Science could just be a fun and discourse of a very high intellectual order.Besides, it could be a savior of humanity as well by eradicating a lot of superstitious and superfluous things from our society which are hampering our march towards peace and prosperity. Let us join hands to move towards establishing a scientific culture........a brave new world.....!
Wednesday, 20 August 2008
पुरूष पर्यवेक्षण -बालों का रंग रोशन और कुछ दीगर बातें !
कई आदिवासी समाजों में पुरुषों द्वारा लंबे बाल रखने का रिवाज है जबकि औरतें सर मुदा कर रखती हैं .यहाँ पुरूष के लंबे घने बाल उसके ऊंचे स्टेटस का प्रतीक हैं .जैसे सीजर शब्द की व्युत्पत्ति में kaiser और tsar शब्द के मूल अर्थ ही लंबे बाल हैं .इसी अर्थ में लंबे बाल दलीय नेता या मुखिया के पहचान चिन्ह बन गए .कहते हैं इस परम्परा का उदगम आदिम गिल्गामेश के कथानक से हुआ है .महानायक गिल्गामेश लंबे घने बालों वाले थे .जिन्होंने बाल्मीकि रामायण पढी है वे जानते होंगे कि अपने भगवान् राम भी लंबे घने बालों वाले थे जिसे सजाने सवारने में उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ती थी .लक्ष्मण के बालों को भी बड़ा दिखाया गया है -इन दोनों भाईयों के लिए वनवास में अपने बालों को सेट करना एक श्रमसाध्य काम बन गया था .अब जब हमारे महापुरुष ही घने लंबे बालों वाले ठहरे तो यह दिव्यता और उच्चता -राज घराने का एक स्टेटस सिम्बल बन गया .आज भी अपने क्षेत्रों के दिग्गज लंबे नारी सरीखे वाले बाल लहराते दिख जाते हैं -इसका प्रचलन भारत में बहुत पुराना है -दिव्यता के द्योतक इन लंबे बालों को साधू सन्यासियों -भगवान के समकालीन कथित अवतारों पर फबते हुए देखा जाता है -ये नारी से बाल तो हैं पर कतई स्त्रैण नही हैं .क्योंकि ऐसे दिव्यता के द्योतक बालों को सरेआम मुडाना ,सफाचट करना किसी की भी किरकिरी के लिए काफी है .यह किसी को अपमानित कराने का सबब हो सकता है -जैसे बालों को मुडवा कर गधे पर बैठाना किसी के लिए घोर अपमान हो सकता है -उसके सामाजिक हैसियत को गिराना हो सकता है .सर मुडाने का मतलब ही हुआ अतो विनम्रता और गिरा हुआ स्टेटस .ईश्वर के लिए सर मुडाने का मतलब हुआ उनके सामने मर मिटाना -कई धार्मिक कर्मकांडों में किसी दिव्यशक्ति के सामने बाल मुड्वाने का यही मरम है -कई लोगों ने तो इसे विनम्रता के ढोंग के रूप में भी लिया -मूंड मुडाई भये संन्यासी .
इति केश प्रकरणम्.......
Tuesday, 19 August 2008
वे अजन्मी बच्चियां !
अम्नियोसेंटेसिस तकनीक का भी दुरूपयोग आज की बी बी सी की यह समाचार प्रस्तुति दरअसल एक दर्दभरी दास्तान है -भारत में मादा भ्रूण पात की घटनाओं में तेजी आयी है जब कि लिंग के आधार पर यह भेदभाव या लैंगिक जांच यहाँ कानूनन अपराध है .अल्ट्रासाउंड तकनीक का दुरूपयोग मादा भ्रूणों को नष्ट कराने के लिए बढ़ता ही जा रहा है .स्टीव ब्रैडशा की रिपोर्ट यह खुलासा करती है कि भारत सचमुच नारियों के लिए अभी भी एक कष्टप्रद देश ही है .रिपोर्ट में जो आंकडा उधृत है वह बताता है कि देश में हर वर्ष १० लाख मादा भ्रूण विनष्ट हो रहे हैं -यह सचमुच एक बड़ी संख्या है .दिली में एक हजार लड़कों की तुलना में महज ८८१ लड़कियों का लिंग अनुपात रह गया है ।रिपोर्ट में बंगलौर आदि शहरों के भी हालत का वर्णन है .
यह संयोग ही है कि इस रिपोर्ट से भी कहीं ज्यादा गंभीर अध्ययन का ब्योरा अभी अभी अनवरत ने भी जारी किया है .साईब्लाग की दृष्टि में दरअसल यह ऐसा मुद्दा है जो विज्ञान के सामाजिक सरोकारों की ओर ध्यान आकर्षित करता है -अल्ट्रा साउंड तकनीक उदर संबन्धी बीमारियों के निदान के लिए विकसित की गयी थी .पर मनुष्य ने इसका दुरूपयोग करना शुरू कर दिया है .इसी तरह दूसरी लिंग भेद की तकनीक है अम्नियोसेंटेसिस जिसमें कुछ गर्भजल को सीरिंज से निकाल कर जांच कर गुणसूत्रों के जरिये नर मादा लिंग की जांच प्रसव के पहले हो जाती है .यह तकनीक भी चोरी छिपे प्रयोग में लाई जा रही है .यह तकनीक अल्ट्रा साउंड की तुलना में प्रसवपूर्व जेनेटिक जांच के लिए ज्यादा प्रामाणिक है .मगर यह केवल उन स्थितियों में जेनेटिक परामर्श के लिए विकसित हुयी थी जब भावी नर या नादा संतान किसी लायिलाज जेनेटिक बीमारी से ग्रस्त होने की परबल संभावना रखते हों -पर अफ़सोस की यह तकनीक भी भारत में केवल मादा गर्भ की शिनाख्त और उसे विनष्ट करने के दुष्कर्म में इस्तेमाल हो रही है .यहाँ विज्ञान और तकनीकतथा वैज्ञानिक दोषी नही -दोषी हमारी आदिम मानसिकता है जो आज भी गुफाओं के कैद से मुक्त नही हो पायी है ।
एक बड़ा जनांदोलन ही हमें इस आदिम मानसिकता से मुक्ति दिला सकता है -इसमें वैज्ञानिकों को भी आगे आना होगा !
Sunday, 17 August 2008
पुरूष पर्यवेक्षण -केशव केशन अस करी ........2
मित्रों ,यदि आप चांद्रशीर्ष हैं तो दुखी न हों इसकी जिम्मेवारी काफी हद तक आपकी आनुवंशिकता को जाता है ,यह खानदानी हो सकता है इसके चांसेस ज्यादा हैं .और एक सनसनीखेज खुलासा यह भी कि चांद्र शीर्ष मित्रों में पौरुष हारमोन अधिक स्रवित होते पाये गए हैं .ये पौरुष हारमोन -खास तौर पर टेस्टोंस्टेरान तो जैसे बालों का दुश्मन ही है .टेस्टोंस्टेरान बालों की जड़ों पर हमला बोलता है और उन्हें बेदम कर देता है .यह पाया गया है कि खोपडी के अगल बगल के बाल इसी टेस्टोंस्टरआन की सक्रियता से झडते जाते हैं .हारमोन के प्रभाव से झड़ने वाले ये बाल कोटि जतन के बाद भी फिर से नही उग पाते .यह गंजापन स्थायी बन जाता है .
गंजापन तो वैसे एक लेट उम्र से शुरू होने वाली धीमी प्रक्रिया है मगर यह देखा गया है कि ५ लोगों में से कोई एक तो किशोरावस्था के बाद ही गंजेपन की चपेट में आने लग जाता है .हां, यह इतनी धीमी गति से होता है कि बहुधा नोटिस में नहीं आता .मगर ३० वर्ष के उम्र तक पहुंचते पहुंचते इस नग्न सत्य या कटु यथार्थ का अहसास होने लगता है .५० तक पहुंचते पहुंचते ६० फीसदी तक लोगों में गंजापन स्पष्ट दृष्टिगोचर हो जाता है .
आख़िर कैसे पाएं इस मुसीबत से छुटकारा .आईये हम बताते हैं आपको कुछ शर्तियाँ इलाज ! अब जब सारा खेल पुरूष हारमोन का ही है तो क्यों नहीं किशोरावाश्था तक पहुँच कर ऐसा कुछ किया जाय कि पुरूष हारमोन की सक्रियता कम कर दी जाय ! एक उपाय तो है मगर वह बड़ा नृशंस है -कास्टरेशन (बधियाकरण ) !अरे आप इसे हल्के में ले रहे हैं -जनाब ज़रा इतिहास के पन्ने तो पलटिये -किसी सुलतान के हरम के चौकीदार -हिजडों को कभी भी गंजा नही पाया गया .(कुछ बातें आप की कल्पना पर छोडी जा रही हैं ).गंजा होने से बचने का एक शर्तिया तरीका और हो सकता है -आप उस घर में जन्म ही क्यो लें जहान् यह नफासत विरासत में चली आ रही हो -काश ये दोनों उपाय व्यावहारिक होते !पर हे मेरे चांद्र शीर्ष मित्र नर होकर मन को निराश क्यों करते हो....मैंने अपनी पिछली पोस्ट में यह वादा किया था कि आपके मोरल को ऊंचा करने वाली एक बात आपको बताऊंगा ॥
तो वह बात यह है कि आपको अपने किसी भरे पूरे बालों वालें मित्र की तुलना में पुंसत्व का अतरिक्त बल मिला हुआ है .ऐसा विग्यानिओं का दावा है .बाल भले ही कम हैं पर पुरुसत्त्व के मामले में आप बाजी मार ले गए हैं .आप में टेस्टोंस्टरआन की अधिकता जो है -इस हारमोन के चलते आप औरों की तुलना में अधिक दबंग भी हैं ।
सावधान !हे चान्द्र शीर्ष मित्र !तुम्हारी यह खासियत तुम्हारे कई हमराहियों के लिए ईर्ष्या का सबब बन सकती है .पर यह कूवत तो आपने अपने भरे पूरे बालों की बलि देकर कुदरत से हासिल किया है -लोग बाग जलें तो जलें .....(सच कहूं ,यह जलन तो मुझे भी आपसे है ..)अगले अंक में बालों का रंग रोशन ....
Friday, 15 August 2008
पुरूष पर्यवेक्षण -पहला पड़ाव -१.....केशव केशन अस करी.......
चान्द्र शीर्ष पुरूष -एक पर्यवेक्षण केशव केशन अस करी जस अरिहू न कराहिं
चन्द्र मुखी मृगलोचनी बाबा कहि कहि जाहिं
महाकवि केशव की यह दृष्टि व्यवहार विज्ञान की कसौटी पर आज भी खरी है -क्योंकि कि पुरूष के बाल का सफ़ेद होना उसके वृद्धावस्था के आरम्भ के अनेक लक्षणों में से एक लक्षण तो हैं ही .राजा दशरथ ने अपने बालों की सफेदी देखकर राजपाट छोड़ने की तैयारी कर ली थी .
लेकिन पुरूष के लिए बालों की सफेदी से बढ़कर एक और चिंता का सबब है सर से बालों का इक सिरे से ही गायब होते जाने का -जो समाज में उसके हास परिहास का भी बायस बन जाता है-टकला,चान्दवाला आदि फब्तियां पुरूष के लिए 'मेरा दर्द न जाने कोय ' किस्मका दुखदर्द भी दे जाता है .खल्वाट खोपडी यानी टकले होते जाने का भी एक भरा पूरा विज्ञान है .
आईये पुरूष पर्यवेक्षण के इस पहले पड़ाव पर खोपडी पर बालों की इसी कारस्तानी का जायजा लेते चलें -
टकले होने के चार मुख्य पैटर्न मार्क किए गए हैं -बाकी इन चारों के मिलेजुले अनेक पैटर्न हैं .ये चार मार्क हैं -
१-द विंडोज पीक -इसमें सर के मध्य भाग में तो एक शिखा पट्टी बनी रहती है मगर अगल बगल से माल असबाब यानी बाल सफाचट होने लगते हैं .
२-द मांक पैच-यहाँ आगे के बाल तो सही सलामत रहते हैं मगर पीछे से इक चाँद उगने को बेताब नजर आता है .
और दिन ब दिन पूर्णिमा की ऑर अग्रसर होता है .
३-द डोम्द फोरहेड - सर के अगले भाग के लगभग आधे हिस्से से बालों का लोकार्पण हो उठता है और एक चंद्र सतह अनावृत्त हो उठती है .और
४-नेकेड क्राउन में सर के अगले भाग से शुरू होकर एक स्वेज नहर ख़ुद ब ख़ुद खुदती चली जाती है .मगर इस नहर के अगल बगल के तट बंधों पर बालों की एक फसल लहलहाती रहती है .यह ठीक विडोज पीक का उल्टा नजारा होता है .
ये तो रहे चार मुख्य पैटर्न -मगर ऐसे भी नर पुंगव हैं जिनमें ये चारो पैटर्न मिल जुल कर अठखेलियाँ खेलते हैं और तरह तरह के नजारे पेश करते हैं .
हे मेरे चंद्र्शीर्ष पुरूष मित्रों तुम कतई उदास न होना अगले अंक में आप के लिए एक जबरदस्त ख़बर है .कुदरत सबके सुखदुख का ख्याल रखती है -और हे चंद्र्मुखियाँ तुम केवल चन्द्र्सतह से मत भरमाना वह केवल एक भरम मात्र ही है .जी हाँ अगले अंक में होगा खुलासा !!
ब्लागरों के लिए एक खुशखबरी !
ब्लॉगर एट कीबोअर्ड हारवर्ड विश्वविद्यालय के न्युरोविग्यानी अलायिस फल्हेर्टी ने हायीपर्ग्रैफिया -लिखने की कशिश वाले लोगों के मामलों का अध्ययन कर रही हैं .कुछ लिख कर अपने को अभिव्यक्त करने की अदम्य अकुलाहट जैसा ही एक नशा और होता है बात करने का .कुछ लोग बहुत बातूनी होते हैं .ब्लागिंग और बातूनीपन में एक साम्य पाया गया है कि ये दोनों गतिविधियाँ मस्तिस्क के लिम्बिक प्रणाली को उद्दीपित करती हैं .मस्तिष्क के मध्य भाग में पाया जाने वाली लिम्बिक प्रणाली कई अदम्य लालसाओं का केन्द्र बिन्दु होती है .मसलन भोजन करने ,कामोद्दीपन या किसी पहेली को हल करने में यही लिम्बिक प्रणाली निर्णायक भूमिका निभाती है. अब चूंकि ब्लाग्गिंग की गतिविधि से यह क्षेत्र उद्दीपित होता पाया गया है जिसमें डोपामाईन नामक रसायन स्रावित होता है .यह रसायन आनन्दानुभूति के लिए जाना जाता है .अमेरिका में कई हास्पिटलों में मरीजों द्वारा संचालित कई कम्युनटी ब्लागों का प्रचालन शुरू हुआ है .रोगियों में इसके पार्टी उत्साह देखा जा रहा है .कुछ लिंक्स आप भी देख सकते हैं -यहाँ ,यहाँ और यहाँ .
Sunday, 10 August 2008
पुरूष पर्यवेक्षण -एक देहान्वेषण यात्रा !(प्रस्तावना )
माईकेल एंजेलो की अमर कृति -पौरुष के प्रतीक डेविडनारी सौन्दर्य यात्रा के समापन तक आते आते इस विषय पर अन्य बहस मुहाबिसों के साथ ही मुझसे नर नख- शिख वर्णन के लिए भी आग्रह किया जाने लगा. यह तर्क दिया गया कि 'विज्ञान की दृष्टि में चूंकि नर नारी में विभेद करना उचित नहीं इसलिए नर सौदर्य शास्त्र की चर्चा भी होनी चाहिए ' .इस मत की पुरजोर वकालत करती लवली जी ने आख़िर मुझे इस लेखमाला के लिए प्रेरित कर ही दिया .
जब साहित्य -सिनेमा में फरमाईशों और उनके पूरा किए जाने की समृद्ध परम्परा रही है तो फिर विज्ञान की दुनिया जहाँ ज्ञान विज्ञान के बांटने की परिपाटी वैसे भी रही है -इस फरमाईश को न पूरा करना मेरे कर्तव्यच्युत होने सरीखा ही है -अस्तु ,यह नयी शोध यात्रा ,मानव देह की पुरान्वेषण यात्रा ......आत्म देहान्वेषण यात्रा ....इस लेखमाला को आप भी अपनी ओर से कोई और भी शीर्षक सुझा सकते हैं .मैं इसे पुरूष सौन्दर्य यात्रा कहने में किंचित संकोच कर रहा हूँ क्योंकि फिर मेरे ऊपर कुछ ओर आरोप लगने लगेंगे -और देश का क़ानून मैं क्या, किसी के भी लिए भी शिरोधार्य होना चाहिए ......
वैसे भी पुरुषों के 'नख शिख 'सौदर्य वर्णन' की कोई परिपाटी मेरी जानकारी में नही है -और अपनी ओर से यह नामकरण कर मैं विवादों को आमंत्रित नही करना चाहता .लेकिन यह एक रोचक तथ्य है कि समूचे जंतु जगत में मादा के मुकाबले नर प्रत्यक्षतः अधिक चित्ताकर्षक लगता है - मोरिनी के बजाय मोर को देखिये , मुर्गी के बजाय मुर्गे को देखिये ,अनेक खग मृग में नर ही आकर्षक दीखते हैं .क्या मनुष्य के मामले में भी ऐसा ही है ?यह मुद्दा भी चिंतन की दरकार रखता है .मगर विज्ञान की तटस्थता के लिहाज से यह निर्णय करेगा कौन ? वही न जो न नारी हो और और न नर -क्या किन्नर ?
नारी सौदर्य के अपने सद्य प्रकाशित ब्लॉग पोस्टों में मैंने नारी अंग प्रत्यंग की चर्चा को सौदर्य चर्चा में इसलिए तब्दील कर दिया था कि नख शिख नारी सौदर्य वर्णन की हिदी साहित्य में एक परम्परा रही है -बस उसी की विरासत को यथाशक्ति अल्पबुद्धि कायम रखने तथा वैज्ञानिक ज्ञान की रुचिकर प्रस्तुति के लिहाज से और कुछ अपने व्यक्तिगत आग्रहों के चलते भी वह एक सौन्दर्य बोध यात्रा बनती गयी .......जिस पर अनुचित कम उचित ज्यादा वाद विवाद भी हुआ और शायद सही परिप्रेक्ष्य में उस पूरी यात्रा कथा को न लेने के कारण भी लोगबाग सशंकित से दिखे .....
मैं यह पुनः पुनरपि स्पष्ट कर दूँ- यहाँ केवल विज्ञान की वार्ता हो रही है कोई प्रायोजित और पूर्वाग्रहित आयोजन नही है यहाँ ,और न कोई लक्षित फलसफा ......हाँ पिछली कुछ कमियों को जिसे विद्वान् ब्लॉगर मित्रों ने चेताया है मैं ध्यान रखूंगा -मसलन वैज्ञानिक शोध सन्दर्भों का यथा सम्भव लिंक भी देने का प्रयास करूंगा .
मुझ पर नर नारी में पक्षपात कराने का आरोप न झेलना पड़े इसलिए भी यह पुरूष प्रसंग जरूरी हो गया है
इहाँ न पक्षपात कछु राखऊँ ,वेद पुरान संत मत भाखऊँ ...........
पुरूष के अंग प्रत्यंग का यह व्यवहार शास्त्रीय [ethologial ] अध्ययन भी दरअसल एक देहान्वेषण भ्रमण /पर्यटन शोध यात्रा ही है .निजी तौर पर एक ब्लॉगर के रूप में कहूं तो यह मेरे लिए भी एक आत्मान्वेषण यात्रा है -
इस शोध यात्रा की भी अध्ययन पद्धति [methodology ] वही है - सिर से लेकर पैरों तक अंग अंग प्रत्यंग का पर्यवेक्षण ! बालों से शुरू होकर आगे के सभी देह स्थल पडावों पर ठहरती सुस्ताती यह यात्रा आगे बढेगी -मगर इस बार द्रुत नहीं विलंबित गति से .......इस बीच साईब्लाग विज्ञान के अन्य क्षेत्रों को भी कवर करता रहेगा और पुरूष पर्यवेक्षण पर मेरा अध्ययन भी अपडेट होता रहेगा .
आईये शुरू करते हैं पुरूष की देहान्वेषण यात्रा ----आप बिना टिकट ही इस यात्रा का शुरू से ही मुसाफिर बन लें --आईये आईये स्वागत है .......संकोच न करें ......पुरूष और नारी सभी ब्लॉगर मित्रों के लिए यहाँ कोई पक्षपात नहीं ..दोनों के लिए एक ही कम्पार्टमेंट हैं .......
यह पूरी लेखमाला फर्मायिश्कर्ता को ही समर्पित है -इदं न मम .........
Friday, 8 August 2008
कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना ..................!
इसे दूसरे पानीपत के युद्ध के समकक्ष भी देखा जा रहा है - - शुद्धता वादी भी इसे अभी तक निहार रहे हैं और मानसिक परिताप से आक्रान्त से हैं । .
वैज्ञानिक मनोवृत्ति सदैव सुचिंतित आलोचनाओं को प्रोत्साहित करती आयी है .ये वाद विचारों की उर्वरता की ही ओर इंगित करते हैं .विज्ञान जनित तथ्य किस सीमा तक सामाजिक आचार संहिताओं की परिधि को लाँघ रहे है यह भी अवश्य देखा जाना चाहिए - क्योंकि विज्ञान जीवन जीने का दर्शन हमें नही सिखाता -सामाजिक लक्षमण रेखाएं तो प्रबुद्ध जन ही तय करते हैं .मैं इन विवादों को इसी नजरिये से देख रहा हूँ .वैसे तो मैंने मन बना लिया था कि मानव अंगों के पुनरान्वेशन से अब मेरी तोबा है पर कुछ विचार शील मित्रों का यह आग्रह उचित ही पा रहा हूँ कि जब नारी सौन्दर्य की चर्चा यहाँ हुयी तो फिर पुरुषों की क्यों नहीं ?बात में दम है . तो बैठे ठाले मैं पुरूष के देहान्वेषण पर अध्ययन को अपडेट करनें में लगा हूँ और जल्दी ही नर नारी समानता के पलडे की बराबरी के लिहाज से पुरूष प्रसंग को भी यहाँ चर्चा में लाउंगा.
मुझे आभास है तब भी यहाँ टोका टोकी होगी ,किसकी तरफ़ से -नर या नारी यह भी समय बताएगा .और फिर कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना ..................