Wednesday, 17 June 2009

मानव एक नंगा कपि है ! (डार्विन द्विशती ,विशेष चिट्ठामाला -3)

प्रमाण ही प्रमाण
ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि मानव की वैकासिक प्रक्रिया का केन्द्र स्थल अफ्रीका था। वहाँ के विराट जंगलों में विकास की एक विराट यात्रा चुपचाप सम्पन्न हो रही थी। आज के विकासविद् अफ्रीका को मानव विकास का पालना मानते हैं। आज के लगभग 7 करोड़ वर्ष पूर्व, आधुनिक लीमर व टार्सियस के संयुक्त पूर्वज `प्रासिमियन्स´ के क्रमानुक्रमिक विकास से जहाँ अफ्रीकी जंगलों में एक ओर बन्दरों का विकास हुआ तो वहीं इनसे ही कालान्तर में कपि सदृश प्राणी `एजिप्टोपिथेकस´ का विकास हुआ। इसी कपि सदृश प्राणी ने आज के वर्तमान कपियों व मानव के संयुक्त पूर्वज ``ड्रायोपिथेकस´´को विकसित किया। `ड्रायोपिथेकस´ पूरा `चौपाया´ ही नहीं था बल्कि उसके दोनों अगि्रम हाथ कभी-कभी स्वतंत्र कार्य कर लेते थे, तब वह दो पैरों पर ही खड़ा हो चल भी लेता था।


प्राणी विकास की दूसरी महान घटना का सूत्रपात `डायोपिथेकस´ के दोनों अगि्रम हाथों के स्वतन्त्र हो जाने से हो गया था। एजिप्टोपिथेकस , ड्रायोपिथेकस व अन्य वानर पूर्वजों के जीवाश्म उत्खननों के दौरान प्राप्त हुए हैं , जीवश्मों के अध्ययन से यह पता चलता है कि `ड्रायोपिथेकस´ की एक शाखा से लगभग 2 करोड़ वर्ष पूर्व कपियों या वनमानुषों का वंशक्रम चला- जिससे आज के गोरिल्ला, चिम्पान्जी, गिब्बन व ओरंगउटान विकसित हुए। ये सब झुककर चलते थे, मुँह सामने न होकर नीचे की ओर झुका सा रहता था। इसका कारण यह था कि इनमें रीढ़ की हड्डी सीधी न होकर झुकी अवस्था में थी।

मानव के आदि स्वरूप, `रामापिथेकस´ का जन्म :
`ड्रायोपिथेकस´ की दूसरी शाखा से पहली मानव आकृत उभरी-`रामापिथेकस´ के रूप में। `रामापिथेकस´ के जीवाश्म अवशेष भारत की शिवालिक पहाड़ियों (चण्डीगढ़) में भी मिले हैं। मानव का आदि स्वरूप लगभग एक करोड़ वर्ष पूर्व अवतरित हुआ था। यह अपेक्षाकृत सीधा खड़ा हो सकता था। अग्रपाद पूर्णतया स्वतंत्र होकर `हाथों का स्वरूप ले चुके थे। यह अपनी `टांगों पर सुगमता से चल सकता था, भाग दौड़ कर सकता था। मस्तिष्क अच्छी तरह विकसित हो गया था। मस्तिष्क जो सोचता था, हाथ उसे क्रियािन्वत रूप देने का प्रयास करते थे। मस्तिष्क और स्वतंत्र हाथों के इस संयोजन ने इसे एक अद्भुत क्षमता प्रदान कर दी थी, जिसने विकास प्रक्रिया को आधुनिक मानव तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त किया।





वनमानुष से आदमी तक का सफर




समय बीतता गया। `रामापिथेकस´ का तन-मन और विकसित तथा अनुकूलित होता गया। इसका ही विकसित स्वरुप `आस्ट्रैलोपिथेकस´ कहलाया। आस्ट्रैलोपिथेकस ने ही आगे चलकर आधुनिक मानवों के सीधे पूर्वजों (होमो इरेक्टस ) को जन्म दिया। `होमो इरेक्टस´ (सीधा मानव ) एक तरह से पूरा मानव बन चुका था। यह पूरी तरह से सीधा होकर चलता था, दौड़ता था, झुण्डों में जंगली पशु-पक्षियों को आखेट करता था। नयेन्डर्थल घाटी में इनके वंशजों को जीवाश्म मिले हैं जो `नियेन्डर्थल मानव´ के नाम से जाने जाते हैं। होमोइरेक्टस का ही एक पूर्ण विकसित स्वरूप `क्रोमैगनान मानव´´ कहलाया। क्रोमैगनान मानव आज के मानवों (होमो सेपियेंस- बुद्धिमान मानव) के स्वरूप में अपना भविष्य सुरक्षित करके विलुप्त हो गया।

आधुनिक मानव का विकास अभी भी हो ही रहा है- उसके आगामी स्वरूपों का निर्धारण भविष्य करेगा। परन्तु विकास की दृष्टि में, भविष्य, अतीत पर ही अवलिम्बत होता है, स्वतंत्र निर्णय की क्षमता उसके वश की बात नहीं।

जारी

Saturday, 13 June 2009

मानव एक नंगा कपि है ! (डार्विन द्विशती ,विशेष चिट्ठामाला -2)

मानवीय चिन्तन के इतिहास का वह अविस्मरणीय क्षण !
मानव के उद्भव को लेकर जब धार्मिक मान्यतायें अपने चरमोत्कर्ष पर जनमानस को प्रभावित कर रही थीं, मानव चिन्तन के इतिहास में, उन्नीसवीं शताब्दी के छठवें दशक में एक `धमाका´ हुआ। एक तत्कालीन महान विचारक चाल्र्स डार्विन (1809-1882) ने सबसे पहले अपने अध्ययनों के आधार पर यह उद्घोषणा की कि मानव जैवीय विकास का ही प्रतिफल है और अन्य पशुओं के क्रमानुक्रमिक विकास के उच्चतम बिन्दु पर आता है। इस `कटु सत्य´ का गहरा प्रभाव पड़ा। अनेक धर्मावलिम्बयों ने डार्विन को बुरा-भला कहना शुरू किया। सामान्य लोगों की ओर से भी उन्हें अपमान, तिरस्कार एवं उपेक्षा मिली। लोग उन्हें घोर नास्तिक, अहंवादी, भ्रमित व पागल जैसे विशेषणों से विभूषित करने से अघाते न थे। डार्विन इन सबसे यद्यपि मूक द्रष्टा को भाँति तटस्थ से थे, किन्तु फिर भी वे अपने निष्कर्ष पर अडिग थे।

डार्विन के विचार तर्क सम्मत, तथ्यपूर्ण एवं प्रमाण संगत थे। वे इस निष्कर्ष पर वर्षों के शोध व चिन्तन से पहुँचे। एच0एम0एस0 बीगल पर की गयी अपनी महत्वपूर्ण यात्रा के दौरान उसने कई, द्वीपसमूहों (मुख्यत: गैलापैगास द्वीप समूह) पर जाकर पशु-पक्षियों के आकार-प्रकारों, विभिन्नताओं और विकासक्रम का गहन अध्ययन किया था। वे सृष्टि विकास के मर्म को समझ गये थे।


डार्विन ने वर्तमान कपियों और मानवों के बीच की एक विलुप्त हो गयी कड़ी (मिसिंग लिंक ) की ओर विचारकों /वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया था। उस `लुप्त कड़ी´ की खोज जोर शोर से शुरू हो गयी। यह बताना आवश्यक है कि डार्विन ने कभी भी मानव को बन्दरों का सीधा वंशज नहीं कहा था। डार्विन का संकेत बस यही था कि मानव और कपियों के संयुक्त पूर्वज कभी एक थे। कपि जैसे, जिस प्राणी -पहले प्रतिनिधि `मानव आकृति´ का जो स्वरूप उभरा रहा होगा वह विलुप्त हो चुका है। और इस बात की पुष्टि के लिए उसकी खोज होनी चाहिए।
पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध और आज तक के मानव विकास सम्बन्धी अवधारणाओं का इतिहास बस उसी `विलुप्त कड़ी´ के लिए सम्पन्न हुई खोजों में प्राप्त बन्दरों, कपियों व मानवों के तरह-तरह के फासिल्स पर ही आधारित है।

नर-वानर कुल के सदस्य और उनका वैकासिक इतिहास :
आधुनिक विकासविदों का मानना है कि आज से लगभग 40 करोड़ वर्ष पूर्व पृष्ठवंशी प्राणियों का उद्भव शुरू हुआ। पहले मछलियों के आदि पूर्वज आये, फिर मछलियाँ जन्मी, मछलियों ने उभयचरों (मेढक कुल) को जन्म दिया। कालान्तर में इन्हीं, उभयचरों की एक शाखा में सरीसृपों यानी रेंगने वाले जंतुओं का विकास हुआ। इन्हीं सरीसृपों की एक शाखा से स्तनपायी सरीखे एक सरीसृप `साइनोग्नैपस´ का जन्म हुआ। इसी `साइनोग्नैपस´ से स्तनपोषी प्राणियों का विकास हुआ . यही वह समय भी था जब पक्षी सदृश डायनासोर (सरीसृप) से पक्षियों का भी विकास होना प्रारम्भ हुआ था।


सरीसृप डाल से विकसित हो रहे स्तनपोषियों की एक शाखा ने कीटभक्षी छन्छून्दर जैसे प्राणियों को जन्म दिया। अपने विकास कम में, इन प्राणियों ने जमीन को त्यागकर वृक्षों को अपना आवास बनाया- इनका जीवन `हवाई´ हो गया। यह वहीं समय था जब स्थल पर खूँखार मांसाहारी स्तनपायी जैसे बिलाव परिवार के सदस्य (बाघ, शेर, चीता, तेन्दुआ) तथा अन्य आक्रामक पशुओं का राज्य था। जमीन का `अस्तित्व का संघर्ष´ अपना नृशंस रूप धारण कर चुका था। स्थलीय जीवन अब खतरों से भर गया था। अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए छछूँदर जैसे स्तनपोषी ने जमीन त्यागकर वृक्षों की शाखाओं पर शरण ली। इनसे ही आधुनिक बन्दरों (नये संसार `अमरीका´ व पुराने `एशिया और यूरोप´ के वर्तमान बन्दर) के आदि पूर्वज का विकास हुआ जो `प्रासिमियन्स´´ कहलाते हैं। इन्हीं `प्रासिमियन्स´ से दो शाखायें उपजीं, जिनसे आधुनिक बन्दरों से मिलते-जुलते प्राणियों (लीमर, लौरिस व टार्सियस) का विकास हुआ। इनमें मुख्य विशेषता थी, इनकी आँखों का मुखमण्डल पर सामने की ओर आ जाना। ऐसी `विशिष्टता´ पहले के प्राणियों में नहीं थी। यह मस्तिष्क के उत्तरोत्तर विकास का परिणाम था। लोरिस व टार्सियस की दृश्य क्षमता अब, त्रिविम्दर्शी -स्टीरियोटिपिक दृष्टि के कारण अन्य प्राणियों की तुलना में परिष्कृत हो गयी थी। प्राणी विकास-क्रम में यह एक महत्वपूर्ण घटना थी। लोरिस व टार्सियस के वंशज आज भी अफ्रीकी जंगलों में बहुप्राप्य हैं।

जारी ......

Tuesday, 9 June 2009

मानव एक नंगा कपि है ! (डार्विन द्विशती ,विशेष चिट्ठामाला -१)

वर्तमान विश्व के जंगलों में लगभग 200 प्रजाति के बन्दरों व वनमानुषों या कपियों (ऐप) का अस्तित्व है। इन सभी के शरीर वालों से ढके हैं। परन्तु एक कपि इसका अपवाद है। उसके शरीर पर बाल नहीं के समान है। उसका शरीर नंगा है। वह नंगा कपि है उसने ही स्वयं का नाम `मानव´ रख लिया है वह सबसे विकसित, बुद्धिमान, सुसंस्कृत व सभ्य किस्म का कपि है। यह बुद्धिमान किन्तु `नंगा´ कपि इस पृथ्वी पर कहाँ से आ गया? धरा के अन्य जीवों, पशु-पक्षियों से उसका क्या सम्बन्ध है? वह बुद्धिमान कैसे हुआ?

मानव की धार्मिक मान्यतायें :

अपने विकास के दौरान जब मानव ने पहले-पहल `चिन्तन´ शुरू किया तो उसके मन में यह प्रश्न विशेष रूप से कौंधा कि आखिर वह कौन है और कहाँ से आया है? अपने जिज्ञासु मन की तुष्टि के लिए ही मानव ने अपने उद्भव के सन्दर्भ में कई रोचक कल्पनायें भी कीं। देवी-देवताओं जैसी `अलौकिक सत्ताओं´´ की उसने स्वत: खोज कर डाली और उनसे अपने उद्भव, अस्तित्व आदि को संयुक्त कर दिया। उसकी अज्ञानतावश ही कई अन्धविश्वासों को भी बल मिला।

कृपया चित्र को बड़ा करके देखें (साभार :इंसायिक्लोपीडिया ब्रिटैनिका ,स्टुडेंट संस्करण )

उसने धार्मिक मान्यताओं का भी सृजन किया, अपने सुख-शान्ति और तमाम अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर के लिए। इन्हीं धार्मिक मान्यताओं ने उसे उसके जन्म, मृत्यु सम्बन्धी सभी गूढ़ समझे जाने वाले प्रश्नों का यथासम्भव उत्तर दिया है, जिनका अभी तक स्पष्टत: कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिल पाया है। लिहाजा अब मानव की जिज्ञासु प्रवृत्ति बहुत कुछ `शान्त´ हो चली थी--वह संतुष्ट हो चला था। अभी पिछली शताब्दी के मध्यकाल तक ऐसा निर्विवाद माना जाता था कि मानव का अलौकिक सृजन हुआ है और पृथ्वी के अन्य पशु-पक्षियों से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। विश्व के लगभग सभी पौराणिक साहित्य में, मानव के उद्भव को लेकर रोचक कथायें हैं। हमारी प्रसिद्ध पौराणिक मान्यता यही है कि आज का मानव मनु और श्रद्धा दो महामानवों का वंशज है। यह दम्पित्त पुराणोक्त महाप्रलय में भी बच गया था और तदनन्तर इसी ने नयी सृष्टि का संचार किया।

प्रसिद्ध ईसाई ग्रन्थ बाइबिल भी मानव उत्पित्त के पीछे इसी भँति साक्ष्य देता है और आदम तथा हौव्वा को आज के मानवों का जनक बताता है। वैसे आज भी विश्व की अधिकांश धर्मभीरु जनता भ्रमवश इन्हीं मान्यताओं में विश्वास रखती है- परन्तु मानवोत्पित्त को लेकर अब की वैज्ञानिक विचारधारा यह है कि वह अन्य पशुओं से ही विकसित एक समुन्नत सामाजिक पशु ही है।

जारी .......

Saturday, 6 June 2009

आखिर चार्ल्स डार्विन ने आखीर में यह क्या कह दिया !

आज चार्ल्स डार्विन की लिखी उस महान ४५८ पेजी पुस्तक - ओरिजिन ,जिसने वैचारिक दुनिया में कभी तहलका मचा दिया था के छंठे संस्करण का परायण पूरा हुआ जिसे पिछले दो माहों से मैं लगातार पढता रहा हूँ ! मुझे लगता है की इस पुस्तक को यदि इंटर /बी एस सी नहीं तो एम् एस सी बायलोजी कक्षाओं में अनिवार्य कर ही दिया जाना चाहिए ! मैंने तो इसके मुद्रित संस्करण को झेला है मगर यदि आपको फुरसत है तो ऊपर के लिंक पर जाकर यह पुनीत कार्य -अंजाम दे सकते हैं !

आप छात्रों को कुछ और पढाएं या नहीं इस किताब का पढ़ना मात्र ही बायलोजी में एक ही नहीं अनेक पी एच डी का ज्ञान प्राप्त करनेके समतुल्य है -हमें दुःख है कि हमारे अध्यापकों ने इस पुस्तक को मूल रूप में पढने को कभी हमें रिकमेंड नही किया ! बस इसका डाईजेस्ट पढ़वाते रहे ! यह हमारी शिक्षा प्रणाली का दोष है जिसका परिणाम है कि भारत में मौलिक शोध न के बराबर हो पा रहा है -कारण बच्चों को ऐसा संस्कार ही नही मिलता कि वे अपनी जिज्ञासा और खोज की प्रवृत्ति को सही दिशा दे सकें ! बहरहाल पुस्तक आज सुबह पूरी हुयी मगर इस महान महान पुस्तक का समपान वाक्य देख कर मैं थोडा अचकचा गया -डार्विन ने पूरी पुस्तक में जीवों के किसी अलौकिक सृजन का जोरदार खंडन किया है और सर्जक की भूमिका को सिरे से नकार दिया है मगर हद हो गयी जब अंत में महाशय यह क्या लिखते भये हैं -

There is grandeur in this view of life, with its several powers, having been originally breathed by the Creator into a few forms or into one; and that, whilst this planet has gone cycling on according to the fixed law of gravity, from so simple a beginning endless forms most beautiful and most wonderful have been, and are being evolved।

चलिए इस वाक्य का एक चलताऊ हिन्दी अनुवाद ट्राई किया जाय -
जीवन की विभिन्न शक्तियों के बारे में यह विचार कितना उच्च है कि सृजनकर्ता द्वारा जीवन के किसी एक अथवा कुछ रूपों को अनुप्राणित कर देने /रच देने के उपरांत एक ओर जहाँ गुरुत्वाकर्षण के स्थायी नियमों के अधीन धरती चक्कर लगाती रही वहीं एक अति साधारण से प्रारंभ से जीवों के अनंत खूबसूरत और अद्भुत रूपों का विकास हुआ और होता जा रहा है .

बड़ी मुश्किल है -डार्विन अपनी पूरी पुस्तक में सृजनकर्ता /सृष्टिकर्ता की भूमिका को नकारते रहे मगर अंत में एक ऐसा समापन वाक्य रच डाला जो कट्टर पंथियों को सीना फुलाकर सृजन्वाद के पक्ष में बोलने का अवसर प्रदान कर गया -क्या डार्विन तत्कालीन चर्च और पादरियों से डर गए थे और उन्हें आर्किमिडीज और ब्रूनो का दहशतनाक हश्र याद हो आया था जो उन्होंने यह समझौता वादी नजरिया अपना लिया ? या फिर सीधे साधे यह कि डार्विन भी कहीं न कहीं "क्रियेटर '' की भूमिका को नकार नहीं पायें ! मैं तो पहले वाली संभावना के पक्ष में हूँ ! आप क्या सोचते हैं ??

Tuesday, 2 June 2009

स्वायिन फ्लू -ताजातरीन !

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अब इस विश्व महामारी ( पैन्डेमिक ) के स्तर को ६ पर ले जाने का फैसला कर लिया है .आपको याद दिला दें कि पैडेमिक -महामारियों के स्तर को एक ६ बिन्दु वाले स्केल से जाना समझा जाता है -६ का मतलब है कि अमुक वैश्विक महामारी दुनिया में चारो ओर फैल चुकी है ! स्वायिन फ्लू के यूरोप ,एशियाई देशों जिसमें भारत भी है ,दक्षिण अमेरिका ,आस्ट्रेलिया ,जापान आदि जगहों से फैलने के समाचारों की पुष्टि हो गयी है .
कुल मिला कर इसने ६४ देशों को अब अपने गिरफ्त में ले लिया है .अब तक ११७ मौतें जाहिर हो चुकी हैं .

विश्व स्वास्थ्य संगठन पर इस बात का दबाव पड़ रहा था कि इस महामारी के स्तर को ६ न घोषित किया जाय ! क्योकि इससे वैश्विक आवाजाही ,व्यवसाय और पर्यटन पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है -मगर अभी कल ही २३ देशों के ३० महामारी विशेषज्ञों कीसमवेत राय पर इसके छठें स्तर का अलर्ट किसी भी समय घोषित करने का फैसला ले लिया गया है.इसका आशय तो यही हुआ कि हमें इस त्रासदी के प्रति अपना शुतुरमुर्गी रवैया छोड़कर अब सतर्क हो जाना चाहिए !


स्वायिन फ्लू का वाहक वाईरस एच १ एन १ बहुत शातिर है और स्वस्थ युवाओं तक को भी अपने चपेट में ले रहा है जिनकी रोग प्रतिरोधन क्षमता काफी अच्छी मानी जाती है ! याद रखें इससे बचने का सबसे सरल तरीका है -अपने हाथ को कहीं भी बाहर से आने पर साबुन से साफ़ करें ! जिसे फ्लू हुआ दिखायी दे ,सामना होने पर मुंह नाक को रूमाल से ढकें ! विदेश से आने वाले मेहमानों पर चौकस नजर रखें ! उनके फ्लू ग्रस्त होने पर अपने करीब के स्वास्थ्य अधिकारियों को सूचित करें -जैसे जिले के कलेक्टर या चीफ मेडिकल आफीसर (सी एम् ओ )को !


भारत में महामारी के तीन मामलों के पुष्टि हो चुकी है -पहला केस दुबई से होकर न्यूयार्क से हैदराबाद आये एक छात्र का है और नया मामला मां बेटे का है और यह भी बरास्ते दुबई न्यूयार्क से ही कोयम्बतूर पहुँचने का है सभी का इलाज भारत में उपलब्ध एकमात्र प्रभावी औषधि टामीफ्लू से किया जा रहा है .


Sunday, 24 May 2009

ईडा से मिलिए !

ईडा -सौजन्य :ग्रेग लैडेन्स ब्लॉग
जी हाँ यह हैं हमारी अति प्राचीन/आदि पुरखा जिन्हें लेकर इन दिनों काफी हो हल्ला मचा हुआ है !अभी उसी दिन मल्हार वाले अपने पा.ना. सुब्रमणियन ने मुझे इस बारे में निजी मेल भेज कर जैसे सोते से जगाया ! मनुष्य के उद्भव की जड़े तलाशते जीवाश्म विदों को यह फासिल /जीवाश्म जो दरअसल एक नर वानर आदि कुल के मादा प्रतिनिधि लेमूर का है जर्मनी में मिला है -इसे एक नए गण का नामकरण देते हुए डार्विनियस मैसिली प्रजाति बताई गयी है !


यह करीब ४.७ करोड़ वर्ष पहले की है और बहुत बढ़िया हालत में मिली है -पूरी तरह परिरक्षित ! नर वानर कुल को दो समूहों में बाटा गया है -स्ट्रेपसिर्रहिनी और हैप्लोरिनी ! स्ट्रेपसिर्रहिनी में तो मेडागास्कर के लेमूर और लोरिस आते हैं तथा एशिया और अफ्रीका के पोत्तोस और गल्गोस ! हैप्लोरिनी नयी और पुरानी दुनिया के बंदरों और कपियों से सम्बन्धित है जोआकार में मनुष्य सादृश्य रखते हैं ! ऐसा डी एन ए अध्ययन बताते हैं कि ये दोनों समूह तकरीबन ८ करोड़ वर्ष पहले एक दूसरे से अलाग थलग अस्तित्व में आ चुके थे ! अभी मिले ईडा के जीवाश्म से मानव विकास की कई अनसुलझी गुत्थियों के सुलझने की उम्मीद की जा रही है - अध्ययन से पता चलता है कि यह एक मादा फासिल है जिसका वजन ५८० ग्राम है -इसे शाकाहारी होना पाया गया है !

यह एक स्तापित मान्यता है कि मनुष्य का उद्भव अफ्रीका में हुआ -अब जर्मनी के इस अति प्राचीन जीवाश्म के मिलने से क्या मनुष्य की उत्पत्ति के बहु क्षेत्रीय माडल को तो बल नही मिलेगा ! आप इस फसिल के बारे में मेरे एक प्रिय बुक मार्क ब्लॉग साईट -ए ब्लॉग अराउंड द क्लाक पर नजरे फिरा सकते हैं और एक जबरदस्त बाईस्कोप यहाँ देख सकते हैं !













Monday, 11 May 2009

आख़िर पहचान ही ली गयी चिडिया ! भाग्य की मारी कोयल बिचारी !

ऐसी ही दिखती है मादा कोयल !
आखिर वह हतभाग्य चिडिया पहचान ही ली गयी ! मादा कोयल थी बेचारी ! इस समय उनका प्रजनन काल चल रहा है ! और आप जानते होंगें कोयल अपना घोसला तो बनाती नही -यह एक नीड़ परजीवी पक्षी है जो कौए जैसे चालाक पक्षी के घोसले में ,काग दम्पति की आंखों में धूल झोक कर अंडा भी दे आती है और बगलोल बना कौवा दम्पति कोयल शिशु को अपना समझ कर पालता पोषता है -एक दिन वह अहसान फरामोस भी अपने बाबुल के घर को उड़ चलता है -ठगे से रह जाते हैं कौवे !

लेकिन कभी कभी कोयल को इस खतरनाक खेल में जान की भी आहुति देनी पड़ जाती है -जैसा शायद इस बार हुआ ! कौवो ने कोयल को खदेडा या मारा पीटा भी शायद और वह बिचारी असमय ही कल कवलित हो गयी ! जिन्होंने मादा कोयल न देखी हो वे देख लें ध्यान से -यह भूरी सी होती है और शरीर पर सफ़ेद बुंदियाँ होती हैं !
कई लोगों ने इस चिडिया को पहचानने की ईमानदारी से कोशिश की और कुछ लोगों ने इसकी सही पहचान स्थापित करने में मदद की -मैं उन सभी का ह्रदय से आभारी हूँ !

मेरी भतीजी स्वस्तिका को सही उत्तर भी मिल गया और कोयल कौए के बीच की यह सच्ची कहानी भे उसे मालूम हो गयी !