Friday, 20 February 2009

पुरूष पर्यवेक्षण -नाभि दर्शन !

विष्णु की नाभि से जन्मे हैं ब्रह्मा ( सौजन्य - वैष्णव वायस )
पुरूष पेट के मानचित्र पर नाभि एक पूरा द्वीप ही है ! और एक खान्च्दार (डिप्रेसन ) रेखा भी नाभि से वक्ष के निचले हिस्से तक जाती है -मगर यह नाभि रेखा ( लीनिया अलवा ) तुंदियल लोगों में नही दिखती .छरहरे युवाओं में यह स्पष्ट और नाभि के नीचे तक भी दर्शनीय है .नाभि की अंतर्कथा बहुत रोचक है -पुराने समय के चित्रकारों के सामने -खासतौर पर ईसाई धर्म के अनुयायी के सामने यह संकट आन पड़ा कि आदम के चित्रों में नाभि दिखाएँ भी अथवा नहीं .क्योंकि आदम 'गर्भजात ' तो थे नहीं और जब "ईश्वर ने मनुष्य को अपनी ही इमेज में बनाया " है तो ईश्वर को भी नाभि तो होनी ही चाहिए ! यह उधेड़बुन चलती रही ! हिन्दू पुराण -दर्शन में कोई भ्रम नही रखा गया -क्षीर सागर में शयनरत विष्णु की नाभि तो दिखायी ही गयी उससे एक कमल नाल और कलमल पुष्प और उस पर विराजे ब्रह्मा को को भी दर्शित किया गया ।
सबसे रोचक मामला तो तुर्कों का है जिनकी एक दंतकथा के मुताबिक जब अल्लाह मियाँ ने पहला आदमी बनाया तो शैतान आग बबूला हो उठा और नवजात पर हिकारत से थूक बैठा और वह थूक नवजात के पेट के बीचों बीच आ गिरा -मगर अल्लाह के उस थूक के तुरंत हटाने की जल्दी में कि कहीं यह पूरे शरीर तक न फैल जाय एक गड्ढा सा बन गया जो नाभि(बोडरी) कहलाया ! बुद्ध दर्शन भी नाभि को बडी महत्ता देता है और उसे ब्रह्मांड का का केन्द्र तक मानता है !
नारी नाभि तो कामुकता के परिप्रेक्ष्य में ली जाती है मगर पुरूष नाभि इस अल्न्कारिकता से वंचित ही है -सब जानते हैं कि नाभि माँ के पेट में उससे प्लेसेंटा के जरिये जुड़ कर पोषण प्राप्त करने का माध्यम रही है इसलिए नाभि नाल सम्बन्ध को जीवन दाई सम्बन्ध के रूप में देखा जाता है !
पेट को गुदने गुदाने के परिक्षेत्र के रूप में भी बड़ा फोकस मिला है !
पेट पर्यवेक्षण के बाद हम अब कूल्हे तक आ पहुँचते हैं !
जारी ....

Tuesday, 17 February 2009

पापी पेट का पर्यवेक्षण !

ये तोंदू पहलवान क्या कर हैं -पेट पर्यवेक्षण तो नहीं ?
कहते हैं की मानवता केसामने सबसे बड़ा सवाल पापी पेट का ही है -यह पापी इसलिए कि इसे भरने की जुगाड़ में जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं -कर्म कुकर्म करने पड़ते है ! पीठ पर लात तो फिर भी सहन की जा सकती है पेट पर लात न मारने की नैतिक दुहाई दी जाती है -! बिना पेट पूजा के देवता भी प्रसन्न नही होते -लोक मंगलकारी और विघ्न विनाशक गणेश जी पेट से भी भारी हैं ! आईये पेट पर एक नजर डालें !
काफी पहले तक पुरूष का उभरा पेट -सही शब्द तोंद समृद्धि,खुशहाली का प्रतीक होता था .तोंद वाले खाए पिए अभिजात्य वर्ग की प्रतीति कराते थे ! लेकिन आजकल तोंद खुदगर्जी ,आलस्य और खराब सेहत का संकेत है .हलवाई ,सेठ - साहूकारों की तोंद अब उनके प्रति हिकारत का भाव पैदा करती है -नई पीढी के जागरूक सेठ साहूकार इसलिए अपने स्टेरीओटाईप इमेज को बदल रहे हैं ! मगर जापान में तो आज भी तोंद को एक पेशे में सम्मानजनक ओहदा मिला हुआ है -वहाँ के पहलवान आज भी लंबे चौडे पेट -तोंद के स्वामी हैं .इससे उनके शरीर का गुरुत्व मध्य ( सेंटर आफ ग्रैविटी ) थोडा और नीचे खिसक आता है और उन्हें पीठ दिखाना टेढी खीर हो रहता है .इसलिए वे अपनी पेट पूजा को लेकर काफी सचेष्ट रहते -वे ऐसा ही भोजन करते हैं जिससे उनकी तोंद और भी भारी भरकम बन सके ! अब जैसे उनकी एक डाईट नुस्खा है -( स्ट्यू -चांको नैबे ) : मछली ,पोल्ट्री ,मीट ,अंडे ,सब्जियाँ ,चीनी और सोयासास का मिश्रण जिसमें १२ बड़े कटोरे चावल और ६ पिंट बीयर भी मिला कर ये रोजाना लेते हैं और अपनी तोंद को धन्य करते हैं !
पेट को परिभाषित करें तो यह शरीर का वह अधो अंग है जो वक्ष की नीचे और जननांगों के ऊपर स्थित है .चिकित्सीय संदर्भ में यह ऐबडामेन कहलाता है ।
जारी ........

Monday, 16 February 2009

डार्विन की चुनिन्दा कृतियाँ (डार्विन द्विशती )

डार्विन का समग्र साहित्य अब अंतर्जाल पर सहज ही सुलभ है। उनकी कुछ चुनिन्दा कृतियाँ कालक्रमानुसार निम्नवत् हैं:-
(1) द वोयेज ऑफ बीगल (1839)
(2) जियोलाजिकल आब्जरवेशन्स आन साउथ अमेरिका (1844)
(3) वोल्कैनिक आइलैण्डस (1844)
(4) द ओरिजिन आफ स्पीशीज (1844)
(5) फर्टीलाइजेशन आफ आिर्कड्स (1862)
(6) द मूवमेन्ट्स एण्ड हैबिट्स ऑफ क्लाइिम्बंग प्लाण्ट्स (1865)
(7) वैरियेशन आफ एनिमल्स एण्ड प्लान्ट्स अण्डर डोमेस्टिकेशन
(8) डीसेन्ट आफ मैन एण्ड सेलेक्शन इन रिलेशन टू सेक्स (1871)
(9) इक्सप्रेशन आफ द इमोशन्स इन मेन एण्ड एनिमल्स (1872)
(10) इन्सेक्टीवोरस प्लाण्ट्स (1875)
(11) इफेक्ट्स ऑफ क्रास एड सेल्फ फर्टिलाइजेशन इन द वेजीटेबल किंगडम (1876)
(12) द डिफरेन्ट फाम्र्स आफ फ्लावर्स आन प्लान्ट्स आफ सेम स्पीशीज (1877)
डार्विन की आत्मकथा आप हिन्दी ब्लॉग जगत में भी पढ़ सकते हैं जिसकी एक सहज प्रस्तुति रचनाकार (अनुवाद एवं प्रस्तुति: सूरज प्रकाश और के पी तिवारी) दृष्टव्य है !


A Peculiar Snow White Fish !


The amazing beauty !

While searching /prospecting of common carp brooders in our usual netting operations of the season confined to cemented water channels of forest department in Sarnath the Famous Buddhist pilgrimage ,Varanasi we encountered this milk white fish hitherto not seen and reported from the region.
We know that this is a member of the species -Cyprinus carpio communis -the Common Carp fish, native of China but the colour of the fish is just amazing.In last 25 years of my service in Fisheries department I have not seen this completely white coloured common carp any where in my extensive tours of many parts of India.

A fish in hand is better than many in pond !
Whether this is an albino variety or a genetic trait /dominant combo of some recessive genes or result of inbreeding depression is not clear as yet.Since the ongoing month ie February is its breeding season in India we are planning to induce it to breed.And a planned breeding strategy including even many successive generation may only clarify if it is really a genetic variety.
Dr.R .P .Raman , a senior scientist in Central Institute of Fisheries Education (CIFE) Mumbai when contacted on this curious phenomenon told that chances of finding this kind of albino/genetic common carp is really very rare .

in water tub .......
Further input about this rare form of common carp from any source would be highly appreciated and acknowledged.

Sunday, 15 February 2009

,,,,,और उजड़ गया इडेन का बागीचा ! (डार्विन द्विशती )

1858 में डार्विन ने अपने विचारों पर पुस्तक के प्रकाशन का मन बना लिया था। वे पाण्डुलिपि प्रकाशक को सौंपने ही वाले थे कि एक अनहोनी घट गई। 18 जून 1858 की सुबह वे जब रोजाना की डाक देख रहे थे उन पर अचानक वज्रपात सा हुआ। एक दूसरे वैज्ञानिक अल्फ्रेड रसेल वैलेस ने विकासवाद पर हूबहू डार्विन के विचारों सा ही एक आलेख डार्विन के पास उनके अनुमोदन के लिए भेजा था। वैलेस का यह पत्र मलाया से आया था। डार्विन को मानो काटो तो खून नहीं- उनके दशकों के अध्ययन के नतीजों की दावेदारी अब अकेले उनकी ही नहीं थी - वैलेस का भी दावा यही था कि जीव सृजित नहीं बल्कि निरन्तर विकसित होते आये हैं।
डार्विन को अब यह सूझ ही नहीं रहा था कि वे करें तो क्या करें? वे विचारों की ऐसी हैरतअंगेज समानता के संयोग से हतप्रभ से थे। पहले तो मनोघात की सी स्थिति में डार्विन ने वैलेस के उस पत्र पर तीन लकीरें खींचकर लिखा- नहीं, नहीं, नहीं, - मगर संयत होकर विकास के सिद्धान्त के प्रतिपादन का पूरा श्रेय वैलेस को ही देने का फैसला कर लिया। लेकिन उनके मित्र लायेल ने उन्हें ऐसा करने से रोका और सुझाव दिया कि वे विकासवाद के सिद्धान्त को वैलेस के साथ संयुक्त रूप से प्रकाशित करें। अन्ततोगत्वा डार्विन की सहमति से विकासवाद का सिद्धान्त लीनियन सोसाइटी के जर्नल में वैलेस एवं डार्विन के संयुक्त नाम से प्रकाशित हुआ। डार्विन ने जल्दी ही जनसामान्य के लिए भी अपने विकासवाद के सिद्धान्त को 24 नवम्बर, 1859 को ``द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज बाई मीन्स आब नैचुरल सेलेक्शन ऑर द प्रिजर्वेशन ऑफ फेवर्ड रेसेज इन द स्ट्रगल फार लाईफ´´, के भारी भरकम शीर्षक के साथ पुस्तकाकार प्रकाशित किया।
`विकासवाद का डंका´
पुस्तक की सभी प्रतियाँ हाथों हाथ बिक गई। पर वैचारिक दुनियाँ में मानों एक भूचाल साथ आ गया। लोगों का मत था कि ``वैज्ञानिक तथ्यों की आँधी में आदम और हव्वा की कहानी धूल धूसरित हो गयी थी... ... इडेन का बागीचा उजड़ चुका था.. ...´´। इस पुस्तक में डार्विन की स्थापना थी कि दुनियाँ में प्राणी प्रजनन के चलते असीमित संख्या में जन्म लेते/उत्पन्न होते हैं। मगर उनके पोषण की खाद्य सामग्री तो सीमित है। रहने के स्थान सीमित हैं। लिहाजा जीवन की रक्षा के लिए सभी में अस्तित्व का संघर्ष लाजिमी है। इस संघर्ष में जो अपने वातावरण के ज्यादा अनुकूल होते हैं बचे रहते हैं बाकी मारे जाते हैं। डार्विन ने अस्तित्व की रक्षा में सफल जीवों को `योग्यतम की उत्तरजीविता´ की परिणति बताई। बदलते पर्यावरण के अनुकूल प्राणियों में निरन्तर विकास की प्रक्रिया से नई - नई प्रजातियों के उदग्म को भी डार्विन ने व्याख्यायित किया और इसी घटना को उन्होंने `प्राकृतिक वरण´ -नेचुरल सेलेक्शन का सम्बोधन दिया। दरअसल संक्षेप में यही है विकास की कहानी - विकास का सिद्धान्त।
मनुष्य का उन्नयन या अधोपतन?
इसी सिद्धान्त की तािर्कक परिणति हुई डार्विन की दूसरी पुस्तक, `द डिसेन्ट आफ मैन´ में जिसमें मनुष्य को किसी दैवीय सृजन का परिणाम न मानकर मानवेतर प्राणियों से ही उदभूत और विकासित प्राणी माना गया था। इस पुस्तक के कारण ही डार्विन के बारे में प्राय: यह गलत उद्धरण दिया जाता है कि उन्होंने यह कहा था कि `मनुष्य बन्दर की संतान हैं´ । डार्विन ने वस्तुत: ऐसा कुछ भी नहीं कहा था बल्कि उनका यह मत है कि मनुष्य और कपि दरअसल एक ही समान प्रागैतिहासिक पशु पूर्वज से विकसित हुए हैं जो लुप्त हो गया है- इस `लुप्त कड़ी´ की खोज होनी चाहिए। आज के कपि-वानर हमारे सीधे-पूर्वज परम्परा में थोड़े ही हैं। वे हमारे दूर के मानवेतर स्तनपोषी, बन्धु-बान्धव भले ही हो सकते हैं। डार्विन का कहना था कि मनुष्य एक `सामाजिक प्राणी´ है। उसका स्वर्ग से अधोपतन नहीं हुआ अपितु वह एक पाशविक विरासत से रूपान्तरित होता आया है।
डार्विन की मृत्यु (19 अप्रैल, 1882) पर विरोधियों ने उन्हें नरक में जाने की कामना की। मगर उनके सम्मोहक व्यक्तित्व से प्रभावित लोगों ने गहरा दु:ख भी जताया। एक बूढ़ी अंग्रेज महिला बोल उठी, `डार्विन ने तो यह सिद्ध किया कि ईश्वर नहीं है, पर ईश्वर इतना दयालु है कि उसे माफ कर देगा´

Thursday, 12 February 2009

वह ऐतिहासिक यात्रा , ओरिजिन और विकासवाद !(डार्विन द्विशती )



बीगल की यात्रा (1831-1836)
मशहूर जलपोत एच0एम0एस0 बीगल पूरे पाँच वर्षों (1831-1836) तक समुद्री यात्रा पर रहा जहाँ डार्विन ने प्रकृति के विविधता भरे रुप को शिददत के साथ देखा-परखा। उनके प्रेक्षणों में एक वैज्ञानिक की सी सटीकता थी, तो उनकी कल्पनाशीलता भी किसी कवि से कम नहीं थी। बीगल की यात्रा के दौरान उनके अनुभव का संसार समृद्ध होता गया। एक बार, जब बीगल ब्राजील के तट पर लंगर डाले हुए था, डार्विन ने एक गुलाम नीग्रो महिला के साथ हुए अत्याचारों को देखा तो बहुत व्यथित हो गये। इस घटना ने उनके मन पर इतना गहरा प्रभाव डाला कि उन्होंने दासता प्रथा का जीवन भर कड़ा विरोध किया। डार्विन ने बीगल यात्रा में बहुत कष्ट सहे- मगर ज्ञान पिपासा की अपनी धुन में कितने ही दिनों भूखे प्यासे रहकर कीट-पतंगों के दंश को भी बर्दाश्त कर उनके नमूनों को इकट्ठा करने की अपनी मुहिम में जुटे रहते। समुद्री यात्रा की बीमारी, खासकर अपच से भी वे जूझते ही रहे। जब बीगल गैलापैगास द्वीप समूह पर पहुँचा तो डार्विन वहाँ पर फिन्च चिड़ियों की चोंच की विविधता को देखकर मन्त्रमुग्ध से रह गये। द्वीप समूह के अलग अलग द्वीपों पर फिन्च चिड़िया की चोंचों में स्थानिक खाद्य सामग्री-कीट पतंगों की विभिन्नता के चलते कुछ न कुछ बदलाव था- वे अब अलग स्पीशीज बन गई थीं। यह कहना उचित होगा कि डार्विन के मन में प्राकृतिक कारणों से जैविक बदलाव की सूझ यहीं कौंधी। कहते हैं कि बीगल की यात्रा आज भी उतनी ही रुमानी है जितनी कि अलिफ लैला की कहानियाँ।
विकासवाद
यद्यपि डार्विन के पहले भी दुनियाँ में विकास वाद पर चिन्तन मनन तो हुआ था- हिन्दू दशावतारों-मछली, कच्छप, नरसिंह आदि से पुरुषोत्तम राम तक का अवतरण, चीनी साहित्य में भी विकास के लगभग ऐसे ही आरिम्भक विचार के उदाहरण हैं। लैमार्क ने भी विकासवाद की एक रुपरेखा जिराफ के गरदनों की लम्बाई बढ़ते जाने के आधार पर बनाई थी।
लेकिन ईसाई मत द्वारा प्रवर्तित `सृजनवाद´ (सृष्टि का सृजन हुआ है!) के व्यापक प्रसार के चलते विकासवाद नेपथ्य में जा पहुँचा। यह डार्विन का ही प्रादुर्भाव था कि विकासवाद मानों पुनर्जीवित ही नहीं हुआ उसे एक वैज्ञानिक धरातल भी मिल गया।
डार्विन को यह आभास हो चला था कि पुरातनपन्थी उनके विकासवाद के सिद्धान्त का पुरजोर विरोध करेंगे। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के अपने एक मित्र प्रोफेसर असा ग्रे को उन्होंने लिखा, ``मैं पूरी ईमानदारी से कहना चाहता हूँ कि अपने सतत् अध्ययन से मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि जीवों का स्वतन्त्र सृजन नहीं हुआ है ... ... मुझे मालूम है कि यह सुनकर आप मुझसे खफ़ा हो जायेंगे .. ... ´´ यह तो शुरूआत भर थी ... ...। डार्विन ने फिर पीछे मुडकर नहीं देखा। ... ...
`द ओरिजन´

उनकी पुस्तक-द ओरिजिन् आफ् स्पीशीज की सभी 1250 प्रतियाँ प्रकाशित होते ही हाथों हाथ बिक गई जिससे वैचारिक जगत में मानों एक भूचाल सा आ गया। इस पुस्तक ने अनेक भूगभीZय, जीवाश्मीय प्रमाणों से यह साबित कर दिया था कि धरती पर जीवों का सृजन नहीं हुआ है बल्कि सभी जीव एक वैकासिक प्रक्रिया की देन हैं। डार्विन ने यह क्रान्तिकारी वैचारिक पुस्तक आनन फानन में ही नहीं लिख डाली थी। बल्कि इसके प्रकाशन के 20 वर्षों पहले ही उन्होंने इसकी एक रुप रेखा 1839 में ही बना ली थीं फिर 1842 में उस रुपरेखा पर आधारित 35 पृष्ठों का आलेख तैयार किया जो 1844 में 230 पृष्ठों तक जा पहुँचा। अब पुस्तक प्रकाशन के लिए तैयार थी मगर उन्होंने अगले डेढ़ दशक तक इसकी सभी स्थापनाओं, आँकड़ों की बार-बार जाँच की, पुनर्सत्यापन किया।
जारी ........

Wednesday, 11 February 2009

चार्ल्स डार्विन का अवतरण !


चार्ल्स डार्विन -एक युग द्रष्टा !


जी हाँ आज चार्ल्स डार्विन की दो सौवीं जयंती है -बोले तो द्विशती ! इसी महामानव -वैज्ञानिक मनीषी ने सबसे पहले प्रमाण सहित दुनिया को बताया कि धरा पर सृष्टि की विविधता का रहस्य क्या है ? क्या मनुष्य स्वर्ग से टपका देवदूत है या फिर कपि वानरों से ही उन्नत हुआ एक सभ्य कपि है ! डार्विन के इन विचारों ने तहलका मचा दिया !

आज की वैचारिक दुनिया जिन महान चिन्तकों की विशेष रुप से ऋणी है उनमें, कार्ल मार्क्स (1818-1883), सिगमन्ड फ्रायड (1856-1939) और चाल्र्स डार्विन (12 फरवरी, 1809-19 अप्रैल, 1882) के नाम स्वर्णाच्छरों में अंकित हैं। माक्र्स एवं फ्रायड की विचारधाराओं की प्रासंगिकता को लेकर आज भले ही अनेक सवाल उठ रहे हैं मगर चाल्र्स डार्विन का विकासवाद आज भी दुनियाँ में वैचारिक वर्चस्व बनाये हुए है। डार्विन के जन्म के दो सौ वर्षों बाद भी आज विश्व में चहुँ ओर विकासवाद का डंका बज रहा है। समूचा कृतज्ञ विश्व वर्ष (2009) भर चाल्र्स डार्विन की दो सौंवीं जयन्ती मनाने को मानो कृत संकल्प है- यह सवर्था उचित ही है कि भारत भी इस महान विकासविद् की द्विशती जोर-शोर से आयोजित करे। यह आलेख इसी अभियान की एक विनम्र प्रस्तुति भर है।

जन्म और बचपन!
महान विकासविद् चाल्र्स डार्विन का जन्म ठीक उसी दिन हुआ जिस दिन अमेरिका के एक जाने माने राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन भी जन्में थे। यानि 12 फरवरी, 1809 यह एक अद्भुत संयोग था क्योंकि एक ओर तो जहाँ चाल्र्स डार्विन के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने मनुष्य के मस्तिष्क को अज्ञानता के अभिशाप से मुक्त कराया वहीं कौन नहीं जानता कि लिंकन ने मनुष्य के शरीर को दासता की बेड़ियों से आजादी दिलायी।

चाल्र्स डार्विन इंग्लैंड के एक शहर श्रूसबेरी में जन्में-बचपन में वे बड़े ही शील संकोची थे मगर अपने परिवेश के प्रति बहुत जागरुक थे। उन्हें तरह-तरह के प्राकृतिक साजो-सामान-चिड़ियों के अंडों, घोसलों, कीट पतंगों, सीपियों और घोंघों को इकट्ठा करने का शौक था- प्रकृति प्रेम में रमें बालक डार्विन में मानों भविष्य का एक महान प्रकृतिविद् पनप रहा था। प्रकृति निरीक्षण की अपनी इस बाल लीला में वे जीवों को मारकर नहीं बल्कि उनके मृत स्पेशीमनों को ही इकट्ठा करते थे। वे उन्हें अपने हाथों मारना नहीं चाहते थे। मगर चिड़ियों के मामले में जाने क्यूँ वे अहिंसा का आचरण छोड़ अपनी एयरगन से उनका शिकार करने दौड़ पड़ते। लेकिन यहाँ भी एक दिन एक घायल पक्षी की तड़फड़ाहट से वे विचलित हो उठे और आजीवन जीव जन्तुओं को मात्र आखेट के लिए मारने की प्रतिज्ञा कर बैठे। अब मानों उनमें महात्मा बुद्ध की करुणा का भी समावेश हो उठा था।

डार्विन के कई जीवनी लेखकों का मानना है कि डार्विन की विनम्रता उन्हें अपनी माँ से मिली थी। किन्तु जब डार्विन मात्र 8 वर्ष के ही थे उनकी माँ चल बसी। उनके पिता डॉ0 राबर्ट बेरिंग जो अपने बेटे के ही शब्दों में ``एक बहुत बुद्धिमान व्यक्ति थे´ खुद अपने पुत्र को भलीभाँति समझ नही पा रहे थे। वे आये दिनों चाल्र्स द्वारा घर में इकट्ठा किये जा रहे अजीबोगरीब चीजों के कबाड़ से ऊब चुके थे। उन्होंने बालक चाल्र्स को लैटिन और ग्रीक भाषाओं को सिखाने वाले पारम्परिक स्कूल में दाखिला दिलाया पर चाल्र्स की रुचि भाषा साहित्य में होकर अपनी अदम्य जिज्ञासाओं को शान्त करने में थी। लिहाजा उन्होंने घर के पिछवाड़े ही चोरी छिपे एक रसायन शास्त्र की प्रयोगशाला स्थापित कर ली। स्कूल के साथियों ने चाल्र्स का नया नाम रखा - `गैस´ आखिर रोज-रोज की इन कारगुजारियों से ऊब कर डा0 राबर्ट ने अपने शरारती बच्चे का दाखिला एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में करा दिया-चिकित्सा शास्त्र के अध्ययन के लिए

चाल्र्स डार्विन ने इस नये माहौल में शुरू शुरू में तो अपने को सभाँलने का प्रयास किया मगर शल्य चिकित्सा के व्याख्यानों से उन्हें ऊब होने लगी। उस समय एनेस्थेसिया का प्रचलन तो था नहीं, बिना संज्ञा शून्य किये ही आपरेशन कर दिये जाते थे। रोगियों के आर्तनाद से डार्विन को इस पेशे से वितृष्णा होने लगी। डार्विन की इस पेशे से अरूचि उनके पिता से छुप सकी। और थक हार कर उन्होंने अपने बेटे को पादरी बनाने का अनचाहा निर्णय ले लिया। यहाँ भी चाल्र्स को उनके मुताबिक माहौल नहीं मिल सका पर यहीं उनकी मुलाकात अपने समय के मशहूर वैज्ञानिक प्रोफेसर हैन्स्लो से हो गई, जिनकी सिफारिश पर ही उन्हें एच0एम0एस0 बीगल जलपोत में यात्रा का सुअवसर मिल सका।

साईनटिफिक अमेरिकन का जनवरी 09 अंक
जो विकासवाद और डार्विन पर ही केंद्रित है !



जारी ........