पर मांस का एक रेशा भी नहीं बचेगा !केवल कंकाल ही रहेगा ! अब ऐसी मछली यदि खुली कुदरती जल धाराओं में आ गयी तो क्या कहर गुजरेगा यह सहज ही कल्पनीय है !
सुन्दर सलोनी मछली मगर खतरनाक कितनी ?
उत्तर प्रदेश से पिरान्हा परिवार की इस मछली की यह पहली रिपोर्ट मेरी जानकारी में है -जो प्रजाति -पहचान मैंने की है वह है -
Pygocentrus nattereri और जो चित्र मैंने लिया है वह भी देखिये -इसकी सुन्दरता पर मत जाईये -यह बहुत खतरनाक है !
अभी इन मछलियों को कानूनन बैन नहीं किया गया है ! जबकि इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक कमेटी भी है जो बाहरी जनन द्रव्यों -जर्म प्लाज्म के आंतरिक निवेशन की समीक्षा और रोक के लिए ही है ! हमें तो फील्ड में वही करना है जो निर्देश मिलेगा! बस इसकी रिपोर्ट ऊपर भेज देते हैं !
Monday, 7 September 2009
......और गायब हो गए शनि के सभी छल्ले !

इन दिनों जबकि हिन्दी ब्लॉग जगत कन्या राशि ( जो सौभाग्य या दुर्भाग्य से मेरी भी है ) पर आगामी ९ सितम्बर से शनि की साढे साती के आरूढ़ हो जाने का विवेचन कर रहा है शनि देव से ही जुडी एक विलक्षण खगोली घटना अभी पिछले ४ सितम्बर को घटित हुयी है -और देखा गया की शनि के सभी वलय /छल्ले ही गायब हो चुके हैं !
नहीं नहीं घबराने की कोई बात नही है -प्रत्येक १५ -१६ साल पर सूर्य के चक्कर लगाने के चक्कर में शनि महराज धरती से कुछ ऐसे कोण में आ जाते हैं की उनके छल्ले ही नही दीखते ! ४ सितम्बर को यही हुआ और तभी से शनि के छल्ले ही नही दिख रहे हैं जो अगले माह से ही दिखना आरम्भ करेगें !
आप इस साईट पर जाकर रोंगटे खडी कर देने वाली और भी विस्तृत जानकारी और वीडियो देख सकते हैं !
राहत है कि मेरी राशि वालों पर शनि आरूढ़ होगें तो छल्ले अदृश्य होगें ,इसे हम शुभ मान रहे हैं ! यानि हम शनि के घेरों से मुक्त हो घनचक्कर नही बनेगें -हा हा हा !
Sunday, 6 September 2009
यह इश्क कमीना -क्या सचमुच ?
प्रेम पर इधर कुछ गंभीर चिंतन मनन शुरू हुआ है जिसे आप यहाँ ,यहाँ और यहाँ देख सकते हैं ! मंशा है कि इसी को थोड़ा और विस्तार दिया जाय ! हो सकता है कुछ लोग रूचि लें ! कबीर तो कह गए कि ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय -मगर यह 'ढाई आखर' है क्या और कोई इसे चाहे तो कैसे आजमा पाये जबकि अगरचे जुमला यह भी है कि प्यार किया नही जाता बल्कि हो जाता है !प्रेम का हो जाना तो एक बात है अन्यथा प्रेम करने का आह्वान एक अशिष्ट आग्रह की ओर संकेत भी करता है !
पहले तो हम यह बात साफ़ कर देना चाहते हैं कि प्रेम एक छतनुमा / छतरी -शब्द है इसके अधीन कई कई भाव पनाह पाते हैं ! प्रेम का भाव बहुत व्यापक है -भक्त -ईश्वर का प्रेम ,पिता- पुत्री /पुत्र ,माँ -बेटे /बेटी ,पति -पत्नी /प्रेयसी ,प्रेमी -प्रेमिका आदि आदि और इन सभी के प्रतिलोम (रेसीप्रोकल ) सम्बन्ध और यहाँ तक कि आत्मरति भी हमें प्रेमाकर्षण के विविध आयामों का नजारा कराते हैं !
हम यहाँ प्रेम के बहु चर्चित ,गुह्यित रूप को ही ले रहे हैं जो दो विपरीत लिंगियों के बीच ही आ धमकता है और कई तरह का गुल खिलाता जाता है और अंततः रति सम्बन्धों की राह प्रशस्त कर देता है ! आईये यही से आज की चर्चा शुरू करते हैं ! जब आप किसी के प्रति आकृष्ट होते हैं तो उसके प्रति एक भावातीत कोमलता अनुभूत होती है -एक उदात्त सी प्रशांति और पुरस्कृत होने की अनुभूति सारे वजूद पर तारी हो जाती है और यह अनुभूति देश काल और ज्यादातर परिस्थितियों के परे होती है -मतलब पूरे मानव योनि में इकतार -कहीं कोई भेद भाव नहीं -न गोरे काले का और न अमीर गरीब का !
इस अनुभूति के चलते आप कई सीमा रेखाएं भी तोड़ने को उद्यत हो जाते हैं -बस प्रिय जन की एक झलक पाने को बेताब आप, बस चले तो धरती के एक सिरे से दूसरे तक का चक्कर भी लगा सकते हैं -आसमान से तारे तोड़ लेने की बात यूं ही नहीं कही जाती ! कैसी और क्यूं है यह कशिश ?रुटगर्स विश्विद्यालय के न्रिशाश्त्री हेलन फिशर कहते हैं - लोग प्रेम के लिए जीते हैं मरते हैं मारते हैं ..यां जीने की इच्छा से भी अधिक प्रगाढ़ इच्छा प्रेम करने की हो सकती है !
सच है प्यार की वैज्ञानिक समझ अभी भी सीमित ही है मगर कुछ वैज्ञनिक अध्ययन हुए हैं जो हमें इस विषय पर एक दृष्टि देते हैं जैसे मनुष्य के 'जोड़ा बनाने ' की प्रवृत्ति ! प्रेम को कई तरीकों से प्रेक्षित और परीक्षित किया जा रहा है -चाक्षुष ,श्रव्य ,घ्राण ,स्पार्शिक और तांत्रिक -रासायनिक विश्लेषणों में विज्ञानी दिन रात जुटे हैं प्रेम की इसी गुत्थी को सुलझाने ! क्या महज प्रजनन ही प्रेम के मूल में है ?
आभासी दुनिया की बात छोडे तो फेरोमोन भी कमाल का रसायन लगता है जो एक सुगंध है जो अवचेतन में ही विपरीत लिंगी को पास आकर्षित कर लेता है -पर सवाल यह की किसी ख़ास -खास में ही फेरोमोन असर क्यों करता है ? समूह को क्यों नहीं आकर्षित कर लेता ! मगर एक हालिया अध्ययन चौकाने वाला है -मंचीय प्रदर्शन करने वाली निर्वसनाएं (स्ट्रिपर्स ) जब अंडोत्सर्जन (ओव्यूल्युशन ) कर रही होती हैं तो प्रति घंटे औसतन ७० डालर कमाती हैं , माहवारी की स्थिति में महज ३५ डालर और जो इन दोनों स्थितियों में नहीं होती हैं औसतन ५० डालर कमाती है -निष्कर्ष यह की ओव्यूल्यूशन के दौर में फेरोमोन का स्रावित होना उच्चता की दशा में होता है और वह पुरुषों की मति फेर देता है -फेरोमोन एक प्रेम रसायन है यह बात पुष्टि की जा चुकी है !
एक और अध्ययन के मुताबिक जब औरते ओव्यूलेट कर रही होती हैं तो उनके सहचर उनके प्रति ज्यादा आकृष्ट रहते हैं और पास फटकते पुरुषों से अधिक सावधान ! वैज्ञानिकों की माने तो प्रेम सुगंध केवल यह भान ही नहीं कराता की कौन सी नारी गर्भ धारण को बिलकुल तैयार है बल्कि यह इतना स्पेसिफिक भी होता है की एक सफल (जैवीय दृष्टि से -गर्भाधान की योग्यता और शिशु लालन पालन के उत्तरदायित्व की क्षमता ) जोड़े को ही करीब लाता है !
वैज्ञानिकों ने एक मेजर हिस्टो काम्पैबिलटी फैक्टर (एम् एच सी ) की खोज की है जो दरअसल एक जीन समूह है जो अगर नर नारी में सामान हो जाय तो गर्भ पतन की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं -ऐसे जोड़े प्रेम सुगंधों से आकर्षित नहीं होते ! इस शोध की पुष्टि कई बार हो चुकी है -एक सरल से प्रयोग में पाया गया की कुछ वालंटियर महिलाओं को अज्ञात लोगों की बनियाने सूघने को दी गयीं और बार बार उन्हें वही बनियाने सूघने में पसंद आयीं जिनके स्वामी विपरीत एम् एच सी फैक्टर वाले थे !
अभी प्रेम सुगंध का स्रवन जारी है .....
पहले तो हम यह बात साफ़ कर देना चाहते हैं कि प्रेम एक छतनुमा / छतरी -शब्द है इसके अधीन कई कई भाव पनाह पाते हैं ! प्रेम का भाव बहुत व्यापक है -भक्त -ईश्वर का प्रेम ,पिता- पुत्री /पुत्र ,माँ -बेटे /बेटी ,पति -पत्नी /प्रेयसी ,प्रेमी -प्रेमिका आदि आदि और इन सभी के प्रतिलोम (रेसीप्रोकल ) सम्बन्ध और यहाँ तक कि आत्मरति भी हमें प्रेमाकर्षण के विविध आयामों का नजारा कराते हैं !
हम यहाँ प्रेम के बहु चर्चित ,गुह्यित रूप को ही ले रहे हैं जो दो विपरीत लिंगियों के बीच ही आ धमकता है और कई तरह का गुल खिलाता जाता है और अंततः रति सम्बन्धों की राह प्रशस्त कर देता है ! आईये यही से आज की चर्चा शुरू करते हैं ! जब आप किसी के प्रति आकृष्ट होते हैं तो उसके प्रति एक भावातीत कोमलता अनुभूत होती है -एक उदात्त सी प्रशांति और पुरस्कृत होने की अनुभूति सारे वजूद पर तारी हो जाती है और यह अनुभूति देश काल और ज्यादातर परिस्थितियों के परे होती है -मतलब पूरे मानव योनि में इकतार -कहीं कोई भेद भाव नहीं -न गोरे काले का और न अमीर गरीब का !
इस अनुभूति के चलते आप कई सीमा रेखाएं भी तोड़ने को उद्यत हो जाते हैं -बस प्रिय जन की एक झलक पाने को बेताब आप, बस चले तो धरती के एक सिरे से दूसरे तक का चक्कर भी लगा सकते हैं -आसमान से तारे तोड़ लेने की बात यूं ही नहीं कही जाती ! कैसी और क्यूं है यह कशिश ?रुटगर्स विश्विद्यालय के न्रिशाश्त्री हेलन फिशर कहते हैं - लोग प्रेम के लिए जीते हैं मरते हैं मारते हैं ..यां जीने की इच्छा से भी अधिक प्रगाढ़ इच्छा प्रेम करने की हो सकती है !
सच है प्यार की वैज्ञानिक समझ अभी भी सीमित ही है मगर कुछ वैज्ञनिक अध्ययन हुए हैं जो हमें इस विषय पर एक दृष्टि देते हैं जैसे मनुष्य के 'जोड़ा बनाने ' की प्रवृत्ति ! प्रेम को कई तरीकों से प्रेक्षित और परीक्षित किया जा रहा है -चाक्षुष ,श्रव्य ,घ्राण ,स्पार्शिक और तांत्रिक -रासायनिक विश्लेषणों में विज्ञानी दिन रात जुटे हैं प्रेम की इसी गुत्थी को सुलझाने ! क्या महज प्रजनन ही प्रेम के मूल में है ?
आभासी दुनिया की बात छोडे तो फेरोमोन भी कमाल का रसायन लगता है जो एक सुगंध है जो अवचेतन में ही विपरीत लिंगी को पास आकर्षित कर लेता है -पर सवाल यह की किसी ख़ास -खास में ही फेरोमोन असर क्यों करता है ? समूह को क्यों नहीं आकर्षित कर लेता ! मगर एक हालिया अध्ययन चौकाने वाला है -मंचीय प्रदर्शन करने वाली निर्वसनाएं (स्ट्रिपर्स ) जब अंडोत्सर्जन (ओव्यूल्युशन ) कर रही होती हैं तो प्रति घंटे औसतन ७० डालर कमाती हैं , माहवारी की स्थिति में महज ३५ डालर और जो इन दोनों स्थितियों में नहीं होती हैं औसतन ५० डालर कमाती है -निष्कर्ष यह की ओव्यूल्यूशन के दौर में फेरोमोन का स्रावित होना उच्चता की दशा में होता है और वह पुरुषों की मति फेर देता है -फेरोमोन एक प्रेम रसायन है यह बात पुष्टि की जा चुकी है !
एक और अध्ययन के मुताबिक जब औरते ओव्यूलेट कर रही होती हैं तो उनके सहचर उनके प्रति ज्यादा आकृष्ट रहते हैं और पास फटकते पुरुषों से अधिक सावधान ! वैज्ञानिकों की माने तो प्रेम सुगंध केवल यह भान ही नहीं कराता की कौन सी नारी गर्भ धारण को बिलकुल तैयार है बल्कि यह इतना स्पेसिफिक भी होता है की एक सफल (जैवीय दृष्टि से -गर्भाधान की योग्यता और शिशु लालन पालन के उत्तरदायित्व की क्षमता ) जोड़े को ही करीब लाता है !
वैज्ञानिकों ने एक मेजर हिस्टो काम्पैबिलटी फैक्टर (एम् एच सी ) की खोज की है जो दरअसल एक जीन समूह है जो अगर नर नारी में सामान हो जाय तो गर्भ पतन की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं -ऐसे जोड़े प्रेम सुगंधों से आकर्षित नहीं होते ! इस शोध की पुष्टि कई बार हो चुकी है -एक सरल से प्रयोग में पाया गया की कुछ वालंटियर महिलाओं को अज्ञात लोगों की बनियाने सूघने को दी गयीं और बार बार उन्हें वही बनियाने सूघने में पसंद आयीं जिनके स्वामी विपरीत एम् एच सी फैक्टर वाले थे !
अभी प्रेम सुगंध का स्रवन जारी है .....
Monday, 31 August 2009
लो जी, एक और सुअरा !
अभी एक सुअरा (स्वायिन फ्लू ) के प्रकोप से मानवता कराह ही रही है कि एक नए सुअरा का पता लगने से वैज्ञानिक समुदाय चिंतित हो उठा है .गनीमत यही है कि यह नया सुअरा स्वायिन फ्लू के विपरीत मनुष्य के लिए अभी तक तो निरापद पाया गया है .मगर बकरे की माँ जो इस मामले में एबोला वाईरस हैं आख़िर कब तक खैर मनायेगी ?
वैज्ञानिकों ने एबोला वाईरस के इस स्ट्रेन- reston ebola virus की पहचान फिलीपीन के घरेलू सूअरों में की है ! वैसे यह सतरें तो अभी तक निरापद पाया गया है मगर है यह उसी घातक एबोला समूह का ही सदस्य जिनसे अनियंत्रित रक्तस्राव के साथ तेज बुखार हो जाता है !
खतरनाक एबोला विषाणु मनुष्य में छुआछूत से फैलने वाली बीमारियों में कुख्यात हैं और इनसे मरने की दर ८० फीसदी तक जा पहुँचती है ! अभी खोजा गया तो यह सुअरा सौभाग्य से एबोला परिवार का एकलौता निरापद सदस्य है -मगर विषाणु म्यूटेशन करते रहते हैं यह कौन नही जानता ? पहले पहल यह निरापद एबोला वाईरस १९८९ में बंदरों में पाया गया था -आख़िर ये वाईरस पहले पहल बंदरो (ऐड्स की याद है ? ) में ही क्यों मिलते है ? कौन बातएगा ? और फिर सुअरा बन मानवता को ग्रसित करते हैं ! कुदरत का यह क्या खेल है ??
इस निरापद सुअरा की खोज का श्रेय मैकिन्टोश नामक वैज्ञानिक को है और पूरी रिपोर्ट मशहूर साईंस पत्रिका के १० जुलाई के अंक में प्रकाशित है .
आभारोक्ति : स्वायिन फ्लू के लिए सुअरा शब्द की सूझ भाई गिरिजेश राव की है !
वैज्ञानिकों ने एबोला वाईरस के इस स्ट्रेन- reston ebola virus की पहचान फिलीपीन के घरेलू सूअरों में की है ! वैसे यह सतरें तो अभी तक निरापद पाया गया है मगर है यह उसी घातक एबोला समूह का ही सदस्य जिनसे अनियंत्रित रक्तस्राव के साथ तेज बुखार हो जाता है !
खतरनाक एबोला विषाणु मनुष्य में छुआछूत से फैलने वाली बीमारियों में कुख्यात हैं और इनसे मरने की दर ८० फीसदी तक जा पहुँचती है ! अभी खोजा गया तो यह सुअरा सौभाग्य से एबोला परिवार का एकलौता निरापद सदस्य है -मगर विषाणु म्यूटेशन करते रहते हैं यह कौन नही जानता ? पहले पहल यह निरापद एबोला वाईरस १९८९ में बंदरों में पाया गया था -आख़िर ये वाईरस पहले पहल बंदरो (ऐड्स की याद है ? ) में ही क्यों मिलते है ? कौन बातएगा ? और फिर सुअरा बन मानवता को ग्रसित करते हैं ! कुदरत का यह क्या खेल है ??
इस निरापद सुअरा की खोज का श्रेय मैकिन्टोश नामक वैज्ञानिक को है और पूरी रिपोर्ट मशहूर साईंस पत्रिका के १० जुलाई के अंक में प्रकाशित है .
आभारोक्ति : स्वायिन फ्लू के लिए सुअरा शब्द की सूझ भाई गिरिजेश राव की है !
Sunday, 30 August 2009
मानव प्रजाति में प्रणय याचन और यौन संसर्ग : क्या कहते हैं व्यवहारविद ?
चित्र साभार : Lori Finneganइन्ही ब्लॉग पन्नो पर हमने पशु पक्षियों के प्रणय याचन प्रदर्शनों को निरखा परखा और अब बारी है मनुष्य प्रजाति में प्रणय व्यवहार के अवलोकन की -मनुष्य प्रजाति यानि होमो सैपिएंस सैपिएंस जो एक 'सामाजिक प्राणी ' है ! जैवविद प्रायः प्रजाति को पारिभाषित करने में यह भी कहते हैं की जो प्राणी आपस में निर्बाध प्रजनन कर संतति जनन कर लेते हैं वे एक प्रजाति के होते हैं ! यह परिभाषा भी मनुष्य को एक भरी पूरी प्रजाति होने का गौरव देती है ! मतलब धरती पर का कहीं का गोरा या काला ,नाटा -मोटा कद काठी का इन्सान इस परिभाषा को पूर्णतः साक्षात ,चरितार्थ कर सकता है !
तो आईये अनावश्यक विस्तार को तूल न देकर हम सीधे मुद्दे की बात करें -मनुष्य के प्रणय प्रदर्शनों पर मेरे संग्रह में जो बेहतरीन कृति है वह डेज्मांड मोरिस की " इंटीमेट बिहैवियर " है ! आईये इस मसले पर इसी पुस्तक के हवाले से कुछ गौर फरमाएं !
मनुष्य का प्रणय काल दीगर पशुओं की तुलना में काफी अधिक -एक वर्ष तक लंबा खिचता देखा जाता है ! मगर सहज तौर पर यह औसतन एक वर्ष का आका गया है ! मनुष्य की पारस्थितिकीय जटिलताओं के चलते इस समय में प्रायः कमी बेसी भी देखी जाती है ! (मतलब प्यार में धैर्य का साथ न छोडें या धैर्य आपका साथ न छोडे तभी गनीमत है ! ) ! इसी एक वर्ष की अवधि में प्रथम दृष्टि के कथित अनुभव के साथ ही यौनिक संसर्ग तक प्रणय याचन (कोर्टशिप ) के कई चरण /स्टेप्स घटित होते हैं ! ऐसा लगता है कि व्यवहार शास्त्री ( इथोलोजिस्ट ) रूहानी प्रेम (प्लैटानिक लव ) को अपने अध्ययन क्षेत्र के बाहर का विषय मानते हैं -वे प्यार की दीवानगी में देह की भूमिका ही सर्वोपरि मानते हैं !
घनिष्ठ सम्बन्ध की व्याख्या करते हुए डेज्मांड मोरिस कहते हैं कि बिना शरीर के किसी भाग के हिस्से के संस्पर्श हुए किसी के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध नही हो सकता ! मतलब बात बात में घनिष्ठ सबंध का दावा करने वालों में यह देखा जाना चाहिए कि उनके अंग उपांग कभी संस्पर्श के दौर से गुजरे भी है या नहीं ! अब हैण्डशेक तक न हुआ हो और दावे किए जायं कि अमुक से हमारा घणा /घनिष्ठ संबंध है तो एक इथोलोजिस्ट को इस पर आपत्ति हो सकती है ! गरज यह कि घनिष्ठ सम्बन्ध संस्पर्शों की बिना पर ही परवान चढ़ते हैं ! तो जाहिर है मनुष्य के प्रणय याचन से यौन संसर्ग तक की कथा दरअसल कड़ी दर कड़ी घनिष्ठ से घनिष्ठतम संस्पर्शों का ही फलीभूत होना है ! मोरिस ने इस पूरी प्रक्रिया को कई चरणों /स्टेप्स में यूँ बयान किया है ! (मूल कृति से साभार ) ( इस अंतर्जाल संस्करण को पढने की सिफारिश है )
1. eye to body.
2. eye to eye.
3. voice to voice.
4. hand to hand.
5. arm to shoulder.
6. arm to waist.
7. mouth to mouth.
8. hand to head.
9. hand to body.
10. mouth to breast.
11. hand to genitals.
12. genitals to genitals.
मतलब आंख से शरीर ,आँख से आँख ,आवाज से आवाज ,हाथ से हाथ ,हाथ से कंधे ,
हाथ से कमर ,मुंह से मुंह ( चुम्बन ) ,हाथ से सिर ,हाथ से शरीर का कोई भी हिस्सा -यौनांग छोड़कर ,
मुंह से वक्ष ,हाथ से यौनांग ,यौनांग से यौनांग ! (इति रति-लीलाः)
मगर यहाँ एक काशन है !प्यार के एक पावदान से ऊपर के पावदान पर पैर रखना इतना सहज नही है !
यह पुरूष के प्रणय साथी के निरंतर प्रतिरोध ,हतोत्साहन ,और अनिच्छा को झेलते जाने का एक जज्बा है -यह प्रकृति के फूल प्रूफ़ सुरक्षात्मक उपायों की एक व्यवस्था है ताकि किसी नाकाबिल /अक्षमं को प्रजननं का मौका न मिल जाय जिसमे नारी को जहमत ही जहमत उठानी पड़ती है -गर्भ धारण से शिशु के लालन पालन तक ! तो एक स्टेप से आगे के स्टेप पर जाते हुए कड़ी जैवीय छान बीन भी अपरोक्ष रूप से चलती रहती है -इसमें किसी भी स्तर पर भी क्वालीफाई न कर पाने पर प्यार के मैदान से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है -भले ही आप उसके बाद बेमिसाल उर्दू पोएट्री लिखते पाये जाएँ ! हाँ आश्चर्य है कि इतनी चाक चौबंद व्यवस्था के बाद भी कुछ चक्मेबाज अपनी घुसपैठ बना ही लेते हैं और नारी अभिशप्त होती है ! ऐसा क्यों होता है -विमर्श जारी है !
ऊपर के चरणों के अपवाद वेश्यावृत्ति और सामाजिक अनुष्ठानों -परिणय जो निश्चय ही प्रणय नही है में मिलते है जिनमे बताये गए स्टेप्स गडमड हो जाते हैं -इन पर चर्चा फिर कभी !
तो आईये अनावश्यक विस्तार को तूल न देकर हम सीधे मुद्दे की बात करें -मनुष्य के प्रणय प्रदर्शनों पर मेरे संग्रह में जो बेहतरीन कृति है वह डेज्मांड मोरिस की " इंटीमेट बिहैवियर " है ! आईये इस मसले पर इसी पुस्तक के हवाले से कुछ गौर फरमाएं !
मनुष्य का प्रणय काल दीगर पशुओं की तुलना में काफी अधिक -एक वर्ष तक लंबा खिचता देखा जाता है ! मगर सहज तौर पर यह औसतन एक वर्ष का आका गया है ! मनुष्य की पारस्थितिकीय जटिलताओं के चलते इस समय में प्रायः कमी बेसी भी देखी जाती है ! (मतलब प्यार में धैर्य का साथ न छोडें या धैर्य आपका साथ न छोडे तभी गनीमत है ! ) ! इसी एक वर्ष की अवधि में प्रथम दृष्टि के कथित अनुभव के साथ ही यौनिक संसर्ग तक प्रणय याचन (कोर्टशिप ) के कई चरण /स्टेप्स घटित होते हैं ! ऐसा लगता है कि व्यवहार शास्त्री ( इथोलोजिस्ट ) रूहानी प्रेम (प्लैटानिक लव ) को अपने अध्ययन क्षेत्र के बाहर का विषय मानते हैं -वे प्यार की दीवानगी में देह की भूमिका ही सर्वोपरि मानते हैं !
घनिष्ठ सम्बन्ध की व्याख्या करते हुए डेज्मांड मोरिस कहते हैं कि बिना शरीर के किसी भाग के हिस्से के संस्पर्श हुए किसी के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध नही हो सकता ! मतलब बात बात में घनिष्ठ सबंध का दावा करने वालों में यह देखा जाना चाहिए कि उनके अंग उपांग कभी संस्पर्श के दौर से गुजरे भी है या नहीं ! अब हैण्डशेक तक न हुआ हो और दावे किए जायं कि अमुक से हमारा घणा /घनिष्ठ संबंध है तो एक इथोलोजिस्ट को इस पर आपत्ति हो सकती है ! गरज यह कि घनिष्ठ सम्बन्ध संस्पर्शों की बिना पर ही परवान चढ़ते हैं ! तो जाहिर है मनुष्य के प्रणय याचन से यौन संसर्ग तक की कथा दरअसल कड़ी दर कड़ी घनिष्ठ से घनिष्ठतम संस्पर्शों का ही फलीभूत होना है ! मोरिस ने इस पूरी प्रक्रिया को कई चरणों /स्टेप्स में यूँ बयान किया है ! (मूल कृति से साभार ) ( इस अंतर्जाल संस्करण को पढने की सिफारिश है )
1. eye to body.
2. eye to eye.
3. voice to voice.
4. hand to hand.
5. arm to shoulder.
6. arm to waist.
7. mouth to mouth.
8. hand to head.
9. hand to body.
10. mouth to breast.
11. hand to genitals.
12. genitals to genitals.
मतलब आंख से शरीर ,आँख से आँख ,आवाज से आवाज ,हाथ से हाथ ,हाथ से कंधे ,
हाथ से कमर ,मुंह से मुंह ( चुम्बन ) ,हाथ से सिर ,हाथ से शरीर का कोई भी हिस्सा -यौनांग छोड़कर ,
मुंह से वक्ष ,हाथ से यौनांग ,यौनांग से यौनांग ! (इति रति-लीलाः)
मगर यहाँ एक काशन है !प्यार के एक पावदान से ऊपर के पावदान पर पैर रखना इतना सहज नही है !
यह पुरूष के प्रणय साथी के निरंतर प्रतिरोध ,हतोत्साहन ,और अनिच्छा को झेलते जाने का एक जज्बा है -यह प्रकृति के फूल प्रूफ़ सुरक्षात्मक उपायों की एक व्यवस्था है ताकि किसी नाकाबिल /अक्षमं को प्रजननं का मौका न मिल जाय जिसमे नारी को जहमत ही जहमत उठानी पड़ती है -गर्भ धारण से शिशु के लालन पालन तक ! तो एक स्टेप से आगे के स्टेप पर जाते हुए कड़ी जैवीय छान बीन भी अपरोक्ष रूप से चलती रहती है -इसमें किसी भी स्तर पर भी क्वालीफाई न कर पाने पर प्यार के मैदान से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है -भले ही आप उसके बाद बेमिसाल उर्दू पोएट्री लिखते पाये जाएँ ! हाँ आश्चर्य है कि इतनी चाक चौबंद व्यवस्था के बाद भी कुछ चक्मेबाज अपनी घुसपैठ बना ही लेते हैं और नारी अभिशप्त होती है ! ऐसा क्यों होता है -विमर्श जारी है !
ऊपर के चरणों के अपवाद वेश्यावृत्ति और सामाजिक अनुष्ठानों -परिणय जो निश्चय ही प्रणय नही है में मिलते है जिनमे बताये गए स्टेप्स गडमड हो जाते हैं -इन पर चर्चा फिर कभी !
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