Sunday, 29 July 2012

खेलों में जेंडर जांच:सवाल दर सवाल


लन्दन ओलम्पिक्स की शानदार शुरुआत हो गयी है ,मगर एक समान्तर खेल और खेला जा रहा है .सेक्स की जांच का खेल .पहले कई पुरुष खिलाड़ी जनाना भेष में ओलम्पिक मेडल तक हथियाते रहे हैं .खेलों में जेंडर जांच की जरुरत इसलिए ही आन पडी ताकि ऐसे छलिया लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा सके ...१९५० से लेकर किसी न किसी रूप में जेंडर जांच २००९ तक बदस्तूर जारी रही .मेडिकल साईंस के उन्नत होने के साथ ही शक के मामलों में खिलाड़ियों के सेक्स के गुणसूत्रों को भी देखा जाने लगा .हम सभी जानते हैं कि एक्स एक्स लैंगिक गुणसूत्र महिलाओं तथा एक्स वाई गुणसूत्र पुरुष के होते हैं .इसके साथ बार बाडी भी देखी जाने लगी जो महिलाओं के मामले मेंप्रत्येक कोशिका के  नाभिक के परत के अंदरुनी हिस्से से जुदा एक धब्बा दीखता है जो एक निष्क्रिय गुणसूत्र एक्स की पहचान बताता है .अब चूंकि महिलाओं में दो एक्स सेक्स गुणसूत्र होते हैं तो एक निष्क्रिय रहता है जबकि पुरुष में एक एक्स सक्रिय होता है तो वह जांच में धब्बा सरीखा नहीं दीखता .मगर ये जांच भी विवादित होते गए ...क्योंकि लैंगिक गुणसूत्रों के में भी विकार पाए जाते हैं .जैसे किसी महिला में दो एक्स के साथ एक वाई भी मिल गया या महज एक ही एक्स गुणसूत्र दिखा -या पुरुष एक्स वाई के साथ एक और एक्स आ गया आदि आदि .लैंगिक गुणसूत्रों के इसी गडबडझाले की वजह से २००९ से ही ओलम्पिक असोसिएशन ने इन लैंगिक गुणसूत्रों की जांच पर रोक लगा दी .
पिछले वर्ष   दक्षिण अफ्रीकी धाविका कैस्टर सेमेन्या का मामला भी विवादित रहा था .पहले तो उन्हें ओलम्पिक असोसिएशन ने खेलने से मना किया मगर बाद में अनुमति मिल गयी .रंगभेद लिंगभेद पर पक्षपात की दुहाईयाँ दी गयीं ,यद्यपि उनकी लैंगिक जांच आज भी सार्वजनिक नहीं हुयी .यहाँ भारत में पिंकी प्रामाणिक का मामला चल ही रहा है ..अदालत ने उनके गुणसूत्रों की जांच का आदेश दिया है .खेल प्रेमियों को इसका बेसब्री से इंतज़ार है . इंटरनेशनल ओलम्पिक कमेटी ने अब से टेस्टोस्टेरान जिसे पुरुष हारमोन भी कह देते हैं के स्तर की जांच का नया मानदंड रख दिया है .यदि किसी महिला खिलाड़ी में इस हारमोन का स्तर एक सीमा से ज्यादा हुआ तो वह महिला प्रतिस्पर्धी के रूप में खेल से बाहर होगी -इस स्तर का निर्धारण विशेषज्ञ करेगें -मतलब अभी भी यह तरीका बहुत पारदर्शी नहीं है .हाँ कहा गया है कि महिला खिलाड़ियों में यह हारमोन पुरुष खिलाड़ियों के स्तर तक नहीं होना चाहिए . 
महिलाओं की एक जन्मजात स्थिति   " कान्जेनायिटल एड्रीनल हायिपरप्लासिया" उनके  बही जनन अंगों में विकृतियों का कारण बनती है और उनकी भगनासा अविकसित नर अंग जैसी लगती है .अब इनकी बाह्य जांच में बड़ी दुविधा उत्पन्न हो सकती है यद्यपि इनमें आंतरिक लैंगिक अंग गर्भाशय और अंडाशय पाए जाते हैं .इसी तरह एक अन्य मामले में एक्स वाई गुणसूत्रों के बावजूद "एंड्रोजेन इन्सेंसिविटी सिंड्रोम " में जेनेटिक तौर पर पुरुष होने के बाद नारी बाह्य अंगों का विकास हो जाता है -उभरे स्तन,अविकसित नारी जननांग मगर अंडाशय और गर्भाशय नदारद .हाँ टेस्टिस पाया जाता है . ऐसे लोगों का शरीर पुरुष हारमोन के प्रति असंवेदनशील रहता है . अब इन्हें किस कटेगरी में रख जाय . 
अब खेलों में टेस्टोस्टेरान के जांच का पैमाना कहाँ तक निरापद और विवादहीन रहेगा यह देखा जाना है . ओलम्पिक कमेटी यह समझती है कि चूंकि यही हारमोन खिलाड़ियों के परफार्मेंस में उनकी शक्ति क्षमता और गति से सीधे जुड़ा है इसलिए इसकी जांच से खेलों के मैदान में बराबरी का स्तर(लेवल प्लेयिंग फील्ड)  बनाए रखा जा सकता है . वैसे इस जांच को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं .कहा जा रहा है कि अनेक ऐसे मामले हैं जिनमें टेस्टोस्टेरान स्तर कम होने पर भी खिलाड़ियों ने अच्छे प्रदर्शन किये हैं और मेडल जीते हैं . क्या लैंगिक जांच का एक पूर्णतया अविवादित जैवीय तरीका अभी भी विकसित होना शेष है?  

Sunday, 22 July 2012

मंगल का मेन्यू अब धरती पर भी ..यम यम!


मंगल अभियान के तहत अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी (नासा) 2030 के वैज्ञानिक अपने मंगल ग्रह अभियान की तैयारियों में करीब 18 साल बाद की मंगल यात्रा के लिए अभी से मेन्यू तैयार करने में व्यस्त हो गए हैं। यह मेन्यू ऐसे व्यंजनों का है जो लम्बे समय तक खराब नहीं होंगे और छह से आठ अंतरिक्ष यात्रियों के हिसाब से पर्याप्त होंगे। लाल ग्रह पर पहुंचने में अन्तरिक्ष यात्रियों को करीब छह महीने का समय लग सकता है और इतना ही वहां से वापसी में। वहां 18 महीने तक रुकना भी है। अब अगर इस दौरान उनका खाना खराब हो गया तो मुसीबत ही हो जाएगी। लिहाजा इनके खाने का विशेष मेन्यू तैयार हो रहा है। आइये एक बानगी लें - हो सकता है यह कभी हमें यहां जमीन पर भी नसीब हो जाए।

नासा के खाद्य वैज्ञानिक ऐसे व्यंजन श्रृंखलाओं को तैयार करने में जुटे हैं जो काफी लम्बे अरसे – माह, बरस, दस बरस तक जैसा का तैसा बने रहेंगे उनके स्वाद में भी फर्क नहीं आएगा। उन्होंने एक ब्रेड पुडिंग तैयार कर ली है जो चार सालों तक जस की तस बनी रह सकती है। पेंटागन में तैयार हुआ एक पाउंड केक पांच वर्षों तक फ्रेश बना रह सकता है। ये मीठे डेजर्ट ही नहीं दूसरे स्टार्टर्स और मेन कोर्स व्यंजन भी अभी बनाए जाने की अवस्थाओं से गुज़र रहे हैं जिन्हें मंगल ही नहीं धरती के फूड स्टोरों और आम रसोईघरों में कई वर्षों तक बिना खराब हुए रखा जा सकता है।

कई लम्बी अवधि तक खाने योग्य बने रहने के वाले व्यंजनों की खेप पहले से ही अमेरिकी बाज़ारों में आ चुकी है। और वैश्विक व्यापार के चलते दूसरे देशों तक भी पहुंच रही है। इनमें एक तो समुद्र की चिकन मानी जाने वाली ट्यूना मछली ही है जो अब एयर टाइट पाउच में उपलब्ध है और पहले से मिलने वाली डिब्बा बंद ट्यूना की तुलना में बेहतर है। यह भी ढाई वर्षों की शेल्फ लाइफ लिए हुए है। दरअसल खाद्य पदार्थों/व्यंजनों को लम्बे समय तक परिरक्षित रखने की प्रौद्योगिकी सेना की आवश्यकताओं के चलते वजूद में आई।

सेना की टुकड़ियों को गंतव्य तक कूच और युद्ध या शान्ति के दौरान बना बनाया - 'मील्स रेडी टू ईट' (MRE) की जरुरत होती है। मगर उनका स्वाद बस माशा अल्लाह ही होता है। पहली बार वैज्ञानिकों ने एक ऐसा टिकाऊ सैंडविच तैयार किया है जो स्वादिष्ट है और बिना रेफ्रीजेरेटर के 3-5 वर्षों तक इस्तेमाल में आ सकता है। इसके भीतर तंदूर (बार्बीक्यूड) चिकन भरा रहता है या फिर पेपरानी। सैंडविच की बाहरी परत एक खाद्य पदार्थ पालीप्रोपेलीन की महीन परत से लैमिनेटेड होती है जो खाते वक्त महसूस ही नहीं होती। और भीतर भरे जाने वाली सामग्री में आर्द्रता शोषित करने वाले अनुमन्य रसायन सार्बिटाल और ग्लिसेराल होते हैं जिससे ब्रेड गीला न होने पाए। इसके चलते ब्रेड पर किसी भी बैक्टीरिया, फफूंद का संक्रमण रुक जाता है।

सुस्वादु सैंडविच को और भी बैक्टेरिया रोधी बनाने के लिए इन्हें पाक विद्या की एक सर्वथा नवीन प्रक्रिया - एचपीपी - हाई प्रेशर प्रोसेसिंग से गुजारा जाता है जिससे स्वाद भी बढ़ता है। इसके तहत व्यंजन को एक 'दबाव कक्ष' के भीतर 87000 पाउंड के दबाव से गुजारा जाता है। इसके चलते सभी बैक्टीरिया मर जाते हैं। इस समय 'हार्मेल नैचरल चॉइस लाइन' बाज़ार में इसी तरह के खाद्य पदार्थों की एक श्रृंखला लेकर आ गयी है। ये व्यंजन ऐसे  लगते हैं जैसे अभी अभी बनाए गए हों। नासा ने जिन व्यंजनों पर ख़ास ध्यान दिया है उनमें - कैरेट क्वायंस, थ्री बीन सैलेड्स, पोर्क चॉप्स, वेजिटेबल  ऑमलेट और ऐप्रीकार्ट कोब्लेर मुख्य हैं।

प्रोसेसिंग और पैकेजिंग के बाद जाह्नसन स्पेस सेंटर में इनका भंडारण होता है और इन्हें लगातार तीन वर्षों तक चख कर चेक करने के बाद ही फिलहाल अन्तरिक्षयात्रियों के लिए जारी किया जाता है।


ऐसे व्यंजन महज सैनिकों और अन्तरिक्ष वासियों के बजाय कई दैवीय आपदाओं, भूकंप, सुनामी आदि से प्रभावित लोगों तक भी पहुंचाये जा सकते हैं। अमेरिका में कैटरीना तूफ़ान के बाद इनका वितरण काफी दुर्गम जगहों पर फंसे लोगों में किया गया जो लम्बे समय तक प्रभावित क्षेत्रों में पड़े रहे। ऐसे व्यंजन निर्माण तकनीकों का सबसे बड़ा लाभ अंततः विकराल होती जनसंख्या के लिए हो सकेगा क्योंकि खाद्य सामग्रियों की बढ़ती खपत के चलते हमें खाद्य परिरक्षण और सुरक्षा की भी जरूरत होगी। आज भी भारत सरीखे विकासशील देश में बिना आधुनिक खाद्य - वितरण प्रणाली और प्रशीतन के 30 प्रतिशत तैयार खाद्य सामग्री खराब हो रही है। कहीं कहीं तो यह नुकसान 70 फीसदी पहुंच गया है । टाईम पत्रिका के अंक 12 मार्च 2012 में ऐसा ही दावा किया गया है। तो यह खाद्य परिरक्षण का मसला केवल अन्तरिक्ष की ऊंचाइयों से ही नहीं जुड़ा है बल्कि जमीनी हकीकत से ज्यादा जुड़ा है।

Thursday, 5 July 2012

पिंकी प्रामाणिक के लिंग की प्रमाणिक जांच कब तक?


अंतरराष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी पिंकी प्रामाणिक की लैंगिक पहचान का मुद्दा गहराता जा रहा है। जाहिर है उसके बाह्य लैंगिक प्रमाण पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे में गुणसूत्रों की जांच ही अब एकमात्र भरोसेमंद और प्रामाणिक विकल्प बचा है। आश्चर्य है कि जिस देश में डीएनए विश्लेषण से पैतृकता तक की पहचान अब आम बात हो गयी हो वहां किसी के लिंग की पहचान को लेकर इतना घमासान मचा हुआ है जबकि अवैध रूप से लिंग पहचान का यह धंधा भारत की गली कूचो में बैठे डॉक्टरों तक चलता रहा है। मगर वहां मकसद कन्या भ्रूण की पहचान और गर्भ समापन का रहता है। जहां एक देश, एक व्यक्ति और समाज की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हो, वहां एक छोटी सी जांच का इतना लटकाया जाना आश्चर्य में डालता है। यह दूसरे देशों के सामने भी भारत में तकनीकी स्तर की अक्षमता का गलत नज़ारा पेश करता है।

बार बाडी से लिंग की पहचान 

वैसे भ्रूण के लिंग की जांच की प्रक्रिया जो अम्नियोसेंटेसिस कहलाती से लिंग की जांच सहजता से हो जाती है और पता लग जाता है कि भ्रूण लड़की का है या लड़के का....मतलब लड़की के दो लैंगिक गुणसूत्र समान होते हैं जो अंग्रेजी के एक्स एक्स सरीखे दिखते हैं। लड़के में एक एक्स आधा टूटा हुआ दिखता है। लेकिन वयस्क में इसी टेस्ट के लिए उसका कोई ऐसा ऊतक (कोशिका समूह ) जांच के लिए लेना होता है जिसमें कोशिका विभाजन तेज गति से चलता हो -जैसे अस्थि मज्जा (बोन मैरो)। बोन मैरो लेकर उसे अल्कोहल और एसिटिक अम्ल के एक निश्चित अनुपात में डालकर प्रिजर्व करने के बाद एक विधि जिसे कैरियो टाईपिंग कहते हैं के जरिये गुणसूत्रों का मानचित्रण होता है। अगर लैंगिक गुणसूत्रों के जोड़े असमान हैं मतलब एक एक्स दूसरा वाई तो वह लड़का है और अगर दोनों समान हैं तो लडकी मतलब एक्स एक्स। 
               
पुरुष गुणसूत्रों का प्रोफाईल 
एक  और जांच है जिसे बार बॉडी टेस्ट कहते हैं। इससे किसी महिला होने की सहज ही पुष्टि हो जाती है। यह बेहद आसान विधि है और मिनटों में संपन्न की जा सकती है। और इसका उतक केवल गालों की अंदरुनी खुरचन से ही मिल सकता है। इसमें मइक्रोस्कोप में एक ख़ास रासायनिक रंग से रंगे ऊतक में एक काला धब्बा दिखता है जो महिला होने की प्रामाणिक पुष्टि  है.  .                                                                                                        

                                                                                                                        
                                                                                                                        नारी गुणसूत्र 

ये दोनों तरीके भारत में भी सहज है आम हैं और पूरी दुनिया में दशकों से आजमाए जा रहे हैं मगर खिलाड़ी पिंकी का मामला इतना रहस्यमय क्यों बनाए रखा गया है, यह आश्चर्यजनक है और कई निहितार्थों की ओर संकेत करता है। क्या वह सचमुच एक एक्स वाई लड़का है? तब तो भारत की भी पूरी दुनिया में बड़ी किरकिरी होगी और कई लोगों पर कार्रवाई भी। क्या इसीलिए ही इस मामले को दबाया जा रहा है? जो भी हो आज की इस वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी समृद्ध दुनिया में ऐसे सच को ज्यादा दिनों तक दबाया नहीं जा सकेगा। सच अब बिना विलम्ब के हमारे और दुनिया सामने आ जाना चाहिए । अब यह किसी एक देश से जुड़ा मसला न होकर अंतरराष्ट्रीय बन चुका है।


मगर कई ऐसे मामले हैं जिनमें सेक्स का गुणसूत्रीय सत्यापन भी जटिल हो जाता है जो लैंगिक गुणसूत्रों के असामान्यता के चलते होता है .पिंकी प्रामाणिक का अगर ऐसा भी कोई मामला है तो भी वह सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा सकता ?
विशेष सूचना:ओलम्पिक असोसिएशन ने अब स्पर्धाओं में भाग लेने के लिए लैंगिक सत्यापन की बाध्यता समाप्त कर दी है!  


Tuesday, 12 June 2012

भारत में पहली बार मकड़ियों का हमला

ऐसी घटना भारत में पहले कभी नहीं घटी। असम के सादिया शहर में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान भगदड़ मच गयी जब रहस्यमयी मकड़ियों का एक विशाल झुण्ड न जाने कहां से आ गया। इन मकड़ियों ने लोगों पर हमला कर दिया। जिन्हें इन मकड़ियों ने डसा उनमें से दो के मरने की खबर है। हालांकि शवों का पोस्टमॉर्टम नहीं हो पाया मगर कुछ कीट विज्ञानी मानते हैं कि ये मकड़ियां विषैली रही होंगी। चूंकि भारत में ये मकड़ियां पहले कभी देखी नहीं गईं इसलिए इन्हें लेकर विश्वभर के कीट विज्ञानियों में जिज्ञासा है। यहां तक कि विश्व प्रसिद्ध टाइम पत्रिका ने भी इस खबर को प्रमुखता से 4 जून 2012 के अंक में प्रकाशित किया है। मकड़ियों का यह आक्रमण पिछले महीने में देखा गया था और एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार ने इस पर ख़ास 'स्टोरी' की थी।
टैरनटूला   से मिलते जुलते  ऐसे ही थे वे मकड़े 

डिब्रूगढ़ और गुवाहाटी विश्वविद्यालय के कीट विज्ञानियों ने इस मकड़ी या मकड़े को पहचानने में असमर्थता व्यक्त की है मगर कहा है कि ये विश्व के एक खौफनाक विशाल मकड़े टैरनटुला के परिवार की हो सकती हैं। एक दूसरे कीट विज्ञानी ने कहा कि यह दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया मूल की मकड़ी ब्लैक विशबोन हो सकती है। मगर ऑस्ट्रेलिया की मकड़ी आखिर यहां कैसे आ पहुंची? मधुमक्खियों का झुंड में हमले करना एक आम घटना है और हॉलीवुड की कई फिल्मों में मधुमक्खियों के झुंडों में हमले के खौफनाक दृश्य भी दिखाए गए हैं। हालांकि हॉलीवुड मकड़ियों के हमले पर भी फिल्में बना चुका है। '8 लेग्ड फ्रीक्स' काफी चर्चित हुई थी। मगर मकड़ियों/मकड़ों का ऐसा आक्रमण कम से कम भारत में तो अब तक कहीं से सूचित नहीं है।
'8 लेग्ड फ्रीक्स' का एक दृश्य 
ब्रितानी प्रकृति विज्ञानी विजय के सिंह ने कहा है कि मकड़ियों का झुंड में हमला करना एक बहुत कम घटने वाली घटना है। उनके अनुसार पर्यावरण में हुआ कोई असामान्य परिवर्तन उनकी जनसंख्या वृद्धि को उकसा सकता है। जैसे पिछले वर्ष ऑस्ट्रेलिया में बाढ़ के पश्चात मकड़ियों के एक विशाल झुंड ने खेतो को मकड़जालों में तब्दील कर दिया था। पाकिस्तान में भी आयी विशाल बाढ़ के पश्चात मकड़ियों ने पेड़ पौंधों को मानो ढक सा दिया हो। सदिया की मकड़ियों को पहचान के लिए महाराष्ट्र के मकड़ी संस्थान (इन्डियन सोसायटी ऑफ अरैक्नोलॉजी) को भेजा गया है।
बहुत से लोग कई तरह के जीव जंतुओं को डर के चलते भरीपूरी आंख से देख भी नहीं सकते। मकड़ी ऐसे टॉप टेन भयावने जंतुओं की सूची में है। गोलियेथ टैरनटुला सबसे बड़ा मकड़ा है जो छोटी हमिंग चिड़ियों को भी अपना शिकार बना लेता है। यह एक फुट तक बड़ा हो सकता है और इसके विषदंत भी काफी बड़े होते हैं। माना जा रहा है कि सादिया का मकड़ा इसी नस्ल से मिलता जुलता है। इस तरह के मकड़ा-आक्रमण ने भारतीय मकड़ी विज्ञानियों की पेशानी पर बल ला दिया है। आगे की खोजबीन जारी है।

Monday, 4 June 2012

सूर्य पर शुक्र की चहलकदमी


जी हाँ आप भारत के किसी भी हिस्से से कल सुबह उठते ही एक बहुत दुर्लभ अद्भुत आकाशीय नज़ारा देख सकेगें जिसे शुक्र का पारगमन कहा जाता है .दरअसल यह सूर्य पर शुक्र का ग्रहण है .ठीक वैसे ही जैसे सूर्य ग्रहण या चन्द्र ग्रहण वैसे ही शुक्र ग्रहण ..मतलब सूर्य और धरती के बीच अपने परिक्रमा पथ पर शुक्र का आ टपकना..अब जब चंद्रमा सूर्य और धरती के बीच होता है तो चंद्रमा की पूरी चकती सूर्य को ढक लेती है- कारण यह कि नजदीक होने से चंद्रमा की चकती सूर्य की चकती के बराबर ही लगती है ..मगर शुक्र तो दूर होने से काफी छोटा लगता है और इसलिए यह सूर्य की बड़ी चकती पर बस चहलकदमी करता नज़र आता है ...कहने भर को ग्रहण होना चरितार्थ करता है ....और यह पूरा तमाशा सात घंटे चलेगा और इस बीच शुक्र सूर्य की चकती के इस पार से उस पार हो जाएगा -बस यही तो है शुक्र पारगमन जिसे लेकर इतना हौवा मचा हुआ है .
मगर यह एक दुर्लभ दृश्य इसलिए है कि जल्दी जल्दी नहीं घटता .अगला शुक्र पारगमन ११ दिसम्बर २११७ को घटित होगा और तब हम आप इस दुनिया में नहीं होंगे ....जाहिर है इस शताब्दी में यह अंतिम अवसर है इस आकाशीय नज़ारे को देखने का .....पिछली बार यह जून ८ ,२००४ को घटित हुआ था . दरअसल प्रत्येक २४३ वर्षों  में यह घटना जोड़ों में घटती है -इस शती में २००४ और २०१२ में यह घटना घटी है -इसके पहले जोड़े में आठ वर्षों के अंतराल पर १८७४ और १८८२ में घटी थी . इस नयनाभिराम दृश्य को सीधे नहीं देखा जा सकता .बल्कि ख़ास चश्मों से या रिवर्स इमेज तकनीक के सहारे जिसमें दूरबीन को सूर्य की ओर  बिना देखे फोकस कर रिवर्स तस्वीर कागज़ पर ली जाती है और घटना की प्रगति देखी जाती है . ऐसी तस्वीरो में सूर्य की चमकदार चकती पर शुक्र का काला धब्बा आगे बढ़ता हुआ दिखता जाता है .इस बार यह लगभग सात घंटे का मजमा है .

 भारत में कई वेधशालाएं इस दृश्य को आम लोगों को दिखाने का जतन   कर रही हैं .आप अपने शहर में ऐसे किसी अस्ट्रोनोमी क्लब ,या वेधशाला तक पहुँच कर इस दृश्य का लुत्फ़ उठा सकते हैं .या फिर इस मकसद हेतु ख़ास तौर पर बनाए काले चश्मों से सीधे भी देख सकते हैं या फिर वेबकैम के जरिये कम्प्युटर पर भी देख सकते हैं -कोई जुगाड़ न हो पाया तो परेशान न हो इस  वेबसाईट पर जाकर इस घटना क्रम के पल पल की जानकारी और दृश्य देख सकते हैं . टी वी भी इस दृश्य को फोकस करेगें ही ....हाँ इतना जरुर गाँठ बाँध लें कि दुर्लभ होने के बावजूद भी यह एक सामान्य खगोलीय  घटना ही है और मनुष्य के ऊपर इसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं पढने वाला है . अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन से इस बार इस घटना को कैमरे में कैद करने की तैयारी है .यह वीडियो  देखिये -




Monday, 28 May 2012

वे बड़े कि हम ......


मनुष्य के संज्ञानबोध का फलक बहुत सीमित है .हम एक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम के उपरी छोर के गामा विकिरणों और निचले स्तर के अल्ट्रा वायलेट फ्रीक्वेंसी के बीच हिस्से के प्रति ही संवेदित हो पाते हैं ,उसका संज्ञान ले पाते हैं . यही हमरा दृश्य क्षेत्र है . इसे हमारा दृश्य संवेदी अंग रंगों में देखता है जहाँ नीले के ठीक ऊपर अल्ट्रा वायलेट -परा बैगनी क्षेत्र है जिसे कीट पतंगे तो देख लेते हैं मगर हम नहीं ...यही बात आवाज के साथ भी है जहाँ हमारी  सीमाएं निर्धारित हैं -चमगादड़ उच्च तरंग दैर्ध्य वाली वे परा ध्वनियाँ सुन लेते हैं जिनका हमें भान  तक नहीं होता ...और हाथी बहुत कम तरंग दैर्ध्यो वाले आवाज में संवाद कर सकते है और वह भी हमारे पल्ले नहीं पड़ता . 

कुछ मछलियाँ विद्युत् तरंगों के सहारे गंदे पानी में भी गंतव्य तक जा पहुँचती हैं और यह क्षमता  भी मनुष्य में नदारद है . हम धरती के चुम्बकीय क्षेत्र की अनुभूति से भी वंचित हैं जिसका लाभ उठाकर बहुत से पक्षी प्रवास गमन करते हैं . और हम बरसात के बादल भरे  दिनों  में आकाश के उन सूर्य -प्रकाश के ध्रुवित पुंजों को भी लक्षित नहीं कर पाते जिनसे मधुमक्खियाँ सहारा पा अपने छत्ते और फूलों के बीच आने जाने का  रास्ता तय करती हैं ... 

मगर हमारी सबसे बड़ी अक्षमता  है स्वाद और गंध के मामले की जिसमें हम सभी जीव जंतुओं से पिछड़ गए हैं .जीव जगत के ९९ फीसदी सदस्य चाहे वे बड़े जानवरों से लेकर कीड़े मकोड़े  तक क्यों न हो रासायनिक /गंध के इस्तेमाल से  संवाद कर लेते  हैं . इन रसायनों को वैज्ञानिक फेरोमोन कहते हैं . गंध की क्षमता में ब्लड हाउंड कुत्तों और रैटल स्नेक के सामने हम निरे लल्लू ही हैं ... अपनी गंध और स्वाद की अनुभूति की अक्षमताओं ने मनुष्य को इतना लाचार कर दिया है कि इनसे जुड़े बहुत से अनुभवों के लिए वह तरह तरह की उपमाएं ढूंढता फिरता है .. मतलब  गंध और स्वाद के बखान के लिए मनुष्य के पास बहुत कम शब्द संग्रह है . हालांकि मनुष्य इन कमियों की भरपाई के लिए तरह तरह के यंत्र /डिवाईस-जुगतें बना रहा है . कृत्रिम संवेदी नाक है तो जीभ की कृत्रिम स्वाद कलिकाएँ प्रयोगशालाओं में बनायी जा रही हैं जिनके लिए जीव जंतु माडल के रूप में चयनित किये गए हैं . 

नए प्रयोगों में  मनुष्य की निर्भरता जीव जंतुओं पर बढ़ती जा  रही है ..फिर भी हम अपने को सर्वोच्च मानने के मुगालते में ही हैं .... 

Thursday, 17 May 2012

दैत्याकार होते मनु पुत्र !

अभी इसी वर्ष की बीती फरवरी में  रूसी वैज्ञानिकों के एक अभियान दल ने अन्टार्कटिका में एक इतिहास रच दिया .विगत तकरीबन एक दशक से यहाँ के विपरीत मौसम में भी प्रयोग परीक्षणों में जुटे इन वैज्ञानिकों ने ठोस बर्फ की ३.२ किमी गहरी  खुदाई पूरी करते ही एक ऐसा दृश्य देखा कि अभिभूत हो उठे ...यहाँ एक ग्लेशियर नदी कल कल कर बह रही थी ...जो करीब ३.४ करोड़ वर्ष पहले से वहां दबी पडी थी और इतने लम्बे अरसे से सूर्य के किरणों से उसका मिलन नहीं हुआ था .यह युगों से शान्त स्निग्ध बहती जा रही थी .....अभिभूत वैज्ञानिकों ने इसका नाम रखा वोस्टोक...मगर  एक और पहलू भी था, वोस्टोक के जल में करोडो वर्षों पहले के माईक्रोब -सूक्ष्म जीव भी हो सकते थे जिनसे आज की मानवता परिचित नहीं है -और ये अनजाने आगंतुक किसी नयी महामारी को न्योत दें तब ? वोस्टोक के जल का ताप और संघटन बृहस्पति के एक उपग्रह /चाँद यूरोपा की प्रतीति कर रहे थे ...वैज्ञानिकों को यह सूझ कौंधी कि वोस्टोक के विस्तृत अध्ययन से सौर मंडल के समान पर्यावरण वाले ग्रहों -उपग्रहों ,ग्रहिकाओं का भी अध्ययन धरती पर बैठे ही हो सकेगा .. 
वोस्टोक 
ऊपर का दृष्टांत मनुष्य की अन्वेषी और सर्वजेता बनने की भी प्रवृत्ति का उदाहरण प्रस्तुत करती है .आज मनुष्य ने धरती के  बर्फ से बिना ढके तीन चौथायी से अधिक के भू /जल भाग की जांच पड़ताल कर रखी है .मानव चरण वहां पड़ चुके हैं . और एक कहावत हैं न- जहं जहं चरण पड़े संतों के तहं तहं बंटाधार ...ऐसी ही स्थिति अब उजागर होने लगी है क्योकि मनुष्य जहाँ जहाँ पहुँच रहा है पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है ,प्रकृति का ताम झाम बिखर रहा है . धरती के ४.५ अरब के इतिहास में मनुष्य अभी कुछ पलों पहले ही अवतरित हुआ है मगर कारनामें ऐसे कि धरती के तीन चौथायी हिस्से पर कब्ज़ा हो चुका है .. दुनिया  के ९० प्रतिशत पेड़ पौधे मनुष्य की छाया में आ गए हैं . अब तक हमने कितने ही वनों उपवनों को उजाड़ डाला है और हजारों प्रजातियों के विलुप्त हो जाने का दुष्कृत्य कर डाला है मगर हमारे पाँव अभी थमे नहीं हैं . सागरों को हमने अपनी गतिविधियों से मथ डाला है ,सागर संपदा का भयंकर दोहन किया है ,मछलियाँ खात्में के कगार पर हैं ..समुद्रों  में भी कई 'रेगिस्तानी जोन' बन गए हैं जो सीधे सीधे हमारी गतिविधियों की ही देन हैं .

मनुष्य की गतिविधियाँ इतनी तेजी से धरती का हुलिया बिगाड़ रही हैं जो वैज्ञानिकों की पेशानी पर बल डाल रही हैं .अभी तो १०-१२ हजार साल पहले ही  धरती एक हिमयुग से मुक्त हुयी और मानव ने खुद का विस्तार शुरू किया था ...और इतने शीघ्र सब कुछ इतना बदल गया? कहने को तो यह धरती युग 'होलोसीन इपोक'  कहलाता है मगर वैज्ञानिकों ने इस युग का नया नाम ढूंढ लिया है -अन्थ्रोपोसीन, मतलब मनुष्य का युग .यह नामकरण देते हुए नोबेल लारियेट  पौल क्रुटजेन ने कहा है कि" मनुष्य और प्रकृति के बीच वस्तुतः अब कोई लड़ाई ही न रही ,यह अब एकतरफा मामला है -अब मनुष्य ही यह निर्णय कर रहा है कि कुदरत का क्या होना है और भविष्य में वह कैसी रूप लेगी ? "

 अभी मुश्किल से १५-२० हजार साल पहले तक मनुष्य केवल एक गुफावासी आखेटक हुआ करता था ,फिर तकरीबन दस हजार वर्ष पहले से ही मनुष्य ने  कृषि कर्म अपनाया और धरती का चेहरा बदलने लगा . आज धरती के  बर्फ से रहित भाग का ३८% कृषि योग्य जमीन में तब्दील किया जा चुका है ..बर्फ पर खेती संभव नहीं हो पायी है नहीं तो वह वहां भी हरियाली बिखेर चुका होता ..कहते हैं कृषि के चलते मनुष्य की रक्तबीजी जनसंख्या भी बढ़ चली है . मगर १८०० की औद्योगिक क्रान्ति ने तो मनुष्य की विकास की गतिविधियों में मानों एक "विस्फोट ' सा कर दिया ....और अन्थ्रोपोसीन युग की नींव डाल दी ....हम देखते देखते १ अरब से सात अरब के ऊपर जा पहुंचे हैं और हमारे इस तेज वंश वृद्धि पर प्रसिद्ध समाज जैविकीविद ई ओ विल्सन ने चुटकी लेते हुए कहा है कि यह वृद्धि तो जीवाणुओं की प्रजननशीलता को भी मात करती है . आज धरती पर मनुष्य का जैवभार उन सभी दैत्याकार छिपकलियों -डायनासोरों से भी सौ गुना ज्यादा हो चुका है जिनका कभी धरती पर राज्य था ...
इतनी बड़ी महा दैत्याकार जनसंख्या  के पोषण में हमारे कितने ही खनिज ,तेल आदि संसाधन स्वाहा हो रहे हैं . अन्थ्रोपोसीन धरती का बुरा हाल किये दे रहा है . इसके अंगने में अब प्रकृति का कोई काम ही नहीं रहा ....नैसर्गिकता के दिन लद चले हैं ...हाँ संरक्षणवादियों चिल्लपों तो मची है मगर उनकी आवाज विकास के पहिये के शोर में अनसुनी सी रह जा रही है . आखिर हम धरती को अब और कितना रौंदेगें? मगर क्या कोई विकल्प बचा भी है ?