Tuesday, 2 September 2008

पुरुष पर्यवेक्षण -कैसी कैसी ऑंखें !

सुबह के इस आन्ख्मार चाय - कप के साथ हाजिर है साईब्लाग -आंखों की एक नयी दास्ताँ लिए !
रोती हुयी आँखों की कुछ बातें और -जलचरों में सील और समुद्री उद्बिलाओं को रोते हुए पाया गया है ,मगर थल चरों में मनुष्य ही सच्ची मुच्ची रोता है -आंसुओं से डबडबाई या फिर जार जार रोती आँखें देखने वालों में दया भाव संचारित करती हैं -यह एक सशक्त सोशल सिग्नल है जो लोगों से 'केयर सोलिसिटिंग रेस्पांस ' की मांग करता है ।
वैज्ञानिकों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि रोना मुख्य रूप से तनाव शैथिल्य की भूमिका निभाता है -यह दरअसल तनाव -रसायनों (स्ट्रेस प्रोटीन्स ) को बाहर का रास्ता दिखाता है .यही कारण है कि जी भर रोने से मन हल्का हो जाता है .और लोगों के स्नेह सांत्वना का जो बोनस देता है सो अलग !शायद गालिब ने रोने के इन फायदों को जान लिया था -"रोयेंगे हम हजार बार कोई हमें रुलाये क्यों ?"
आईये अब यह रोना धोना छोडें और सीधे प्रेमियों की आंखों में झांकें !देखें क्या चल रहां वहाँ ? पर सावधान ! किसी भी की आँख में लम्बी समय तक झांकना /देखना एक मुश्किल भारा मामला है -ऐसा तो बस केवल प्रेमरस में आकंठ डूबे प्रेमी ही कर सकते हैं .या तो फिर एक दूसरे से अतिशय घृणा करने वाले ही कर सकते हैं ।
प्रेमियों के मामले में तो उनके बीच का पारस्परिक भरोसा और सहज विश्वास उन्हें बेधड़क ऐसा करने देता है और वे एक दूसरे की आंखों में डूब कर जाहिरा तौर पर अनजाने ही एक दूसरे की पुतलियों की नाप जोख करते रहते हैं !
अगर दोनों में से किसी भी की नीयत में खोट हुआ तो पुतलियाँ भांप लेती हैं -सिकुडी सिमटी पुतली प्रेम की पींगे आगे बढाने को खबरदार कर देती है !दो प्रेमियों की नीयत में खोट को ये पुतलियाँ ही जैवीय रेड सिग्नल देकर जता देती हैं !हाँ कुछ अनाड़ी तब भी ऐसे होते हैं कि बिचारे इस सशक्त जैवीय सिग्नल को भांप नहीं पाते !और धोखा खा जाते हैं ।
नजरें प्रेम औरविलासिता के साथ इतनी गहरे जुडी हैं कि कई मिथकीय आख्यान तक इन पर रचे गए हैं -एक तो देवाधिपति इन्द्र से ही जुडा है -कहते हैं जब अहल्या -इन्द्र प्रसंग में भृगु के शाप से इन्द्र अभिशप्त हुए तो उनके शरीर पर सहस्र भग हो गए -जो उनकी काम लोलुपता को देखते हुए एक उचित ही ऋषि -श्राप था .लज्जित इन्द्र के काफी अनुनय विनय पर ऋषि ने उन भगों को हजार नेत्रों में बदल दिया -इन्द्र तब से सहस्र नेत्र धारी हैं -यहाँ नेत्र काम विलासता के द्योतक तो हैं ही साथ ही वे 'बुरी नजरों ' की भूमिका में भी हैं ।
दक्षिण इटली में इन बुरी आंखों का ऐसा खौफ रहा कि दो पोप -पियास ix और लियो xiii तक को बुरी आंखों वाला मान लिया गया था जो उनके अनुनायियों को उनसे दूर कर रहा था ।
आईये अंततः कुछ मशहूर इशारों की बात कर ली जाय -
१-आँखे नीची और झुंकी झुंकी पलकें -विनम्रता ,सम्मान देने और कुछ परिप्रेक्ष्य में दब्बूपन को दर्शाती हैं ।
२-पलकों को ऊपर उठा क्षण भर के लिए उठा ही छोड़ देना -मासूमियत का संकेत !
३-घूरती हुयी आँखें -अभिभावकों की आँख है जो बच्चों को अनुशाषित करती है ।
४-कनखियों से देखना -सीधे देखा न जाय और बिन देखे रहा न जाय !
५-आँखें मारना -एक आँख खुली रखते हुए दूसरी को सहसा दबा देना -यह गुप्त संकेत है पर साथ ही अजनबियों से सेक्स की गुप्त अपील भी -मगर यह संकेत कई संस्कृतियों में शिष्टाचार के विपरीत माना जाता है -बैड ईटीकेट्स /मैनर्स .इसलिए आप कम् से कम इस इशारे से बाज आयें या फिर माहौल भांप कर इसे आजमायें .
( यहाँ कुछ नेत्र -इशारे नर नारी में कामन हैं )

Sunday, 31 August 2008

भारतीय भस्मासुरी भीमकाय भांटा अब थाली की शोभा बढाएगा !

Courtesy :Brinjal dimond kiran
भांटा बोले तो बैगन यानी ब्रिनज्ल ....यह भारत का पहला जेनेटिकली माडिफाईड फ़ूड (जी एम् फ़ूड ) बनने को बेताब है .बैंगन का भुरता /चोखा और कलौंजी के क्या कहने यम् यम् ....खाईये तो बस उंगलियाँ चाटते रह जाईये ।लेकिन भला यह भस्मासुरी भीमकाय का विशेषण ?यह क्या बला है ?
प्यारे मित्रों यह बला ही है -भला वह कैसे तो आईये इसे समझने के लिए एक कहानी सुनें .सन १८१८ में मशहूर ब्रितानी कवि पी बी शैली की पत्नी मेरी शैली ने एक उपन्यास लिखा था -जिसमे डॉ फ्रैन्केंसटीन को एक कृत्रिम मानव बनाने का चस्का लगता है और वे कई शवगृहों से लाशों के अंग प्रत्यंग दूंढकर लाते हैं और उनमें विद्युत् का संचार करते हैं -एक बहुत ही घिनौना प्राणी तैयार हो जाता है और डॉ उससे डर कर भागतेैं और अंततः उसके द्वारा सपरिवार मारे जाते हैं -यह एक दुखांत कथा है .फ्रैकेंसटीन नामक यह उपन्यास विश्व का पहला वैज्ञानिक उपन्यास माना जाता है .जिसका संदेश यह है कि -बिना बिचारे जो करे सो पाछे पछताय ......और जब वैज्ञानिकों ने अब पाराजीनी फसलें यानी किसी एक प्राणी के जीन को निकाल कर दूसरे प्राणी मे डालने का उपक्रम शुरू किया है तो विचारकों ने इसे भी एक फ्रैंक्सटीनियन काम धाम ही माना है .मसलन ध्रुवों की फ्लाउन्दर मछली के जीन को निकाल कर टमाटर में डाल देना ..जिससे टमाटर फ्रिज में लंबे समय तक चिकना और फूला Mसा बना रहे -क्योंकि उसमें एंटी फ्रीज जीन जो मिला है .अब आप यह टमाटर यदि खाते हैं तो एक तो यदि आप शकाहारी हैं तो धरम नष्ट भ्रष्ट हुआ और न जाने लांग रन में यह आपकी अंतडियों में क्या गुल खिलाये .ऐसे भोज्य पदार्थों को सारी दुनिया में फ्रंकेंसटीन फ़ूड कहा जा रहा है -इन्हे जेनेटिकली बदल्दिया गया है .ऐसे अनेक भोज्य पश्चिमीं बाजारों में और चोरी छिपे यहाँ भी बिकने लगे है -
भारत में पराजीनी फलों -फसलों पर कड़ी नजर के लिए एक समिति है -GEAC -जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी - जो यद्यपि इस समय विवादों में घिरी है मगर जल्दी ही भारत के लिए पहले जी एम् बैगन का उपहार जारी करने वाली है .
तो यह भस्मासुर और भीमकाय का क्या मतलब है ?अरे भाई !याद कीजिये शंकर और भस्मासुर की कथा जिसमें शंकर जी ने बिना आगा पीछा सोचे उस राक्षस को वरदान दिया और फिर मुसीबत में पड़ गए .तो मैंने भारतीय मनीषा के लिए फ्रैकेंसटीन के बजाय अपना जाना पहचाना भस्मासुर नाम चुना है -तो ये फिर भीमकाय क्या ?
ये बैगन बड़े बड़े आकार के होंगे इसलिए भीमकाय भी !
अब आप बताएं कि क्या भस्मासुरी बैगन आपको पसंद आयेगा ?



Friday, 29 August 2008

पुरूष पर्यवेक्षण :बड़ी आँखें ,छोटी आँखें !

रोती आँखें -नर की या नारी की ?साभार :मूव -4
मैं तो यही जानता था कि मृगनयनी का विशेषण नारियों के लिए इसलिए है कि उनकी आँखें बड़ी होती होंगी !मगर मेरी आँखें यह जानकर खुल गयीं कि पुरूष की ऑंखें नारियों की आंखों से इत्ता भर ही सही बड़ी होती हैं -तो अब चाहें तो आप अपने किसी पुरूष मित्र को म्रिग्नैन कहकरसंबोधित कर सकते/सकती हैं .हिन्दी के साहित्यकार नाक भौ सिकोणे तो बला से !
समूचे थलचरों में मनुष्य ही अकेला प्राणी है जो अपने भावोंद्गारों को आसुओं के जरिये भी व्यक्त कर सकता है .मतलब केवल वही रो सकता है अन्य प्राणी नहीं .घडियाली आंसू भी आप सभी जानते हैं नकली होते हैं .विश्व की अनेक संस्कृतियों की भावुक नारियों में अश्रु ग्रंथि भावुक नरों की अपेक्षा अधिक सक्रिय देखी गयी हैं -ऐसा होना महज सांस्कृतिक /सांस्कारिक लालन पालन जो पुरुषों को भावुकता के प्रदर्शन पर अंकुश रखना सिखाते हैं ,की देन है अथवा कोई जैवीय कारण यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है .मगर नारियों में यह अश्रु व्यवहार समूची दुनिया में इस कदर व्याप्त है कि इसके पीछे महज सामाजिक संस्कारों की भूमिका ही नही लगती ।
मनुष्य की पुतलियाँ किसी प्रिय या प्रिय वस्तु को देखकर फैल जाती हैं -यह एक अनैच्छिक क्रिया है .मतलब यह कि आप झूठ मूठ चाहकर भी अपनी पुतलियों को फैला कर यह प्रर्दशित नहीं कर सकते कि मोगाम्बो खुश हुआ .पुतलियाँ झूठों की पोल खोल देती हैं .मगर प्रिय/प्रिया दर्शन पर ये पुतलियाँ अनचाहे ही काफी फैलती जाती है -चहरे करीब आते जाते हैं और ये फैलती जाती हैं -पर यहीं एक मुश्किल आन पड़ती है -पुत्ल्यों के फैलते जाने से उनमें प्रवेश करने वाली रोशनी की मात्रा भी काफी बढ़ जाती है जो रेटिना पर चका चौंध उत्पन्न करती है -दो प्रेमी चहरे काफी करीब हो जाने पर अब एक दूसरे की धुंधली धुंधली सी तस्वीर ही देख पाते हैं .डेजमानड मोरिस कहते हैं कि यह इसलिए ठीक है कि काफी करीब आए चेहरे एक दूसरे के मुहांसे ,फुंसी और पिर्कियों,धब्बों -यानि चहरे की बदसूरती से विकर्षित भी हो सकते हैं -तो यह प्रकृति प्रदत्त छुपा हुआ वरदान उनकी राहें आसान कर देता है .जब मामला किस तक जा पहुंचा हो तो नर के लिए काहें का ब्रेक !प्रकृति का छुपा मंतव्य तो सदैव संतति संवहन का ही है ।
अब कुछ आंखों की बरौन्यों पर -जो आंखों पर एक सुरक्षा घेरा बनाती हैं .भौहें तथा अन्य हिस्सों के बाल सफ़ेद हो सकते हैं पर अमूमन बरौनियाँ उम्रभर काली ही बनी रहती है -शायद इस अर्थ में ये पुरुषों की सच्ची मित्र हैं .प्रत्येक आंख में ऊपर नीचे लेकर औसतन २०० बरौनी बाल होते हैं .ऊपर के पलक में ज्यादा नीचे कम ।
जारी ..........

Monday, 25 August 2008

पुरूष पर्यवेक्षण -भौहें -2

मनोभावों को प्रगट कराने में भौहों की भी भूमिका है -देखें जर्नल आफ आई विजन
मनोभावों के मूक प्रकटीकरण में भौहों को महारत हासिल है .अब तक हमने भौहों के आरोह अवरोहों और उनके कुछ निहितार्थों को जाना .अब आगे .......
-भौहों का एक साथ ऊपर नीचे होना -इसमें भौहें नीचे होती हैं पर तुंरत ही ऊपर उठ जाती हैं .यह गहरी पीड़ा और चिंता का द्योतक है .तेज दर्द के समय भी भौहों का ऐसा प्रदर्शन हो उठता है .टीवी पर बाम की बिक्री के लिए सरदर्द के विज्ञापनों में इसी भंगिमा को दिखाया जाता है ।

-भौहों को पलक झपकते ऊपर से नीचे करना -यह भंगिमा सारी दुनिया में स्वागत-आमत्रण के लिए जानी जाती है .यह किसी स्वजनके दिखते ही उसके प्रति किया जाने वाला दोस्ताना व्यवहार है .उस व्यक्ति केनिकट आ जाने पर यह हाथों के मिलाने ,गले मिलाने या चुम्बन में तब्दील हो जाता है .पलक का ऊपर उठना मात्र ही आश्चर्य का द्योतक है -यदि उसमें होठों की मुस्कराहट भी मिल जाय तो यह अदा प्लीजेंट सरप्राईज़ बन जाती है ।
-ध्यानाकर्षण -आपसी बात चीत में भौहों को बार बार उठाने का एक संकेत यह भी है कि वक्ता की बात पर गौर किया जाय -वह अपनी समझ के मुताबिक किसी बात पर जोर दे रहा है तो भौहें उठा देगा ।
-भौहों को तेजी से और लगातार ऊपर नीचे करना -
सर्कस के जोकरों का यह चिर परिचित मजाकिया लहजा है .यह हंसी मजाक का संकेत है
-भौहों को ऊपर उठाना ,थोडा रुक कर नीचे गिरान -यह दुःख ,आश्चर्य और आपत्ति के मिले जुले भावों को प्रर्दशित करता है -सर्प्राईजड डिसअप्रूवल !
यह तो हुयी भौह -संकेतों की बात .पुरुषों को गहरे पराजय और चिंता के क्षणों में अपनी भौहों को दोनों हथेलियों से ढकते हुए भी देखा जाता है .मानों यह कहा जा रहा हो कि भाई अब मैं लाचार हूँ और पौरुष विहीन भी !स्पष्टतः घनी भरी पूरी भौहें पौरुष का प्रतीक हैं -इसलिए ही नारी की तुलना में पुरूष की भौहें ज्यादा घनी और मोटी होती हैं .मगर जब ये काफी मोटी और घनी तथा एक दूसरे से मिल सी जाती हैं तो एक अंगरेजी कहावत की याद दिलाती हैं -
ट्रस्ट नॉट मैन हूज आईब्रोज मीट ;फार इन हिज हार्ट यू विल फायिंड डिसीट .

Sunday, 24 August 2008

पुरूष पर्यवेक्षण -भौहें !











मनुष्य में बालदार भौहें हैं मगर चिम्पांजी में नदारद



नर वानर कुल में महज मनुष्य ही भौहों वाला प्राणी है -चिम्पांजी जो हमारा करीबी जैवीय रिश्तेदार है भौहों से वंचित है .भौहें भाव संप्रेषण में काफी सशक्त हैं .भौहों की भाव भंगिमा का कुछ ऐसा रंग चढ़ा कि उनमें देवत्व का आरोपण तक हो गया .परब्रह्म के भ्रिकूटिविलास से ब्रह्माण्ड तक झंकृत होने लग गया . जहाँ चिम्पांजी की भौहें बालों से पूरी तरह रहित होती है मनुष्य की भौहें बालों से लदी फदी !इनमें भाव संप्रेषण की अद्भुत क्षमता होती है .ईर्ष्या द्वेष ,पसंद नापसंद ,प्यार या गुस्सा ,खीझ आदि अनेक भावों की अभिव्यक्ति भौहें बखूबी कर लेती हैं ।
आईये भौंह विलास के कुछ नमूने देखें -
-भौहें चढाना -त्योरी चढाना ,या त्योरी बदलना या फिर तेवर बदलना आदि अभिव्यक्तियाँ बस इन भौहों का विलास ही तो है -ये सभी अप्रसन्नता द्योतक है -मगर मजेदार यह है कि इसमें भौहें ऊपर चढाने के बजाय नीचे की जाती हैं ।इसमें भौहें नीचे तो होती ही हैं वे थोडा आपस में करीब भी हो जाती हैं .यह गुस्से का इजहार है ।
-भौहें उठाना -यह भंगिमा भौहों को ऊपर उठाने की है पर इससे माथे पर भी बल पड़ जाता है .और चिंता की लकीरे स्पष्ट हो उठती हैं ।अन्य सन्दर्भों में यही भंगिमा आश्चर्य ,मुग्धता ,शंका ,अज्ञानता या फिर नक्चढ़ेपन का भाव संप्रेषण करती है .आँखे खोलना -आई ओपनर का भावार्थ भी इसी भंगिमान में छुपा है .सही भी है क्योंकि भौहों को उठाने पर आँखे पूरी खुल जाती है और सामने का दृश्य क्षेत्र काफी विस्तित हो जाता है .
-एक कलाबाजी या कसरत यह भी -एक आँख की भौहे ऊपर ,दूसरी की नीचे -आपने यह पौरुष अदा कभी देखी ?इसका अभिप्राय है किसी बात पर शंकालु हो उठाना यह भाव प्रश्नवाचक भी है ।
जारी ........

Friday, 22 August 2008

जीन डोपिंग का आया ज़माना ......

क्या जमैका वासी जन्मजात धावक हैं ?
खेल प्रतिस्पर्धाओं के लिए डोपिंग एक गंदा शब्द है .चीन में ओलम्पिक प्रतिस्पर्धाएं परवान पर हैं .डोपिंग को लेकर एक आशंका हमेशा ऐसे माहौल पर तारी रहती है .स्टेरायड डोपिंग का ज़माना लगता है लद गया है अब जीन डोपिंग की चर्चाएँ जोर पकड़ रही हैं !क्या है ये जीन डोपिंग ?
आईये इसे समझने का प्रयास करें ।
जीन डोपिंग जैवप्रौद्योगिकी की ऐसी नयी प्राविधि है जिसमें उन जीनों को शरीर में प्रविष्ट कराया जा सकता हैजिनसे शारीरिक क्षमता में अभूतपूर्व और अविश्वसनीय परिवर्तन आ जाय .ऐसे जीन शरीर की लाल रक्त कणिकाओं को बढ़ा देने वाले हो सकतेहैं जिससे एथेलीट को अपने परफार्मेंस के दौरान अधिक से अधिक आक्सीजन मिल सके और वह थके नहीं -इसी तरह एक जीन ऐसा खोजा गया है जो पैरों की एक मांसपेशी को काफी मजबूती दे सकता है और दौडों को जीतने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है .दरसल ये खोंजे चिकित्साविज्ञान की वे खोजें हैं जिनसे पीड़ित मानवता को राहत मिल सकती है -रक्ताल्पता का उपचार हो सकता है ,पेशियों के ढीलापन वाले रोगी ठीक हो सकते है -पर इनके खेलों -खास कर विश्व स्पर्धाओं में दुरूपयोग की संभावनाओं का डर बढ़ता ही जा रहा है -मुश्किल है कि कई प्रचलित डोपिंग के तरीकों जिन्हें पहचाना जा सकता है के ठीक विपरीत इनकी पकड़ अभी तक मुश्किल है -क्योंकि जीन कुदरती प्रणाली का हिस्सा बन जाते हैं और पहचान में नही आ पाते ।
एक सनसनी खेज बात बतायी है कोस्मो ने अपने ब्लॉग पर -उनके अनुसार ७० फीसदी जमैका वासियों में एक जीन है जो Actinen A नामक मांस पेशी को मजबूती देता है -मतलब ? जमैका वासी दौडों में कुदरतीतौर पर मजबूत हैं .इन सारे विषयों को न्यू साईंटिस्ट पत्रिका ने ओलम्पिक के अवसर पर कवर किया है -आप की रूचि हो तो यहाँ देख सकते हैं ।
मैं यह सोच रहा हूँ कि आख़िर भारतीयों को कुदरत ने ऐसे कोई गुण क्यों नही दिए जहाँ एकाध ओलम्पिक रिकार्ड मिल जाने को ही लोग झ्न्खते रहते हैं .ऐसे लोगों को ढूंढ कर उन्हें रिजर्वेशन देने का वक्त आ गया है ! क्यों ?

Wednesday, 20 August 2008

पुरूष पर्यवेक्षण -बालों का रंग रोशन और कुछ दीगर बातें !

बालों के मुख्य रंग हैं -काला ,सफ़ेद और लल्छौंह और इन्ही के विविध संयोगों से उत्पन्न कई और रंगों वाले बाल .जिसमें एक भूरा रंग भी बहुधा दिखता है .दक्षिण स्काटलैंड के सीमावर्ती निवासियों के सुर्ख लाल बालों का मर्म आज भी रहस्य भरा है .बालों का कुदरती स्वरुप मनुष्य की अलग अलग नस्लों में अलग ही होता है .नीग्रो के सिलवटी ,काकेशियन के लहरियादार ,मंगोलों के सीधे [स्ट्रेट ]बाल उनकी नस्ल पहचान से बन गए हैं .ज्यादातर भारतीयों के बाल काकेशियन मूल के ही हैं .बाल इस तरह पुरूष की जातीय पहचान के सिम्बल से बन गए हैं ।
कई आदिवासी समाजों में पुरुषों द्वारा लंबे बाल रखने का रिवाज है जबकि औरतें सर मुदा कर रखती हैं .यहाँ पुरूष के लंबे घने बाल उसके ऊंचे स्टेटस का प्रतीक हैं .जैसे सीजर शब्द की व्युत्पत्ति में kaiser और tsar शब्द के मूल अर्थ ही लंबे बाल हैं .इसी अर्थ में लंबे बाल दलीय नेता या मुखिया के पहचान चिन्ह बन गए .कहते हैं इस परम्परा का उदगम आदिम गिल्गामेश के कथानक से हुआ है .महानायक गिल्गामेश लंबे घने बालों वाले थे .जिन्होंने बाल्मीकि रामायण पढी है वे जानते होंगे कि अपने भगवान् राम भी लंबे घने बालों वाले थे जिसे सजाने सवारने में उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ती थी .लक्ष्मण के बालों को भी बड़ा दिखाया गया है -इन दोनों भाईयों के लिए वनवास में अपने बालों को सेट करना एक श्रमसाध्य काम बन गया था .अब जब हमारे महापुरुष ही घने लंबे बालों वाले ठहरे तो यह दिव्यता और उच्चता -राज घराने का एक स्टेटस सिम्बल बन गया .आज भी अपने क्षेत्रों के दिग्गज लंबे नारी सरीखे वाले बाल लहराते दिख जाते हैं -इसका प्रचलन भारत में बहुत पुराना है -दिव्यता के द्योतक इन लंबे बालों को साधू सन्यासियों -भगवान के समकालीन कथित अवतारों पर फबते हुए देखा जाता है -ये नारी से बाल तो हैं पर कतई स्त्रैण नही हैं .क्योंकि ऐसे दिव्यता के द्योतक बालों को सरेआम मुडाना ,सफाचट करना किसी की भी किरकिरी के लिए काफी है .यह किसी को अपमानित कराने का सबब हो सकता है -जैसे बालों को मुडवा कर गधे पर बैठाना किसी के लिए घोर अपमान हो सकता है -उसके सामाजिक हैसियत को गिराना हो सकता है .सर मुडाने का मतलब ही हुआ अतो विनम्रता और गिरा हुआ स्टेटस .ईश्वर के लिए सर मुडाने का मतलब हुआ उनके सामने मर मिटाना -कई धार्मिक कर्मकांडों में किसी दिव्यशक्ति के सामने बाल मुड्वाने का यही मरम है -कई लोगों ने तो इसे विनम्रता के ढोंग के रूप में भी लिया -मूंड मुडाई भये संन्यासी .
इति केश प्रकरणम्.......