Saturday, 15 August 2009

टिलैपिया का आतंक ...

ढेरों मृत टिलैपिया
अफ्रीकी मूल की टिलैपिया मछली दुनिया भर में इसलिए कुख्यात है कि यह किसी भी जलतंत्र में घुसपैठ कर ऐसा कब्जा जमाती है कि दूसरी प्रजाति की मछलियों की छुट्टी ही नही कर देती है बल्कि उन्हें पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर देती है -इसलिए यह घुसपैठिया जलीय प्रजातियों-एक्वेटिक इन्वैजिव स्पीशीज (IAS) में अव्वल नंबर पर है -इसने पिछले कुछ सालों से गंगा और सहयोगी जल प्रणालियों में भी प्रवेश पा लिया है और दिन दूनी और रात चौगुनी दर से बढ़ रही है बिल्कुल सुरसा की तरह ! यह जबरदस्त प्रजननं कारी है ,साल भर बच्चे देती रहती है ! गंगा में इसके प्रवेश से यहाँ की देशज मछलियों पर अभूतपूर्व संकट आ गया है !

कल छुट्टी के बावजूद भी मुझे डी एम का आदेश मिला कि मैं तत्काल लक्सा के के निकट लक्ष्मीकुण्ड पर पहुंचू और वहां मर रही मछलियों की समस्या दूर करुँ -मैं आश्चर्यचकित रह गया कि कुंड टिलैपिया मछलियों से भरा पडा है जबकि उसका सम्बन्ध गंगा से नही है और नही उससे कोई नाला नाली ही जुडी है जिससे कहीं और से यह मछली आ सके -पूंछताछ पर पता लगा कि प्रत्येक मंगल और शनि को यहाँ राहु से पीड़ित वैष्णव जन आ आ कर मछलियाँ डाल जाते हैं -किसी भक्तजन ने टिलैपिया भी लाकर डाल दी होगी और अपनी आदत के मुताबिक इसने बच्चे बच्चे दे देकर तालाब को भर दिया !

जब भी बदली कई दिनों से छाई रहती है और सूरज महाराज के दर्शन नही होते तो तालाबों में घुलित आक्सीजन कम पड़ जाती है -जलीय शैवाल ,प्लवक और वनस्पतियाँ प्रकाश संश्लेषण नही कर पाते -आक्सीजन की कमी पड़ती जाती है जबकि उनका श्वसन चालू रहता है और निकट परिवेश की आक्सीजन भी वे लेते रहते हैं -एक ऐसी स्थिति आ पहुँचती है कि पानी में आक्सीजन की मात्रा बहुत कम (१ -२ पी पी एम ) मात्र ही रह जाती है -तब मछलियाँ पानी की सतह पर आकर बेचैन होकर मुंह खोल खोल कर मुंह में हवा लेती देखाई पड़ती हैं ! और सदमें से मरने लगती है .यही घटना लक्ष्मी कुंड पर अल्लसुबह घटी -सैकडों मछलिया मर के उतरा गयीं ! चिल्ल पो मच गयी ! हम लोग इस स्थिति के आदी हो चुके हैं -वहाँ पहुँच कर लाल दवा आदि छिड़क कर पानी को हिला डुला कर ,टैकरों से पानी मंगा मंगा कर उसमे डाल कर उनका मरना नियंत्रित किया गया !



यह है सबसे घुसपैठिया टिलैपिया प्रजाति -ओरिओक्रोमस मोजाम्बिकस




यह तो समस्या का तात्कालिक हल हुआ है -वहां से टिलैपिया का निकलना ही स्थाई हल है -मगर स्थानीय भक्तजनों की भावनाएं इन मछलियों से जुडी हुयी हैं -वे उन्हें निकालने के लिए राजी नही हैं ! देखिये यह समस्या अपना हल कैसे ढूंढती है ?

कुछ छूटा है तो वह यहाँ पर है !

Tuesday, 11 August 2009

अन्तरिक्ष में आतिशबाजी !

पर्सिज तारामंडल को लोकेट करें -चित्र पर क्लिक्क करें
जी हाँ ,गूगल बाबा की पैनी निगाहें आगाह कर रही हैं कि अन्तरिक्ष में आज रात एक अद्भुत नजारा दिखेगा जिसे आधीरात के बाद उत्तरी पूर्वी क्षितिज में देखा जा सकेगा ! यह अद्भुत दृश्यावली पर्सिज उल्का वृष्टि (Perseid meteor shower) कहलाती है -आसमान में लुक्क -लुक्कारे छूटते हैं .आम आदमी को लगता है देवता लोग आतिशबाजी का लुत्फ़ उठा रहे हों ! वैसे भी बरसात का जिम्मा इन्द्रदेव ने इस बार संभाला ही नही है उन्हें फुरसत ही फुरसत है आतिशबाजी खेलने की ! मगर इस आकाशीय आतिशबाजी का कारण तो कुछ और ही है -होता यह है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते हुए प्रत्येक वर्ष उस नियत स्थान पर जा पहुँचती है जो एक धूमकेतु स्विफ्टटटल का परिभ्रमण पथ है और जहाँ उससे उत्सर्जित मलबा /कचरा जमा है ! जब धरती के परिवेश से इस कचरे के धूल धक्कड़ टकराते है तो जल उठते हैं और हमें आसमानी आतिशबाजी का नजारा दिखता है !

अन्तरिक्ष में वह जगह जहाँ हमारी धरती स्विफ्ट टटल के परिभ्रमण पथ से गुजरती है पर्सिज तारामंडल (perseid constellation ) का पृष्ठभूमि लिए हुए दिखती है -इसलिए इस घटना को पर्सिज उल्का वृष्टि भी कहते हैं !यह प्रत्येक वर्ष १०-१२ अगस्त को अपने चरम पर होती है -आज यह नजारा अपने उरूज पर होगा ! आप अगर इन दिनों आसमान के तारों को गिन रहे हो या बादलों की खोज में निगाहें रात में भी आसमान की ओर बार बार उठ जा रही हों तो पक्का दिखेगा यह नजारा आपको -हाँ निगाहें उत्तरी पूर्वी क्षितिज की ओर रखियेगा -पानी की बूंदों की बौछार की बजाय इस बार उल्कों की बौछार /बरसात से ही दिल बहला लीजिये ! एक बार यह अनुभव भी सही!
यह वीडियो भी देख लीजिये !

Sunday, 9 August 2009

स्वायिन फ्लू :समय गवाने का वक्त नही अब !

दुःख है कि इस विश्वव्यापी महामारी को लेकर की गयी आशंकाएं धीरे धीरे हकीकत में बदल रही है -और उन सभी लोगों के लिए जो ऐसी स्थितियों के प्रति एक बेपरवाह दृष्टि लिए रहते हैं अब सजग होने की जरूरत है - इन आकडों से ऐसे लोगों की आँख खुल जानी चहिये -

1. कुल पुष्टि हो चुके मामले-772

२-मृत्यु -4

उम्र सीमा -

* 0-4 y.o. = 5%

* 5-14 y.o. = 33.97%

* 15-34 y.o. = 41.6%

* 35-59 y.o. = 18%

* 60+ y.o. = 1.5%


लिंग

* पुरूष : 49%

* औरत : 51%

ट्रेंड -बढाव पर

साफ़ है कि यह युवको को ज्यादा चपेट में ले रहा है -वे सावधान हो रहें . किसी संदेह के मामले में पूरी सावधानी बरते - मास्क का प्रयोग करें ! कई बार साबुन से मल मल कर हाथ धोएं !इस पृष्ठको देखें .


Thursday, 6 August 2009

इक प्रणय कुटीर बने न्यारा : पशु पक्षियों के प्रणय प्रसंग (10)-(डार्विन द्विशती विशेष)

बना यह प्रणय कुटीर आलीशान
सबसे अनोखा प्रणय मंच कर्मी (स्टेज परफार्मर ) तो आस्ट्रेलियाई बोवर बर्ड है जिसकी १८ प्रजातियाँ हैं और सभी अपने अपने अनूठे तरीके से प्रणय पर्ण कुटीर का निर्माण मादा को रिझाने के लिए करती हैं -टूथ बिल्ड बोवरबर्ड घने जंगल की फर्श के एक नन्हे से टुकड़े को बड़ी परिश्रम से साफ़ करता है और तृन - तिनकों को बीन बीन कर एक आठ फीट का घेरा लिए हुए प्रणय कुटीर तैयार करता है और उसे तरह तरह की रंग बिरंगी चीजों से सजाता है .पत्तियों का उल्टा पीला भाग यह सामने की ओर करके पर्ण कुटीर पर चस्पा करता रहता है -मानो इसके प्रणय बसंत का भी संकेत रंग पीला ही हो ! पत्तियों की सजावट के बाद नाचना गाना शुरू हो जाता है !

बोवर बर्ड की दूसरी प्रजाति है एवेन्यू बिल्डर्स की जो अपने कुटीर में एक प्रेम गली का निर्माण करने में निपुण हैं और वह भी कोई बहुत संकरी नहीं ,अच्छी खासी चौड़ी जिससे उसकी महबूबा खरामा खरामा आराम से भीतर आ सके ! स्पाटेद बोवर बर्ड अपने प्रणय कुटीर को सफ़ेद रंग के साजो सामान से सजाती है -सफ़ेद हड्डी के टुकड़े ,पत्थर के टुकड़े ,छोटे घोंघों के सफ़ेद कवच आदि यह ढूंढ ढूंढ कर लाकर कुटीर के इर्द गिर्द बिखेरती है और मानो अपनी शान्ति प्रियता की मिसाल देना चाहती हो प्रणय संगिनी को ! फान बोवर बर्ड को हरा और गहरा नीला रंग पसंद है -सब प्रजातियों ने मानो कामवश हो इन्द्रधनुष के सभी रंगों को थोड़ा थोड़ा सा चुरा लिया हो ! डेविड अटेंन्ब्रो का यह वीडियो जरूर देखिये !

सबसे भव्य प्रदर्शन तो satin bower bird का है और इसप्रजाति पर व्यवहार विदों ने व्यापक अनुसंधान किया है .गहरे नीले काले रंग और नीली आंखों वाला नर अपने प्रणय कुटीर के एक हिस्से में एक ५ इंच चौड़ी रास गली बनाता है जिसकी दीवारें १२ इंच ऊंची और चार इंच मोटी होती हैं -कुटीर के उत्तरी सिरे पर यह रगीन वस्तुओं का मानो भानुमती का पिटारा ही चुरा लाता हो -तोतों के नीले पर ,नीले फूल ,नीले चेरी के फल ,नीले कांच के टुकड़े ,नीले फीते -रस्सी के टुकड़े ,नीले कपड़े ,नीले बटन और यहाँ तक की शहरी बस्ती के निकट के जंगलों में यह बसों के नीले टिकट ,धोबी घाट से ले उडे नीले रूमाल और थैले सभी कुछ .प्रणय की इस नीलिमा को प्रणाम ! गोपियों को कृष्ण का नीला रंग ही तो कहीं भा नही गया था -नील सरोरुह श्याम !

अब प्रणय के इस नीले रंग /ब्लू फिल्म का एक त्रासद पक्ष भी देखिये कि जब इन पक्षियों को अध्ययन के लिए बने बड़े पिजरों में दूसरी चिडियों के साथ रखा गया तो प्रणय काल में इन्होने दी गयी टहनियों और फुन्गों से कुटीर तो बना लिया मगर नीले रंग के अभाव में नैराश्य जनित क्रोध के चलते इन्होने नीले रंग की चिडियों को ही मार मार कर प्रणय कुटीर के सामने प्रदर्शित कर दिया -प्रेम के नाम पर निरीहों के बलि ! हे राम !

Monday, 3 August 2009

प्रणय घरौदे और अभिसार मंच !-पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (9)-(डार्विन द्विशती विशेष)



तीतरों
और बटेरों की कुछ प्रजातियों में तीतरों की एक प्रजाति सेज ग्राउस में मादा से संसर्ग की इतनी होड़ होती है बस केवल कुछ हर दृष्टि से सक्षम नर ही अपनी मुहीम में कामयाब हो पाते हैं -एक प्रेक्षण में पाया गया कि ४०० नरों में से केवल चार ही स्वयम्बर की इच्छुक ७४ फीसदी मादाओं से घनिष्ठ हो गए -बाकी सब के सब महज २६ प्रतिशत पर कामयाब हो पाये ! मतलब प्रणय शूरमा निकले केवल चार !
प्रणय रत नर मादा सेज ग्राउस

आस्ट्रेलिया की लम्बी पूंछो वाली लायिर बर्ड का नर तीन फिट के लगभग दस गीली मिट्टी के प्रणय घरौदें (love mounds ) बनाता है और अपने प्रणय याचन की विभिन्न भाव भंगिमाओं से मादा को रिझा लेता है !

लायिर बर्ड का प्रणय प्रदर्शन



इसी
तरह बर्ड आफ पैराडाईज घने जंगलों में जहाँ सूरज का प्रकाश तक नही पहुँचता जमीन के छोटे छोटे स्थलों की साफ़ सफाई करके अभिसार /स्वयम्बर मंच बनाते हैं और फिर घने लता गुलमो की कटाई छटाई करके प्रकाश की एक रेख स्वयम्बर मंच तक ला पाने में सफल हो जाते हैं -सूर्य की यह प्रकाश रेखा स्वयम्बर मंच पर मनो स्पाट लाईट का काम करती है ! फिर नर की नाच कूद मादा को रिझाने के लिए शुरू हो जाती है !
यह वीडियो जरूर देख लें !

Thursday, 30 July 2009

कैसे कैसे स्वयम्बर ?-पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (8)-(डार्विन द्विशती विशेष)

अब एरेना डिसप्ले मतलब रंगभूमि प्रदर्शन की कुछ बानगी भी देखिये जो आपके सामने यह भी खुलासा करेगी कि चिडियों की कुछ प्रजातियों में स्वयम्बर की क्या रूप रेखा है -मादाएं नर का चुनाव कैसे करती हैं ?

एक पक्षी है यूरोपियन सैंड पाईपर -भारत में भी प्रवासी है -ruff नर को कहते हैं reeve मादा को ! हिन्दी नाम है गेह वाला या कहीं कहीं बागवाद ! नर की उन्नत कलंगी होती है जो अपने रंगीले परो व कालर से सहज ही पहचाना जा सकता है .ये बसंत ऋतु के आगमन के साथ ही कुछ पारम्परिक रंग भूमियों पर अपना अनंग आसन जमा लेते हैं -नरों में उच्च अनंग आसन यानी पर्वत की चोटी को हथियाने की होड़ और घमासान मचता है. मतलब रंगभूमि का यह हिस्सा सबसे महत्वपूर्ण होता है जहां ज्यादा से ज्यादा नर पहुचने की कवायद करतेहैं- यह नरों की जमावट के कारण फूलों की सेज सा दीखता है -पहाड़ की चोटी , और सेज पिया की,वाह! क्या कहने! सबसे दबंग नर यहाँ कब्जा जमा लेते हैं और ढेर सारे दब्बू नर इर्द गिर्द जमा होते हैं !

मादाएं परिधि के दब्बू नरों की उपेक्षा कर चोटी के गहरे रंगों की कलगी वालों नरों की और आकर्षित होती हैं -उनके आगमन के साथ ही नर प्रणय याचन का जबरदस्त प्रदर्शन करते हैं -मादाएं मनचाहे नर का वरण करती हैं और घनिष्ठ संसर्ग के बाद स्वयंबर सम्पन्न हो जाता है ! प्रणय संसर्ग संपन्न होते ही मादाएं नरों को अलविदा कह देती हैं और अपने वात्सल्य बसेरे की और लौट चलती हैं जहां नीड का निर्माण और अंडे देने ,सेने ,शिशुओं का लालन पालन खुद करती हैं ।रंगभूमि में मादाओं का आगमन और प्रणय प्रसंग कुछ मिनटों में ही निपट जाता है .

यहाँ कुछ हैरतअंगेज भी घटता है. दरअसल इस महा -स्वयम्बर में दो तरह के नर होते है ,एक तो 'सेज पिया की ' पर कब्जा किये अखाडिया नर (रेसिडेंट मेल्स ) और दूसरे अखाडे के किनारे पर जमे लग्गू भग्गू या भडुआ नर (सैटेलाईट मेल्स )। अखाडिया नरों की कलगी गहरे रंग की होती है जबकि भडुआ नर फीकी कलगी वाले होते हैं ! मादा के साथ मुख्य यौन संसर्ग तो अखाडिया नर ही करते हैं मगर भडुआ नर भी किनारे से मादा पर कामुक गिद्ध दृष्टि जमाये रहते हैं ! और मजे की बात तो ये कि अखाडिया नरो से भडुआ नर बिलकुल भी नहीं झगड़ते बल्कि उनकी मिजाज पुरसी /ठकुर सुहाती में लगे रहते हैं! तो फिर इनकी जैवीय जरूरत ही क्या है ? रंगभूमि में फिर इनका क्या काम ?


जोहन फ्रेडरिच नौमान (1780-1857) का "लेक " का चित्रण


दरअसल भडुए नर अपनी उपस्थिति से चोटी /सेज पिया पर काबिज नरों की भीड़ का हिस्सा बनते हैं और मादाओं को दूर से यह अहसास दिला देते हैं कि वहां नरों की भीड़ अधिक है ! इस तरह वे अखाडिया नरो की मदद ही कर रहे होते हैं ! मादाओं का अवचेतन "अधिक नर ,उपयुक्त के चयन के अधिक अवसर " का अनुसरण करता है और वे पिया की सेज पर आ धमकती हैं ! फिर भी इससे भडुआ नरों का क्या सीधा लाभ ? क्या वे निरपेक्ष भाव से केवल अखाडिया नरों के यौन लाभ के लिए आत्मोत्सर्ग कर रहे होते हैं ? नहीं ! ये भी मौके की तलाश में होते हैं और अखाडिया नरो की आपसी प्रतिस्पर्धा जनित द्वंद्व युद्धों में यौनोन्मत्त मादा से क्षण भर के लिए भी विरत नर के स्थान पर ये सहसा ही आ धमकते हैं और ख़ुद द्वारा चयनित नर के युद्ध कौशल को निहार रही और उसके वापस लौटने की प्रतीक्षा कर रही मादा पर आरूढ़ हो जाते हैं -मानो कुदरत भी एक विचित्र असमंजस की स्थिति को बनाये रहती है और मादा के प्रतिकार के पूर्व ही भडुआ नर अपना शुक्र दान कर चुके रहते हैं -विजयी नर के आते आते ये फिर फुर्र से अखाडे के किनारे उड़ चलते हैं -परिस्थितियों का पूरा लाभ उठाने वाले घोर अवसरवादी भडुआ नर बस इन्ही चुराएं हुए काम केलि के तोहफों पर जीवन गुजार देते हैं।

कुछ और पक्षी प्रजातियों में स्वयम्बर की दास्तान जारी रहेगी .......

Monday, 27 July 2009

एक स्वयम्बर यहाँ भी है - पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (7)-(डार्विन द्विशती विशेष)


बर्ड आफ पैराडाईज का नर भी एक बहुगामी एरेना बर्ड है

इन दिनों एक सिने तारिका का रियलिटी -स्वयम्बर शो दूरदर्शन पर छाया हुआ है ! आईये हम आपको स्वयम्बर की प्रवृत्ति के उदगम के खोज यात्रा पर लिए चलते हैं चिडियों की मनमोहक दुनियां में ! यहाँ के स्वयम्बर के आगे बड़े बड़े स्वयम्बर भी फीके हैं ! वैसे तो चिडियों की 8700 प्रजातियों में से अधिकाँश में नर नारी का एकल जोड़ा ही सारी पैत्रिक /मातृत्व की जिम्मेदारियों का वहन करता है -मगर ८५ प्रजातियों में जो कुल के महज एक फीसदी हैं जोड़े नही बनते -इनमें नर बहुगामी होते हैं ,मतलब पालीगैमस ! मगर क्या मजाल किसी मादा से कोई जोर जबरदस्ती हो -यहाँ मादा ही एक विशाल स्वयम्बर में नर का वरण करती है -

इन चिडियों में कोई जोड़ा -बंध (पेयर बोंड) नही बनता .नर और मादा अल्प काल के लिए मिलते हैं -नर जीवन का सर्वोत्कृष्ट आकर्षक प्रदर्शन -प्रणय याचन करता है मादा वर माला डालती है -संसर्ग होता है और फिर मादा नर को छोड़ अलग चल देती है -नर अभी भी और मादाओं के लिए पलक पावडे ही बिछाए रहते हैं और अवसर का लाभ उठा कर एक से भी अधिक मादाओं से प्रणय सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं . इसके बाद नर मादा हमेशा के लिए बिछड़ जाते हैं -मादा घोसला बनाने ,अंडे सेने ,शिशुओं के लालन पालन का जिम्मा ख़ुद निभाती है, नर से कोई मतलंब नही रह जाता !

ये बहुगामी नर ,प्रणय लीला के सिवा बस उठल्लू के चूल्हा होते हैं ,कुछ करते धरते नहीं बस केवल प्रणय कला प्रवीण होते हैं और दिन रात कोई और काम धाम न करके अपने पौरुष प्रदर्शन में ही लगे रहते हैं -अपने डैनों ,पखों -परों को सजाना सवारना ही इनका मुख्य काम होता है ! चूकिं इनमें जोड़ा बाँधने की प्रवृत्ति नहीं होती अतः कई मादाओं से प्रणय बंध स्थापित करने में इन्हें कोई रोक टोक नहीं रहती .नरों में एक दूसरे से बढ़ चढ़ कर खूबसूरत दिखने की चाह और प्रतिस्पर्धा होती है -जो नर जितना ही स्फूर्त ,मुखर और चमक दमक लिए होता है वह मादाओं को उतना ही आकर्षित कर लेता है.

इन पक्षी प्रजातियों जिनमे मुख्य रूप से कई मुर्गों ,तीतर , बटेर ,रफ (नर)और रीव (मादा ) की पक्षी प्रजातियाँ आती हैं में एक विशाल स्वयम्बर का आगाज होता है -पहाडों की ऊंची एकांत निर्जन चोटियां सैकडों नरों से गुंजायमान हो कर "रंगभूमि "का नजारा पेश करती हैं ! इन पारम्परिक रंगभूमियों में आने वाले नर अपने पौरुष का बढ़ चढ़ कर प्रदर्शन शुरू कर देते हैं -मादाएं भी उसी रंगभूमि को चुनती हैं जहाँ ज्यादा नरों की भीड़ होती है -ताकि उनमे चुनाव के अधिक मौके मौजूद रहें ! मादाओं के आते ही एक साथ सारे नर प्रणय याचना शुरू कर देती है -मगर मादा ऐसा दिखाती है की जैसे कुछ हो ही नहीं रहा उसके सामने -प्रत्यक्षतः उदासीन सी वह नर लीलाओं का बस तटस्थ भाव से लेकिन बारीक निरीक्षण करती है -पक्षी प्रणय के इस रंगभूमि को अंग्रेजी में एरेना -arena या स्कैन्देनिविआयी भाषा में Leka मतलब "टू प्ले ' कहते हैं और यहाँ हो रहे प्रणय प्रदर्शन को 'एरेना डिस्प्ले '- इन पक्षियों का एरेना ही वह अभिसार स्थल है जो केवल प्रणय लीला का केंद्र है ,यहाँ घोसला बनाना ,शिशुओं का लालन पालन सभी वर्जित है -मादा नर से संसर्ग के बाद अन्यत्र घोसला बनाने और भावी पीढी के लालन पालन की तैयारियों की और चल देती है !

यह वर्णन अभी आगे भी है मगर अभी तो मुझे रामचरित मानस का वह प्रसंग याद हो आया -रंगभूमि जब सिय पगु धारी,देखि रूप मोहे नर नारी -मगर मनुष्य कितना विकसित हो गया है -यहाँ स्वयम्बर में राम को वरण करने के बाद सीता उनकी जीवन सगिनी बन जाती हैं मगर एरेना बर्ड्स में नर को मादा की परवाह कहाँ ?


अभी जारी रहेगा यह पक्षी प्रणय पुराण