Thursday, 1 January 2009

पुरूष पर्यवेक्षण :बलिष्ठ बाहों का जलवा !

मुश्क और इश्क छुपाये नही छुपता :चित्र सौजन्य फ्लिकर
मनुष्य की विकास यात्रा में उसकी चौपाये पशु विरासत से मुक्ति और केवल दो पैरों पर खडा हो जाना एक बड़ी घटना थी. इसे अगले दोनों पावों की हाथों के रूप में मिली स्वच्छन्दता के जश्न के रूप में भी देखा समझा जाता है .अब मनुष्य के हाथ आखेटों /शिकार के दौरान पूरा सहयोग करने को स्वतंत्र हो चुके थे . हाथों के जरिये हथियार फेंकना ,मजबूत पकड़ के साथ कही चढ़ जाना ,किसी विरोधी को मारना पीटना और थपडियाना और यहाँ तक कि उँगलियों से बारीक काम करना मनुष्य की दिनचर्या बनती गयी -अब चूंकि इनमें से ज्यादातर काम पुरूष के जिम्मे था अतः उसकी बाहें विकासयात्रा के दौरान उत्तरोत्तर बलिष्ठ होती गयीं .
हाथ में कंधे से नीचे के ऊपरी हिस्से में अकेली ह्यूमर हड्डी और कुहनी के जोड़ से नीचे की दुकेली हड्डियों -अल्ना और रेडियस ने मनुष्य की दिनचर्या की अनेक उलझनों को संभाल लिया -बताता चलूँ कि कनिष्ठा (कानी ) उंगली की सिधाई में हमारी अल्ना हड्डी होती है तो अंगूठे की सिधाई में रेडियस ! और जो बाँहों की मुश्कें उभरती हैं ..अरे क्या कहा आपने ?आप नहीं जानते मुश्कों को (याद कीजिये वह कहावत -इश्क और मुश्क छुपाये नही छुपते ) हाँ तो वही मुश्कें ह्यूमर हड्डी यानी बाहों के ऊपरी हिस्सों में ही तो उभरती हैं ।और ढेर सारी मांसपेशियां भी हैं जो बाहों को गति देती हैं और तरह तरह के कामों में सहायता करती हैं -ब्रैकियेलिस ,कोरैसो ब्रैकियेलिस ,ट्रायिसेप , फ्लेक्सर ,इक्सेंटर ,प्रोनैटर ,सुयीटर आदि मांसपेशियां हाथों की तरह तरह की गतिविधियों को अंजाम देती रहती हैं -हाथों को आगे पीछे करना ,कलाईयों को घुमाना ,हथेली ऊपर नीचे करना अदि आदि ...नियमित रियाज से बाहों की मुश्कों को काफी उभारा जा सकता है जैसा कि पुरूष सौन्दर्य प्रतियोगिताओं में शरीक हो रहे मिस्टर बनारस से लेकर मिस्टर यूनिवर्स तक का यह प्रिय शगल है जो अपनी अपनी मुश्कें उभार कर अतिशय पौरुष का प्रदर्शन करते हैं .बली ,महाबली और खली बन जाते हैं .मगर कुछ सर्वेक्षणों से आश्चर्यजनक रूप से जो बात सामने आई है वह यह है कि ऐसे "खली " मर्दों की मर्दानगी ज्यादातर महिलाओं को फूटी आँख भी नही सुहाती -व्यवहार मनों- विज्ञानियों का मानना है कि ऐसा इसलिए होता है कि ऐसे पुरुषों की अपने देह यष्टि के प्रति अतिशय विमोह और आत्ममुग्धता के चलते नारियां अवचेतन रूप में उनसे विकर्षित होती जाती हैं .ऐसे आत्मरति इंसानों को अपनी अपनी सहचरी की कहां सुधि ? ऐसे आत्मविमोही नर नारीसौन्दर्य के प्रति सहज रुझान को भी त्याग ख़ुद के ही शरीर को आईने में देख देख आत्मरति की सीमा तक जा पहुँच आत्ममुग्ध होते रहते हैं -अब कोई रूपगर्विता इसे बर्दाश्त भी कैसे कर सकती है भला !-लिहाजा नारियां ऐसे मुश्क वालों से दूर दूर खिंचती जाती हैं .
यद्यपि पुरूष शरीर सौष्ठव की ये पराकाष्ठा नारी को हतोत्साहित करती है तथापि स्वस्थ और संतुलित रूपसे विकसित सुगठित बाहें एक तीव्र लैंगिक संकेत तो संप्रेषित करती ही हैं -कई जैविक लैंगिक विभेदों में बाहों की भी खास भूमिका है .पुरूष की उत्तरोत्तर बलिष्ठ होती बाहों की तुलना में नारी की बाहें अमूमन छोटी ,कमजोर और पतली हैं -इसके पार्श्व में एक लंबे वैकासिक अतीत की भूमिका रही है जिसमें सामाजिक कार्य विभाजनों मेंपुरुषों के जिम्मे नित्य प्रति शिकार करने के दौरान अस्त्र शस्त्र संधान अदि सम्मिलित थे !
(नव वर्ष संकल्प ) प्रत्याखान: (डिस्क्लेमर :यह श्रृंखला महज एक व्यवहार शास्त्रीय विवेचन है,इसका नर नारी समानता /असामनता मुद्दे से कोई प्रत्यक्ष परोक्ष सम्बन्ध नही है )

Sunday, 21 December 2008

विज्ञान कथा पर राष्ट्रीय परिचर्चा -कतिपय चित्र स्मृतियाँ !


कहते हैं कि याददाश्त बेहद ख़राब दोस्त है जो कि ठीक ऐन वक्त पर धोखा दे देती है .इसलिए बनारस में पिछले माह ,नवम्बर में संपन्न राष्ट्रीय विज्ञान कथा परिचर्चा के कुछ फोटो यहाँ सहेज रहा हूँ ताकि धुंधली पड़ती यादों को कभी कभार ताजा कर सकूं ।ऊपर का चित्र है विषय प्रवर्तन का और यह भार मुझे ही वहन करना पडा! डायस
सुशोभित है विज्ञानं कथा के पुराधाओं से -महाराष्ट्र के डॉ वाई एच देशपांडे ,राजस्थान के एस एम् गुप्ता ,दिल्ली से डॉ मनोज पटैरिया (अध्यक्ष ) .जे आर एच विश्विद्यालय के वाइस चांसलर और मशहूर गणितग्य प्रोफेसर एस एन दुबे ( मुख्य अतिथि ),लखनऊ से साहित्यकार हेमंत कुमार , बाल भवन दिल्ली की पूर्व निदेशक डॉ मधु पन्त ,डॉ राजीव रंजन उपाधायाय !

यह चित्र है विशिष्ट प्रतिभागी जनों का ,सामने गेरुए रंग के वस्त्र में दिख रहे हैं पूर्व एयर वाइस मार्शल विश्व मोहन तिवारी जी .
कौन है चित्र में दक्षिण भारत से आयी कई विज्ञान कथा विभूतियाँ हैं .राजस्थान के मशहूर विज्ञान कथा लेखक हरीश गोयल भी हैं ! (नीचे )



नीचे चित्र है उस यादगार पल का जब माईकल क्रिख्तन जिसने जुरासिक पार्क बनायी थी की मृत्यु पर शहनाई की शोक धुन श्रद्धांजलि देते हुए मरहूम भारत रत्न बिस्मिल्ला खां के भतीजे उस्ताद अली अब्बास खान और सहयोगी !

एक प्रतिभागी समूह परिचर्चा का दृश्य है नीचे जिसमें डॉ मधु पन्त के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय की सुश्री रीमा सरवाल ,बिट्स पिलानी की डॉ गीता बी आदि हैं .


एक प्रतिभागी बड़े मनोयोग से क्षेत्रीय भाषाओं के विज्ञान कथा प्रकाशनों को देख रहे हैं .



Saturday, 22 November 2008

कंधे पर लदी पुरूष सौन्दर्य यात्रा !

पुरूष का कंधा नारी के लिए अतीत से आज तक सिर टिकाने को सहज ही उपलब्ध है
Image Reference: VC019055
जी हाँ यह पुरूष पर्यवेक्षण यात्रा तो अब कंधे पर लदे वैताल के मानिंद ही हो चली है ! पर मुझे इसे पूरा करना ही है -तो आगे बढ़ें -
चर्चा पुरूष कन्धों की विशालता को लेकर हो रही थी -चिम्पान्जियों को अपने कंधे तब ऊंचे करने पड़ते हैं जब कोई घुसपैठिया उनकी टेरिटरी में आ धमकता है -ऐसे समय में चिम्पांजी अपने कंधे की एक भयावह भंगिमा बनाता है और उसके कंधे के बाल भी ऊर्ध्वाधर खड़े हो जाते है -घुसपैठिया आम तौर पर भाग खडा होता है .हमारे (पुरुषों) कंधे के एकाध बचे बाल दरअसल आज भी हमें हमारे उसी "बालयुक्त" अतीत की ही प्रतीति कराते हैं .आज हमारे कंधे बाल विहीन से भले हो गए हों मगर अब भी कंधे को भरा पूरा दिखाने के अवसर मिलते रहते हैं और मजे की बात यह कि आज भी एकाध बचे खुचे बाल चिम्पांजी के बाल सरीखे सीधे खड़े हो उठते हैं ।
वे माने या माने पर आज भी पुरुषों का कंधा नारी के बोझिल से हुए सर को एक सकून भरा आसरा देते हैं -एक आम पुरूष की लम्बाई आम नारी से कम से कम पाँच इंच अधिक होती है जिससे पुरूष के ऊंचे कंधे नारी को सिर टिकाने का मानों शाश्वत आमंत्रण देते रहते हैं .पुरूष का कंधा नारी आज भी नारी के सिर को टिकाने के एक सुरक्षित और भरोसेमंद स्थल के रूप में सहज ही उपलब्ध है.यह आश्वस्ति भरा पुरसकून स्थल गुफाकाल से ही नारी के आश्रय के लिए उपलब्ध रहा है ।
अब चूंकि विकास की प्रक्रिया बहुत धीमीहै और जीनों में सहज परिवर्तन भी लाखो वर्षों में होता है अभी भी पुरूष के इस पोस्चर में कोई बदलाव नही आया है .और अभी तो लाखो वर्षों ऐसयीच ही चलेगा भले ही पुरूष अपने शिकारी अतीत को काफी पीछे छोड़ आया है -आफिस में कलम घिस्सू या पी सी के की बोर्ड पर उंगली थिरकू बने रहने के बाद भी पुरूष का कंधा नारी को आराम दिलाने के अपनी आतीत सौहार्द के साथ उपलब्ध है .
क्या कंधे भी देह की भाषा में कुछ योगदान करते हैं ? जी बिल्कुल ! दो स्कंध भंगिमाएं तो बिल्कुल जानी पहचानी हैं .एक तो शोल्डर शेक है तो दूसरा शोल्डर स्रग -पहला तो मनोविनोद के क्षणों मे कन्धों की ऊपर नीचे की गति है तो दूसरा विभिन्न सिचुयेशन में 'मैं नही जानता ' ,'मुझसे क्या मतलब ?','अब मैं क्या कर सकता हूँ ','अब तो कुछ नही हो सकता ' की इन्गिति करता है -आशय यह कि यह भंगिमा नकारात्मक भावों को इंगित करती है .

Wednesday, 19 November 2008

मजबूत कन्धों पर आ टिका अब पुरुष पर्यवेक्षण !

विकास के दौर में जब मनुष्य चौपाये से दोपाया बना तो उसके स्वतंत्र हो गए दोनों बाहुओं के संचालन की एक नयी जिम्मेदारी उस पर आ पडी .लिहाजा बाहुओं को सपोर्ट करने वाले कन्धों को प्रकृति ने मजबूत मांसपेशियों से लैस करना शुरू कर दिया . जिसके चलते हाथों को शिकार पकड़ने में तरह तरह के आयुधों के सहज संधान में काफी सुविधा हुई .जाहिर है पुरुषों के कंधे ऑर बाहें आम स्त्री की तुलनामें मजबूत होते गए .दोनों हाथों के संधि क्षेत्र यानी कंधा पुरूषों में काफी मजबूत होता गया ऑर एक स्पष्ट से लैंगिक विभेद का बायस बन बैठा .पुरुषों का कंधा नारी की तुलना मे ज्यादा चौडा ऑर भारी होता गया है .एक सामान्य पुरुष का शरीर कंधे से नीचे से पतला होता जाता है जबकि ठीक इसके उलट नारी कंधे से नीचे फैलाव पाती जाती है -यह नारी विभेद कूल्हों के चलते और उभर उठता है ।

अब इतने स्पष्ट लैंगिक विभेद के अपने सांस्कृतिक फलितार्थ /निहितार्थ तो होने ही थे .अब पुरुषों को मर्दानगी के प्रदर्शन एक और जरिया मिल गया था .अब कन्धों को उभारने वाली साज सज्जा और अलंकरण का चलन चल पडा .राजा महराजाओं ,राजकुमारों के पहनावों में कंधे उभार पाने लगे -आज भी ज़रा सेना के किसी कमीशंड अधिकारी को देखे कैसा उसका कंधा चौडा और अलंकरणों से लदाफदा होता है .जापानी थियेटर के काबुकी पात्र और अमेरकी फुटबाल खिलाड़ियों के भारी भरकम कन्धों को आपने भी देखा होगा .जापानी पुरुष अपने कंधे को उभारने के लिए जो परिधान -ब्रोकेड पहनता है कामी नारीमू कहलाता है .इसी तरह अमेरिकी फुटबालर अपने कन्धों से अधिक पुरुशवत लगते हैं ।
मगर मजे की बात तो यह है कि इतिहास ऐसे भी उदाहरणों का गवाह बना है जब पश्चिम में नारी मुक्ति आन्दोलनों की कुछ झंडाबरदार जुझारू नारी सक्रियकों ने पुरुष्वत दिखने की चाह में अपने कन्धों को उभार कर दिखाने का उपक्रम शुरू किया .नारी मुक्ति की अगुआ महिलाओं ने १८९० मे ही यह अनुष्ठान आरम्भ कर दिया था -लैंगिक समानता की चाह लिए महिलाओं को मानो 'शोल्डर समानता ' रास आ गयी थी .इस प्रवृत्ति ने फैशन विशेषगयों .इतिहासकारों का धयान अपनी ओर खींचा .ब्रितानी नारियों ने १८९५ के आस पास ऐसी पोशाकें पहननी शुरू की कि ऐसा लगता था कि उस परिधान के स्कंधिका -ब्रोकेड के भीतर फूले हुए गुब्बारे रख दिए गएँ हों .ऐसी मुक्त हो चली नारियां पुरुषों से हर कदम से कदम मिला कर विश्वविद्यालय की डिग्रियां .खेल के मैदानों और उनके पारम्परिक पुरुष कार्य क्षेत्र तक चहल कदमी करने लगीं थीं .मगर यह भी कोई बात हुई कि उनके पुरुष्वत परिधानों के भीतर अभी भी कोरसेट और पेटीकोट मौजूद हुआ करते थे .वे सार्वजनिक रूप से तो पुरुशवत तो हो चली थीं मगर निजी तौर पर कमनीया नारी ही थीं .....जारी !

Friday, 14 November 2008

विज्ञान कथा पर राष्ट्रीय परिचर्चा का समापन ....

विज्ञान कथा पर पहली राष्ट्रीय परिचर्चा ( १०-१४ नवम्बर , 08 ) का कल समापन हो गया ! यदि आपको रुचिकर लगे तो यहाँ आप मिनट टू मिनट कार्यक्रम और यहाँ अतिथि प्रतिभागियों का विवरण देख सकते हैं -कल ही परिचर्चा का समापन हुआ है और आज अचानक ही सब सूना सूना सा हो गया है .पूरे विवरण को ब्लॉग करना है पर शायद कुछ समय लग जाय ,क्योंकि अभी तो सिर पर आयोजक का भूत ही सवार है, रचना धर्मिता डरी सहमी पिछवाडे से झाँक सी रही है की यह मुआ आयोजक हटे तो मैं कुछ अर्ज करुँ -तो मित्रों थोडा सब्र करें ! इस बीच चाँद पर हमारा तिरंगा लहर उठा है -यह हमारे लिए अपूर्व गौरव और स्वाभिमान की बात है .इस पर भी कुछ लिखना है -एक अलग फोरम की मित्र मंडली ने एक चर्चा यहाँ पहले ही छेड़ दी है -आप चाहें तो वहाँ पधार सकते हैं .

Tuesday, 11 November 2008

राष्ट्रीय परिचर्चा -विज्ञान कथा ,सत्र चालू आहे !

मित्रों ,जल्दी जल्दी कुछ बातें -कल उदघाटन सत्र और तीन तकनीकी सत्र पूरे हुए -यह मामला छाया रहा की विज्ञान कथा को मुख्य धारा के साहित्य में लानी के लिए क्या उपाय किया जाना चाहिए -या फिर इसे मुख्य धारा से बचा कर इसकी विधागत शुचिता को बचाए /बनाएं रहना चाहिए .क्योंकि मुख्यधारा की कई बुराईयों के समावेश से यह विधा अपनी विशिष्ट पहचान ही खो देगी .दूसरा मुद्दा यह रहा कि क्या विज्ञान कथा केवल पश्चिमी साहित्यिक सोच की उपज है या फिर इसके उदगम सूत्र भारत में भी तलाशे जा सकते हैं .आम मत से यह तय पाया गया कि भारत में मिथकों के प्रणयन और विज्ञान में फंतासी के प्रगटन में गहरा साम्य है -इन दोनों मुद्दों पर गहन विचार विमर्श से उद्भूत नवनीत -विचार को बनारस दस्तावेज -विज्ञान कथा -०८ में समाहित किया जायेगा .
कल के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जे आर एच विस्वविद्यालय के कुलपति महान गणितग्य प्रोफेस्सर एस एन दूबे थे जिन्होंने विज्ञान कथा की जड़ों को भारतीय पुराणों में स्थित पाया .अध्यक्षता प्रसिद्ध विज्ञान संचारक और राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार परिषद् नयी दिल्ली के निदेशक डॉ पटेरिया ने किया जिन्होंने विज्ञान कथा को विज्ञान के सहज संचार के माध्यम के रूप में विकसित करने पर बल दिया .
भारत की विभिन्न आंचलिक भाषाओं में भी विज्ञान कथा को प्रोत्साहन को बल दिया गया ,मराठी में तो यह पहले से ही समादृत है -
सत्र चालू आहे ......

Monday, 10 November 2008

बनारस में शुरू हुई राष्ट्रीय विज्ञान कथा परिचर्चा !

मित्रों ,मेरी व्यस्तता का अनुमान आप लगा सकते है -उक्त परिचर्चा के संयोजन का भार मेरे ही कमजोर कन्धों पर आ पडा है जो कल से इस धार्मिक नगरी में आरम्भ हो गयी है -कल हम लोगों ने जीशान हैदर जैदी लिखित विज्ञान कथा बुड्ढा फ्यूचर का पुतल रूपांतर देखा .शायद किसी विज्ञान कथा के पुतल रूपांतर का विश्व में यह पहला प्रयास रहा -लोगों ने इस प्रदर्शन की भूरि भूरि प्रशंसा की .दूसरे ,अमेरिकी लेखक और प्रोड्यूसर मार्क लुंड की फ़िल्म फर्स्ट वर्ल्ड का प्रीमियर शो भी हुआ जो यह इंगित करता है कि धरती पर परग्रही आ भी चुके हैं और छुप कर हमसे हिल मिल कर रह रहे हैं .यह तथ्य नासा को भी मालुम है पर वहाँ के लोग अपना होठ सिये हुए हैं ।
.कल ही विश्व विज्ञान दिवस भी था ,इस मौके को लक्ष्य कर हमने इसरो से आए वैज्ञानिक डॉ नेल्लाई एस मुथु से चाँद -कल्पना और यथार्थ पर एक बहुत ही रोचक और जानकारी वाला व्याख्यान सुना .
उक्त परिचर्चा में देश के कोने कोने से लगभग १०० प्रतिभागी आए हुए हैं .
पल प्रतिपल का कार्यक्रम आप यहाँ देख सकते हैं .