Wednesday, 15 July 2009

पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (4)-कैसे कैसे लैंगिक संकेत ? (डार्विन द्विशती विशेष )

शु पक्षियों के प्रणय याचन में प्रजाति पहचान का मामला भी बड़ा जटिल है -जहाँ एक सरीखे ही असंख्य प्राणी प्रजातियाँ हों ,यह कैसे सुनिश्चित हो कि प्रेम की अभिव्यक्ति अपनी ही प्रजाति के जोड़े से हो पायेगी ? इसलिए कुदरत ने प्रजातियों को विशेष पहचान चिह्न और प्रणय याचन के तौर तरीकों की अलग सौगात सौंपी है -जिससे कोई भूल चूक हो और सही जोड़े ही प्रणय संसर्ग कर सकें अन्यथा विपरीत प्रजाति सयोगों से वंश बेलि बढ़ नही पायेगी ! इस कुदरती व्यवस्था के चलते क्या मजाल कि कोई एक प्रजाति किसी दूसरी प्रजाति से जोड़ा गान्ठने लगे !

जैव विदों ने उन तौर तरीकों जिनसे किन्ही अलग थलग प्रजातियों में यौनिक संसर्ग होने पाये -प्रजनिक पृथक्करण प्रलाणी ( reproductive isolation mechanism ) कहा है और इनमें प्रणय याचन के अलग अलग तरीके ,अलग अलग प्रणय काल (ब्राडिंग पीरियड ) , शारीरिक बनावट आदि शामिल है विकास की सीढी पर कई निचली श्रेणी के प्राणियों में यद्यपि प्रजनिक पृथक्करण प्रणाली थोड़ी ढीली ढाली सी है -मतलब उनमें विभिन्न गैर प्रजातियों में भी कभी कभार आकस्मिक संकरण हो जाता है ! ऐसा इसलिए भी है की कई निचले स्तर के प्राणियों में बाह्य निषेचन होता है आंतरिक गर्भाधान नहीं.जैसे जब मछलियों की कुछ प्रजातियाँ एक साथ प्रजनन करती हैं तो उनके अंडे और शुक्राणुओं की विशाल फौज जल धाराओं में गुत्थम गुत्था होती रहती हैं और गैर प्रजातियों के शुक्राणु और अंडे आपस में टकरा जाते हैं -सारी बोलने के बजाय वे निषेचन को तरजीह दे देते हैं ,इसलिए प्रकृति में रोहू ,कतला ,नैन मछली प्रजातियों के विभिन्न संकर रूप भी देखने को मिल जाते हैं -ऐसे उदाहरण दूसरे प्राणियों - जानवरों में भी हैं .मगर ऊँची प्रजातियों में गैर प्रजातीय यौन संसर्ग अपवाद हैं -गोरिल्ला और चिम्पांजी के वर्ण संकर नहीं मिलते !

इसी तरह नर मादा के बीच परस्पर पहचान के लैंगिक संकेत भी मुखर होते हैं -मगर यहाँ भी कई प्रजातियों में जैसे कई पक्षी प्रजातियों में लैंगिक पहचान बहुत गौण होती है जहां नर मादा की पहचान मुश्किल है -अब जैसे बुजेरिगर पक्षी (जिसे लव बर्ड कहने का प्रचलन है ) में नर के चोंच के ऊपर का हिस्सा -सेरे ,गहरा नीला होता है जबकि मादा में यही भाग भूरा होता है ! मगर यदि किसी नर की चोंच के इस ऊपरी हिसे को पेंट से भूरा कर दिया जाता है तो दूसरे नर उसी को मादा समझ कर यौन याचन और संसर्ग के प्रयास शुरू कर देते हैं और मादा के भूरे हिस्से को गहरा नीला पेंट कर देने पर नर उसकी ओर से बेरुखी अख्तियार कर लेते हैं !

बुजेरिगर -बाएँ मादा ,दायें नर (चोंच के ऊपर के सेरे से पहचाने ,जो मादा में भूरा और नर में नीला है !)

कई दूसरे लैंगिक संकेत गैर वयस्कों और वयस्कों के बीच फर्क करते हैं जैसे जेब्रा फिंच पक्षी के अवयस्क सदस्यों की चोंच काली होती है और मादा तथा वयस्कों की गहरी लाल -जब इन अवयस्कों की काली चोच लाल नेल पालिश से लाल कर दी गयी तो नर पक्षी यहाँ तक की खुद उनके पिता उनसे यौन संसर्ग पर उतारू हो गए ! उनकी जान फिर से नेल पालिश रिमूवर से लाल रंग हटाने के बाद ही छूटी !


जेब्रा फिंच पक्षी की वयस्क मादा की चोंच लाल होती है और अवयस्क की भूरी
विकास वाद के अनुसार सभी प्राणी एक दूसरे से गहरे सम्बन्धित हैं और उनमें व्यवहार का विकास भी पृथक तौर पर नहीं बल्कि एक क्रमिक रूप में हुआ हैं -ऊपर के अध्ययनों के मानवीय संदर्भ में क्या फलितार्थ /निहितार्थ हैं , अनेक व्यवहार शास्त्री ,समाज जैविकी विद इसे जानने समझने में जुटे हुए हैं !
जारी ......

Tuesday, 14 July 2009

पशु पक्षियों के प्रणय सम्बन्ध (३)-बड़े खतरे हैं इस राह में (डार्विन द्विशती विशेष )

पशु पक्षियों में प्रणय याचन के अनेक भड़कीले प्रदर्शन केवल जीवन साथी को ही आकर्षित नही करते वरन वे कुदरती दुश्मनों ,परभक्षियों को भी सहज ही आकर्षित कर लेते हैं जो की किसी आफत से कम नही है .मादा को रिझाने के विज्ञापन अनुष्ठान (advertisement ritual )खतरनाक शिकारी प्रजातियों को भी आकर्षित करते हैं -टर्र टर्र करते मेढको के झुंड पर सहसा ही कोई चमगादड़ झपट पड़ता है और प्रणय सगीत का आरोह अचानक ही टूट जाता है .दादुर धुन सुन साँप सहज ही प्रणय रती बेसुध /बेखुद मेढक के पास पहुँच उसे दबोच लेता है और प्रणय गीत की जगह सहसा जीवन रक्षा की प्राणेर गुहार सुनाई देने लगती है .बरसात के मौसम में ऐसे आर्तनादों से आपका भे पाला पडा हो शायद -ये आर्तनाद प्रेम की वेदी पर बलि चढ़ जाने वाले बिचारे निरीह प्राणियों की हैं जो अपने समूह /प्रजाति संतति संवहन के लिए यह अनचाहा प्राणोत्सर्ग कर जाते हैं ! मगर यह तो कुदरत की बड़ी बेइंसाफी है .अब प्रणय निवेदन भी गुनाह है ?मतलब प्रणय पुकार का मतलब है जीवन को ही दांव पर लगा देना ?


बचो प्रणयी -कोई झपटने वाला है !

हाँ ,यहाँ एक नाजुक संतुलन की दरकार है -अगर प्रणयी प्राणी ज्यादा तड़क भड़क प्रर्दशित करता है तो वह अपनी मौत को भी आमंत्रित करता है और यह प्रदर्शन तनिक फीका रहा तो जीवन संगिनी का मिलना सम्भव नही और ख़ुद उसके वंश बेली का बढ़ना मुश्किल ! और इन दोनों ही स्थितियों में सम्बन्धित प्राजाति का विलोपन निश्चित है ।कुदरत ने इसलिए प्रजातियों को उनके नाजुक स्थिति /स्तर को देखकर प्रणय प्रदर्शन के अंग वस्त्रम /तौर तरीके सौंपे हैं .जो परभक्षियों के चपेट में नाहे हैं ऐसे पशु पक्षी काफी तड़क भड़क प्रणय प्रदर्शन कर लेते हैं जैसे जहरीले मेढक की प्रणय पुकार बहुत कर्कश होती है ,लंबे समय की होती है क्योंकि कोई परभक्षी उन्हें खाने की जुर्रत नही कर सकता .धोखे मेंपकड़ लिया तो सांप छछूदर की गति मिल जाती है .व्हेलें ज्यादा समय के लिए इसलिए ही गाती हैं की समुद्र में उनका कोई परभक्षी ही नही है -हाँ डालफिन कम देरी तक ही गा पाती है !

मगर जो प्राणी परभक्षियों से घिरे रहते हैं उनमें प्रणय प्रदर्शन ज्यादा तड़क भड़क लिए नही होता .और उनके जीवन संगी भी जल्दी ही रीझ जाते हैं.प्राणि जगत में कई नर बहुत ही तड़क भड़क तरीके से प्रणय संवाद करते हैं ! अब मोर को ही देखिये -यह कितना भव्य लगता है -औरअपने हरम की मादाओं को ही नही हमें भी रिझाता नहीं ? और क्या यही कारण नही है की मोरपंख की खातिर ही कितने मोरों को अपनी जान तक गवानी पड़ती है ! सच है प्रणय के राह में बड़े खतरे हैं -बच के भाई !

जारी.......

Tuesday, 7 July 2009

पशु पक्षियों के प्रणय प्रसंग -2 (डार्विन द्विशती विशेष )

कोर्टशिप यानि प्रणययाचन पर कुछ थियरी पहले हो जाय फिर प्रैकटिकल की भीबारी आयेगी -वो क्या है जब थियरी अच्छी समझी नहीं होती तो फिर प्रयोग भी सध नही पाता ! तो सुधी जन पहले थियरी पर लो मन लगाय फिर प्रयोग की बारी आय !
पहले विद्वानों द्बारा दी गयी प्रणय याचन की परिभाषा को हृदयंगम कर लें -
प्रणय याचन वह विशिष्ट व्यवहार प्रदर्शन है जो रति क्रिया की पूर्व पीठिका तैयार करता है
मगर इसमें बहुत झाम भी हैं -यह मामला बहुत सीधा सादा नही है -प्रेम गली अति साकरी ! प्रणय याचन जिसमें तरह तरह के शरीर सौष्ठव प्रदर्शन ,अठखेलियाँ ,स्वर संधान ,गीत संगीत होते हैं नर और मादा को यौन संसर्ग हेतु उकसाते हैं -अभिमुख करते हैं और उन्हें रति लीला हेतु समंजित करते है .मगर त्रासदी यह है कि संभावनाशील लैंगिक जोड़े केवल मिलन की ही भावना के वशीभूत नही होते उन्हें साथ ही भय और दुविधा की भी भावना आ घेरती है .नर तो बहुधा बहुत आक्रामक हो जाता है ,क्योंकि इसी वक्त उसमें अपनी टेरिटरी -चौहद्दी की रक्षा अपने प्रतिद्वंद्वी नरों से करनी होती है .

कुछ जीवों में तो मादा भी बड़ी आक्रामक हो उठती है - मकडो /मकडियों की कुछ प्रजातियों में नर ज़रा भी असावधान हुआ तो बड़े आकर की मादा उसे चट कर उदरस्थ ही कर लेती है -इसी आदत के कारण एक मकडी प्रजाति चिर वैधव्य से अभिशप्त होती है नाम है ब्लैक विडो स्पाईडर ! इसलिए आत्मरक्षा में नर मकड़े की कई प्रजातियों में यौन प्रदर्शन के सिग्नल मादा को निश्चल कर देने का काम भी करते हैं .

ब्लैक विडो स्पाईडर जो यौन संसर्ग के समय नर को उदरस्थ कर सकती है .



रीढ़ धारी प्राणियों में भी नर के क्षेत्र रक्षण (टेरीटोरियलिज्म ) प्रवृत्ति के कारण यौनोंमत्त नर मादा के प्रति भी आक्रामक हो सकता है -बस यही मुश्किल आन खडी होती है ! मादाएं नर की प्रेम पीगों को डर और भय से भी देखती हैं- समर्पित हों या फिर नयी मुसीबत /जहमत से भाग चलें -यह दुविधा उन्हें आ घेरती है . नर का आक्रामक हाव भाव सेक्स हारमोन टेस्टोस्तेरान के कारण होता है जो आक्रामकता का भी जिम्मेदार होता है .कई प्रजातियों यहाँ तक मनुष्यों में भी प्रणय याचन आक्रामकता लिए होता है और मनुष्य प्रजाति में यौन भावना और आक्रामकता का ऐसा कुछ घालमेल है कि यह कुछ यौन विकृतियों का भी जिम्मेवार हो गया है -कुछa असामान्य लोग बिना आक्रामक आचरण किए यौन तृप्ति नही पाते ,पर यह अलग विषय है !


प्रक्रति ने मादा को प्रणय दौरान नर की आक्रामकता से बचने के लिए कई प्रशान्तिदायक -अपीजमेंट व्यवहारों की सौगात दी है जिसमें अचानक अतिशय विनम्रता ,और समर्पण के हाव भाव और भंगिमाएं शामिल हैं ,एक मछली है यूंटरोप्लस मैक्यूलेटसka जिसमे नर प्रणय लीलाओं के दौरान इतना आक्रामक हो उठता है कि मादा की मानो शामत आ जाती है -ऐसे में एक्वेरिय्म मछलियों के ब्रीडर ऐसे जोड़े के साथ एक दो अतिरिक्त छोटे नरों को रखता है जिन पर यौनोंमत्त नर अपनी आक्रामकता का शमन करता है और मादा के साथ तब जाकर सफल यौन संसर्ग हो
पाता है


यूंटरोप्लस मैक्यूलेटस मछली का प्रणय
जिसमें नर मादा के जोड़े के साथ
और भी एक दो नर रखे जाते हैं ताकि
मादा उसकी आक्रामकता से बची रहे .


जारी .....