Sunday, 13 July 2008

नाक ऊंची या नीची -फ़र्क पङता है !

फोटो सौजन्य :आर्टिस्टिक रियलिस्म आर्ट स्टूडियो
सामान्यत: नारी की नाक पुरुष की अपेक्षा छोटी होती है-पर यह सौन्दर्य का प्रतीक है, किसी तरह की हीनता का नहीं।

सौन्दर्य प्रेमियों की दृष्टि में ही नहीं वरन व्यवहारविदों की भी राय यही है कि नारी की नाक बहुत कुछ बचपन सरीखी नाक-संरचना को बनाये रखती है। बच्चों की छोटी नाक सहज ही बड़ों को आकिर्षत करती है। चूंकि नारी में अपने सहकर्मी की ओर से सुरक्षा की चाहत रहती है, अत: प्रकृति भी उसकी नाक को बच्चों सरीखा बनाये रखती है। ताकि उसके पुरुष सखा अनजाने ही उसकी देखभाल और सुरक्षा के प्रति सचेष्ट रहें ।

नारी की बड़ी नाक विश्व की बहुतेरी सम्यताओं में कुरूपता की निशानी मानी गयी है। बड़ी नाक वाली महिलाओं के प्रति पुरुषों के मन में सुरक्षा प्रदान करने का ``सहज बोध´´ (इंस्टिंक्ट ) जागृत नहीं होता। मॉडल सुन्दरियों या फिर अभिनेत्रियों में छोटी नाक का होना बहुतों के लिए उन्हें और भी आकर्षक बना देता है। इसलिए पाश्चात्य सम्यता में अधिक सुन्दर दिखने की चाह के चलते नारियों में अपनी नाकों को प्लािस्टक सर्जरी के जरिये छोटा बनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही हैं। विश्व के बहुत से देशों में नाक में आभूषण पहनने का चलन है। भारत में भी महिलायें अलंकरण के लिए तरह-तरह के आभूषण -नथनी, नथ, बुलाक, बेसर आदि पहनती है।

नगर बधुओं में `नथ´ से जुड़ी एक रस्म का सम्बन्ध तो कौमार्यता से भी है। इन आभूषणों और उनके पहनावों से महिलाओं की एक विशिष्ट जाति पहचान भी जुड़ी हुई हैं।

Friday, 11 July 2008

अब आँखें हैं नया पड़ाव !

इन दोनों आंखों मे से कौन आपको ज्यादा खूबसूरत लग रही हैं ?
मुझे तो दायीं वाली आँख ज्यादा खूबसूरत लग रही है क्योंकि इसकी पुतली बेलाडोना के प्रभाव में अधिक फैल गयी है !!

एक जैव विज्ञानी की नजर में आँखे मानव शरीर की बहुत प्रभावी संवेदी अंग हैं। नारी की आंखों का तो कहना ही क्या। साहित्य में नारी की आंखों पर बहुत कहा सुना गया है। लोकजीवन में आंखों को लेकर कितने ही मुहाबरे गढ़े गये है- नजरें चुराना, नजर लगाना, नजर दिखाना/मिलाना आदि आदि। वैज्ञानिको की राय में बाहरी दुनिया की 80 प्रतिशत जानकारी हमें इन आंखों के जरिये ही मिलती है।
उन संस्कृतियों में भी जहाँ नारी शरीर की सभी इन्द्रियों /ज्ञानेिन्द्रयों ,यहाँ तक कि मुंह को ढ़क कर रखने का रिवाज है, आंखों को खुला रखने की आजादी है। नारी के आंखों की तुलना में नर की आँखें जरा बड़ी होती हैं। हाँ ,नारी की आंखों की सफेदी ज्यादा जगह घेरती है। बहुत से समुदायों में नारी की अश्रुग्रिन्थया¡ काफी सक्रिय पायी गयी हैं। किन्तु ऐसा वहाँ के सांस्कारिक परिवेश की देन है। (जिसमें नर को बचपन से ही कम भावुक होने की हिदायत दी जाती है)आंखों आंखों के बीच होने वाले कुछ संकेत/इशारे उल्लेखनीय है जैसे आंखों की पलकों को चौड़ा कर विस्मय प्रगट करना।
भारतीय नृत्यांगनाओं में इस भाव को मेकअप के जरिये और भी उभार दिया जाता है। इसी तरह एक आँख का दबाना (आँख मारना) एक भेद भरा संकेत है, जिसका आदान-प्रदान घनिष्ठ लोगो-प्रेमी या मित्रों के बीच ही किया जाता है। इस संकेत का मतलब है कि `उन दोनों में कुछ ऐसा है जिससे दूसरे बेखबर हैं´´। किसी अनजान विपरीत सेक्स (पुरुष) की ओर इस संकेत के सम्प्रेषण का मतलब विपरीत लिंगी आकर्षण की मूक किन्तु स्पष्ट स्वीकारोक्ति भी हो सकती है। इसी भांति आँखें चार होना वह स्थिति है जिसमें प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे की आ¡खों में खोये हुए रह सकते हैं। पर इस संकेत का आदान-प्रदान दो घृणा करने वाले लोगों के बीच भी हो सकता है। वे भी काफी देर तक एक दूसरे को घूरते रह सकते हैं।
आंखों के ``मेकअप´´ में पलकों की विभिन्न शेड भी शामिल है- ताकि चेहरे के पूरे भूगोल में उनका प्रभुत्व विशेष रूप से बना रहे। जिससे लोग बरबस ही ऐसी आंखों और उसकी स्वामिनी की ओर आकिर्षत हो जाय। आंखों की सुन्दरता बढ़ाने के लिए आंखों में कुछ रसायनों (बेलाडोना) के प्रयोग का भी प्रचलन रहा है। इन रसायनों के प्रभाव में आंखों की पुतलिया¡ फैल जाती हैं, जो इन्हे और भी आकर्षक बनाती है।
प्रयोगों में यह स्पष्ट रूप से पाया गया है कि फैली/बड़ी पुतलियों वाले नारी चित्रों ने सिकुड़ी हुई पुतलियों वाले नारी चित्रों की तुलना में अधिक लोगों को आकिर्षत किया। यह भी देखा गया है कि ``प्यार की दृष्टि´ के दौरान महिलाओं की आंखों की पुतलिया¡ कुदरती तौर पर फैल जाती है और उनके आकर्षण में इजाफा करती हैं- आकर्षक दिखने के लिए इससे अच्छा और मुफ्त नुस्खा भला व दूसरा क्या होगा--बस ``देखिए मगर प्यार से ........."

Thursday, 10 July 2008

अब आता है नारी सुन्दरता का अगला पडाव -भौहें !

फोटो साभार Killer Strands


मन के भावों की मूक अभिव्यक्ति में भौहें अपनी भूमिका बखूबी निभाती हैं। भारत की कई नृत्य शैलियों में भौहों के क्षण-क्षण बदलते भावों को आपने देखा सराहा होगा। तनी भृकुटि और चंचल चितवनों की मार से भला कौन घायल नहीं हुआ होगा। भौहों के जरिये कई तरह के अभिप्राय पूर्ण इशारे किये जाते हैं- जिसमें प्रेम, क्रोध, घृणा जैसे मनोभावों की अभिव्यक्ति शामिल हैं।
पुरुषांें की तुलना में नारी भौहें (आईब्रोज) कम बालों वाली होती हैं। नारी के इसी प्रकृति प्रदत्त विशेष लक्षण को चेहरे के `सौन्दर्य मेकअप´ में उभारा जाता है- भौहों को सफाचट करके या फिर कृत्रिम भौहे बनाकर। ऐसा इसलिए ताकि नारी सुलभ कुदरती गुण/सौन्दर्य को बनावटी तरीके से ही सही और उभारा जा सके- नारी सुन्दरता में चार-चा¡द लगाया जा सके। किन्तु पश्चिम में खासकर हालीवुड की अभिनेत्रियों में अब भौहों को सफाचट करने का फैशन नहीं रहा, कारण वे अब पुरुषोंचित गुणों की बराबरी में आना/दिखना चाहती हैं। वहा¡ अब ``आई ब्रो पेिन्सलें` वैनिटी बैंगों में ढ़ूढे नहीं मिलतीं। कभी इंग्लैण्ड में भौहों के कुदरती बालों को साफ कर चूहों की चमड़ी चिपकाने का भी अजीब रिवाज था और यह सब महज इसलिए की नारी सौन्दर्य में इजाफा हो सके।

Tuesday, 8 July 2008

इस जुल्फ के क्या कहने .........!

सौजन्य :मीडिया मग्नेट
नारी की केश राशि पर किसी शायर का कुछ कहा आपको याद है ? मुझे तो याद है मगर यह किस शायर का कलाम है याद नही आ रहा ....

इस जुल्फ के क्या कहने जो दोश पे लहराई ,सिमटे तो बनी नागिन बिखरे तो घटा छाई !

और पन्त जी की यह ललक तो देखिये कि ``बाले तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन।´´ जी हाँ हमारा यह पहला पड़ाव ही काफी उलझाव भरा है। थोड़ी देर के लिए नारी केशों पर कवियों के कहे सुने को भूलकर आइये सुने क्या कहते हैं वैज्ञानिक नारी के गेसुओं के बारे में। व्यवहार विज्ञानियों की नजर में नारी के लम्बे घने केश समूचे जैव जगत में उसे एक खास ``पहचान´´ प्रदान करते हैं- किसी मादा कपि-वानर के सिर पर कभी इतनी लम्बी केश राशि देखी आपने नहीं न ? यह हमारी ``स्पीशीज पहचान´´ है। वैसे नारी और पुरुष केशों में कोई मूलभूत ताित्वक भेद नहीं है। यह तो हमारे सांस्कृतिक और सौन्दर्य बोधक प्रवृत्तियों का तकाजा है कि नर और नारी के सिर के बालों को अलग-अलग ढंग से सजाया सवारा जाता है। वरना अनछुये बाल चाहे वे नर के हो या नारी के, छ: वर्षों में 40 इंच तक लम्बे हो जाते हैं और फिर कुछ वर्षों के अन्तराल पर गिर जाते हैं-नये बाल उगते हैं। यह प्रक्रिया जीवन पर्यन्त चलती रहती है ।

नारी केश राशि को संभालने सजाने सवारने के कितने ही तौर तरीके आज प्रचलित हैं। नारी के सुन्दर घने बालों के देखभाल की भी अच्छी व्यवस्था प्रकृति ने की है- प्रत्येक बाल के जड़ के निकट ही सिबेसियस ग्रंथियां होती हैं जिनसे एक तैलीय पदार्थ निकलकर बालों को रूखा होने से बचाता है, उन्हें अच्छी हालत में बनाये रखता है। बालों को अधिक धोने से उनमें छुपे धूल के कण तो साफ हो जाते है, किन्तु कुदरती तैलीय पदार्थ `सेबम´ भी नष्ट होता है। व्यवहार विज्ञानियों की राय में बालों को बिल्कुल न धोना या बहुत कम या बहुत ज्यादा धोना उनकी सेहत के लिए अच्छी बात नहीं है। समूची दुनिया¡ में बालों के तीन मुख्य प्रकार पहचाने गये हैं- नीग्रो सुन्दरियों के ``सिलवटी´´ बाल काकेशियन युवतियों के लहरदार केश तथा मंगोल नारियों के सीधे खड़े बाल। बालों का यह भौगोलिक विभेद आनुवंशिक कारणो से है। जिसके चलते विभिन्न मानव नस्लों को एक खास ``जातीय पहचान´´ मिली हुई है, किन्तु यह एक रोचक तथ्य यह है कि चाहे वह कोई भी मानव नस्ल हो-नर-नारी के केश (बालो) में कोई खास अन्तर नहीं हैं। यानी इनमें कोई लैंगिक विभेद नहीं है। यदि पुरुष के सिर के बाल भी समय-समय पर न काटे जाय तो वे भी नारी के समान घने (काले) और लम्बे होते जायेंगे। पर हमारे सांस्कृतिक संस्कारों ने केशों के आधार पर नर नारी भेद का बड़ा स्वांग रचाया है।

दरअसल मानव की सांस्कृतिक यात्रा ने दो तरह के केशीय प्रतीकों (हेयर सिम्बोलिज्म) को जन्म दिया है। एक केशीय प्रतीकवाद तो वह है जिसमें पुरुष के बड़े घने बाल उसकी शक्ति पौरूष और यहा¡ तक कि पवित्रता का द्योतक बन गया है- उदाहरणस्वरूप `सीजर´ शब्द की व्युत्पत्ति को देखे- `कैजर´ और `त्सार´ दो शब्दों के मेल से बने इस शब्द का मूलार्थ है- लम्बे बाल जो कि महान नेताओं के लिए सर्वथा शोभनीय माना गया है। विश्व के कई सम्यताओ में नेताओं के लम्बे बालों का प्रचलन आज भी है। बालो की अधिकता पौरूष का भी प्रतीक बनी है-इसलिए किसी पुरुष के सिर के बालों को कटाना/सफाचट कराना, उसका अपमान करने के समान है, उसकी दबंगता को कम करना है। यही कारण है कि ईश्वर के सामने नत मस्तक होने के लिए भिक्षुओं में सिर मुड़ाने की परम्परा है। इन परम्पराओं के ठीक विपरीत नारी केशों के लम्बे होने को नारीत्व या नारी सौन्दर्य का प्रतीक माना जाने लगा।

भारत में विधवा स्र्त्रियों के सिर मुड़ाने के पीछे भी यही मन्तव्य लगता है कि वे अनाकर्षक लगें- (नारी) सौन्दर्य से रहित विश्व की अनेक संस्कृतियों में कई संस्कारों के समय स्त्रियों को बाल ढकें रखने के कड़े नियम भी हैं। चूंकि नारी के खुले लम्बे केश सौन्दर्य कामोददीयकता के कारण बन सकते हैं- सार्वजनिक स्थलों पर बालों को खुले छोड़ देना कई संस्कृतियों में ``बदचलन औरत´´ के लक्षण माने गये हैं। विश्व में शायद ही कोई ऐसी जगह हों जहाँ नारी केशो के सजाने संवारने और निखारने का प्रचलन न हो। ऐसी परम्परा हजारों वर्षो से रही है। बाल रंगे जाते हैं, काढ़े जाते हैं, तरह-तरह की स्टाइलों में सजाये संवारे जाते हैं। आज `जूड़ा बा¡धने´ की विभिन्न स्टाइलों में इसे देख सकते हैं- गोल कद्दूनुमा `जूड़े´ से लेकर `साही´ के कंटीले बालों के सरीखे दिखते बाल, मानव की कलात्मक कल्पना की अनूठी मिसाले हैं।

Monday, 7 July 2008

व्यवहार विज्ञानी निरख रहे हैं नारी का सौन्दर्य !

व्यवहार वैज्ञानिकों की नजर में नारी सौन्दर्य
नारी सौन्दर्य-नख से शिख तक एक मनोरम यात्रा

नारी के नख-शिख सौन्दर्य पर भारतीय कवियों-साहित्यकारो ने खूब लेखनी चलायी है। महाकवि कालिदास की सौन्दर्य परक रचनाओं से लेकर रीतिकालीन कवि बिहारी लाल के श्रृंगारिक ``दोहों´´ में नारी सौन्दर्य की भारतीय अवधारणा अपने विविध रूपों में बिखरी दिखाई देती है। नायिका भेद से लेकर नारी के अंग प्रत्यंगों पर भी श्रृंगार/सौन्दर्य प्रेमी कविजनों की नज़रे उठी हैं। किसी ने प्राकृतिक सुन्दरता के विविध रूपों को अपनी नायिका/प्रेयसी में निहारा है तो कोई नायिका विशेष की सुन्दरता को ही प्रकृति में बिखरा हुआ पाता है- तभी तो कविवर सुमित्रानन्द पन्त कह पड़ते हैं - छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया बाले तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन।

कविवर बिहारी लाल का नायक चित्रकार नायिका के नख शिख सौन्दर्य को अपनी तूलिका से उकेरने में खुद को असफल पाता है, क्योंकि वह लक्षित सौन्दर्य को क्षण-क्षण में बदलता हुआ पाता है। नारी सौन्दर्य के वर्णन में वैज्ञानिक के पीछे नहीं है। व्यवहार वैज्ञानिकों (इथोलाजिस्ट) ने भी नारी सौन्दर्य का बड़ा ही रस सिक्त वर्णन किया है। मगर उनके अध्ययन-मनन का एक सिलसिलेवार तरीका है और इसलिए उन्होंने भी चुना है वही नख से शिख तक का क्रमवार अध्ययन। मशहूर ब्रितानी व्यवहार विद डिज्माण्ड मोरिस कहते हैं कि उन्होंने पूरे नारी तन को एक निराले लैण्डस्केप के रूप में निहारा है, जैसे कोई पर्यटक किसी अनजानी किन्तु मनचाही जगह पर अपनी नजरें दौड़ाता है और फिर उस अनजाने प्रदेश के हिस्से दर हिस्से को उसकी सम्पूर्णता में निरखता परखता है। गरज यह कि नारी की केश राशि से शुरु होकर यह मनोरम यात्रा पावों के अंगूठे पर जा विराम पाती है, रास्ते के यही कोई बीसेक पड़ावों पर मौजमस्ती करते, ठहरते-सुस्ताते। तो आइये, डिज्माण्ड मोरिस तथा कुछ दूसरे व्यवहार बिदों के साथ ही हम भी नारी सौन्दर्य की इस पुनरान्वेषण यात्रा पर निकल चलें ...........

यह मनोरम यात्रा शिमला की खिलौना ट्रेन के तरह अपने गंतव्य पर पहुंचेगी .हौले हौले स्टेशनों पर रुकते सुस्ताते ......हाँ कभी कुछ खटक जाय या शब्द नागवार गुजरें तो जरूर टोकें ....वैसे मेरी कोशिश रहेगी कि अपनी संस्कृति ऑर सोच के मुताबिक ही शब्द ऑर अभिव्यक्ति को विस्तार मिले ......

Sunday, 6 July 2008

"इस साँप का काटा सुबह की रोशनी नही देखता "

करैत जो नाग से भी ज्यादा विषैला है !

"इस साँप का काटा सुबह की रोशनी नही देखता " जैसी धारणा संभवतः करैत साप को लेकर ही है .यह एक सुस्त साँप है जो गाँव के कच्चे मकानों में प्रायः घर के अन्दर बिलों में अपना डेरा जमाता है .

मैं समझता हूँ कि यही वह सांप है जिसके डसने से आदमी का बचना मुश्किल है ,हाँ समय से एंटीवेनम मिल जाय तो जान बच सकती है .यह रात को ही असावधान रहने पर या चारपाई पर पहले से ही मौजूद रहने पर सोते में काट सकता है .मुश्किल यह है कि इसके काटने पर कोई ज्यादा या कभी कभी तो बिल्कुल सूजन ही नही होती .और विषदंत भी कोबरा की तुलना में महीन होते हैं ,जिससे ये भी प्रमुखता से नही दिखते.अब यह पहचान मुश्किल हो जाती है कि किसी विषैले साँप ने काटा भी है या नही .

हाथ ,पैर का बेजान पडना एक लक्षण है जो थोडा विलंब से शुरू होता है लेकिन जल्दी ही गंभीर रूप ले लेता है .नतीजतन जिसे यह रात में काट ले और एंटीवेनम मिले तो समझिये काम तमाम !

इसका मात्र माईक्रोग्राम ही किसी की जान लेने में पर्याप्त है .

इस साँप से सबसे अधिक सावधान रहने की जरूरत है .ऊपर के चित्र में इसे पहचान लें यह काले रंग का नीली आभा लिए होता है और शरीर पर सफ़ेद धारियाँ दिखती हैं -कभी कभी वोल्फ स्नेक[संखारा या कौडिसाप] जो विषैला नही होता है को लोग भ्रम से करैत मान लेते हैं -दरअसल वोल्फ स्नेक भूरापन लिए होता है और पालतू बन जाता है .

एंटीवेनम को रखने के लिए किसी लाईसेंस की जरूरत नही है .बड़े मेडिकल स्टोरों पर यह मिल जायेगा .यह पाउडर फार्म में होता है और डिस्टिल्ड वाटर के साथ मिला कर घोल बना कर इंजेक्ट होता है .इसे यहाँ से भी प्राप्त किया जा सकता है -

Serum Institute of India

283 Mahtma Gandhi Road

Poona-४११००१

हिमाचल प्रदेश में भी सोलन जिले के कसौली नामक स्थान पर सर्पविष शोध और निर्माण संस्थान है .

मेरी कामना है कि किसी की भी सर्प दंश से मौत हो ....आप भी कृपा कर सापों के बारे में लोगो में जागरूकता लायें .......

अब इस दहशत भरे माहौल से आपको बाहर लायें .....ईथोलोजी पर एक सौन्दर्यपरक श्रृखला की प्रतीक्षा करें -

नारी -नख शिख सौन्दर्य -नारी सौन्दर्य -व्यवहार विदों की नजर में

प्रतीक्षा करें ...........


Saturday, 5 July 2008

सर्पदंश: बचाव और उपचार


सर्पदंश: बचाव और उपचार

यदि आप गावों में रहते हैं तो टॉर्च या पर्याप्त रोशनी के साथ ही बाहर जाएँ ,बरसात में ख़ास तौर पर .पैरों को गम बूट ज्यादा सुरक्षा देते हैं मगर नही है तो ऐसा जूता रहे जो पैर को ऊपर तक अच्छी तरह ढक सके .साथ में एक डंडा और गमछा भी रखें .

यह सापों का प्रणय - प्रजनन काल भी है -ख़ास तौर पर नाग -कोबरा का .यह एक आक्रामक साँप है .यह अपनी टेरिटरी बना कर रहता है यानी एक ऐसा क्षेत्र जिसमें किसी को भी आने पर इसे नागवार लगता है .यदि प्रणय काल में कोई इस क्षेत्र से गुजरता है तो यह आक्रमण कर सकता है .इस पर पैर पड़ जाय तो यह काट ही लेगा .अगर किसी की अचानक नाग से भेट हो जाय तो वह अपना गमछा या कोई भी कपडा तुरत फुरत निकाली हुयी शर्ट या गंजी उस पर फेक दें.यह आदतन उससे उलझ लेगा और वह रफू चक्कर हो सकता है .कोबरा को लाठी से मारना ज़रा अभ्यास का काम है .लाठी तभी इस्तेमाल में लायें जब मरता क्या करता की पोजीशन हो जाय .क्योंकि ऐसा देखा गया है कि निशाना यदि उसके मर्म स्थल [फन और इर्दगिर्द का हिस्सा ]पर नही पडा और आदतन लाठी मारने वाले ने लाठी उठायी तो वह उसके शरीर पर गिरेगा .और फिर वह क्रोध में काटेगा और विष भी ज्यादा निकालेगा .

विषैले सापों में दो विषदंत आगे ही ऊपर के जबड़े में होता है और विष की थैली इसी से दोनों और जुडी रहती हैं

खुदा खास्ता साँप काट ही ले तो -

धैर्य रखें ,दौड़ कर जाएँ -भागें ,इससे विष रक्त परिवहन के साथ जल्दी ही पूरे शरीर में फैल जायेगा .रूमाल ,गमछा से जहाँ दंश का निशान है उसके ऊपर के एक हड्डी वाले भाग यानी पैर में काटा है तो जांघ में और हाथ में काटा है तो कुहनी के ऊपर बाँध दे ,बहुत कसा हुआ नही .पुकार कर किसी को बुलाएं या धीरे धीरे मदद के लिए आस पास पहुंचे .और तुंरत एंटीवेनम सूई के लिए पी एच सी पर या जिला अस्पताल पर पहुंचे .यह सूई अगर आसपास किसी बाजार हाट के मेडिकल स्टोर पर मिल जाय तो इंट्रामस्कुलर भी देकर अस्पताल तक पहुंचा जा सकता है -जहाँ आवश्यकता जैसी होगी चिकित्सक फिर इंट्रा वेनस दे सकता है . अगर आप के क्षेत्र में साँप काटने की घटनाएँ अक्सर होती है तो पी एच सी के चिकित्सक से तत्काल मिल कर एंटी वेनम की एडवांस व्यवस्था सुनिशचित करें - मेडिकल दूकानों पर भी इसे पहले से रखवाया जा सकता है . अगर शरीर में जहर ज्यादा उतर गया है तो एंटीवेनम के ५-१० वायल तक लग सकते हैं . एंटीवेनम १० हज़ार लोगों में एकाध को रिएक्शन करता है -कुशल चिकित्सक एंटीवेनम के साथ डेकाड्रान/कोरामिन की भी सूई साथ साथ देता है -बल्कि ऐसा अनिवार्य रूप से करना भी चाहिए .

कोबरा के काट लेने के लक्षण क्या हैं -काटा हुआ स्थान पन्द्रह मिनट में सूजने लगता है .यह कोबरा के काटे जाने का सबसे प्रमुख पहचान है .ध्यान से देखें तो दो मोटी सूई के धसने से बने निशान -विषदंत के निशान दिखेंगे .

प्राथमिक उपचार में नयी ब्लेड से धन के निशान का चीरा सूई के धसने वाले दोनों निशान पर लगा कर दबा दबा कर खून निकालें .और किसी के मुहँ में यदि छाला घाव आदि हो तो वह खून चूस कर भी उगल सकता है .

विष का असर केवल खून में जाने पर ही होता है यदि किसी के मुंह में छाला पेट में अल्सर आदि हो तो वह सर्पविष बिना नुकसान के पचा भी सकता है .

कोबरा का १२ माईक्रो ग्राम आदमी को मार सकता है मगर वह एक भरपूर दंश में ३२० माईक्रोग्राम विष तक मनुष्य के शरीर में उतार सकता है .मगर प्रायः लोग पावों को तेज झटक देते हैं तो पूरा विष शरीर में नही पाता .इसलिए कोबरा का काटा आदमी - घंटे तक अमूमन नही मरता .और यह समय पर्याप्त है एंटी वेनम तक पहुँच जाने के लिए।

करैत सुस्त साँप है मगर इसका मिक्रोग्राम ही मौत की नीद सुला सकता है .यानी कोबरा के जहर की केवल आधी ही मात्रा .इसके बारे में कल ......