नाक के सवाल पर पिछली पोस्ट में हम मनुष्य के शारीरिक भूगोल की भूमध्य रेखा पर दो उभारों -नाक और पुरूष विशेषांग की चर्चा तक आ पहुंचे थे और उनके कथित साम्यों की पड़ताल में लगे थे.डेज्मांड मोरिस कहते हैं कि मनुष्य शरीर की भूमध्य रेखा के इन दोनों ऊँचें उभारों की कायिक रचना में समानता की बात केवल इसलिए होती है कि ये दोनों ही मांसल -स्पंजी संरचनाएं हैं जिनमें रक्त वाहिकाओं और ऊतकों की भरमार है और काम विह्वलता के क्षणों में इन दोनों ही रचनाओं में रक्त परिवहन बढ़ जाता है .और प्रणय के गहन क्षणों में ये दोनों ही अंग सेंसेटिव हो जाते हैं.वे रक्ताभ तो होते ही हैं ऊष्मित भी होते हैं .एक सनकी अध्येता ने तो प्रणय के गहनतम क्षणों में नाक का तापक्रम लिया तो पाया कि उसमें ३.५ से ६.५ फेरेंहाईट की बढोतरी हो जाती है ।
नाक तो पौरुष का प्रतीक है ही -रोमन नोज फिकरे को इसी अर्थ में लिया जाता है -पर चूंकि बड़ी नाक 'कहीं कहीं 'फैलिक सिम्बल 'के रूप में भी देखी जाती है ,इसलिए अब लोकाचार के लिहाज से समूची दुनियाँ में अब छोटी नाक ही अच्छी मानी जाती है -अभिनेताओं के रूप में अब छोटी नाक वालों का ही बोलबाला है .आज भी विश्व में कई जगह सेक्स अपराधों के लिए नाक काटने की ही सजा है -भारत में तो सूर्पनखा की नाक ऐसे ही मामले में काटी गयी थी पर आश्चर्यजनक है कि यहाँ समान अपराधों के लिए किसी पुरुष की नाक काटने का कोई वृत्तांत नहीं मिलता ।
कई आदिवासी संस्कृतियों में नाक की दोनों वायु प्रवाहिकाओं -नासिका द्वारों को आत्मा के आने जाने का रास्ता मना गया है .एक समय सारी दुनिया में ही यह मान्यता थी की आत्मा इसी द्वार से बाहर निकल जाती है .सामान्य साँस आने जाने के अलावा जब इन नासिका द्वार से कुछ भी अन्यथा -जैसे छींक का प्रवाह होता है तो उसे घबराहट के साथ देखा जाता है -और आस पास के लोग तुंरत ही 'गाड ब्लेस यू '-अपने यहाँ शतं जीवी का तात्कालिक उद्घोष करते हैं -मानो उसे हादसे से (आत्मा के निकलते निकलते बच जाने का हादसा )बच जाने पर आशीर्वाद दे रहे हों .इसलिए सार्वजनिक कार्य व्यवहारों में छींक को अपशकुन माना गया है .मरणासन्न व्यक्ति कीनासिका छेदों में रुई डालकर आत्मा को निकल भागने से रोकने की युक्तियाँ भी प्रचलित हैं। एक्सिमों जातियों में तो शव यात्रा में भाग लेते लोगों को नाक को बाकायदा बंद रखने के सख्त निर्देश है -ताकि मृत व्यक्ति की आत्मा के साथ साथ औरों की आत्माएं भी ना चलता बनें ।
नाक के आकार प्रकार के आधार पर एक क्षद्म विज्ञान भी वजूद में आ गया -फिजिओनोमी ,उन्नीसवीं सती के आते आते एक और छद्म विद्या -नोजियोलोजी भी प्रचलित हो उठी -भारत में मुखाकृति विज्ञान के नाम से भी यह विद्या जानी जाती रही है ।
नाक से जुड़े कई सिग्नल भी हैं -ख़ास कर झूंठ बोलने वाले अपनी नाक को पकड़ते हुए देखे गए हैं .अकसर ऐसा वे करते हैं जो झूंठ बोलने में परवीण नही हो पाते .ऐसा लगता है कि नौसिखिये झुट्ठे जब झूंठ बोलने का उपक्रम करने लगते हैं तो उनकी नाक में खुजली सी होने लगती है जिससे उंगलियाँ ख़ुद ब ख़ुद नाक तक जा पहुँचती हैं ।
भारत ही नहीं विश्व में कई जगहों पर नाक को चुटकी में दबा कर थोड़ी देर तक साँस रोंकने की क्रियाएं तनाव शैथिल्य के लिए की जाती हैं -प्राणायाम एक प्रचलित तरीका है .यह कुछ सीमा तक तनाव को कम करता भी है ।
इति नासिकोपाख्यानम !
Science could just be a fun and discourse of a very high intellectual order.Besides, it could be a savior of humanity as well by eradicating a lot of superstitious and superfluous things from our society which are hampering our march towards peace and prosperity. Let us join hands to move towards establishing a scientific culture........a brave new world.....!
Wednesday, 10 September 2008
Monday, 8 September 2008
मस्त रहें ज्ञान जी और आप सभी ,प्रलय नहीं आने वाली !
लार्ज हेड्रान कोलायीडर एक्सेलेरेटर -यही वह मशीन है जिसे लेकर हो हल्ला मचा हुआ है !मैं इस विषय को साईब्लोग पर नहीं लेने वाला था पर आज अल्लसुबह ज्ञान जी की इस पोस्ट ने झकझोरा !उन्होंने परोक्ष ही सही मेरे कर्तव्य बोध को जगाया कि भई यदि अपने को ज़रा भी जन हितैषी मानते हो तो विज्ञान से जुड़े इस मामले पर आम जनकी समझ में कुछ इजाफा करो ।
पता नहीं दुनिया को ख़त्म होने के प्रचार के पीछे कौन सी मानसिकता काम करती है -ऐसा कई बार पहले भी हो चुका है .२०१२ में किसी आसमानी जलजले से दुनिया के खात्में की बात हो ही रही थी कि अब यह नया शिगूफा आ धमका .कल यानी १० सित्मबार को क़यामत आने वाली बात को कुछ मीडिया चैनल टी आर पी की फेर में दर्शकों के बीच जोर शोर से ले जाकर उन्हें डरा धमका रहे हैं .पर इत्मीनान रखें कल भी सुबह चिडियों की चहचहाहट से शुरू होगी और सुबहे बनारस और अवध की शामें गुलज़ार होंगी -दुनिया की आपाधापी बदस्तूर जारी रहेगी .हिन्दी ब्लॉग जगत पर नर नारी द्वंद्व जारी रहेगा औरउनकी मनुहार होती रहेगी जो जाने को कह रहे हैं -यानी दुनिया वैसी ही चलती रहेगी ।
पर यह माजरा आख़िर है क्या ? कोई ख़ास नहीं बस भौतिकी के कुछ परीक्षण किए जाने वाले हैं स्विट्जरलैंड में जहाँ यूरोपियन रिसर्च आर्गनाईजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च कुछ मूल भौतिकी के कणों पर कल ही परीक्षण करने वाली है .कई किलोमीटर की इस मशीन में नाभकीय प्रोटान कणों को टकराया जायेगा .ऐसी मशीने भौतिकी की भाषा में सायिक्लोत्रान कहलाती हैं जो नाभकीय कणों की गति को भी काफी तेज कर सकती है ।
इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम १९८० से ही शुरू हो गया था .कल वह सुनहरा दिन है जब इसे कुछ मूलभूत प्रयोंगों के लिए उपयोग में लाया जायेगा .फ्रांस और स्विजरलैंड की सीमा पर जेनेवा के निकट स्थित सबसे बड़े इस पार्टिकिल एक्स्लेरेटर काम्प्लेक्स में लार्ज हैड्रान कोलायीडर वैसे एक भीमकाय मशीन है पर यहाँ से मौत की किरणे नहीं बल्कि जीवन की किरणे फूटेंगी -कैसे ?
आईये बताएं -कल के प्रयोग से नाभकीय कणों के जरिये इस समय की एक बड़ी समस्या बन रहे नाभकीय कचरे को विनष्ट किया जा सकेगा .कैंसर के उपचार में नाभकीय किरणों के व्यापक उपयोग को हरी झंडी मिल सकेगी ! साथ ही धरती के वायुमंडल में कास्मिक बौछारों से बनने वाले बादलों की प्रक्रिया को सही तरह से समझा जा सकेगा जिससे हमें मौसमों के नियमन में सुविधा होगी ।ये तो हैं मनुष्य के सीधे लाभ की बातें ,साथ ही कई अकादमिक बहसों जैसे ब्रह्मांड के निर्माण की पहेलियों को भी समझा जा सकेगा । इससे विनाशक अंधकूप नहीं बनेंगे बल्कि जीवन की रोशनी छलक उठेगी ! और दुनिया इस आलोक में पहले से भी सुन्दर दिखेगी ,हम फिर कल मिलेंगे ! आमीन !!
Thursday, 4 September 2008
पुरुष पर्यवेक्षण -सवाल नाक का है !
कैसी है यह नाक ?एक अनुरोध : इस ब्लॉग पोस्ट के कतिपय अंश कुछ लोगों को आपत्तिजनक लग सकते हैं -यहाँ वर्णित तथ्यों से लेखकीय सहमति भी हो यह अनिवार्यतः आवश्यक नही है .आप की रुचि यदि मानव समाज जैविकी ,व्यवहार शास्त्र या फिर जैविकी में हो तो यह पोस्ट आपके लिए ही है .सामाजिक सरोकारों के पैरवीकारों का भी स्वागत है बशर्ते वे अपने आग्रहों से मुक्त होकर यहाँ आयें !
सवाल नाक का है !
जीवन मरण का प्रश्न बन जाती है पुरुष की नाक ,यह हम जानते ही हैं .मगर पास्कल (PASCAL) की यह उक्ति अक्सर उधृत की जाती है कि "क्लियोपेट्रा की नाक ने समूची दुनिया का नक्शा ही बदल डाला था .अपने ही यहाँ देखें सूर्पनखा की नाक ने एक भयानक युद्ध ही करा डाला-ऐसा पुराणों में वर्णित है .मगर इन कथित घटनाओं के काफी बाद अपनी इस जानी पहचानी दुनिया में ही चार्ल्स डार्विन की नाक ने तकरीबन २०० वर्ष पहले १८३१ में विश्व के वैचारिक इतिहास के चहरे की नाक में ही फेरबदल कर डाला -जबकि एच एम् एस बीगल में अपनी विश्व यात्रा के लिए निकलनें में डार्विन की नाक ने अड़चन डाल दी थी .समुद्री जहाज के कैप्टन फित्ज्राय ने डार्विन की नाक देखते ही उन्हें यात्रा में साथ ले जाने को मना कर दिया था -क्योंकि उसके मुताबिक डार्विन के नाक का आकार ऐसा था कि वे न तो मान्सिक्म रूप से परिपक्व लग रहे थे और न ही परिश्रमी !इतिहास गवाह है कि फित्ज्राय ग़लत थे ...डार्विन ने विकास वाद को सिद्धांत का जामा पहनाया और विज्ञान की नाक बचा ली .....
व्यवहार विज्ञानियों की राय में पुरुष की नाक उसके चहरे के जोक रीजन -मनोविनोद के रूप में जानी जाती है.कैसी कैसी नाके बनायी हैं विधाता ने -गोली ,चपटी .फैली .पिचकी ,सुतवां ,लम्बी .मोटी ,नाटी -अनेक आकार प्रकार की -कुछ की तोते की चोंच के आकार की नाक है तो कोई चहरे पर एक छोटा मोटा बैगन लिए घूम रहा है .यानी जितने लोग उतनी नाकें .....व्यवहार विज्ञानी कहते हैं कि नाक तो वही सौन्दर्यपरक है जिसमें किसी फीचर की प्रतीति न हो .अर्थात वह फीचर लेस हो ....जहाँ नाक ने कोई फीचर अंगीकृत किया वह सुन्दरता के पैमाने से खिसकी..मानव शिशु की नाक इस मामले में सुन्दरता का आदर्श मानी गयी है .यह सुघड़ छोटी और फीचर लेस है पर बरबस ही आकर्षित करती है -क्यूट है !पर किशोरावस्था पार होते होते यह ज्यादातर मामलों में कोई फीचर ग्रहण करने लगती है और इसके अनकुस से दिखने की संभावना बढ़ने लगती है.इसलिए सुन्दरता के पैमाने पर मानव शिशु की नाक ही आदर्श बन गयी है -जिस पुरुष(और नारियों की भी !) नाक शिशु की जैसी आनुपातिक सीमा में छोटी और फीचर्लेस हो वह सुंदर मानी जाती है -विश्व के अनेक भागों में -भारत के बारे में यह अभी भी शोध का विषय हो सकता है ।
मगर पुरुष की बड़ी नाक पौरुष की निशानी मानी गयी है .नेपोलियन बोनापार्ट को लंबे नाक वाले लोग पसंद थे .विश्व के कई भागों में पुरुष की नाक और उसके अंग विशेष साम्य की भी चर्चा है -मगर वास्तविकता तो यह है कि किसी मनुष्य की नाक के सायिज़ और उसके अंग विशेष के बीच कोई साम्य सम्बन्ध नही है -जैव विदों ने यह नाप जोख कर तय पाया है.मगर एक बात तो है -पुरुष के शारीरिक मध्य रेखा पर ये दोनों ही अंग विराजमान है - और दोनों के तापक्रम साम्य तथा कुछ दूसरे अद्भुत साम्य तो प्रमाणित हैं ........जारी !
Tuesday, 2 September 2008
पुरुष पर्यवेक्षण -कैसी कैसी ऑंखें !
सुबह के इस आन्ख्मार चाय - कप के साथ हाजिर है साईब्लाग -आंखों की एक नयी दास्ताँ लिए !रोती हुयी आँखों की कुछ बातें और -जलचरों में सील और समुद्री उद्बिलाओं को रोते हुए पाया गया है ,मगर थल चरों में मनुष्य ही सच्ची मुच्ची रोता है -आंसुओं से डबडबाई या फिर जार जार रोती आँखें देखने वालों में दया भाव संचारित करती हैं -यह एक सशक्त सोशल सिग्नल है जो लोगों से 'केयर सोलिसिटिंग रेस्पांस ' की मांग करता है ।
वैज्ञानिकों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि रोना मुख्य रूप से तनाव शैथिल्य की भूमिका निभाता है -यह दरअसल तनाव -रसायनों (स्ट्रेस प्रोटीन्स ) को बाहर का रास्ता दिखाता है .यही कारण है कि जी भर रोने से मन हल्का हो जाता है .और लोगों के स्नेह सांत्वना का जो बोनस देता है सो अलग !शायद गालिब ने रोने के इन फायदों को जान लिया था -"रोयेंगे हम हजार बार कोई हमें रुलाये क्यों ?"
आईये अब यह रोना धोना छोडें और सीधे प्रेमियों की आंखों में झांकें !देखें क्या चल रहां वहाँ ? पर सावधान ! किसी भी की आँख में लम्बी समय तक झांकना /देखना एक मुश्किल भारा मामला है -ऐसा तो बस केवल प्रेमरस में आकंठ डूबे प्रेमी ही कर सकते हैं .या तो फिर एक दूसरे से अतिशय घृणा करने वाले ही कर सकते हैं ।
प्रेमियों के मामले में तो उनके बीच का पारस्परिक भरोसा और सहज विश्वास उन्हें बेधड़क ऐसा करने देता है और वे एक दूसरे की आंखों में डूब कर जाहिरा तौर पर अनजाने ही एक दूसरे की पुतलियों की नाप जोख करते रहते हैं !
अगर दोनों में से किसी भी की नीयत में खोट हुआ तो पुतलियाँ भांप लेती हैं -सिकुडी सिमटी पुतली प्रेम की पींगे आगे बढाने को खबरदार कर देती है !दो प्रेमियों की नीयत में खोट को ये पुतलियाँ ही जैवीय रेड सिग्नल देकर जता देती हैं !हाँ कुछ अनाड़ी तब भी ऐसे होते हैं कि बिचारे इस सशक्त जैवीय सिग्नल को भांप नहीं पाते !और धोखा खा जाते हैं ।
नजरें प्रेम औरविलासिता के साथ इतनी गहरे जुडी हैं कि कई मिथकीय आख्यान तक इन पर रचे गए हैं -एक तो देवाधिपति इन्द्र से ही जुडा है -कहते हैं जब अहल्या -इन्द्र प्रसंग में भृगु के शाप से इन्द्र अभिशप्त हुए तो उनके शरीर पर सहस्र भग हो गए -जो उनकी काम लोलुपता को देखते हुए एक उचित ही ऋषि -श्राप था .लज्जित इन्द्र के काफी अनुनय विनय पर ऋषि ने उन भगों को हजार नेत्रों में बदल दिया -इन्द्र तब से सहस्र नेत्र धारी हैं -यहाँ नेत्र काम विलासता के द्योतक तो हैं ही साथ ही वे 'बुरी नजरों ' की भूमिका में भी हैं ।
दक्षिण इटली में इन बुरी आंखों का ऐसा खौफ रहा कि दो पोप -पियास ix और लियो xiii तक को बुरी आंखों वाला मान लिया गया था जो उनके अनुनायियों को उनसे दूर कर रहा था ।
आईये अंततः कुछ मशहूर इशारों की बात कर ली जाय -
१-आँखे नीची और झुंकी झुंकी पलकें -विनम्रता ,सम्मान देने और कुछ परिप्रेक्ष्य में दब्बूपन को दर्शाती हैं ।
२-पलकों को ऊपर उठा क्षण भर के लिए उठा ही छोड़ देना -मासूमियत का संकेत !
३-घूरती हुयी आँखें -अभिभावकों की आँख है जो बच्चों को अनुशाषित करती है ।
४-कनखियों से देखना -सीधे देखा न जाय और बिन देखे रहा न जाय !
५-आँखें मारना -एक आँख खुली रखते हुए दूसरी को सहसा दबा देना -यह गुप्त संकेत है पर साथ ही अजनबियों से सेक्स की गुप्त अपील भी -मगर यह संकेत कई संस्कृतियों में शिष्टाचार के विपरीत माना जाता है -बैड ईटीकेट्स /मैनर्स .इसलिए आप कम् से कम इस इशारे से बाज आयें या फिर माहौल भांप कर इसे आजमायें .
( यहाँ कुछ नेत्र -इशारे नर नारी में कामन हैं )
Sunday, 31 August 2008
भारतीय भस्मासुरी भीमकाय भांटा अब थाली की शोभा बढाएगा !
Courtesy :Brinjal dimond kiranभांटा बोले तो बैगन यानी ब्रिनज्ल ....यह भारत का पहला जेनेटिकली माडिफाईड फ़ूड (जी एम् फ़ूड ) बनने को बेताब है .बैंगन का भुरता /चोखा और कलौंजी के क्या कहने यम् यम् ....खाईये तो बस उंगलियाँ चाटते रह जाईये ।लेकिन भला यह भस्मासुरी भीमकाय का विशेषण ?यह क्या बला है ?
प्यारे मित्रों यह बला ही है -भला वह कैसे तो आईये इसे समझने के लिए एक कहानी सुनें .सन १८१८ में मशहूर ब्रितानी कवि पी बी शैली की पत्नी मेरी शैली ने एक उपन्यास लिखा था -जिसमे डॉ फ्रैन्केंसटीन को एक कृत्रिम मानव बनाने का चस्का लगता है और वे कई शवगृहों से लाशों के अंग प्रत्यंग दूंढकर लाते हैं और उनमें विद्युत् का संचार करते हैं -एक बहुत ही घिनौना प्राणी तैयार हो जाता है और डॉ उससे डर कर भागतेैं और अंततः उसके द्वारा सपरिवार मारे जाते हैं -यह एक दुखांत कथा है .फ्रैकेंसटीन नामक यह उपन्यास विश्व का पहला वैज्ञानिक उपन्यास माना जाता है .जिसका संदेश यह है कि -बिना बिचारे जो करे सो पाछे पछताय ......और जब वैज्ञानिकों ने अब पाराजीनी फसलें यानी किसी एक प्राणी के जीन को निकाल कर दूसरे प्राणी मे डालने का उपक्रम शुरू किया है तो विचारकों ने इसे भी एक फ्रैंक्सटीनियन काम धाम ही माना है .मसलन ध्रुवों की फ्लाउन्दर मछली के जीन को निकाल कर टमाटर में डाल देना ..जिससे टमाटर फ्रिज में लंबे समय तक चिकना और फूला Mसा बना रहे -क्योंकि उसमें एंटी फ्रीज जीन जो मिला है .अब आप यह टमाटर यदि खाते हैं तो एक तो यदि आप शकाहारी हैं तो धरम नष्ट भ्रष्ट हुआ और न जाने लांग रन में यह आपकी अंतडियों में क्या गुल खिलाये .ऐसे भोज्य पदार्थों को सारी दुनिया में फ्रंकेंसटीन फ़ूड कहा जा रहा है -इन्हे जेनेटिकली बदल्दिया गया है .ऐसे अनेक भोज्य पश्चिमीं बाजारों में और चोरी छिपे यहाँ भी बिकने लगे है -
भारत में पराजीनी फलों -फसलों पर कड़ी नजर के लिए एक समिति है -GEAC -जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी - जो यद्यपि इस समय विवादों में घिरी है मगर जल्दी ही भारत के लिए पहले जी एम् बैगन का उपहार जारी करने वाली है .
तो यह भस्मासुर और भीमकाय का क्या मतलब है ?अरे भाई !याद कीजिये शंकर और भस्मासुर की कथा जिसमें शंकर जी ने बिना आगा पीछा सोचे उस राक्षस को वरदान दिया और फिर मुसीबत में पड़ गए .तो मैंने भारतीय मनीषा के लिए फ्रैकेंसटीन के बजाय अपना जाना पहचाना भस्मासुर नाम चुना है -तो ये फिर भीमकाय क्या ?
ये बैगन बड़े बड़े आकार के होंगे इसलिए भीमकाय भी !
अब आप बताएं कि क्या भस्मासुरी बैगन आपको पसंद आयेगा ?
Friday, 29 August 2008
पुरूष पर्यवेक्षण :बड़ी आँखें ,छोटी आँखें !
रोती आँखें -नर की या नारी की ?साभार :मूव -4मैं तो यही जानता था कि मृगनयनी का विशेषण नारियों के लिए इसलिए है कि उनकी आँखें बड़ी होती होंगी !मगर मेरी आँखें यह जानकर खुल गयीं कि पुरूष की ऑंखें नारियों की आंखों से इत्ता भर ही सही बड़ी होती हैं -तो अब चाहें तो आप अपने किसी पुरूष मित्र को म्रिग्नैन कहकरसंबोधित कर सकते/सकती हैं .हिन्दी के साहित्यकार नाक भौ सिकोणे तो बला से !
समूचे थलचरों में मनुष्य ही अकेला प्राणी है जो अपने भावोंद्गारों को आसुओं के जरिये भी व्यक्त कर सकता है .मतलब केवल वही रो सकता है अन्य प्राणी नहीं .घडियाली आंसू भी आप सभी जानते हैं नकली होते हैं .विश्व की अनेक संस्कृतियों की भावुक नारियों में अश्रु ग्रंथि भावुक नरों की अपेक्षा अधिक सक्रिय देखी गयी हैं -ऐसा होना महज सांस्कृतिक /सांस्कारिक लालन पालन जो पुरुषों को भावुकता के प्रदर्शन पर अंकुश रखना सिखाते हैं ,की देन है अथवा कोई जैवीय कारण यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है .मगर नारियों में यह अश्रु व्यवहार समूची दुनिया में इस कदर व्याप्त है कि इसके पीछे महज सामाजिक संस्कारों की भूमिका ही नही लगती ।
मनुष्य की पुतलियाँ किसी प्रिय या प्रिय वस्तु को देखकर फैल जाती हैं -यह एक अनैच्छिक क्रिया है .मतलब यह कि आप झूठ मूठ चाहकर भी अपनी पुतलियों को फैला कर यह प्रर्दशित नहीं कर सकते कि मोगाम्बो खुश हुआ .पुतलियाँ झूठों की पोल खोल देती हैं .मगर प्रिय/प्रिया दर्शन पर ये पुतलियाँ अनचाहे ही काफी फैलती जाती है -चहरे करीब आते जाते हैं और ये फैलती जाती हैं -पर यहीं एक मुश्किल आन पड़ती है -पुत्ल्यों के फैलते जाने से उनमें प्रवेश करने वाली रोशनी की मात्रा भी काफी बढ़ जाती है जो रेटिना पर चका चौंध उत्पन्न करती है -दो प्रेमी चहरे काफी करीब हो जाने पर अब एक दूसरे की धुंधली धुंधली सी तस्वीर ही देख पाते हैं .डेजमानड मोरिस कहते हैं कि यह इसलिए ठीक है कि काफी करीब आए चेहरे एक दूसरे के मुहांसे ,फुंसी और पिर्कियों,धब्बों -यानि चहरे की बदसूरती से विकर्षित भी हो सकते हैं -तो यह प्रकृति प्रदत्त छुपा हुआ वरदान उनकी राहें आसान कर देता है .जब मामला किस तक जा पहुंचा हो तो नर के लिए काहें का ब्रेक !प्रकृति का छुपा मंतव्य तो सदैव संतति संवहन का ही है ।
अब कुछ आंखों की बरौन्यों पर -जो आंखों पर एक सुरक्षा घेरा बनाती हैं .भौहें तथा अन्य हिस्सों के बाल सफ़ेद हो सकते हैं पर अमूमन बरौनियाँ उम्रभर काली ही बनी रहती है -शायद इस अर्थ में ये पुरुषों की सच्ची मित्र हैं .प्रत्येक आंख में ऊपर नीचे लेकर औसतन २०० बरौनी बाल होते हैं .ऊपर के पलक में ज्यादा नीचे कम ।
जारी ..........
Monday, 25 August 2008
पुरूष पर्यवेक्षण -भौहें -2
मनोभावों को प्रगट कराने में भौहों की भी भूमिका है -देखें जर्नल आफ आई विजन मनोभावों के मूक प्रकटीकरण में भौहों को महारत हासिल है .अब तक हमने भौहों के आरोह अवरोहों और उनके कुछ निहितार्थों को जाना .अब आगे .......
४-भौहों का एक साथ ऊपर नीचे होना -इसमें भौहें नीचे होती हैं पर तुंरत ही ऊपर उठ जाती हैं .यह गहरी पीड़ा और चिंता का द्योतक है .तेज दर्द के समय भी भौहों का ऐसा प्रदर्शन हो उठता है .टीवी पर बाम की बिक्री के लिए सरदर्द के विज्ञापनों में इसी भंगिमा को दिखाया जाता है ।
५-भौहों को पलक झपकते ऊपर से नीचे करना -यह भंगिमा सारी दुनिया में स्वागत-आमत्रण के लिए जानी जाती है .यह किसी स्वजनके दिखते ही उसके प्रति किया जाने वाला दोस्ताना व्यवहार है .उस व्यक्ति केनिकट आ जाने पर यह हाथों के मिलाने ,गले मिलाने या चुम्बन में तब्दील हो जाता है .पलक का ऊपर उठना मात्र ही आश्चर्य का द्योतक है -यदि उसमें होठों की मुस्कराहट भी मिल जाय तो यह अदा प्लीजेंट सरप्राईज़ बन जाती है ।
६-ध्यानाकर्षण -आपसी बात चीत में भौहों को बार बार उठाने का एक संकेत यह भी है कि वक्ता की बात पर गौर किया जाय -वह अपनी समझ के मुताबिक किसी बात पर जोर दे रहा है तो भौहें उठा देगा ।
७-भौहों को तेजी से और लगातार ऊपर नीचे करना -
सर्कस के जोकरों का यह चिर परिचित मजाकिया लहजा है .यह हंसी मजाक का संकेत है
८-भौहों को ऊपर उठाना ,थोडा रुक कर नीचे गिराना -यह दुःख ,आश्चर्य और आपत्ति के मिले जुले भावों को प्रर्दशित करता है -सर्प्राईजड डिसअप्रूवल !
यह तो हुयी भौह -संकेतों की बात .पुरुषों को गहरे पराजय और चिंता के क्षणों में अपनी भौहों को दोनों हथेलियों से ढकते हुए भी देखा जाता है .मानों यह कहा जा रहा हो कि भाई अब मैं लाचार हूँ और पौरुष विहीन भी !स्पष्टतः घनी भरी पूरी भौहें पौरुष का प्रतीक हैं -इसलिए ही नारी की तुलना में पुरूष की भौहें ज्यादा घनी और मोटी होती हैं .मगर जब ये काफी मोटी और घनी तथा एक दूसरे से मिल सी जाती हैं तो एक अंगरेजी कहावत की याद दिलाती हैं -
ट्रस्ट नॉट ए मैन हूज आईब्रोज मीट ;फार इन हिज हार्ट यू विल फायिंड डिसीट .
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