Tuesday, 8 July 2008

इस जुल्फ के क्या कहने .........!

सौजन्य :मीडिया मग्नेट
नारी की केश राशि पर किसी शायर का कुछ कहा आपको याद है ? मुझे तो याद है मगर यह किस शायर का कलाम है याद नही आ रहा ....

इस जुल्फ के क्या कहने जो दोश पे लहराई ,सिमटे तो बनी नागिन बिखरे तो घटा छाई !

और पन्त जी की यह ललक तो देखिये कि ``बाले तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन।´´ जी हाँ हमारा यह पहला पड़ाव ही काफी उलझाव भरा है। थोड़ी देर के लिए नारी केशों पर कवियों के कहे सुने को भूलकर आइये सुने क्या कहते हैं वैज्ञानिक नारी के गेसुओं के बारे में। व्यवहार विज्ञानियों की नजर में नारी के लम्बे घने केश समूचे जैव जगत में उसे एक खास ``पहचान´´ प्रदान करते हैं- किसी मादा कपि-वानर के सिर पर कभी इतनी लम्बी केश राशि देखी आपने नहीं न ? यह हमारी ``स्पीशीज पहचान´´ है। वैसे नारी और पुरुष केशों में कोई मूलभूत ताित्वक भेद नहीं है। यह तो हमारे सांस्कृतिक और सौन्दर्य बोधक प्रवृत्तियों का तकाजा है कि नर और नारी के सिर के बालों को अलग-अलग ढंग से सजाया सवारा जाता है। वरना अनछुये बाल चाहे वे नर के हो या नारी के, छ: वर्षों में 40 इंच तक लम्बे हो जाते हैं और फिर कुछ वर्षों के अन्तराल पर गिर जाते हैं-नये बाल उगते हैं। यह प्रक्रिया जीवन पर्यन्त चलती रहती है ।

नारी केश राशि को संभालने सजाने सवारने के कितने ही तौर तरीके आज प्रचलित हैं। नारी के सुन्दर घने बालों के देखभाल की भी अच्छी व्यवस्था प्रकृति ने की है- प्रत्येक बाल के जड़ के निकट ही सिबेसियस ग्रंथियां होती हैं जिनसे एक तैलीय पदार्थ निकलकर बालों को रूखा होने से बचाता है, उन्हें अच्छी हालत में बनाये रखता है। बालों को अधिक धोने से उनमें छुपे धूल के कण तो साफ हो जाते है, किन्तु कुदरती तैलीय पदार्थ `सेबम´ भी नष्ट होता है। व्यवहार विज्ञानियों की राय में बालों को बिल्कुल न धोना या बहुत कम या बहुत ज्यादा धोना उनकी सेहत के लिए अच्छी बात नहीं है। समूची दुनिया¡ में बालों के तीन मुख्य प्रकार पहचाने गये हैं- नीग्रो सुन्दरियों के ``सिलवटी´´ बाल काकेशियन युवतियों के लहरदार केश तथा मंगोल नारियों के सीधे खड़े बाल। बालों का यह भौगोलिक विभेद आनुवंशिक कारणो से है। जिसके चलते विभिन्न मानव नस्लों को एक खास ``जातीय पहचान´´ मिली हुई है, किन्तु यह एक रोचक तथ्य यह है कि चाहे वह कोई भी मानव नस्ल हो-नर-नारी के केश (बालो) में कोई खास अन्तर नहीं हैं। यानी इनमें कोई लैंगिक विभेद नहीं है। यदि पुरुष के सिर के बाल भी समय-समय पर न काटे जाय तो वे भी नारी के समान घने (काले) और लम्बे होते जायेंगे। पर हमारे सांस्कृतिक संस्कारों ने केशों के आधार पर नर नारी भेद का बड़ा स्वांग रचाया है।

दरअसल मानव की सांस्कृतिक यात्रा ने दो तरह के केशीय प्रतीकों (हेयर सिम्बोलिज्म) को जन्म दिया है। एक केशीय प्रतीकवाद तो वह है जिसमें पुरुष के बड़े घने बाल उसकी शक्ति पौरूष और यहा¡ तक कि पवित्रता का द्योतक बन गया है- उदाहरणस्वरूप `सीजर´ शब्द की व्युत्पत्ति को देखे- `कैजर´ और `त्सार´ दो शब्दों के मेल से बने इस शब्द का मूलार्थ है- लम्बे बाल जो कि महान नेताओं के लिए सर्वथा शोभनीय माना गया है। विश्व के कई सम्यताओ में नेताओं के लम्बे बालों का प्रचलन आज भी है। बालो की अधिकता पौरूष का भी प्रतीक बनी है-इसलिए किसी पुरुष के सिर के बालों को कटाना/सफाचट कराना, उसका अपमान करने के समान है, उसकी दबंगता को कम करना है। यही कारण है कि ईश्वर के सामने नत मस्तक होने के लिए भिक्षुओं में सिर मुड़ाने की परम्परा है। इन परम्पराओं के ठीक विपरीत नारी केशों के लम्बे होने को नारीत्व या नारी सौन्दर्य का प्रतीक माना जाने लगा।

भारत में विधवा स्र्त्रियों के सिर मुड़ाने के पीछे भी यही मन्तव्य लगता है कि वे अनाकर्षक लगें- (नारी) सौन्दर्य से रहित विश्व की अनेक संस्कृतियों में कई संस्कारों के समय स्त्रियों को बाल ढकें रखने के कड़े नियम भी हैं। चूंकि नारी के खुले लम्बे केश सौन्दर्य कामोददीयकता के कारण बन सकते हैं- सार्वजनिक स्थलों पर बालों को खुले छोड़ देना कई संस्कृतियों में ``बदचलन औरत´´ के लक्षण माने गये हैं। विश्व में शायद ही कोई ऐसी जगह हों जहाँ नारी केशो के सजाने संवारने और निखारने का प्रचलन न हो। ऐसी परम्परा हजारों वर्षो से रही है। बाल रंगे जाते हैं, काढ़े जाते हैं, तरह-तरह की स्टाइलों में सजाये संवारे जाते हैं। आज `जूड़ा बा¡धने´ की विभिन्न स्टाइलों में इसे देख सकते हैं- गोल कद्दूनुमा `जूड़े´ से लेकर `साही´ के कंटीले बालों के सरीखे दिखते बाल, मानव की कलात्मक कल्पना की अनूठी मिसाले हैं।

Monday, 7 July 2008

व्यवहार विज्ञानी निरख रहे हैं नारी का सौन्दर्य !

व्यवहार वैज्ञानिकों की नजर में नारी सौन्दर्य
नारी सौन्दर्य-नख से शिख तक एक मनोरम यात्रा

नारी के नख-शिख सौन्दर्य पर भारतीय कवियों-साहित्यकारो ने खूब लेखनी चलायी है। महाकवि कालिदास की सौन्दर्य परक रचनाओं से लेकर रीतिकालीन कवि बिहारी लाल के श्रृंगारिक ``दोहों´´ में नारी सौन्दर्य की भारतीय अवधारणा अपने विविध रूपों में बिखरी दिखाई देती है। नायिका भेद से लेकर नारी के अंग प्रत्यंगों पर भी श्रृंगार/सौन्दर्य प्रेमी कविजनों की नज़रे उठी हैं। किसी ने प्राकृतिक सुन्दरता के विविध रूपों को अपनी नायिका/प्रेयसी में निहारा है तो कोई नायिका विशेष की सुन्दरता को ही प्रकृति में बिखरा हुआ पाता है- तभी तो कविवर सुमित्रानन्द पन्त कह पड़ते हैं - छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया बाले तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन।

कविवर बिहारी लाल का नायक चित्रकार नायिका के नख शिख सौन्दर्य को अपनी तूलिका से उकेरने में खुद को असफल पाता है, क्योंकि वह लक्षित सौन्दर्य को क्षण-क्षण में बदलता हुआ पाता है। नारी सौन्दर्य के वर्णन में वैज्ञानिक के पीछे नहीं है। व्यवहार वैज्ञानिकों (इथोलाजिस्ट) ने भी नारी सौन्दर्य का बड़ा ही रस सिक्त वर्णन किया है। मगर उनके अध्ययन-मनन का एक सिलसिलेवार तरीका है और इसलिए उन्होंने भी चुना है वही नख से शिख तक का क्रमवार अध्ययन। मशहूर ब्रितानी व्यवहार विद डिज्माण्ड मोरिस कहते हैं कि उन्होंने पूरे नारी तन को एक निराले लैण्डस्केप के रूप में निहारा है, जैसे कोई पर्यटक किसी अनजानी किन्तु मनचाही जगह पर अपनी नजरें दौड़ाता है और फिर उस अनजाने प्रदेश के हिस्से दर हिस्से को उसकी सम्पूर्णता में निरखता परखता है। गरज यह कि नारी की केश राशि से शुरु होकर यह मनोरम यात्रा पावों के अंगूठे पर जा विराम पाती है, रास्ते के यही कोई बीसेक पड़ावों पर मौजमस्ती करते, ठहरते-सुस्ताते। तो आइये, डिज्माण्ड मोरिस तथा कुछ दूसरे व्यवहार बिदों के साथ ही हम भी नारी सौन्दर्य की इस पुनरान्वेषण यात्रा पर निकल चलें ...........

यह मनोरम यात्रा शिमला की खिलौना ट्रेन के तरह अपने गंतव्य पर पहुंचेगी .हौले हौले स्टेशनों पर रुकते सुस्ताते ......हाँ कभी कुछ खटक जाय या शब्द नागवार गुजरें तो जरूर टोकें ....वैसे मेरी कोशिश रहेगी कि अपनी संस्कृति ऑर सोच के मुताबिक ही शब्द ऑर अभिव्यक्ति को विस्तार मिले ......

Sunday, 6 July 2008

"इस साँप का काटा सुबह की रोशनी नही देखता "

करैत जो नाग से भी ज्यादा विषैला है !

"इस साँप का काटा सुबह की रोशनी नही देखता " जैसी धारणा संभवतः करैत साप को लेकर ही है .यह एक सुस्त साँप है जो गाँव के कच्चे मकानों में प्रायः घर के अन्दर बिलों में अपना डेरा जमाता है .

मैं समझता हूँ कि यही वह सांप है जिसके डसने से आदमी का बचना मुश्किल है ,हाँ समय से एंटीवेनम मिल जाय तो जान बच सकती है .यह रात को ही असावधान रहने पर या चारपाई पर पहले से ही मौजूद रहने पर सोते में काट सकता है .मुश्किल यह है कि इसके काटने पर कोई ज्यादा या कभी कभी तो बिल्कुल सूजन ही नही होती .और विषदंत भी कोबरा की तुलना में महीन होते हैं ,जिससे ये भी प्रमुखता से नही दिखते.अब यह पहचान मुश्किल हो जाती है कि किसी विषैले साँप ने काटा भी है या नही .

हाथ ,पैर का बेजान पडना एक लक्षण है जो थोडा विलंब से शुरू होता है लेकिन जल्दी ही गंभीर रूप ले लेता है .नतीजतन जिसे यह रात में काट ले और एंटीवेनम मिले तो समझिये काम तमाम !

इसका मात्र माईक्रोग्राम ही किसी की जान लेने में पर्याप्त है .

इस साँप से सबसे अधिक सावधान रहने की जरूरत है .ऊपर के चित्र में इसे पहचान लें यह काले रंग का नीली आभा लिए होता है और शरीर पर सफ़ेद धारियाँ दिखती हैं -कभी कभी वोल्फ स्नेक[संखारा या कौडिसाप] जो विषैला नही होता है को लोग भ्रम से करैत मान लेते हैं -दरअसल वोल्फ स्नेक भूरापन लिए होता है और पालतू बन जाता है .

एंटीवेनम को रखने के लिए किसी लाईसेंस की जरूरत नही है .बड़े मेडिकल स्टोरों पर यह मिल जायेगा .यह पाउडर फार्म में होता है और डिस्टिल्ड वाटर के साथ मिला कर घोल बना कर इंजेक्ट होता है .इसे यहाँ से भी प्राप्त किया जा सकता है -

Serum Institute of India

283 Mahtma Gandhi Road

Poona-४११००१

हिमाचल प्रदेश में भी सोलन जिले के कसौली नामक स्थान पर सर्पविष शोध और निर्माण संस्थान है .

मेरी कामना है कि किसी की भी सर्प दंश से मौत हो ....आप भी कृपा कर सापों के बारे में लोगो में जागरूकता लायें .......

अब इस दहशत भरे माहौल से आपको बाहर लायें .....ईथोलोजी पर एक सौन्दर्यपरक श्रृखला की प्रतीक्षा करें -

नारी -नख शिख सौन्दर्य -नारी सौन्दर्य -व्यवहार विदों की नजर में

प्रतीक्षा करें ...........


Saturday, 5 July 2008

सर्पदंश: बचाव और उपचार


सर्पदंश: बचाव और उपचार

यदि आप गावों में रहते हैं तो टॉर्च या पर्याप्त रोशनी के साथ ही बाहर जाएँ ,बरसात में ख़ास तौर पर .पैरों को गम बूट ज्यादा सुरक्षा देते हैं मगर नही है तो ऐसा जूता रहे जो पैर को ऊपर तक अच्छी तरह ढक सके .साथ में एक डंडा और गमछा भी रखें .

यह सापों का प्रणय - प्रजनन काल भी है -ख़ास तौर पर नाग -कोबरा का .यह एक आक्रामक साँप है .यह अपनी टेरिटरी बना कर रहता है यानी एक ऐसा क्षेत्र जिसमें किसी को भी आने पर इसे नागवार लगता है .यदि प्रणय काल में कोई इस क्षेत्र से गुजरता है तो यह आक्रमण कर सकता है .इस पर पैर पड़ जाय तो यह काट ही लेगा .अगर किसी की अचानक नाग से भेट हो जाय तो वह अपना गमछा या कोई भी कपडा तुरत फुरत निकाली हुयी शर्ट या गंजी उस पर फेक दें.यह आदतन उससे उलझ लेगा और वह रफू चक्कर हो सकता है .कोबरा को लाठी से मारना ज़रा अभ्यास का काम है .लाठी तभी इस्तेमाल में लायें जब मरता क्या करता की पोजीशन हो जाय .क्योंकि ऐसा देखा गया है कि निशाना यदि उसके मर्म स्थल [फन और इर्दगिर्द का हिस्सा ]पर नही पडा और आदतन लाठी मारने वाले ने लाठी उठायी तो वह उसके शरीर पर गिरेगा .और फिर वह क्रोध में काटेगा और विष भी ज्यादा निकालेगा .

विषैले सापों में दो विषदंत आगे ही ऊपर के जबड़े में होता है और विष की थैली इसी से दोनों और जुडी रहती हैं

खुदा खास्ता साँप काट ही ले तो -

धैर्य रखें ,दौड़ कर जाएँ -भागें ,इससे विष रक्त परिवहन के साथ जल्दी ही पूरे शरीर में फैल जायेगा .रूमाल ,गमछा से जहाँ दंश का निशान है उसके ऊपर के एक हड्डी वाले भाग यानी पैर में काटा है तो जांघ में और हाथ में काटा है तो कुहनी के ऊपर बाँध दे ,बहुत कसा हुआ नही .पुकार कर किसी को बुलाएं या धीरे धीरे मदद के लिए आस पास पहुंचे .और तुंरत एंटीवेनम सूई के लिए पी एच सी पर या जिला अस्पताल पर पहुंचे .यह सूई अगर आसपास किसी बाजार हाट के मेडिकल स्टोर पर मिल जाय तो इंट्रामस्कुलर भी देकर अस्पताल तक पहुंचा जा सकता है -जहाँ आवश्यकता जैसी होगी चिकित्सक फिर इंट्रा वेनस दे सकता है . अगर आप के क्षेत्र में साँप काटने की घटनाएँ अक्सर होती है तो पी एच सी के चिकित्सक से तत्काल मिल कर एंटी वेनम की एडवांस व्यवस्था सुनिशचित करें - मेडिकल दूकानों पर भी इसे पहले से रखवाया जा सकता है . अगर शरीर में जहर ज्यादा उतर गया है तो एंटीवेनम के ५-१० वायल तक लग सकते हैं . एंटीवेनम १० हज़ार लोगों में एकाध को रिएक्शन करता है -कुशल चिकित्सक एंटीवेनम के साथ डेकाड्रान/कोरामिन की भी सूई साथ साथ देता है -बल्कि ऐसा अनिवार्य रूप से करना भी चाहिए .

कोबरा के काट लेने के लक्षण क्या हैं -काटा हुआ स्थान पन्द्रह मिनट में सूजने लगता है .यह कोबरा के काटे जाने का सबसे प्रमुख पहचान है .ध्यान से देखें तो दो मोटी सूई के धसने से बने निशान -विषदंत के निशान दिखेंगे .

प्राथमिक उपचार में नयी ब्लेड से धन के निशान का चीरा सूई के धसने वाले दोनों निशान पर लगा कर दबा दबा कर खून निकालें .और किसी के मुहँ में यदि छाला घाव आदि हो तो वह खून चूस कर भी उगल सकता है .

विष का असर केवल खून में जाने पर ही होता है यदि किसी के मुंह में छाला पेट में अल्सर आदि हो तो वह सर्पविष बिना नुकसान के पचा भी सकता है .

कोबरा का १२ माईक्रो ग्राम आदमी को मार सकता है मगर वह एक भरपूर दंश में ३२० माईक्रोग्राम विष तक मनुष्य के शरीर में उतार सकता है .मगर प्रायः लोग पावों को तेज झटक देते हैं तो पूरा विष शरीर में नही पाता .इसलिए कोबरा का काटा आदमी - घंटे तक अमूमन नही मरता .और यह समय पर्याप्त है एंटी वेनम तक पहुँच जाने के लिए।

करैत सुस्त साँप है मगर इसका मिक्रोग्राम ही मौत की नीद सुला सकता है .यानी कोबरा के जहर की केवल आधी ही मात्रा .इसके बारे में कल ......

Thursday, 3 July 2008

सापों से बढ़ती मौतें और अनोनीमस जी की टिप्पडी !

साँपों के बारे में कल एनोनीमस जी की की एक बड़ी तल्ख़ टिप्पडी आयी .उन्होंने मुझे विग्यान के मठाधीश होने की उपाधि देते हुए यह उलाहना दिया है कि मैंने उक्त पोस्ट पर भारतीय ज्ञान की उपेक्षा की है .यहाँ मैं विनम्रता के साथ यह कहना चाहता हूँ कि जब सवाल आदमी की जान से जुडा हो तो हमें अकादमीय बहसों में नही पड़ना चाहिए - प्राच्य ज्ञान बेहतर है या पश्चिम का ज्ञान इसके चक्कर में बेचारा रोगी तो दम ही तोड़ देगा .जैसा कि हर साल ऐसे ही झमेले में पड़ कर लोग जान गवाते रहते हैं और एनोनीमस भाई लोग अप्रत्यक्ष तौर पर ही सही ऐसी मौतों के जिम्मेदार बनते हैं ।
मैं यहाँ विज्ञान का उपदेश देने नही आया .मनुष्य की सोशल ड्यूटी होती है वही निभा रहा हूँ .विभिन्न संचार माध्यमों के जरिये विगत तीस वर्षों से मैं लगातार यह कोशिश करता रहा हूँ कि सर्प दंश के रोगियों की संख्या कम हो सके .इसका श्रेय नही लेना चाहता पर समय से हस्तक्षेप के चलते मुझे अपने सामने कुछ लोगों को मौत के मुंह से वापस आ जाने का अनिवर्चनीय सुख साझा करने का अवसर मिला है -जो मेरे जीवन को सार्थकता प्रदान करता है .
मेरे टिटहरी सरीखे प्रयास से और आप लोगों तक यह बात पहुंचा कर ,इस गुजारिश के साथ कि इस बात को आप और लोगों में बाटें ताकि राजा परीक्षित के समय से छाया सर्प अज्ञानता का तमस धीरे धीरे दूर हो सके .
राजा परीक्षित को भी गुमान था कि उन्हें तक्षक नही डस सकेगा -सारी प्राच्य विद्याएँ उनकी जान नहीं बचा सकीं .इस आख्यान के यथार्थ /निहितार्थ को समझना चाहिए .

एनानिमस जी ,विज्ञान में मुल्ले -मठाधीशों के लिए कोई जगह नही होती और न ही यहाँ फतवों के जारी होने का कोई रिवाज ही है .मैं तो सापों के बारे में ये जानकारियाँ महज आप सभी से इसलिए बाँट रहा हूँ ताकि लोगों अकाल मौतों से बचाया जा सके .
अब कुछ काम की बात हो जाय .यह देखा गया है कि कई उन लोगों को जिन्हें धामन [रैट स्नेक ],पंडोल या देढ़हा [वाटर स्नेक ],या वोल्फ स्नेक आदि विषहीन सौंप काट लेते हैं उन पर झाड़ -फूँक का चमत्कारिक -मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है ।और इसका सेहरा ओझाओं सोखाओं के सर दिया बाँध जाता है .
ओझा सोखा तरह तरह के झाम फैलाते हैं -कान में जडी डालते हैं ,जिससे कान के परदे भी फट जाते हैं -नीम की पत्ती खिलायी जाती है जो घबराहट में मीठी लगती है .मनोन्माद में या दर्द से रोगी चिल्लाता है तो उसे साँप का लहर आना बताया जाता है .वह अनाप शनाप बोलता है तो बताया जाता है कि साँप स्वयं बोल रहा है ।इसे स्थानीय भाषा में 'अभुआना 'कहते हैं .आदि आदि .
अब चूंकि रोगी को तो विषैले सौंप ने तो काटा नही है वह इस तरह के आलतू फालतू उपचार के बाद ठीक भी हो जाता है -पी जे देवरस ने इन झाड़ फूंकों का विस्तृत व्योरा अपनी किताब 'द स्नेक आफ इंडिया ' में दिया है .नेशनल बुक ट्रस्ट आफ इंडिया से हिन्दी और अंगरेजी में प्रकाशित इस पुस्तक को पुराने और नयी पीढी को पढने की ,ख़ासकर जिनका संपर्क अभी गावों से बना हुआ है मैं जोरदार सिफारिश करता हूँ .यह साँपों का वेद है .
विषैले सौंप के मामले में झाड़ फूँक की सारी तदबीरें फेल हो जाती हैं और मरीज तिल तिल कर मौत की और बढ़ता रहता है .जिसका जिक्र कल .......

Wednesday, 2 July 2008

शुरू हो गया सर्पदंश से मौतों का सिलसिला ....

यह हैं सापों के लम्बरदार और सबसे अधिक मानव मौतों के जिम्मेदार नाग महराज
सापों से मरने का सिलसिला फिर शुरू हो चुका है .अब से अक्टूबर तक अमूमन हर रोज अखबारों की सुर्खियाँ आपको सापों से हो रही बेमौत मौतों का दास्तान बयान करती रहेंगी .यह एक वार्षिक त्रासदी है .भारत में हर वर्ष तकरीबन ३०००० लोग साँप काटने से मरते हैं ।मैंने इस भयावह त्रासदी को कोई तीसेक साल से जाना समझा है ।ये मौते रूक सकती हैं .ऐसा भी हो सकता कि एक भी मौत सौंप काटने से न हो .लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नही हो पा रहा है .कारण ?

सबसे बडा कारण भोले भाले ग्रामीणों के अंधविश्वास हैं .साँप काटने पर गावों में जो चिल्ल पों मचती है उसे आप सब ने देखा होगा .सबसे पहले लोग ओझा सोखा के पास लेकर रोगी को भागते हैं .अब साँप है तो उसको लेकर जितनी मुंह उतनी बातें -कोई बह्चरिया साँप का विष उसी साँप को बुलाकर खींच लेने का दावा करता है तो कोई जडी बूटी से काटे के इलाज का दंभ भरता है ।कोई मरीज को तुरत फुरत मस्जिद मजार वाले फकीर के पास ले जाने कि जिद करता है .नतीजा यह कि ज्यादातर मामलों में बिचारा मरीज बेमौत मारा जाता है .


सर्पदंश के शिकार व्यक्ति की बड़ी ही दुर्दांत मौत होती है -वह लकवाग्रस्त हो जाता है .जबान भी इसलिए बेकार हो जाती है ...बोल नही पाता ..संज्ञा बनी रहती है बस वेचारा असहाय लोगों को देखता निहारता अपनी बेबसी और लाचारी लिए संसार से विदा हो जाता है -सर्प दंश की मौत इसलिए ही दुसह दुःख देने वाले मानी जाती है .आप आश्चर्य करेंगे पूरे भारत में महज ४ ही साँप ऐसे हैं जिनके काटने से लोग मरते हैं -कोबरा ,करईत ,और वाईपर की दो प्रजातियाँ जो महाराष्ट्र और कुछ जगहों पर ही मिलती हैं -ज्यादातर तो यही कोबरा यानी नाग और करईत ही लोगों के मौत के जिम्मेदार हैं ।इनका विष नुरोटाक्सिक है यानी स्नायुतंत्र इनकी असर से काम करना बंद करता है ॥फेफडे काम करना बंद कर देते हैं .वाइपेर्स का विष खून को जमा देता है ,रक्त संचार रूक जाता है .


जहाँ का मैं रहने वालाहूँ -पूर्वांचल ,उत्तर प्रदेश -केवल नाग और करईत के गिरफ्त में है .यहाँ प्रतिवर्ष २ हजार लोग साँप काटने से मरते हैं .आख़िर सर्पदंश से बचने का और कारगर इलाज का मन्त्र क्या है ?बस केवल एंटी वेनोम और केवल एंटी वेनोम का इंजेक्सन ही सर्पदंश का शर्तिया इलाज है जो अब सरकार के आदेश से हर पी एच सी -प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर उपलब्ध है .यह पोलीवलेंट है यानी सभी चारों प्रकार के विषैले साँप को काटने पर लगाया जा सकता है -इसे इंट्रावेनस लगाते हैं -सीधे रक्त वाहिका में .अगर सर्पदंश के काटे को ६ घंटों के भीतर यह इंजेक्शन लगवा दिया जाय तो बच जायेगा -इसे गारंटी ही समझिये ।अक्सर यह छः घंटे झाड़ फूक में बीत जाते हैं और फिर कुछ नही किया जा सकता .

क्रमशः ......

Tuesday, 1 July 2008

डिजिटल दुनिया के बाहर भी साईब्लाग की धमक !

मित्रों ,आपके स्नेह और सतत प्रोत्साहन का नतीजा है कि साईब्लाग ने डिजिटल दुनिया के बाहर भी अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी है .आज देश के जाने माने अखबार ,हिन्दुस्तान ने अपने सम्पादकीय पृष्ठ पर इस पर प्रमुखता से टिप्पणी की है .टिप्पणीकार ने तफसील से साईब्लाग के आलेखों और उसके आब्जेक्टिव पर लिखा है ।मुझे संतोष है कि भारत में अब भी काम की कीमत है .आप मुडिया के काम करते रहें तो लोगों की नजर पड़ती है और आपके काम की पहचान होती है .
यह मेरे लिए एक प्रोत्साहन भर है .एक उत्प्रेरण सरीखा बस .न तो मैं यहाँ फूल कर कुप्पा हो गया हूँ और न तो यह डींग मार रहा हूँ कि लो बच्चू मैंने यह कर के दिखा दिया .यह तो विज्ञान के जन संचार के लिए उठा मेरा एक अदना सा कदम है ।हाँ ,ऐसे प्रोत्साहन किसी को भी अपने काम में लगे रहने की प्रेरणा देते हैं .
बहुत बहुत आभार, हिन्दुस्तान, एक सात्विक मुहिम में मुझे 'कन्नी' भर का बल देने के लिए .....उत्साह बढ़ाने के लिए ....और आभार मेरे मित्रों और सुधी पाठकों का कि मेरे इस अकिंचन प्रयास को उन्होंने सर माथे पर रख रखा है .हाँ ,इसने मेरे उत्तरदायित्व और कार्य के प्रति समर्पण को और बढ़ा दिया है -देखता हूँ समय के पृष्ठ पर साईब्लाग कितनी जगह घेर पाता है .