Saturday, 15 November 2014

अरबों किमी दूर धूमकेतु पर मानव की विजय पताका -मानव इतिहास का एक महान पल!



तमाम अनिश्चितताओं को लेकर जब यूरोपीय अंतरिक्ष मिशन का रोसेटा( Rosetta) अभियान दस वर्ष पहले दिक्काल की अंनंत गहराईयों में उतरा था तो किसे पता था कि यह मानव इतिहास की इबारत में एक महान पल जोड़ेगा। रोसेटा एक परिक्रमा स्पेसक्राफ्ट और एक लैंडर मॉड्यूल Philae दोनों के साथ धूमकेतु 67P / Churyumov-Gerasimenko (67P) का एक विस्तृत अध्ययन करने के लिए यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी द्वारा बनाया गया एक रोबोट अंतरिक्ष यान है।रोसेटा धूमकेतु की कक्षा के परिभ्रमण लिए पहला अंतरिक्ष यान का उपक्रम है जो एक एरियन -5 रॉकेट पर 2 मार्च 2004 को शुरू किया गया था।

यह एक धूमकेतु के सबसे विस्तृत अध्ययन के लिए डिज़ाइन किया गया है जो जर्मनी में यूरोपीय अंतरिक्ष संचालन केन्द्र (ESOC) से नियंत्रित किया जाता है। यह अंतरिक्ष यान धूमकेतु और आरंभिक सौर प्रणाली की बेहतर समझ विकसित करेगा ऐसी आशा की जाती है।अंतरिक्ष यान पहले 2007 में मंगल ग्रह के गुरुत्व से झटका खाकर ( स्विंग से - flyby) अंतरिक्ष की अनंत गहराई में छलांग लगा बैठा था और अपने रास्ते के दो क्षुद्र ग्रहों के गुरुत्व से निकलते ( flyby ) हुए आगे बढ़ा.. पुनः 2867 सितंबर में क्षुद्रग्रह स्टीनस ,पुनः 2008 और जुलाई 2010 में ल्यूटेटिया से गुजरा। 20 जनवरी 2014 को 31 महीने की हाइबरनेशन मोड से बाहर ले जाया गया था। इस अभियान में 2,000 लोगों ने में मिशन में सहायता प्रदान की है। 
 
 Philae लैंडर का अवतरण 

रोसेट्टा के Philae लैंडर यानि अवतरण मॉड्यूल सफलतापूर्वक १२ नवंबर 2014 को धूमकेतु 67P, के नाभिक पर उत्तर गया हालांकि यह पूर्व निश्चित स्थल से दूर उतरा और उतरने में दो बार उछाल (बाउंस) लिया और एक ऊंची पहाड़ी के पीछे जाकर स्थिर हुआ। जिससे इसका सोलर पैनल पहाड़ी की चोटी की छाया में आ गया और बैटरी रिचार्ज में दिक्कत आ गयी है। मगर तबतक इसने जरूरी आंकड़े धरती तक भेज दिए हैं जिनका विश्लेषण हो रहा है। खगोलविद एलिजाबेथ पियर्सन के अनुसार Philae लैंडर का भविष्य अनिश्चित है, मगर परिक्रमा कर रहा मिशन यान सक्रिय रहेगा।

चार अरब किलोमीटर से भी अधिक दूरी तक इस मानव निर्मित अंतरिक्ष का जा पहुंचना और अपने मिशन में कामयाब होना मानवता की एक बड़ी सफलता है। अगले वर्ष जिस धूमकेतु पर अवतरण हुआ है वह हमारे सौर मंडल में नजदीक आ जाएगा। विज्ञान कथाओं में धूमकेतुओं को अंतरिक्ष के उड़न खटोलों की संज्ञा दी गयी है जो बिना खर्चे ही सौर मंडल के आख़िरी छोर तक आगामी समानव अंतरिक्ष भ्रमण का मार्ग सुझायेगें।

Monday, 6 October 2014

इबोला के बारे में वैज्ञानिकों ने यह बोला

लक्षण: यदि कोई वायरस के संपर्क में आ गया है तो लक्षण दो से 21 दिनों के बीच सकता है. जो है बुखार, मांसपेशियों में दर्द, सिर दर्द, गले में खराश, उल्टी और दस्त।

संक्रामकता : उपर्युक्त लक्षण जिस बोला ग्रसित मरीज में प्रगट होगा तभी वह संक्रामक होगा . यदि वायरस से संक्रमित व्यक्ति में उक्त लक्षण प्रगट नहीं है तो वायरस दूसरे व्यक्ति को संक्रमित नहीं कर सकता भले ही उसके रक्त में वायरस की मौजूदगी हो। एक ही हवाई जहाज या रेल बर्थ पर होने के बावजूद भी यदि लक्षण प्रगट नहीं है तो दूसरे सहयात्री संक्रमित नहीं हो सकते जिसका अर्थ है कि लक्षण प्रगट होने के पहले वायरस अन्य व्यक्ति को संक्रमित नहीं कर सकता.

संक्रामक क्षमता आर जीरो (R0) :यह वह फार्मूला है जिसका अर्थ है कि अमुक वायरल बीमारी की संक्रामकता क्षमता क्या है या उसके फैलने की तीव्रता क्या है जिसे आर शून्य कहा जाता है जिसका एक सूत्र है "संक्रामक रोगों के लिए अनुमानित प्रजनन संख्या.". इबोला का आर ओ 2 है मतलब इसके फैलने की तीव्रता कम है -और स्पष्ट कर दूँ यह बताता है कि किसी एक इबोला रोगग्रस्त से दो लोगों तक ही यह बीमारी पहुँच सकती है जबकि खसरा R0 18 है.

                         विभिन्न वायरल बीमारियों के फैलाव की क्षमता (आर जीरो )
                         आभार:SHOTS
संक्रमित की खोज : यह एक श्रमसाध्य कार्य है। इसके लिए स्वास्थ्य कर्मियों को इबोला रोगी के संपर्क में आये लोगों की खोजबीन की जाती है। इसके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है जो यह जानकारी लिए दायित्व निभाता है कि इबोला ग्रस्त व्यक्ति कब किसके संपर्क में कहाँ आया और कहाँ कहाँ गया किसके साथ उठा बैठा पश्चिम अफ्रीका में, यह कार्य सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षित स्थानीय स्वयंसेवकों द्वारा किया जा रहा है.

सीधा संपर्क: इसके अंतर्गत एक रोगी के परिवार के सदस्यों और दोस्तों के संपर्क की सबसे अधिक बारीकी से जाँच की जाती है . ऐसे लोग जो एक रोगी के शरीर के तरल पदार्थ (खून बलगम आदि) के सीधे संपर्क में आते हैं, और इसलिए सबसे अधिक संभावना उनमें वायरस के संक्रमण का होता है लक्षित समूह होते हैं ।

अप्रत्यक्ष संपर्क: इस समूह में उदाहरण के लिए, एक रोगी के साथ, एक कार्यस्थल या स्कूल में संपर्क किया गया हो सकता है ऐसे लोग शामिल हैं. ये रोगी के शरीर के तरल पदार्थ के संपर्क में न होने से कम खतरा उठाते हैं।

संगरोध: एक संक्रमित व्यक्ति के लिए एक कानूनी आदेश कि वह उपचार होने तक एक स्थान तक परिवार सहित सीमित हो जाय जरूरी है . रोगी के परिवार के सदस्यों को उनके घर के बाहर तैनात एक कानून प्रवर्तन अधिकारी के साथ, संगरोध में रखा जा सकता है।

Monday, 22 September 2014

सर्पदंश के प्राथमिक उपचार में आशा की किरण

अब तक सर्पदंश की एकमात्र भरोसेमंद कारगर इलाज एंटीवेनम इंजेक्शन है जो सांपों के विष से ही तैयार होता है। विषरोधक एंटीवेनम वर्तमान में मरीजों में इंजेक्ट किया जाता है.प्रयोगशाला परीक्षण में एक आशाजनक परिणाम से पता चला है एंटीवेनम गोली को भी सीधे सर्प के काटने के बाद लिया जा सकता है। इंजेक्शन की सुविधा अक्सर कई मील दूर पर उपलब्ध हो पाती है और मरीज के वहां पहुंचने तक देर हो चुकी रहती है। अस्पताल तक पहुंचने से पहले सर्प के काटने से मरने वाले मरीजों में से तीन चौथाई की यही गति होती है।

इस समस्या से निजात पाने की पहल कलकत्ता विश्वविद्यालय की एक शोधकर्ता रोशनआरा मिश्रा ने अपने अनुसन्धान के जरिये किया है और एक सर्वसुलभ प्रतिविष गोली की ईजाद में सफलता पाई है। इसके तहत एंटीवेनम को चीनी से बने एक सस्ते और गैर विषैले गोंद जैसा पदार्थ अल्जीनेट में लेपित करके गोली का रूप दिया गया है जो प्राथमिक उपचार के रूप में तत्काल दिया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने इस चूहों से ली गई आंतों में इस गोली के प्रयोग से पाया कि इनका पाचन नहीं होता और इसतरह इन्हे पचाया नहीं जा सकता और यह सर्प विष को निष्क्रिय करने में प्रभावी रहा। यह शोध "PLOS Neglected Tropical Diseases" के सात अगस्त २०१४ के अंक में छपा है। 
 भारत में विषैले सर्पदंश की वार्षिक दर एक लाख से ऊपर है (स्रोत : विकिपीडिया ) 

संयुक्त राज्य अमेरिका, कैलिफोर्निया अकादमी में एक शोधकर्ता मैथ्यू लेविन कहते हैं कि : " अल्जीनेट के लेप में विषरोधक को खिलाने का एक अच्छा विचार है. लेविन सर्पदंश पीड़ितों के इलाज के लिए एक सस्ते antiparalytic नाक स्प्रे विकसित किया है. देखिये यह गोली पूर्ण रूप से निरापद होकर कब बाज़ार आती है।



Monday, 18 August 2014

इबोला ने धावा बोला!



इबोला यानि ई वी डी(Ebola virus disease)  -इबोला हीमोरजिक फीवर नर वानर समुदाय का रोग है जो इबोला विषाणु से होता है। विषाणु के संक्रमण के बाद दो दिन अथवा तीन सप्ताह के बाद भी लक्षण उभर सकते हैं। लक्षणों में इन्फ्लुएंजा जैसा बुखार, गले में खरास , मांसपेशियों में दर्द और सरदर्द हैं. कुछ भी निगलने में कठिनाई भी हो सकती है। तत्पश्चात वमन (उल्टी /कै) दस्त और शरीर पर चकत्ते होते हैं और लीवर और गुर्दे ठीक से काम नहीं करते। खून की उल्टियाँ भी होती हैं.  मरीज के शरीर के भीतर और बाहर भी रक्तस्राव शुरू हो जाता है। यह जानलेवा है।

इस विषाणु का संक्रमण पहले से ही संक्रमित मुख्यतः कपि वानरों या दूसरे जानवरों या मनुष्य के रक्त सम्पर्क या शारीरिक द्रव से संपर्क से हो सकता है। मनुष्य से मनुष्य में यह फ़ैल रहा है, अभी तक अफ्रीका में इसका ज्यादा कोप है मगर अब यह विश्वव्यापी बीमारी का स्वरुप लेता जा रहा है. कहा जा रहा है कि चमगादड़ों की एक प्रजाति (फ्रूट बैट ) बिना इससे प्रभावित हुए इसे फैला रही है। चूंकि मलेरिया, हैजा और अन्य विषाणु जनित रोगों के लक्षणों से इबोला के लक्षण मिलते जुलते हैं अतः इसके निर्णायक निदान /पहचान के लिए वाइरल प्रतिपिण्डों की जांच रक्त सैम्पल से की जाती है।

बचाव ही इसका कारगर उपाय है क्योकि अभी तक इसका प्रभावी टीका और शर्तिया इलाज सुलभ नहीं है.मांसभोजी मांस को छोटे वक्त हाथों पर दास्ताने पहने और अच्छी तरह उसे पकाएं। और किसी मरीज के आस पास या संपर्क में होने पर हाथों को साबुन से अच्छे ढंग से साफ़ करते रहे।अभी तक मृत्यु दर 50 से 90 के बीच देखी जा रही है। यह सबसे पहले सूडान और कांगो से पहचाना गया -और वर्ष 1976 से ही सहारा अफ्रीका के क्षेत्रों में देखा जाता रहा है। लगभग दो हजार लोग इसके चपेट में आ चुके हैं। इस समय यह महामारी का रूप ले चुका है और पश्चिमी अफ्रीका के गुएना, सिएरा लियोन और लाबेरिया तथा नाइजेरिया में कहर बरपा रहा है। एक हजार से अधिक लोग अब तक मर चुके हैं। वैक्सीन को विकसित करने के प्रयास युद्ध स्तर पर हैं मगर कोई कारगर सफलता नहीं मिल सकी है।

Tuesday, 26 November 2013

यादों की आंखमिचौली-झूठीं यादों का गड़बड़झाला!

सावधान! नए वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि कुछ यादें झूठी भी हो सकती हैं।  अर्थात आप कुछ ऐसा याद किये हुए हो सकते हैं जो आपके जीवन में घटा ही न हो। फिर भी आप शान से अपने संस्मरण में किसी ख़ास घटना और दृश्य का जिक्र कर सकते हैं और शेखी बघारते रह सकते हैं.ऐसी क्षद्म स्मृतियों की जन्म प्रक्रिया अभी ठीक से नहीं समझी जा सकी है मगर वैज्ञानिकों ने पुष्टि कर दी है कि इनका वजूद है और इनके चलते विषम स्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं।  अब किसी घटना के अगर आप कोर्ट में चश्मदीद गवाह बने जो वस्तुतः आपके सामने घटी ही नहीं मगर आपको पूरा भरोसा है कि आपने उसे देखा है तो आपकी गवाही किसी को जेल के सींखचों में डाल  सकती है या निकाल भी सकती है।

दिमाग का एक हिस्सा एमयिगडेला स्मृतियों को सहेजने का काम  करता है.अभी हाल में ही प्रोसीडिंग्स आफ नेशनल अकादेमी आफ साइंसेज में छपे अध्ययन से यह साफ़ पता लगता है कि सामान्य और और तेज याददाश्त वाले दोनों तरह के लोगों में यह स्मृति दोष समान रूप से पाया जाता है।  कुछ लोगों की याददाश्त बहुत अच्छी  होती है जिन्हे "highly superior autobiographical memory -HSAM" कहा जाता है।  प्रयोगों में पाया गया है कि इनकी याददाश्त भी इनके साथ आँख मिचौली कर सकती है -वे झूठे स्मृति प्रतिरूपों को भी याद रख सकते हैं , यह पूरा अध्ययन अभी हाल में ही टाईम पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।स्मृति विभ्रम या विकृति के इस अध्ययन को कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के मनोविज्ञानी लारेंस पैथीस के नेतृत्व में किया गया है। 

मजे की बात यह है कि चूहों पर किये गए अनुसन्धान में ऐसी छदम स्मृतियों को उत्पन्न करने में सफलता मिली है और ऐसे स्मृति पैटर्न को एक से दूसरे चूहे के दिमाग में भी आरोपित कर पाना सम्भव हुआ है।  
मेमोरी के लिए जिम्मेदार कोशायें/ द्रव्य (मेसेंजर आर एन ऐ आदि  ) ट्रांसफर एक से दूसरे चूहों में करना सम्भव हो गया है और इससे किसी छद्म स्मृति प्रतिरूप को भी एक चूहे से दूसरे चूहे तक में अंतरित किया जा सकता है।  यह अध्ययन भी प्रसिद्ध शोध पत्रिका साईंस के एक हालिया अंक में विस्तार से प्रकाशित हुआ है। स्मृति आरोहण के ऐसे अध्ययन मानवीय संदर्भ में कई सम्भावनाओं को जन्म देते हैं जिनमें जहाँ स्मृति दोषों को ठीक किया जा सकेगा ,बहुत बुरे अनुभवों की याद को हटाया  जा सकेगा वहीं इस तकनीक का बहुविध दुरुपयोग भी हो सकता है।  

अब हो सकता है कि आप  अपनी यादों की हकीकत को भी एक बार फिर से परखना चाहें। सम्भव है कि कोई कटु या मधुर याद जिसे आप सजोये हुए हैं वह अनायास ही एक वहम के रूप में आपकी धरोहर बनी हुयी हो।  

Monday, 4 November 2013

धड़कते दिल से मंगलयान आरोहण का इंतज़ार

भारत जैसे गरीब देश के लिए अरबों रुपयों का यह तमाशा या वैज्ञानिक आतिशबाजी क्या शक्ति प्रदर्शन का हेतु लिए महज दिखावा हैं। यह सवाल कई लोगों के जेहन में कौंध रहा है .नहीं नहीं यह मौका है भारत को अपनी तकनीकी क्षमता का स्व -आकलन का ,खुद को साबित करने का .

आज नहीं तो निकट भविष्य में ही मानुषों का मंगल पलायन होना ही है -बिना मंगल पर पहुंचे मानवता का मंगल नहीं है यह तथ्य अब विज्ञानी और विज्ञान कथाकार अच्छी तरह समझ गए हैं . हमारे संस्रोत तेजी से ख़त्म हो रहे हैं ,जनसख्या बढ़ रही है -उन्नत देश गरीब देशों को अंगूठा दिखा मंगल पर मंगल मनाने की जुगत में है -ऐसे में भारतवासियों का हर वक्त अपने गरीबी के अरण्य रोदन के बजाय इस मंगल मुहिम को प्रोत्साहित करना चाहिए -यह पूरी मानवता के (भविष्य के ) अस्तित्व के लिए करो या मरो का प्रश्न है . 




मुझे लगता है कि चन्द्र बस्तियां बसे न बसे किन्तु मंगल पर मानव बस्तियां निश्चय ही एक हकीकत बनेगीं . मार्स - 1 2 प्रोजेक्ट तो ऐसी किसी सम्भावना को एक दशक के भीतर ही पूरा करने के अभियान पर है . आज मंगल आरोहण पर जाने वाले मंगलयान यानि मार्स आर्बिटर मिशन (मॉम ) का एक मकसद है लाल ग्रह पर मीथेन की उपस्थिति का पता लगाना जो कार्य पहले किसी ने नहीं जांचा परखा . अगर मीथेन की उपस्थिति वहाँ पायी जाती है तो निश्चय ही यह जैवीय पर्यावास के लिए एक शुभ संकेत होगा . चंद्रयान ने जैसे चन्द्रमा पर पानी की पुष्टि का अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत किया है वैसे ही मीथेन की उपलब्धता की मगल पर पुष्टि इस अभियान का एक बड़ा हेतु है .हमारा पड़ोसी चीन अपने मंगल अभियान में अब तक असफल रहा है मगर उसकी कोशिशें जारी है। अपने मगलयान को मंगल पर पहुँचने में दस माह का समय लगेगा . वहाँ पहुँच कर यह उसकी परिक्रमा करता रहेगा और इसके खोजी यन्त्र तथा कैमेरे जरूरी सूचनाएं मुहैया कराते रहेगें .

आज सुबह सुबह ही जब स्वप्निल भारतीय ने अमेरिका से मुझे फेसबुक पर एक तुरंता सन्देश भेजा कि उनके लेख के लिए मैं अपनी त्वरित प्रतिक्रिया व्यक्त करूं तो मुझे लगा कि समूची दुनिया भारत के इस अभियान को बड़ी व्यग्रता से देख रही है . याहू के इंडियन साईंस फिक्शन ग्रुप ने भी इस अभियान पर एक चर्चा छेड़ दी है .

शुभकामनाएं भारत -कर दो साबित खुद को!

Friday, 11 October 2013

स्त्री यौनिकता और मदन लहरियां:अचंभित करने वाले तथ्य!

बात उन्नीस सौ पच्चास -साठ के दौरान की है जब वाशिंगटन युनिवेर्सिटी, सेंट लुइस के विलियम मास्टर्स और विरजीनिया जान्हसन के सेक्स विषयक शोध परिणामों ने तहलका मचाया था . उन्होंने ख़ास तौर पर स्त्री यौनिकता पर कई ऐसे शोध परिणाम उजागर किये कि लोग सकते में आ गए और बहुत हो हल्ला मचा .सारी दुनियां में मास्टर्स और जान्हसन के दावे चर्चा का विषय बन गए . तमाम दीगर बातों में उनका यह भी रहस्योद्घाटन था कि स्त्रियाँ में चरमानन्द( )की अनुभूति मदन लहरियों(multiple orgasm) के रूप में होती है -मतलब पुरुष जहाँ स्खलन के साथ मात्र एक ही चरम आंनंद उठाता है, नारियां इस मामले में उनसे समृद्ध हैं।तब से आज तक पुरुष -नारी की यौनिकता पर अनेक अध्ययन हो चुके हैं ,मगर एक नये अध्ययन की चर्चा टाईम पत्रिका ने अपने हाल के अंक में(एशिया  एडीशन, अक्तूबर  07, 2013) की है जो डॉ इडेन फ्रामबर्ग और नाओमी वोल्फ के शोध पर आधारित है.
उनके नए अध्ययन में मुझे तो कोई ख़ास बात नहीं नज़र आती मगर टाईम ने इसे बारह 'अचंभित करने वाले तथ्य' का शीर्षक दिया है . जबकि सच तो यह है कि इनमें सदमाकारी कुछ भी नहीं है . यह सच है कि ज्यादातर भारतीयों को उनकी सहचरियों/संगिनी को आर्गेज्म मिलाता है या नहीं इस के बारे में शायद ही पता हो . बहुतों को बस खुद से मतलब रहता है संगिनी की परवाह ही नहीं रहती . यह बहुत संभव भी हो सकता है क्योकि भारत में सेक्स एक टैब्बू ही बना रहा है और लोग इस मुद्दे पर ठीक से शिक्षित प्रशिक्षित नहीं होते -यह 'काम' पूरी तौर पर बस कुदरत के हवाले ही हो रहता है . अनेक यौन ग्रंथियां फलस्वरूप जीवन भर रह जाती हैं .
आईये नए अध्ययन की एक बानगी लेते हैं . नया अध्ययन भी स्त्री यौनिकता के कई पहलुओं पर से पर्दा उठाने की बात करता है . जैसे उसके अनुसार कभी बहुत पहले स्त्रियों के ऋतु धर्म का चक्र चन्द्रकलाओं से पूरा तारतम्य रखता था .अँधेरे पक्ष में ऋतुस्राव और पूर्णिमा को ही प्रायः अंड स्फुटन होता था . मगर सभ्यता की रोशनी ने यह चक्र बेतरतीब कर दिया .शयन कक्ष के लट्टुओं में उस आदिम प्रक्रिया की लय टूट ही गयी . हाँ कुछ नए प्रयोग चंद्रकला से फिर से जुड़ने के हैं जिसे 'ल्यूनासेप्शन' कहा जा रहा है . एक और खुलासा यह है कि संसर्ग के पांच से आठ दिन बाद तक भी कतिपय मामलों में शुक्राणु जीवित रह सकता है और गर्भ ठहर सकता है . शुक्राणु गर्भमुख के पास के योनि श्लेष्मा में सुरक्षित रह सकता है जबकि प्रायः शुक्राणु संसर्ग हो उठने के कुछ घंटे ही जीवित रहते हैं .
यह एक रोचक बात यह भी बताता है कि  'हाई हील' सैंडल नारी आर्गेज्म पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है . इससे श्रोणि मेखला की कुछ नर्व्स दबती हैं जो आर्गेज्म पर बुरा प्रभाव डालती हैं . सबसे महत्वपूर्ण खुलासा यह हुआ है कि आर्गेज्म लेने वाली स्त्रियाँ ज्यादा कर्मठ और सृजनशील होती है. और यह एक फीडबैक प्रक्रिया है -मतलब ज्यादा आर्गेज्म ज्यादा कर्मठता और सृजन और यह पुनः समुचित आर्गेज्म के लिए उकसाता है . यह भी कि गर्भ निरोध गोलियां कामोत्तेजना को घटाने वाली पाई गयीं हैं . एक रोचक बात यह भी उभरी कि कुछ ढंग की कुर्सियों पर बैठना प्यूदेंडल नर्व को संवेदित कर यौन उत्तेजन को उकसा सकती है . और देर तक बैठना उसे दबा भी सकती है . नहाने के बाद स्त्रियाँ बेहतर आर्गेज्म पाती हैं .

बाकी के शोध परिणाम बस पुराने शोध अध्ययनों के पिष्ट पेषण भर हैं जैसे नारी शरीर के कामोद्दीपक क्षेत्र -भगनासा ,कुचाग्र ,जी स्पाट ,गर्भ द्वार(opening of the cervix) हैं , चरम आनंद के समय होने वाली सिरहनों का कारण गर्भाशय का शुक्राणुओं के बटोरने में होने वाला संकुचन है . अध्ययन यह भी बताता है कि सभी नारियां चरम आनंद पा सकती हैं मगर यह कैसे मिले यह सभी को ठीक से पता नहीं होता .