Monday, 11 February 2013

टल जायेगी यह आसमानी बला भी ......!


धरती का एक निकटवर्ती क्षुद्रग्रह -2012 DA14 हमारे काफी पास से 15 फरवरी(2013)  को गुजर जाने वाला है जो किसी आसमानी बला से कम नहीं है . मगर प्रेम दिवस आराम से मनाकर आराम फरमाएं ,कोई खतरा नहीं है। नभ वैज्ञानिकों ने जोड़ घटा कर देख लिया है कि यह  धरती से टकराने वाला नहीं है हालांकि यह धरती से चंद्रमा की कक्षा से भी कम दूरी (27,680किमी ) तक आएगा . यहाँ तक की यह हमारे तमाम भूस्थिर कृत्रिम संचार उपग्रहों (communications satellites) की परिधि के भी भीतर .तक आ जाएगा ,यही नहीं यह अब तक धरती के इतने पास से बिना नुकसान पहुंचाए गुजर जाने वाला सबसे बड़ा क्षुद्र ग्रह है .
यह क्षुद्र ग्रह खुली  आँखों से तो नहीं दिखेगा मगर इसे अंतर्जाल पर दिखाने के इंतजाम किये गए हैं . तो क्या होगा जब यह धरती के सबसे करीब से गुजर जाएगा? उत्तर है कुछ नहीं :-) कम से कम इस बार तो घबराने की कोई बात नहीं है . यह इतने कम गुरुत्व का है कि इसके चलते न तो कोई ज्वार उठेगा और न ही ज्वालामुखी भभक उठेगें . हाँ लगता है अपने टीवी चैनेल और भारत के फलित ज्योतिषी  अभी तक इससे बेखबर हैं नहीं तो अब तक हो हल्ला मच गया होता .
क्षुद्र ग्रह का भ्रमण पथ (साभार ,अर्थस्काई )
हाँ क्षुद्र ग्रहों /ग्रहिकाओं और धूमकेतुओं के धरती से टकराने की संभावनाओं से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता -बहुत से लोग मानते हैं कि धरती पर प्रलय के कई कारणों में से एक ये भी हो सकते हैं . कोई छह करोड़ पहले ऐसे ही एक टकराव से डायनासोर के लुप्त हो जाने के कयास हैं . साईबेरिया के तुंगुस्का क्षेत्र में पिछली शती(1908)  भी ऐसे ही एक महा विस्फोट में बहुत विनाश हुआ था . अब जैसे यही गृह है -पूरा 45 मीटर लम्बा और करीब एक लाख तीस हजार मेट्रिक टन भारी है -धरती से इसके टकराने का मतलब है एक साथ अनेक  परमाणु /हाईड्रोजन बमों का फूट  पड़ना-अर्थात महाविनाश! प्रलय! खुदा न खास्ता ऐसा कोई क्षुद्र ग्रह धरती से टकरा जाय तो 2,4 मेगाटन टी एन टी ऊर्जा निकलेगी -ऐसा ही एक छोटा पुच्छल तारा या क्षुद्र ग्रह जब तुंगुस्का से टकराया था तो सारे रेनडियर जानवर मारे गए थे और पूरा वन क्षेत्र विनष्ट हो गया था हालांकि कोई विशाल गड्ढा नहीं पाया गया है . भारत की लोनार झील के भी किसी क्षद्र ग्रह  के टकराने से वजूद में आने की बात कही जाती है . पुष्कर का विशाल जलाशय भी ऐसी ही बना होगा क्योंकि वहां की जन श्रुतियों में आसमान से एक विशाल ब्रह्म कमल के आ टकराने का जिक्र है . तो ऐसे क्षुद्र ग्रह समूची धरती को तो तबाह नहीं कर सकते मगर हाँ एक भरे पूरे शहर का तो सफाया कर ही सकते हैं।
नक्षत्र विज्ञानी इस पर चौबीसों नज़र रखे हुए हैं कोई फ़िक्र की बात नहीं है . सूरज का इसका परिभ्रमण पथ धरती सरीखा है और यह निरंतर अपने भ्रमण पथ पर धरती से दूर पास आता  जाता रहा है -कहते हैं यह 2020 में फिर करीब से गुजरेगा मगर तब भी टकराहट की संभावना नहीं है !

Tuesday, 25 December 2012

नए वर्ष में आ धमकने वाला है एक धुंधकारी धूमकेतु!

हाँ ,खगोलविदों का तो अनुमान फिलहाल ऐसा ही है .अगली सर्दियों तक एक धुंधकारी धूमकेतु धरतीवासियों के लिए कौतूहल का विषय बनने  वाला है और कहते हैं कि अब तक के धूमकेतुओं में वह सबसे भव्य और चमकदार होगा . किन्तु कई खगोलविद यह भी कहते हैं कि कोई धूमकेतु कैसा दिखेगा यह शर्तिया तौर पर पहले से नहीं कहा जा सकता -क्योकि पिछले हेली और केहुतेक पुच्छल तारों का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा था .नए ढूंढें पुच्छल तारे के इशान (ISON) के बारे में भी कुछ ऐसे ही उहापोह हैं -किन्तु इसके खोजी शौकिया खगोलविदों आरटीओम नोविचोनोक (बेलरस ) और विटाली नेवेस्की(रूस) का  मानना है कि यह एक भव्य प्रदर्शनकारी धूमकेतु बनेगा! बोले तो पूरा धुंधकारी . इसे इसलिए ही अंतर्जाल पर ड्रीम कमेट कहा जा रहा है . यानी धूमकेतुओं के कितने ही सपनो को साकार कर जायेगा ईशान! 
क्या ग्रेट कमेट (1860) यानि ऊपर जैसा ही दिखेगा इसान? 

ईशान का नामकरण इंटरनेशनल सायिनटीफिक ओप्टिकल नेटवर्क का संक्षिप्त रूप है जिसके सदस्य इसके शौकिया खोजकर्ता हैं . यह तब देखा गया जबकि यह सूरज से लगभग 97 करोड़ किलोमीटर दूर था . दरअसल नेपच्यून के भी आगे इन धूमकेतुओं की एक मांद है जिसे ऊर्ट क्लाउड कहते हैं -वहीं से कभी कभार कोई गन्दा सा बर्फ का गोला (डरटी  आईस/स्नो  बाल ) सूरज के गुरुत्व क्षेत्र में आ टपकता है और फिर सूर्य की प्रदक्षिणा एक बहुत ही दीर्घ परिक्रमा पथ पर करने लगता है -ज्यों ज्यों वह सूर्य के निकट आता जाता है बर्फ के पिघलने से उसका प्रभा मंडल बनता(हालो )  बनता है और सौर हवाए पिघलते हिम धूल को सूर्य के विपरीत बहा ले चलती हैं जिनसे इनकी ख़ास पूंछ का निर्माण होता है -भारत में प्रायः इसे पुच्छल तारे के नाम से जानते हैं जबकि संस्कृत के ग्रंथों में इसे केतु कहा गया है ,यहाँ पुच्छल तारों को अशुभ माना जाता है . किन्तु ये संरचनाएं अन्य खगोलीय घटनाओं की तरह सामान्य घटनाएं ही हैं -हाँ खतरा तब हो सकता है जब कोई धूमकेतु पथभ्रष्ट होकर कहीं धरती के परिक्रमा पथ पर आकर धरती से भीड़ न जाय .

यदि अनुमान सच साबित हुए तो यह धूमकेतु आगामी दिसम्बर माह में दिन में भी चन्द्रमा जैसा दिख सकता है .मतलब यह परिमाप में काफी बड़ा लग रहा है . ऐसा भी समझा जा रहा है कि इसान बहुत कुछ 
''ग्रेट कमेट आफ 1680" सरीखा है और वैसा ही उसका भ्रमण  पथ है . अगले अगस्त माह तक इसान धरती से लगभग 32 करोड़ किमी तक आ पहुंचेगा और इसका आभा मंडल बनना शुरू हो जायेगा। और तभी सही अंदाजा भी हो जायेगा कि यह कैसा दिखेगा .  तब तक की आतुर प्रतीक्षा खगोल प्रेमियों को करनी होगी . 

Friday, 21 September 2012

महिलाओं को यौन कर्म घृणित लगता है,जिम्मेदार पुरुष ही होते हैं!


तनिक सोचिये, सहवास (सेक्स) एक तरह से असहज कार्य नहीं है? -पसीना और उसकी दुर्गन्ध,लार,वीर्य -द्रव तथा और भी असहज स्थितियां ! एक सर्वे के मुताबिक़ बहुत से लोगों ख़ास कर आधी दुनिया के नुमायिन्दों को यह बहुत अनकुस(खराब) लगता है मगर वे फिर भी इसके लिए तैयार हो जाती हैं .आखिर क्यों? नीदरलैंड में इस विषय पर शोध किया गया है और एक रिपोर्ट टाईम पत्रिका ने प्रकाशित की है !
शोधार्थियों का अध्ययन बताता है कि सामान्यतः  महिलायें अगर उत्तेजित न की जायं तो उन्हें सहवास में कोई रूचि नहीं होती बल्कि वे इसे एक जुगुप्सा भरा कार्य मानती हैं . उनकी उत्तेजित अवस्था ही उनके जुगुप्सा प्रतिक्रिया को शमित करती है और वे सहवास की उन क्रियाओं -क्रीडाओं में सहयोग करने ;लगती हैं जिन्हें अन्यथा वे पसंद नहीं करतीं . ग्रोनिंजन विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने ९० महिलाओं पर अपने इस प्रेक्षण को प्रमाणित करने के लिए प्रयोग किये . उन्हें तीन समूहों में बांटा. एक समूह को कामोद्दीपक वीडियो दिखाए गए . दूसरे समूह को ऐसे रोमांचक वीडियो दिखाए गए जिनसे शरीर में ऐडरेलिन का प्रवाह बढ़ता हो जैसे रीवर राफ्टिंग और स्काई डाईविंग -इनमें भी वे उद्वेलित हुईं मगर वह कामोत्तेजना से पृथक का उद्वेलन था . तीसरे समूह को कोई सामान्य सा वीडियो दिखाया गया . 
तदनंतर उन्हें कुछ बहुत अप्रिय से ,अनकुस से काम करने को दिए गए जैसे किसी गिलास में कीड़ा (नकली ) पड़े द्रव को पीना,पहले से ही इस्तेमाल हुए टिश्यू पेपर से हाथ साफ़ करना ,ऐसे बिस्किट खाना जो कीड़े के समूह जैसे दिख रहे थे या फिर इस्तेमाल हुए कंडोम के भीतर उंगली डालना. पाया गया कि जिस समूह ने कामोत्तेजक वीडियो देखा था उसने इंगित कामों को करने में अपेक्षाकृत काफी कम असहजता दिखाई. यह साफ़ था कि उनके कामोद्वेलन ने उनकी कई जुगुप्सात्मक प्रवृत्तियों को तिरोहित कर रखा था .
उक्त अनुसन्धान के जरिये शोधार्थियों ने यह प्रमाणित करना चाहा कि सहवास जैसी गतिविधि के  असहज होते हुए भी लोग उसमें इसलिए संलिप्त हो जाते हैं क्योकि वे कामोत्तेजित हो उठते  हैं या कर दिए जाते हैं  -काम -क्रिया विशेषज्ञ  भी महिलाओं के सहवास पूर्व काम -उद्वेलन के पहलू पर पर ज्यादा जोर देते हैं . इस अध्ययन का एक प्रबल पक्ष यह है कि इसके परिणामों के मद्दे नज़र उन महिलाओं जिनका यौन जीवन असामान्य है या जो सेक्स को जुगुप्सा मानती हैं के लिए कारगर सेक्स थिरेपी इजाद हो सकती है . आज भी ऐसे कई मामले सामने आते हैं जिनमें महिलायें सहवास के बाद अपनी अत्यधिक साफ़ सफाई ,बार बार नहाने सरीखे कार्यों में लग जाती हैं . पुरुषों के लिए भी यह अध्ययन महत्वपूर्ण है जिन पर यौन क्रिया के पूर्व यौन -सहकर्मी को पूर्णतया कामोद्वेलित करने का दायित्व होता है .अन्यथा सहवास केवल एकतरफा आनंद बन कर रह जाता है -सहकर्मी के लिए केवल एक त्रासद अनुभव!  यही कारण है कि महिलाओं में सेक्स के प्रति एक विराक्ति भाव घर कर जाता है  और जोड़ों का यौन जीवन असहज और असामान्य हो उठता है जिसके  ज्यादातर जिम्मेदार पुरुष ही होते हैं!  

Friday, 17 August 2012

खटमलों की वापसी


खबर अमेरिका से है ...मगर आज के इस आवागमन युग में इनका आतंक दुनिया में कहीं से कहीं तक भी फ़ैल सकता है . कहते हैं ये  नन्हे वैम्पायर हैं जो मानव खून के प्यासे हैं . वैसे तो खटमल (बेड बग्स ) मनुष्य के साथ उसके गुफा जीवन से ही जुड़े हैं मगर सभ्यता और साफ़ सफाई से इनका आतंक कमतर होता गया. १९४० के बाद से  विकसित देशों में खटमलों का सफाया कीटनाशी रसायनों के चलते पूरी तरह  हो गया .मगर अब इन देशों में कीट नाशी भी ज्यादा इस्तेमाल में नहीं हैं . लोग पूरी दुनिया में घूम रहे हैं और खटमलों को भी सूटकेस और सामानों के साथ ले आ जा रहे हैं .. 
अब अमेरिका में तो इन नन्हे दैत्यों ने ख़ासा उत्पात मचा रखा है . वे होटलों ,घरों ,नर्सिंग होम ,शयन कक्षों .कार्यालयों और सिनेमा घरों में डेरा जमाये बैठे हैं . सबसे बड़ी समस्या यह है कि ये मौसम के भारी अंतरों -तेज गर्मी और ठंड में ,सूखे और सीलन में अपने को बचाए रखने में सक्षम हैं. ज्यादा ठंडक में ये शीत निष्क्रियता में चले जाते हैं . अनुकूल मौसम आते ही सक्रिय हो  उठते हैं ..बिना खाए वर्ष पर्यंत जिन्दा रह सकते हैं ...एक बेडरूम में हजारो की संख्या में हो सकते हैं . ये गद्देदार आसनों के मुरीद हैं ..कुशन और  बिस्तरों को बहुत पसंद करते हैं .गद्दे के पोरों में और इलेक्ट्रिक साकेट में भी पनाह ले लेते हैं . ये रात में आपके खून के प्यासे हो उठते हैं और आपके सांस की गर्मी से सक्रिय हो उठते हैं -इनके ऊष्मा संवेदी अंग -एंटीना आपकी मौजूदगी को सहज ही भांप लेते हैं . 
Photo credit: Utah Department of Health
अगर सुबह उठने पर आपके शरीर पर लाल रैशेज -चकत्ते दिखें तो वे खटमल के काटे हुए निशान भी हो सकते हैं ....बिस्तर पर  लाल धब्बे आपके खून के हो सकते हैं ...अमेरिका में यह सब जानकारी इसलिए दी जा रही है कि वहां कई पीढ़ियों तक लोगों ने खटमल देखा भी नहीं है -मगर भारत की नयी पीढी हो सकता है इनके बारे में न जानती हो मगर पुन्नी पीढियां जो आज बाप दादों की क़तर में हैं इनसे परिचित हैं ....अगर अमेरिकी प्रवासी आपके यहाँ आने वाले हैं तो होशियार रहिये और उन्हें अलग कमरा ,बेड आदि देकर पहले खटमल -निरोधन की व्यवस्था करिए ....नहीं तो ये  अनचाहे विदेशी मेहमान आपके घर में आ घुसेगें और आपको पता भी नहीं लगेगा . 

Sunday, 12 August 2012

विज्ञान और मानविकी की गहराती खाईयां

वैसे तो ब्रितानी वैज्ञानिक और साहित्यकार सी पी स्नो ने विज्ञान और मानविकी विषयों और प्रकारांतर से वैज्ञानिकों और साहित्यकारों के बीच के फासलों को बहुत पहले ही १९५० के आस पास "दो संस्कृतियों " के नाम से बहस का मुद्दा बनाया था मगर आज भी यह विषय प्रायः बुद्धिजीवियों के बीच उठता रहता है कि विज्ञान और मानविकी या फिर वैज्ञानिकों और साहित्यकारों के बीच के अलगाव के कौन कौन से पहलू हैं? हम क्यों किसी विषय को विज्ञान का तमगा दे देते हैं और किसी और को कला या साहित्य का? 

इस विषय पर ई ओ विल्सन जो आज के जाने माने समाज -जैविकीविद हैं ने विस्तार से फिर से प्रकाश डाला है . पहले हम मानविकी का अर्थ बोध कर लें -मानविकी के अधीन प्राचीन और आधुनिक भाषाएँ ,भाषा विज्ञान ,साहित्य और इतिहास ,न्याय ,दर्शन और पुरातत्व ,संस्कृति , धर्म ,नीति शास्त्र ,आलोचना ,समाज शास्त्र आदि आदि विषय आते हैं . दरअसल मानव परिवेश और उसके वैविध्यपूर्ण अतीत,परम्पराओं और इतिहास और उसके आज के जीवन से जुड़े अनेक पहलू मानविकी के अंतर्गत हैं. मगर यह आश्चर्यजनक है कि मानविकी और प्राकृतिक विज्ञान के अनेक अनुशासनों में लम्बे अरसे से कोई उल्लेखनीय समन्वय नहीं रहा है. इस दूरी को कम करने का तो एक तरीका यह है कि इन दोनों अनुशासनों के प्रस्तुतीकरण के तौर तरीकों -लिखने के तरीके में कुछ साम्य सुझाया जाय. मतलब लिखने की शैली और सृजनात्मक तरीकों में कुछ समानतायें बूझी जायं. यह उतना मुश्किल भी नहीं है जितना प्रथम दृष्टि में लगता है . इन दोनों क्षेत्रों के अन्वेषक मूलतः कल्पनाशील और कहानीकार की प्रतिभा लिये होते हैं.

अपने आरम्भिक अवस्था में विज्ञान और कला/साहित्य /कविता की कार्ययोजना एक सरीखी ही होती है. दोनों में संकल्पनाएँ होती हैं -संशोधन और परिवर्धन होते हैं और अंत में निष्पत्ति या अन्वेषण का अंतिम स्वरुप निखरता है- किसी भी वैज्ञानिक संकल्पना या काव्य कल्पना का अंत क्या होगा,निष्पत्ति क्या होगी शुरू में स्पष्ट नहीं होती.....और निष्पत्ति ही शुरुआत की संकल्पना को मायने देती है ...उपन्यासकार फ्लैनेरी ओ कोनर ने वैज्ञानिकों और साहित्यकारों दोनों से सवाल किया था," ..जब तक मैं यह देख न लूं कि मैंने क्या कहा मैं कैसे जान सकता हूँ कि मेरे कहने का अर्थ क्या है?"यह बात साहित्यकार और वैज्ञानिक दोनों पर सामान रूप से लागू होती है -दोनों के लिए निष्पत्ति -अंतिम परिणाम/उत्पाद ही मायने रखता है...एक सफल वैज्ञानिक और एक कवि आरम्भ में तो सोचते एक जैसे हैं मगर वैज्ञानिक काम करता एक बुक कीपर जैसा है-वह आकंड़ो को तरतीब से सहेजता जाता है . वह अपने शोध प्रकल्पों/परिणामों के बारे में कुछ ऐसा लिखता है जिससे वह समवयी समीक्षा (पीयर रिव्यू) में पास हो जाय .समवयी समीक्षा के साथ ही तकनीकी और आंकड़ो की परिशुद्धता भी विज्ञान के परिणामों के दावों के लिए बेहद जरुरी है .इस मामले में एक वैज्ञानिक की ख्याति ही उसका सर्वस्व है. और यह ख्याति प्रामाणिक दावों पर ही टिकी रह सकती है. यहाँ हुई चूक एक वैज्ञानिक का कैरियर तबाह कर सकती है. धोखाधड़ी तो एक वैज्ञानिक के कैरियर के लिए मौत का वारंट है . 

मानविकी साहित्य में धोखाधड़ी के ही समतुल्य है साहित्यिक चोरी(प्लैजियारिज्म).मगर यहाँ कल्पनाओं का खुला खेल खेलने में कोई परहेज नहीं है बल्कि फंतासी /फिक्शन साहित्य की तो यह आवश्यकता है. और जब तक साहित्य की स्वैर कल्पनाएँ सौन्दर्यबोध के लिए प्रीतिकर बनी रहती हैं,उनका महत्व बना रहता है. साहित्यिक और वैज्ञानिक लेखन में मूलभूत अंतर उपमाओं के इस्तेमाल का है ...वैज्ञानिक रिपोर्टों में जब तक दी गयी उपमाएं महज आत्मालोचन और विरोधाभासों को अभिव्यक्त करनें तक सीमित रहती हैं,ग्राह्य हैं. जैसे एक वैज्ञानिक यह लिखे तो मान्य है," यदि यह परिणाम साबित हो पाया तो मैं आशा करता हूँ यह अग्रेतर कई भावी फलदायी परिणामों के दरवाजे खोल देगा " मगर यह वाक्य कदापि नहीं-" हम यह विचार रखते हैं कि ये परिणाम जिन्हें हम बड़ी मुश्किल से प्राप्त कर पाए हैं अग्रेतर परिणामों के ऐसे झरने होंगें जिनसे निश्चय ही शोध परिणामों के कई और जल स्रोत फूट निकलेगें " यह शैली विज्ञान में मान्य नहीं है . 

विज्ञान में शोध के परिणाम का महत्व है और साहित्य में कल्पनाशीलता,उपमाओं की मौलिकता महत्वपूर्ण है. कव्यात्मक अभिव्यक्तियाँ साहित्य में रचनाकार के मन से पाठक तक संवेदनाओं/भावनाओं के संचार का जरिया हैं . मगर विज्ञान का यह अभीष्ट नहीं है बल्कि यहाँ उद्येश्य तथ्यों को वस्तुनिष्ठ तरीके से पाठकों तक पहुंचाते हुए उसके सामने अन्वेषण की सत्यता और महत्व को प्रमाणों और तर्क के जरिये प्रस्तुत कर उसे संतुष्ट करना होता है . साहित्य में भावनाओं को साझा करने की जितनी ही प्रबलता होगी भाषा शैली जितनी ही काव्यात्मक /गीतात्मक होती जायेगी. एक साहित्यकार के लिए सूरज का उगना,दोपहर में शीर्ष पर चमकना और सांझ ढले डूब जाना जीवन के आरम्भ, यौवन का आगमन और जीवन की इति का संकेतक हो सकता है यद्यपि वैज्ञानिक जानकारी के मुताबिक़ सूर्य ऐसी कोई गति नहीं करता ...किन्तु साहित्य में पूर्वजों से चले आ रहे ऐसे प्रेक्षण आज भी मान्य हैं.काव्य सत्य हैं! साहित्य में वैज्ञानिक सचाई कि सूर्य स्थिर है, धरती ही उसके इर्द गिर्द घूमती है समाहित होने में अभी काफी वक्त है!

Sunday, 29 July 2012

खेलों में जेंडर जांच:सवाल दर सवाल


लन्दन ओलम्पिक्स की शानदार शुरुआत हो गयी है ,मगर एक समान्तर खेल और खेला जा रहा है .सेक्स की जांच का खेल .पहले कई पुरुष खिलाड़ी जनाना भेष में ओलम्पिक मेडल तक हथियाते रहे हैं .खेलों में जेंडर जांच की जरुरत इसलिए ही आन पडी ताकि ऐसे छलिया लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा सके ...१९५० से लेकर किसी न किसी रूप में जेंडर जांच २००९ तक बदस्तूर जारी रही .मेडिकल साईंस के उन्नत होने के साथ ही शक के मामलों में खिलाड़ियों के सेक्स के गुणसूत्रों को भी देखा जाने लगा .हम सभी जानते हैं कि एक्स एक्स लैंगिक गुणसूत्र महिलाओं तथा एक्स वाई गुणसूत्र पुरुष के होते हैं .इसके साथ बार बाडी भी देखी जाने लगी जो महिलाओं के मामले मेंप्रत्येक कोशिका के  नाभिक के परत के अंदरुनी हिस्से से जुदा एक धब्बा दीखता है जो एक निष्क्रिय गुणसूत्र एक्स की पहचान बताता है .अब चूंकि महिलाओं में दो एक्स सेक्स गुणसूत्र होते हैं तो एक निष्क्रिय रहता है जबकि पुरुष में एक एक्स सक्रिय होता है तो वह जांच में धब्बा सरीखा नहीं दीखता .मगर ये जांच भी विवादित होते गए ...क्योंकि लैंगिक गुणसूत्रों के में भी विकार पाए जाते हैं .जैसे किसी महिला में दो एक्स के साथ एक वाई भी मिल गया या महज एक ही एक्स गुणसूत्र दिखा -या पुरुष एक्स वाई के साथ एक और एक्स आ गया आदि आदि .लैंगिक गुणसूत्रों के इसी गडबडझाले की वजह से २००९ से ही ओलम्पिक असोसिएशन ने इन लैंगिक गुणसूत्रों की जांच पर रोक लगा दी .
पिछले वर्ष   दक्षिण अफ्रीकी धाविका कैस्टर सेमेन्या का मामला भी विवादित रहा था .पहले तो उन्हें ओलम्पिक असोसिएशन ने खेलने से मना किया मगर बाद में अनुमति मिल गयी .रंगभेद लिंगभेद पर पक्षपात की दुहाईयाँ दी गयीं ,यद्यपि उनकी लैंगिक जांच आज भी सार्वजनिक नहीं हुयी .यहाँ भारत में पिंकी प्रामाणिक का मामला चल ही रहा है ..अदालत ने उनके गुणसूत्रों की जांच का आदेश दिया है .खेल प्रेमियों को इसका बेसब्री से इंतज़ार है . इंटरनेशनल ओलम्पिक कमेटी ने अब से टेस्टोस्टेरान जिसे पुरुष हारमोन भी कह देते हैं के स्तर की जांच का नया मानदंड रख दिया है .यदि किसी महिला खिलाड़ी में इस हारमोन का स्तर एक सीमा से ज्यादा हुआ तो वह महिला प्रतिस्पर्धी के रूप में खेल से बाहर होगी -इस स्तर का निर्धारण विशेषज्ञ करेगें -मतलब अभी भी यह तरीका बहुत पारदर्शी नहीं है .हाँ कहा गया है कि महिला खिलाड़ियों में यह हारमोन पुरुष खिलाड़ियों के स्तर तक नहीं होना चाहिए . 
महिलाओं की एक जन्मजात स्थिति   " कान्जेनायिटल एड्रीनल हायिपरप्लासिया" उनके  बही जनन अंगों में विकृतियों का कारण बनती है और उनकी भगनासा अविकसित नर अंग जैसी लगती है .अब इनकी बाह्य जांच में बड़ी दुविधा उत्पन्न हो सकती है यद्यपि इनमें आंतरिक लैंगिक अंग गर्भाशय और अंडाशय पाए जाते हैं .इसी तरह एक अन्य मामले में एक्स वाई गुणसूत्रों के बावजूद "एंड्रोजेन इन्सेंसिविटी सिंड्रोम " में जेनेटिक तौर पर पुरुष होने के बाद नारी बाह्य अंगों का विकास हो जाता है -उभरे स्तन,अविकसित नारी जननांग मगर अंडाशय और गर्भाशय नदारद .हाँ टेस्टिस पाया जाता है . ऐसे लोगों का शरीर पुरुष हारमोन के प्रति असंवेदनशील रहता है . अब इन्हें किस कटेगरी में रख जाय . 
अब खेलों में टेस्टोस्टेरान के जांच का पैमाना कहाँ तक निरापद और विवादहीन रहेगा यह देखा जाना है . ओलम्पिक कमेटी यह समझती है कि चूंकि यही हारमोन खिलाड़ियों के परफार्मेंस में उनकी शक्ति क्षमता और गति से सीधे जुड़ा है इसलिए इसकी जांच से खेलों के मैदान में बराबरी का स्तर(लेवल प्लेयिंग फील्ड)  बनाए रखा जा सकता है . वैसे इस जांच को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं .कहा जा रहा है कि अनेक ऐसे मामले हैं जिनमें टेस्टोस्टेरान स्तर कम होने पर भी खिलाड़ियों ने अच्छे प्रदर्शन किये हैं और मेडल जीते हैं . क्या लैंगिक जांच का एक पूर्णतया अविवादित जैवीय तरीका अभी भी विकसित होना शेष है?  

Sunday, 22 July 2012

मंगल का मेन्यू अब धरती पर भी ..यम यम!


मंगल अभियान के तहत अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी (नासा) 2030 के वैज्ञानिक अपने मंगल ग्रह अभियान की तैयारियों में करीब 18 साल बाद की मंगल यात्रा के लिए अभी से मेन्यू तैयार करने में व्यस्त हो गए हैं। यह मेन्यू ऐसे व्यंजनों का है जो लम्बे समय तक खराब नहीं होंगे और छह से आठ अंतरिक्ष यात्रियों के हिसाब से पर्याप्त होंगे। लाल ग्रह पर पहुंचने में अन्तरिक्ष यात्रियों को करीब छह महीने का समय लग सकता है और इतना ही वहां से वापसी में। वहां 18 महीने तक रुकना भी है। अब अगर इस दौरान उनका खाना खराब हो गया तो मुसीबत ही हो जाएगी। लिहाजा इनके खाने का विशेष मेन्यू तैयार हो रहा है। आइये एक बानगी लें - हो सकता है यह कभी हमें यहां जमीन पर भी नसीब हो जाए।

नासा के खाद्य वैज्ञानिक ऐसे व्यंजन श्रृंखलाओं को तैयार करने में जुटे हैं जो काफी लम्बे अरसे – माह, बरस, दस बरस तक जैसा का तैसा बने रहेंगे उनके स्वाद में भी फर्क नहीं आएगा। उन्होंने एक ब्रेड पुडिंग तैयार कर ली है जो चार सालों तक जस की तस बनी रह सकती है। पेंटागन में तैयार हुआ एक पाउंड केक पांच वर्षों तक फ्रेश बना रह सकता है। ये मीठे डेजर्ट ही नहीं दूसरे स्टार्टर्स और मेन कोर्स व्यंजन भी अभी बनाए जाने की अवस्थाओं से गुज़र रहे हैं जिन्हें मंगल ही नहीं धरती के फूड स्टोरों और आम रसोईघरों में कई वर्षों तक बिना खराब हुए रखा जा सकता है।

कई लम्बी अवधि तक खाने योग्य बने रहने के वाले व्यंजनों की खेप पहले से ही अमेरिकी बाज़ारों में आ चुकी है। और वैश्विक व्यापार के चलते दूसरे देशों तक भी पहुंच रही है। इनमें एक तो समुद्र की चिकन मानी जाने वाली ट्यूना मछली ही है जो अब एयर टाइट पाउच में उपलब्ध है और पहले से मिलने वाली डिब्बा बंद ट्यूना की तुलना में बेहतर है। यह भी ढाई वर्षों की शेल्फ लाइफ लिए हुए है। दरअसल खाद्य पदार्थों/व्यंजनों को लम्बे समय तक परिरक्षित रखने की प्रौद्योगिकी सेना की आवश्यकताओं के चलते वजूद में आई।

सेना की टुकड़ियों को गंतव्य तक कूच और युद्ध या शान्ति के दौरान बना बनाया - 'मील्स रेडी टू ईट' (MRE) की जरुरत होती है। मगर उनका स्वाद बस माशा अल्लाह ही होता है। पहली बार वैज्ञानिकों ने एक ऐसा टिकाऊ सैंडविच तैयार किया है जो स्वादिष्ट है और बिना रेफ्रीजेरेटर के 3-5 वर्षों तक इस्तेमाल में आ सकता है। इसके भीतर तंदूर (बार्बीक्यूड) चिकन भरा रहता है या फिर पेपरानी। सैंडविच की बाहरी परत एक खाद्य पदार्थ पालीप्रोपेलीन की महीन परत से लैमिनेटेड होती है जो खाते वक्त महसूस ही नहीं होती। और भीतर भरे जाने वाली सामग्री में आर्द्रता शोषित करने वाले अनुमन्य रसायन सार्बिटाल और ग्लिसेराल होते हैं जिससे ब्रेड गीला न होने पाए। इसके चलते ब्रेड पर किसी भी बैक्टीरिया, फफूंद का संक्रमण रुक जाता है।

सुस्वादु सैंडविच को और भी बैक्टेरिया रोधी बनाने के लिए इन्हें पाक विद्या की एक सर्वथा नवीन प्रक्रिया - एचपीपी - हाई प्रेशर प्रोसेसिंग से गुजारा जाता है जिससे स्वाद भी बढ़ता है। इसके तहत व्यंजन को एक 'दबाव कक्ष' के भीतर 87000 पाउंड के दबाव से गुजारा जाता है। इसके चलते सभी बैक्टीरिया मर जाते हैं। इस समय 'हार्मेल नैचरल चॉइस लाइन' बाज़ार में इसी तरह के खाद्य पदार्थों की एक श्रृंखला लेकर आ गयी है। ये व्यंजन ऐसे  लगते हैं जैसे अभी अभी बनाए गए हों। नासा ने जिन व्यंजनों पर ख़ास ध्यान दिया है उनमें - कैरेट क्वायंस, थ्री बीन सैलेड्स, पोर्क चॉप्स, वेजिटेबल  ऑमलेट और ऐप्रीकार्ट कोब्लेर मुख्य हैं।

प्रोसेसिंग और पैकेजिंग के बाद जाह्नसन स्पेस सेंटर में इनका भंडारण होता है और इन्हें लगातार तीन वर्षों तक चख कर चेक करने के बाद ही फिलहाल अन्तरिक्षयात्रियों के लिए जारी किया जाता है।


ऐसे व्यंजन महज सैनिकों और अन्तरिक्ष वासियों के बजाय कई दैवीय आपदाओं, भूकंप, सुनामी आदि से प्रभावित लोगों तक भी पहुंचाये जा सकते हैं। अमेरिका में कैटरीना तूफ़ान के बाद इनका वितरण काफी दुर्गम जगहों पर फंसे लोगों में किया गया जो लम्बे समय तक प्रभावित क्षेत्रों में पड़े रहे। ऐसे व्यंजन निर्माण तकनीकों का सबसे बड़ा लाभ अंततः विकराल होती जनसंख्या के लिए हो सकेगा क्योंकि खाद्य सामग्रियों की बढ़ती खपत के चलते हमें खाद्य परिरक्षण और सुरक्षा की भी जरूरत होगी। आज भी भारत सरीखे विकासशील देश में बिना आधुनिक खाद्य - वितरण प्रणाली और प्रशीतन के 30 प्रतिशत तैयार खाद्य सामग्री खराब हो रही है। कहीं कहीं तो यह नुकसान 70 फीसदी पहुंच गया है । टाईम पत्रिका के अंक 12 मार्च 2012 में ऐसा ही दावा किया गया है। तो यह खाद्य परिरक्षण का मसला केवल अन्तरिक्ष की ऊंचाइयों से ही नहीं जुड़ा है बल्कि जमीनी हकीकत से ज्यादा जुड़ा है।